9 अप्रैल 2014

आज़म खाँ ने एक हाल ही में कहाँ कि कार्गिल युद्ध मुसलमान सैनिकों की वजह से जीता। बवाल मचने पर बयान से मुकर गए। अंदरखाने की खबर यह है कि वे कहना चाहते थे कि कारगिल में भारत ने तो पूरा ज़ोर लगाया लेकिन जीते हम इसलिए क्यूंकी मुसलमान सैनिक जो पाकिस्तान की सेना में थे भाग गए। जीते ना हम मुसलमान सैनिकों की वजह से।

(वैसे भी भारतीय सेना में इंसान होते हैं)

23 मार्च 2014

क्वीन - उथले तर्क और स्वाभाविक अभिनय वाली मनोरंजक फिल्म

भारतीय फ़िल्मकार न जाने क्यूँ हर बार असफल होते हैं जब वे कोई अच्छे मुद्दे उठाने की कोशिश करते हैं। अक्सर व्यावसायिकता के चलते ऐसे हर मुद्दे को उठाना तो दूर वे उचका भी नहीं पाते। क्वीन भी एक ऐसी ही फिल्म है। सुना था कि यह हीरोइन आधारित फिल्म है जो कि मुंबई फिल्म जगत में एक रिस्की काम है। फिल्म एक मध्यवर्गीय लड़की की शादी से शुरू होती है और लड़के द्वारा शादी से एक दिन पहले मना कर देने जैसे खतरनाक मोड से होती हुयी हनीमून पर अकेले जाने जैसे अभूतपूर्व निर्णय से गुजरती है और अंततः गुजरिया के सस्तेपन में खो कर साधारण रूप से खतम हो जाति है। लड़की अपने हनीमून के टिकट को बेकार ना करते हुये पहुँच जाती है पेरिस। यहाँ उसकी मुलाक़ात भारतीय मानस की एक ऐसी फेंटेसी से होती है जो बड़े अजीब ढंग से दशकों से जस की तस बनी हुयी है – विदेशी औरत – मतलब शराब पीने और सिगरेट पीने वाली व एक ऐसी औरत जो समान्यतः या तो तलाक़शुदा होती है या बिन ब्याही माँ और जो हर समय संगीत की धुन पर मटकती रहती है या सेक्स करती रहती है – इस फिल्म में उसका नाम विजयलक्ष्मी है। यह चरित्र मुख्यतः पेरिस जैसे हाइपरमेट्रोपॉलिटन शहर में रानी की सहायता करता है और हर भारतीय फिल्म चरित्र की तरह फिल्मी है। रानी अनेक पबों, स्ट्रिप क्लबों और ऐसी ही अन्य बदनाम जगहों में घूमती, दारू पीती और एम्स्टर्डम में के एक हॉस्टल में एक रूसी (शायद रुसियों का नाम एलेक्ज़ेंडर कि जगह एलेक्सान्द्र होता है), जापानी जिसे  और फ्रांसीसी लड़कों के साथ रूम शेयर करती एक इतावली को चूमती हुयी आखिर आत्मविश्वास पा लेती है और अपने उस मंगेतर से पीछा छुड़ा लेती है जो अचानक रानी द्वारा निराशा में भेजी चेंजिंगरूम कि एक तस्वीर को देख कर फिर उससे शादी करने की इच्छा जाहिर करता है। मुझ जैसे कहानी प्रिय व्यक्ति को यह समझने में थोड़ी दिक्कत हुयी की रानी को इस यात्रा में आखिर कौन से मूल्यों ने उसे आत्मविश्वास दिया और वह अपने मंगेतर की अंगूठी लौटाने का फैसला करती है।  इस फिल्म की एक किरदार रोक्ज़ेट या रुखसार है जो एक स्ट्रिप क्लब में इसलिए काम करती है कि करने को कोई काम नहीं है, रिसेशन है और जब तक जॉब नहीं है यही है। यह खतरनाक सांस्कृतिक प्रदूषण है। स्ट्रिप क्लबों में काम करने का यह तर्क निश्चित रूप से खतरनाक है और जिस आयु वर्ग के लिए है उसे स्ट्रिप क्लबों कि असलियत भी पता नहीं है। यह अमेरिकी संस्कृति का वह अंग है जिससे खुद अमेरिकी भी परेशान हैं। हाल ही में एक अमेरिकी पिता अपनी बेटी के द्वारा अपनी कॉलेज फीस के लिए पॉर्न फिल्म में काम करने के निर्णय से परेशान नज़र आया। वह बेटी भी शायद हॉलीवुड की ऐसी ही फिल्मों के उथले तर्कों से प्रभावित रही होगी। नारी सशक्तिकरण देह बेच कर नहीं बल्कि देह से मुक्त हो कर संभव है। देह से मुक्ति का मतलब आत्मनिर्णय का अधिकार है। स्ट्रिप क्लब ऐसी जगह नहीं होते जहां आप सुरक्षित घूम सकें। रानी स्ट्रिप क्लब में दोस्तों के साथ प्लेटोनिक भावना के साथ घूमती है जो दरअसल बचकाना है। गूगल पर जाइए और शूटिंग एट स्ट्रिप क्लब्स टाइप करके जान लीजिये कि ये जगहें अपराध, नशा और वेश्यावृत्ति के वे गहरे दलदल हैं जहां अमेरिकी सभ्य समाज नहीं जाता। ये जगहें उतनी ही बदनाम हैं जितनी भारत की सोनगाछी या जी बी रोड बस हालत पैसे के मुताबिक वहाँ चमक दमक ज्यादा है लेकिन शोषण उतना ही है। बताता चलूँ कि रोकजेन नाम से द पुलिस नामक बैंड का एक गाना है भी है जो एक ऐसे लड़के कि तरफ से है जो एक वेश्या को प्यार कर बैठता है और वह इसे ग्लोरीफ़ाई नहीं करता है।
इस फिल्म का मुद्दा एक लड़की का आत्मविश्वास है जिसे पाने का नुस्खा हमारे फ़िल्मकार आजकल बरास्ता पश्चिम, पब और सेक्स में खोज रहे हैं। ह्यू हैफनर (प्लेबॉय पत्रिका के मालिक और अमेरिका में अश्लीलता की गंगा बहाने वाले) के दर्शन वाली आज के “जो दिखता है वही बिकता है” की मार्केटिंग करने वाली, अस्वाभाविक पात्रों वाली हल्की फिल्म में अगर कुछ स्वाभाविक है तो कंगना का अभिनय। दिल्ली कि एक मध्यमवर्गीय लड़की के किरदार में जो स्वाभाविकता है वह फिल्म को मनोरंजक बनाए रखती है।  

11 फ़र॰ 2014

60 वर्ष गए पिक्चर अभी बाकी है

60 वर्ष गए पिक्चर अभी बाकी है
आज भारतीय राजनीति जिस बहुराहे पर खड़ी है वहाँ से आगे जाने का रास्ता सावधानी और उच्च सिद्धांतों के आलोक में तय किया जाना चाहिए। हमारी राजनीतिक व्यवस्था बहुदलीय लोकतन्त्र पर आधारित है और इस व्यवस्था का मुख्य पहलू है दलीय प्रतिस्पर्धा। दुर्भाग्य से आज़ादी के आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाने वाले नेताओं और संस्थाओं ने पार्टियों का रूप लेकर इस प्रतिस्पर्धा का गला घोंट दिया और आज़ादी को महज़ सत्ता हस्तांतरण बना दिया गया। 1947 में चुनावी राजनीति में कांग्रेस और इसके सभी नेताओं से परे कोई सोच नहीं थी और इसी पूर्ण सहमति ने पहले आम चुनाव को जहां अभूतपूर्व रूप से सफल बनाया तो दूसरी ओर इसने बहुदलीय व्यवस्था को अप्रासंगिक बना दिया।  संसदीय व्यवस्थ में विपक्ष का महत्वपूर्ण स्थान होता है और एक मजबूत विपक्ष एक अच्छी सरकार का आश्वासन भी होता है। लेकिन कांग्रेस के सर्वाधिकार ने भारतीय संसदीय व्यवस्था में कभी भी एक मजबूत विपक्ष को उभरने नहीं दिया। आज़ादी को लेकर जो गरिमा, स्फूर्ति और आशा पूरे देश में फैली थी उसे आगे की पीढ़ियों में हस्तांतरित करने की प्रक्रिया को भी इस प्रवृत्ति ने बाधित किया। एकाधिकार और निर्विरोध चुनाव ने कांग्रेस को एक ओर वंशवादी बना दिया तो दूसरी ओर जनता को यथास्थितिवादी। विपक्ष का कमजोर विकास राजनीति में निजी स्वार्थों को सर्वोपरि रखने वाले लोगों के लिए वरदान बन कर आया। ऐसे में कुनिर्णयों, दुर्भाग्य और परिवार्तनों के दौर में सत्ता पर पकड़ बनाए रखने के लिए एकाधिकारवादी और अवसरवादी दोनों ने मिल कर देश की राजनीति को ठीक उन्हीं बिन्दुओं पर ला कर खड़ा कर दिया है जिनसे आज़ादी पाने के लिए हमने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी थी। इसी अवसरवाद ने ठीक अंग्रेजों की तरह भारतीय समाज के तानेबाने में मौजूद सभी दरारों को और बड़ा किया एवं नयी दरारें भी ईज़ाद की गईं। जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्रीयता के जिन मुद्दों के लिए आशा की गयी थी कि स्वशासन के दौर में ये मुद्दे पृष्ठभूमि में चले जाएंगे उन्हीं मुद्दों के सहारे गैर कांग्रेसी दलों ने अपने पैर जमाने की कोशिश की। इस तरह देश की राजनीति ने कल्याणकारी की बजाए जातिवाद, सांप्रदायिकता, क्षेत्रीयता और कट्टरवाद का रास्ता चुन लिया। इस राजनीति ने आज़ादी के बाद के सुनहरे सपनों को ज़मीन पर उतारने की कोशिश करने की बजाए यथास्थितिवाद को प्राथमिकता दी। इस राजनीति ने कर्तव्यबोध और काम करने की संस्कृति की बजाए चापलूसी, भाई भतीजावाद और रिश्वतख़ोरी को जन्म दिया। जनता के मोहभंग और क्षेत्रीय, भाषायी, धार्मिक और जातिवादी राजनीति के कारण जब कांग्रेस का एकाधिकार दरकने लगा तो अब यथास्थिति बनाए रखने के लिए इन्दिरा गांधी द्वारा प्रतिबद्ध नौकरशाही, न्यपालिका और दमन का सहारा लिया गया और फिर आपातकाल जैसे गैर लोकतान्त्रिक कदम भी उठये गए और अंततः पीछे के दरवाजे की राजनीति भी आरंभ हुयी जब कि बूथ कैप्चरिंग, राजनीतिक हत्याएँ, पुलिस और खुफिया तंत्र का इस्तेमाल सत्ता पाने या गिराने में होने लगा। बूथ कैप्चरिंग, आलोकतांत्रिक तरीकों के क्षेत्र में भारत का आविष्कार था। इस तरीके ने राजनीति में अपराधियों के लिए एक बेहतर रोजगार का अवसर पैदा किया और 70 के दशक में बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश में अनेक ऐसे अपराधी बकायदा विभिन्न चुनावी हथकंडों की संगठित सेवा देने लगे। राजनीति और अपराध नजदीक आ गए। प्रतिबद्ध नौकरशाही, न्यायपालिका और पुलिस की अवधारणा ने ट्रांसफर-पोस्टिंग, थानों की नीलामी, पदों की नीलामी और काले धन का प्रचलन बढ़ा दिया। सार्वजनिक जीवन से कर्तव्य, आदर्श और शुचिता के सभी आग्रह समाप्त हो गए और भारतीय जनता अपने संतोषी सदा सुखी को आदर्श मान कर अपने खोल में दुबक गयी। अनेक विफल और अधूरी क्रांतियों के बाद अंततः अब कोई राष्ट्रकवि भी नहीं है। देश के इतिहास में अनेक भीषण मानवीय त्रासदियाँ हुईं पर भारतीय कला चुप रही। समाज की अभिव्यक्ति लुप्त हो गयी। 84 के दंगे हुये, आपातकाल के सितम, नर-संहार, युद्ध, क्रांतियाँ, गरीबी, आतंकवाद और फिर दंगे लेकिन कलाकार, साहित्यकार, संगीतकार चुप रहे। जैसे जैसे देश में निराशा घर कर रही थी कला का फ़लक भी स्याह होता जा रहा था। फिल्मों, संगीत, चित्रकला में उत्तरोत्तर अश्लीलता भी बढ़ रही थी। साहित्य भी चुप ही रहा बल्कि साहित्य भी राजनीतिक-सामाजिक क्षरण के प्रभाव से नहीं बच पाया और इस दौर में प्रकाशस्तंभ की बजाए महज आईना बन कर रह गया। साहित्य भी राजनीति की भांति जातिवादी, खेमेबाजी, धार्मिक और अवसरवादी हो गया। अब हमारे पास कहानीकार नहीं बल्कि दलित या स्त्री या मुस्लिम कहानीकार होते हैं। अब साहित्य रसास्वादन के लिए नहीं बल्कि खेमेबाजी के लिए लिखा जाता है। साहित्य अब राजनीति की B टीम बन गया है। यह वह साहित्य नहीं जो जनसंवेदनाओं को जगाए बल्कि यह उसे भ्रमित करने वाला और बांटने वाला साहित्य है। उयाह कुरीतियों पर कुठराघात नहीं करता बल्कि नयी कुरीतियाँ पैदा और पुष्ट करता है। यह जनता से दूर है और राजनीति के करीब। यह वह आईना है जो उल्टी तस्वीर दिखाता है। यह मूल्यों को पीढ़ियों में हस्तांतरित करने में रुचि नहीं दिखाता। यह नई पीढ़ी के लिए कुछ नहीं देता।
आज़ादी के भंग सपने और जीवन की जद्दोजहद में हमने एक आलसी, यथास्थितिवादी, और असंवेदनशील समाज विकसित कर लिया है। पुरुषार्थ और कर्मवाद के जन्मदाता देश में इन्हीं मूल्यों को खो दिया गया। यह हताशाजनक ही है कि 65 आज़ाद वर्षों बाद भी आज विश्व में सर्वाधिक गरीब, अशिक्षित, कुशासित और प्रदूषित देशों में हम गिने जाते हैं। देश में शिक्षा का जो ढांचा अंग्रेज़ विकसित कर गए थे हम उसी के खंडहरों पर खड़े हैं। शिक्षा के क्षेत्र में नवीनता के नाम पर सिर्फ पब्लिक स्कूल और उनकी विशालकाय इमारतें, भारी बस्ते, भीषण फीस,  ठूँसे हुये दिमाग और ठस शिक्षक ही हैं हमारे पास। कोई नया विचार, आंदोलन नहीं है। सब कुछ सरकार पर निर्भर है।

भारतीय समाज के मानस में अंग्रेजों ने हीन भावनाओं ने जो बीज बोये थे और हमें भरोसा दिलाया था कि हम एक समाज के तौर पर विफल हैं, वे अब फल दे रहे थे। हम एक विफल समाज के रूप में विकसित होते जा रहे हैं। हमारे यहाँ व्यक्तिगत उपलब्धियां बहुत हैं पर सामूहिक सफलताएँ कम। व्यक्तिगत रूप से हम विदेशों में जा कर बड़ी सफलताएँ हासिल करते हैं पर सामाजिक तौर पर हमारी उपलब्धियां शून्य हैं। देश में धन का उदारीकरण तो हो गया पर मन का उदारीकरण होना बाकी है। पुराने मूल्यों को तो हमने त्याग दिया है पर नए श्रेष्ठ मूल्यों का निर्माण अभी बाकी है। देश पुनः एक बहुराहे पर खड़ा है। 

28 जन॰ 2014

राष्ट्रपति के नाम पत्र

महामहिम राष्ट्रपति को पत्र
राष्ट्रपति उद्वेलित हैं । उन्होने अपने भाषण में अपनी व्यथा सामने रखी। लगभग पूरा भाषण वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य के इर्दगिर्द केन्द्रित रहा।
राष्ट्रपति जी आपके भाषण ने मुझे अचंभे में डाल दिया है। प्रश्न उमड़ रहे हैं पर उत्तर नहीं मिल रहे तो सोचा आपसे ही पूछ लूँ।
राष्ट्रपति जी अपने कहा है कि -
 महामहिम जी जनता कभी विश्वासघात नहीं करती बल्कि वह तो विश्वासघात का शिकार होती है। इलेक्शन वाच नामक संस्था ने एक लिस्ट दी है। इसमें वर्तमान कुल 536 लोकसभा सांसदों में से 160 के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं और इनमें 76 के खिलाफ गंभीर किस्म के मामले है। इनमें से 28 सांसद यूपीए के हैं (14 कांग्रेस, 8 सपा और 6 बसपा) और 20 बीजेपी के हैं। क्या संविधान की मूल आत्मा और उसके महान रचयिताओं का यह आशय रहा होगा कि हत्या, अपहरण और बलात्कार के दोषी लोकतन्त्र के मंदिर में बैठ कर उस पवित्र भरोसे को तोड़ें जिसका आपने ज़िक्र किया? क्या आप अपने भाषण में इन्हीं खामियों की ओर इशारा कर रहे थे – सत्ता के लालच के लिए क्या राजनीतिक पार्टियां आत्मतुष्टि और अयोग्यता को प्रश्रय दे कर सर्वोच्च लोकतान्त्रिक संस्था संसद को कमजोर नहीं कर रहीं और लोकतन्त्र में हमारे पवित्र भरोसे का मज़ाक नहीं उड़ा रहीं, जो इस खुले खेल के बावजूद भी 65 वर्षों से कायम है और ईश्वर ही जानता है कि कब तक कायम रहेगा?
आपने कहा है कि चुनाव किसी व्यक्ति को भ्रांतिपूर्ण अवधारनाओं को आज़माने की अनुमति नहीं देते तब शायद आप इंगित कर रहे होंगे कि किस तरह आज बिना स्पष्ट अवधारणाओं के मात्र चुनाव जीतने कि क्षमता को देख कर ही पार्टियां टिकट बँटतीं हैं और सत्ता के लिए बिना स्पष्ट अवधारणाओं के गठबंधन करतीं हैं। क्या आप आज की इस विडम्बना पर तंज़ कसना चाहते थे कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तो कब की विलुप्त हो चुकी है और वर्तमान कांग्रेस असल में कांग्रेस (आई) का ही विस्तार है। इसके पदाधिकारी अक्सर अपनी पार्टी की नीतियों के खिलाफ खड़े हो जाते हैं और विचारधाराओं वाले मंचों पर पारिवारिक कहानियाँ सुनाते हैं। क्या आप कांग्रेस के उस विद्रूप की ओर तो इशारा नहीं कर रहे थे जो इसकी कथनी और करनी में झलकता है। कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ और कांग्रेस खुद पूँजीपतियों के हाथ। वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी बस नाम के लिए समाजवादी है और उसमें वह तमाम तत्व शामिल हैं जिनका समाजवाद से नहीं अराजकतावाद से सीधा नाता जरूर है। उधर भाजपा कि विचारधारा भी दिग्भ्रमित करने वाली है। वे कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। मोदी जी विकास पुरुष बना दिये गए हैं लेकिन गुजरात अभी भी सामाजिक विकास के महत्वपूर्ण मानदंडों पर पिछड़ता जा रहा है, लेकिन मैं भ्रमित हूँ कि आपने “व्यक्ति” क्यूँ कहा ? क्या आप किसी खास व्यक्ति को इंगित कर रहे थे ? बेशक ऐसी स्थिति किसी भी लोकतन्त्र के लिए खतरनाक है जहां सभी जिम्मेदार पार्टियां का कोई विज़न न रह जाए और वे आकंठ भ्रष्टाचार में डूब कर पूँजीपतियों के हाथ का खिलौना बन जाएँ। निश्चित ही आप दुखी हैं कि पार्टियों और सरकारों के लिए जनकल्याण की बजाए स्व कल्याण ही मुख्य मुद्दा रह गया है। आपने सही कहा है कि सरकार कोई खैराती संस्था नहीं है जो अपने सदस्यों की  तिजोरियाँ भरने के काम आए। आखिर कैसे कोई सरकार कैसे देश के संसाधनों को खैरात में बाँट सकती है। कोयला, प्रकृतिक गैस और स्पेक्ट्रम जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों की खैराती बंदरबाँट को कोई कैसे सही मान सकता है।
मैं तब भी भ्रमित हुया जब आपने कहा कि लोकलुभावन अराजकता शासन का विकल्प नहीं हो सकती। आप किस अराजकता की बात कर रहे थे ? राज्य की सम्पूर्ण शक्ति के बावजूद दंगे और हत्याएँ होना 1984, 1991, 2002, 2013 निरंतर अलग अलग सरकारें और पूर्ण सत्ता फिर भी ऐसी अराजकता? घोटालों के गवाहों की जेलों में हत्या, ईमानदार अफसरों और पत्रकारों कि सड़क पर हत्या। नेताओं पर हत्या, रेप और अपहरण के केस दर्ज होना और न्यायालय के आदेश को पुनः इन अपराधी नेताओं के पक्ष में पलट देना भी तो अराजकता ही है – लोकप्रिय अराजकता। राष्ट्रपति जी महाराष्ट्र में गणतन्त्र दिवस के अगले दिन एक नेता द्वारा खुले आम अपने लोगों को चुंगीनाका पर हमला करते और हिंसा करने का आदेश देना, उत्तर भारतियों के खिलाफ मुहिम चलना और निरंतर अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर उगलना यही दिखाता है कि लोकप्रिय अराजकता अब शासन का विकल्प बन चुकी है। ओवैसी के जहरीले भाषणों के बावजूद वे जब सदन में दिखते हैं तो विश्वास पक्का होजाता है कि लोकलुभावन राजनीति अब सुशासन का विकल्प बन चुकी है।


पता नहीं लोग क्यूँ कह रहे थे की आपका भाषण अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी की निंदा है। पर मुझे लगा कि आप भी केजरीवाल की ही भांति हमारी सरकारों, नेताओं और पार्टियों की ही आलोचना कर रहे थे। क्यूंकी जनता के हित के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन और शासन पर हिंसक हमले में वही अंतर है जो लोकतन्त्र और लोकलुभावन अराजकता में हैं। आप केजरीवाल द्वारा बिजली और पानी पर सबसिडी को बेशक खैरात नहीं कह रहे थे क्यूंकी आप महामहिम जानते हैं कि जनकल्याण खैरात नहीं अधिकार है।

गणतन्त्र का नागरिक 

अनुपम दीक्षित 

17 दिस॰ 2013

अन्ना के अनशन का टाइम, लोकपाल बिल का पास होना एक संयोग नहीं हैं। कांग्रेस ने कहा लोकपाल बिल हम पास करेंगे, श्रेय हम अन्ना को देंगे और "आप " को किनारे करेंगे।

11 नव॰ 2013

होनी अनहोनी

गाना था बचपन में सुना था - होनी को अनहोनी कर दें अनहोनी को होनी, अमर अकबर एंथोनि। अपने बौडीवुड (BOWDYWOOD) वाले भी अक्सर बड़ी यूजफूल वस्तुएँ लोकसेवा में अर्पित करते रहते हैं। यह उसी की मिसाल है।
अब देखिये ना। गौहाटी से कैसी गोटियाँ खेली गईं है। याचिका सी बी आई को लेकर दायर हुयी और सरकार के नुमाइंदे कोर्ट में ऐसी कोई दलील नहीं रख पाये जो माननीय जज साहब को संतुष्ट कर पाती कि सी बी आई का गठन पूरी तरह वैध था। तो जो अनहोनी  तय थी वह हो गयी। सी बी आई असंवैधानिक घोषित कर दी गयी और आश्चर्य यह कि जो विपक्ष संसद ठप्प कर कर के जनता को अभी तक चला रहा था उसकी ज़ुबान भी खामोश। रस्म अदायगी के लिए सभी चैनलों ने तीसरी लाइन के नेताओं और दोयम दर्जे के विशेषज्ञों से चर्चा पूरी कर ली और टी आर पी की कृपा से जितने प्रचार मिले जेब में डाले। उधर जनता तो खैर लगी पड़ी है अपने खर्चे पूरे करने में। उसे क्या फरक पड़ रहा है कि सी बी आई सही तरह से गठित हुयी थी या नहीं। उसने तो जब से होश संभाला है यही देखा है कि सी बी आई भले ही कैसे भी गठित हुयी हो उसका गठन ऐसा है कि वह किसी भी तरह के अवैध कार्यों की जांच वैध तरीके से कर ही नहीं पाती। हर महत्वपूर्ण मुद्दे पर उसकी जांच बीरबल की खिचड़ी की तरह अनंत काल के लिए चलती है। सी बी आई कोई उसके लिए तो बनी नहीं जो चेन झपटने, चोरी, डकैती या घूस से उसे निजात दिलाये। 

तो भैया यह एक नया खेल है जिसमें खेल को बदलना होता है (अङ्ग्रेज़ी में गेम चेंजर कहलाता है ) और आज कल यह भारत की युवा राजनीति की देन माना जा रहा है। इसमें अक्सर ही देखने में आता है की किसी मुद्दे की बहस की हवा संवैधानिक या असंवैधानिक सिद्ध करके निकाल दी जाती है। देश के चिरयुवा नेता ने अभी कुछ दिन पहले जनलोकपाल की हवा ऐसे ही संवैधानिक हल दे कर निकाल दी थी। और अब सी बी आई की असंवैधानिकता ने सभी घोटालों की हवा निकाल दी है।  

खैर अभी तक देश में घोटाले होते थे तो लिमिट में पर जब यूपीए को अनलिमिटेड सत्ता जनता ने दी तब देश को कांग्रेस के नेता एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाने लगे और घोटालों की एक अनलिमिटेड सूची सामने आने लगी। कलमाड़ी, राजा राजनीति के धोनी बन कर रोज़ अनहोनी करने लगे और घोटाले की रकम के शून्य बढ़ते बढ़ते अनलिमिटेड हो कर राडिया टेप से होकर कोयला तक पहुँचने लगे तो सी बी आई की मुश्किलें भी बढ़ गईं। कोर्ट की निगरानी से बात हाथ से निकाल गयी। कोयला घोटाले की परतें खोली जाने लगीं तो लगा की देश का पूरा तंत्र असल में सड़ कर कोयले की तरह ही काला हो चुका है।

आए दिन यह कालिख कभी प्रधानमंत्री, कभी गृहमंत्री, विपक्ष, सपक्ष और अपक्ष यानि देश के धन कुबेरों तक उड़ने लगी। अब अनहोनी होने लगी थी। अब कालिख को झाड़ कर साफ करने का वक्त आ चुका था और यही इसी समय यह अनहोनी हुयी की सी बी आई असंवैधानिक घोषित हुयी और माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी गरिमामय हो कर इस पर स्टे लगा दिया। अब सभी प्रकार की जाँचें भी स्टे में ही रहेंगीं। सरकार को राहत मिली।

अब इस होनी और अनहोनी के समय को लेकर आप यह न कहिए की षड्यंत्र है क्यूंकी कवि कह गया है की जब अमर अकबर और एंथोनि (कृपया इसमें भी किसी तरह की साम्यता न खोजें) एक ही जगह जमा हो जाते हैं तो ऐसी होनी अनहोनी होती ही रहतीं हैं। बाकी आप तो खेल का आनंद लीजिये। 

15 मार्च 2013

कच्छ नहीं देखा तो कुच्छ नहीं देखा -3

रण उत्सव : ट्रेन से हम लोग भुज पहुँच कर होटल में रुके। वहाँ रात को चाचा जी, चाची जी और मेरी बहन आयुषी भी अहमदाबाद तक हवाई मार्ग से व भुज तक सड़क मार्ग से आ पहुंचे। उनका कमरा हमने पहले ही ले लिया था। अगले दिन चाचा जी की एक शिष्या, जो प्रशासनिक सेवा में चयनित हो कर अहमदाबाद में ही पोस्टेड है  द्वारा उपलब्ध कराई गयी इनोवा में बैठ कर रण उत्सव की ओर चले। लगभग 12 बजे तक हम टेण्ट सिटी पहुंचे। यहा काउंटर पर हमें तीन दिन के फूड कूपन, कैप, पहचान पत्र इत्यादि मिल गए और पोर्टर सेवा ने हमारा सामान हमारे तयशुदा टेंटों में पहुँच दिया।  इसके बाद सीधे हम लोग डायनिंग हॉल में गए क्यूंकी नाश्ता 12:30 तक ही मिलना था। डायनिंग हॉल पहुँच कर हमें लगा की अगर आगाज ऐसा तो अंजाम कैसा होगा । और आगाज तो बहुत ही अच्छा था। बिना किसी अव्यवस्था के करीने से लगे स्वादिष्ट पकवानों की मेज़ों से आती खुशबू ने भूख बढ़ा दी थी। गुजरती, राजस्थानी और सामान्य पकवानो के विकल्प मौजूद थे। तृप्त हो कर वहाँ से निकले और पहुंचे सीधे अपने टेंट में। यह स्थान बहुत ही खूबसूरत था। अर्ध चंद्राकार में अनेक टेंट लगे थे। A से शायद K तक के ब्लॉक थे और हर ब्लॉक में लगभग 50 टेंट थे। हर टेंट में अटैच बाथरूम था और एसी एवं हीटर दोनों का प्रबंध था। चाय बनाने का सामान व केतली भी मौजूद थी और किसी जरूरत के लिए रूम सर्विस को फोन से इत्तिला दी जा सकती थी। हम सब फ्रेश होकर थोड़ा घूमने निकाल गए। तभी सूचना दी गयी की 3 बजे टूर बसें हडको विलेज और व्हाइट सेंड व सूर्यास्त दिखने के लिए चल पड़ेंगी अतः हम जल्दी से तैयार हो कर बसों के साथ ही निकाल पड़े।

हडको विलेज: यह एक अनावश्यक पड़ाव था और वस्तुतः इस गाँव में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे दर्शनीय कहा जा सकता। मेरी आगामी पर्यटकों से गुजारिश है की यदि आप अपने वहाँ से हैं तो बेहतर है की थोड़ा रुक कर सीधे सनसेट प्वाइंट पहुंचा जा सकता हैं।

श्वेतरज पर सूर्यास्त : मीलों तक जहां दृष्टि जाती थी मानो श्वेत धवल हिम की पर्त बिछी हो। पावों तले नीचे देखने पर काली मिट्टी में मिश्रित यह श्वेतवर्णी  कर्क रेखीय हिम वस्तुतः नमक निकला। कच्छ के इस भाग में  समुद्री पानी अंदर तक चला आता है और तेज़ धूप में पानी सूख कर लवण बच जाता है जी श्वेत पर्त के रूप में मीलों तक फैला दिखाई देता है । अन्वी और विश्वम ने तो एक पोलीथिन ले कर लवण भरने में  मशगूल हो गए। हम सबने यहाँ फोटो खींची। बच्चों ने पतंग भी उड़ाई। कच्छ के मैदान तक जाने के लिए हमने ऊँट गाड़ी भी ले ली थी और बच्चों को तो ऊँट गाड़ी व ऊँट की सवार में बेहद आनंद आया। कच्छ के श्वेत धवल विस्तार के वर्णन के लिए शब्द कम हैं। प्रकृति को सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है, अभिव्यक्त नहीं, फिर मैं कवि भी नहीं। हम सब देर तक धीरे धीरे अस्त होते सूर्य के साथ इस सौंदर्य को पीते रहे। अनेक पर्यटक वहाँ फ़ोटोग्राफ़ी, ऊँट गाड़ी की सवारी और रण के लावणीय जालनिधि के किनारे टहल रहे थे। हमारे दोनों बच्चों को यहाँ बेहद मज़ा आया। सूर्यास्त होने के बाद भी अंधेरा छाने तक हम सब वहाँ रहे और आख़िर में चाय पीते हुए बस में बैठ कर पुनः अपने टेंट में आ गये। जब बस ने हमें छोड़ा तो शाम की चाय का समय हो चुका था अतः हम सब पहले डाइनिंग हाल टेंट में गये। वहाँ चाय और नाश्ते का नायब इंतज़ाम था जिसे हमने पुनः स्वाद लेकर खाया। डाइनिंग हॉल से निकल कर अब टेंट सिटी की ख़ूबसूरती निहारते हुए, वहाँ लगे बाज़ारों में घूमते हुए, फ़ोटो खींचते, खींचते लगभग ९:०० बजे हम पुनः टेंट में पहुँचे और पहुँचते ही संदेश मिला की डिनर के लिए डाइनिंग हाल पुनः तैयार है। हम सब थके थे अतः थोड़ा आराम कर के पुनः डाइनिंग हॉल चल दिये। इस ताँत और डाइनिंग हॉल के अनवरत चक्करों पर हमारे बेटे कि टिप्पणी थी " यहाम हम घूमने आये हैं या खाने, हर समय जब देखो टेंट से डाइनिंग हॉल और डाइनिंग हाल से टेंट" सभी लोगों को उसकी बात बड़ी मज़ेदार लगी लेकिन थी भी सही।
भारत - पाकिस्तान बॉर्डर : अगला दिन तय था टूर कि और से काली पहाड़ी और भारत - पाकिस्तान बॉर्डर तक बस यात्रा का। इस यात्रा में अधिकांश लोगों की रुचि नहीं थी। सिर्फ़ मैं, बहन और चाचा चाची ही गए। यह एक था देने वाली यात्रा थी। सड़क अच्छको नहीं थी और समय काफ़ी लगा। बॉर्डर पर भी देखने या सहने लायक़ कुछ भी नहीं था। ऊँची कँटीली बाड़ों के बीच एक ज़मीन की पट्टी " नो मेंस  लैंड " के तौर पर थी। दूसरी ओर दूर पर कुछ टावर दिखायी दिये । गाइड के अनुसार वे पाकिस्तानी टावर हैं और उनमें पक्सितानी सैनिक घाट लगाये बैठे हैं, जो सिर्फ़ उसे ही दिखायी दिये, बाक़ी सबने आँखें फाड़ फाड़ कर देखने के बाद "ऐंपरर्स न्यू क्लॉथ्स" की भाँति सबने स्वीकार कर लिए की हाँ उसे पाकिस्तानी सैनिक हाथ में बंदूक़ लिए, घात  लगाये बैठे दिखाई दिये हैं। किसी सैन्य बटालियन के दफ़्तर में रुक कर हमने चाय और नाश्ता भी किया। और पुनः एक लंबी थकाऊ यात्रा के बाद देर रात डिनर के समय तक हम फिर टेंट सीटी आ गये। आज यहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी था और इसमें गुजराती पारंपरिक नृत्य और संगीत का कार्यक्रम हुआ जो मनोरंजक था। हम देर रात तक इस कार्यक्रम का आनद लेते रहे और अंततः अपने टेंट में देर रात ही गये। 

15 जन॰ 2013

कच्छ नहीं देखा तो कुच्छ नहीं देखा-2

कच्छ का नक्शा
कच्छ और भुज - भूगोल: भुज एक प्राचीन स्थान है। करीब 10-12 वर्ष पूर्व एक भीषण भूकंप ने इसे नष्ट कर दिया था। तब से यह प्राचीन शहर फिर से उठ खड़ा हुआ है और मानुषी जीजीविषा का उदाहरण है। देश का दूसरा सबसे बड़ा ज़िला कच्छ कई कारणों से विशिष्ट है। कच्छ से कुछ याद आता है आपको..... नहीं? सोचिए क्या यह किसी जानवर का नाम है ----चलिये बताए देते है, कच्छप या कछुए से बना है यह शब्द। असल में बारिश के बाद इस क्षेत्र में पानी भर जाने के कारण यह पूरा क्षेत्र द्वीप बन जाता है और कछुए की पीठ जैसा दिखता हैं। यह क्षेत्र बहुत रोचक है। गुजरात राज्य का यह हिस्सा सिंधु नदी के प्रवाह क्षेत्र का भाग हुआ करता था और जलनिमग्न रहता था लेकिन 1819 के भीषण भूकंप ने इस क्षेत्र का भूगोल बादल दिया। भूकंप से पड़ी दरारों के कारण एक हिस्सा ऊपर उठ गया और सिंधु नदी का मार्ग परिवर्तित हो कर और पश्चिम की ओर चला गया। इस जगह को आज पाकिस्तान के सिंध प्रांत में देखा जा सकता है और इसका बहुत ही उपायुक्त नामकरण हुया है - “ अल्लाह बन्ध”। तो इस तरह यह हिस्सा शुष्क होने लगा। लेकिन आज भी बारिश में यह भूमि पानी से तर हो जाती है और इसकी विशिष्ट मिट्टी दलदल बन जाती है। जब पानी धीरे धीरे वाष्पीकृत हो जाता है या ज़मीन में सोख लिया जाता है तब इस मिट्टी पर नमक की सफेद पर्त जम जाती है। नमक के कारण यह भूमि वनस्पति विहीन है लेकिन फिर भी कहीं कहीं खेती होती नज़र आती है। कटा-फटा होने के कारण इस क्षेत्र में अनेक प्रकृतिक बंदरगाह हैं। मांडवी, कांडला और मूंदड़ा बन्दरगाह प्रमुख व्यस्त बन्दरगाहों में हैं। कच्छ का तटीय प्रदेश मैदानी है और खेती होती हैं। मुख्य रूप से सरसों, कपास और मोटे अनाज उगाये जाते हैं।
कच्छ का दक्षिणी हिस्सा डेक्कन ट्रेप की चट्टानों से बना है और उत्तरी हिस्सा सिंधु, घग्घर और लूनी के जलोढ़ अवसादों से। इनके बीच में रेगिस्तानी रण (रेगिस्तान) है। इसमें भारत के सबसे पुराने डायनासोर अवशेष मिले हैं यद्यपि गुजरात सरकार ने इन्हें प्रमुखता नहीं दी है अपने पर्यटन नक्शे पर।
अन्वी और विश्वम कपास के खेत में - मांडवी से भुज के रास्ते में 
कच्छ में सफर करते समय आपको दूर तक या तो नमक के मैदान नज़र आते हैं या फिर घास वाली ज़मीन। इसे बन्नी मैदान कहते हैं। हाँ जब आप मांडवी की ओर जानते है तो तटवर्तीय इलाकों में सरसों और कपास के खेतों की भूरी और पीली कतारें आपका मन मोह लेतीं हैं( दिसंबर जनवरी में ).

NRI गाँव :  भुज एक छोटा सा शहर है। स्टेशन से होटल तक के रास्ते में भारत के अन्य अधिकांश शहरों की तरह ही झुग्गियाँ और गंदगी आपका स्वागत करती है।  लेकिन अंदरूनी शहर बनिस्बत साफ है और इसका एक कारण मुझे स्थानीय टेम्पो चालक ने बताया कि यह सब निर्माण 9 से 5 वर्ष ही पुराना है । भूकंप के बाद पूर्णतया बर्बाद हो चुके शहर ने फिर अपनी रफ्तार पकड़ ली है और इंडियन एक्सप्रेस अखबार के हवाले से आपको यह भी बताता चलूँ की भुज में विदेशी निवेश भी तेजी से बढ़ा है। भूकंप से पूर्व यह बहुत कम था जबकि पिछले वर्ष तक यहाँ 2000 करोड़ से भी अधिक का निवेश हो चुका है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमने भी देखा। अपनी यात्रा के अंतिम दिन हम मांडवी तट जा रहे थे। रास्ते में एक सूनसान लेकिन खूबसूरत गाँव दिखा। ध्यान गया की यहाँ ज़्यादा चहल पहल नहीं थी लेकिन घर बड़े अच्छे थे परंतु अधिकांश में ताले जड़े हुये थे। टैक्सी ड्राइवर और चाय विक्रेता ने बताया की यह NRI गाँव है। यहाँ के लगभग सभी निवासी एनआरआई हैं और यहाँ सिर्फ केयरटेकर रहते हैं। फिर तो इसे केयरटेकरों का गाँव भी कह सकते हैं। शायद दईसारा नाम था।  


भुज के दर्शनीय स्थल : 

हिल गार्डन :- 
होटल के बाहर - सपरिवार 
हमने 1 जनवरी को भुज पहुँच कर होटल प्रिंस में कमरे लिए और सामान जमा कर नहाया धोया। नाश्ता और आराम करके यह तय किया गया की शाम को पास ही में हिल गार्डन देख लिया जाय। इसके बारे में ममेरे भाई ने पहले ही बता दिया था कि बच्चों के लिए बहुत अच्छा है। हिल गार्डन काफी बड़े क्षेत्र में फैला है और मुख्यतः बच्चों के लिए झूले 
हिल गार्डन 
और राइड्स का बहुत बढ़िया स्थान है। यह रोटरी क्लब द्वारा संचालित है और अनेक लोगों के धर्मार्थ दान से बना है। सभी झूले और पार्क दान दाताओं ने बनवाए हैं और इनका प्रयोग मुफ्त है। पार्क में प्रवेश शुल्क भी मात्र 2 रुपये है। बच्चों ने यहाँ खूब मज़े किए।
 यहाँ एक अक्वेरियम भी है जहां बहुत सी मछलियाँ प्रदर्शित की गईं हैं और साथ में एक विशाल ब्लू व्हेल का कंकाल भी है जो इस अद्भुत और सबसे बड़े जीवधारी के आकार काआभास  दिलाता है 


दुनियाँ के विशालतम जीव ब्लू व्हेल का कंकाल - हिल गार्डन भुज 

कुल मिला कर बच्चों के लिए बढ़िया जगह रही और बच्चे खुश तो बड़े भी खुश। यह देख कर भी सुखद आश्चर्य हुया कि अनेक स्कूल भी यहाँ आए दिन बच्चों को लाते हैं। यह सिलसिला और दिनों भी देखने को मिला जब हम कच्छ संग्रहालय देखने गए। एक छोटा सा लेकिन दर्शकों से भरा संग्रहालय देख कर मन प्रसन्न हो गया।  ऐसा चलन अपने तथाकथित हॉट सिटी शहर गाजियाबाद में तो असंभव ही लगा। यहाँ अव्वल तो पार्क या संग्रहालय हैं ही नहीं और हैं भी तो उनमें बच्चों के खेलने पर मनाही है क्यूंकी पार्क के जॉगिंग रास्ते और पौधे खराब हो जाते हैं और लायन्स व रोटरी क्लब प्रतिवर्ष मेले आयोजित करवाते हैं। काश ऐसा ही कोई प्रयास यहाँ भी होता। गाजियाबाद शहर में भी एक संग्रहालय होना चाहिए। आखिर इस ज़िले का इतिहास भी सिंधु सभ्यता के महत्वपूर्ण स्थल "आलमगीरपुर" से जुड़ा है जो हिंडन नदी के किनारे स्थित था और सबसे पश्चिमी स्थल था। इसके अलावा, महाभारतकालीन,मुगल कालीन और 1857 से जुड़े इस शहर में आज गुंडा राज है और एक ढंग का पुस्तकालय भी नहीं है। घूमने की जगहों के नाम पर ले दे कर मॉल हैं बस। 
हिल गार्डन पार्क का विहंगम दृश्य


शक सम्राट चष्टन का अंधाऊ अभिलेख : कच्छ संग्रहालय भुज 
कच्छ संग्रहालय:  हमारे होटल से नजदीक ही स्वामीनारायण चौक से कुछ दूरी पर एक छोटा सा संग्रहलय है। हमारे पास बहुत समय नहीं था क्यूंकी हमने इसे अपनी यात्रा के अंतिम दिन स्टेशन जाते समय देखा था लेकिन इस संक्षिप्त दर्शन में ही हम बहुत प्रभावित हुये। यहाँ भी हमें 4-5 स्कूलों के बच्चे मिले जिनके उत्साह से संग्रहालय गुंजायमान था। इतिहास और  वर्तमान का मिलन खूबसूरत था। यहाँ धोलावीरा के कुछ अवशेष हैं। सबसे खास है शक क्षत्रपों के तिथि सहित प्रस्तर अभिलेख।भारत में पहला   साम्राज्य चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य ने स्थापित किया था और इसमें महान अशोक जैसा शासक हुआ था। उसने गुजरात पर शासन भी किया था जिसका प्रमाण उसका जूनागढ़ अभिलेख है। मौर्य साम्राज्य के विघटन के बाद इस क्षेत्र में ईसा की पहली शताब्दी में पहले शक फिर कुषाण शासकों का अधिकार रहा। यह दोनों ही भारतीय नहीं बल्कि चीन के पश्चिमी क्षेत्र की क़बायली जनजाति थे। चीनी शासक शी हुआंग ती  द्वारा जब चीनी सीमा पर दीवार खड़ी कर यू-ची जाति को सीमा से भगाया गया और उधर उत्तर में हूणों की गतिविधियों से शक जाति पहले मध्य एशिया  के बल्ख क्षेत्र में सीर दरिया और आमू दरिया के दोआब में बस गयी।यू-ची  तिब्बत और बल्ख पहुंचे और बल्ख में शकों को खदेड़ कर यहाँ बस गए। भगाये गए शक सिंधु नदी पार करके भारत में प्रविष्ट हुयी और भारत में पहलव शासकों को पराजित कर यहाँ दो शाखाओं में बाँट गए। उत्तरी क्षत्रप जो तक्षशिला और मथुरा में थे तथा पश्चिमी क्षत्रप जो नासिक और उज्जैन के शासक थे। ये स्वयं को क्षहरात क्षत्रप कहते थे।उधर यू-ची  भी  भारत आ पहुंचे और बिखरते मौर्य साम्राज्य पर कब्जा कर लिया।  इनका आगमन भारतीय जाति व्यवस्था के लिए असमंजस भरा था। ये विदेशी थे इसलिए अछूत थे परंतु शासक भी थे। केवल यही नहीं कुषाण, पहलव, और ग्रीक भी थे। इनसे अनेक संकर पैदा हो चुके थे अतः यही समय था जब लचीली हिन्दू जीवन शैली ने सत-क्षत्रिय और असत-क्षत्रिय की दो श्रेणियाँ बना कर इन्हें भी क्षत्रिय वर्ण में शामिल कर लिया गया। असल में वर्ण -संकर जैसे सिद्धान्त का जन्म ही इसी आवश्यकता से हुआ क्यूंकी शक्ति और सत्ता के विदेशी स्वामियों को म्लेच्छ कह कर खारिज नहीं किया जा सकता था। बहरहाल गुजरात का यह क्षेत्र ईसा की प्रथम शताब्दियों में एक उथल पुथल भरे दौर से गुजर रहा था। इस क्षेत्र का सबसे प्रसिद्धा राजा चष्टन था। इसके अभिलेखों में कच्छ, सौराष्ट्र और मालवा जैसे प्रदेशों का उल्लेख हुआ है। चष्टन  का 11वे वर्ष का एक अभिलेख यहाँ कच्छ संग्रहालय में है। चष्टन  एवं रुद्रदामन के अन्य अभिलेख भी यहाँ हैं। आपको बताता चलूँ की इन्हीं शक क्षत्रपों के नाम से एक नया संवत शुरू हुया था जिसे शक संवत कहते हैं। यद्यपि इसके आरंभ की तिथि 78 इसवीं है जो कुषाण शासक कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि है। इन विदेशी जनजतियों ने भारत में स्थिरता पायी और इन्हें यहाँ बहुत कुछ सीखने को मिला। भारत के साथ सभी आक्रमणकारियों का यह अनुभव रहा। वे सब यहाँ आए, लड़े और फिर यहीं के हो गए चाहे शक हों, कुषाण हों, तुर्क या मुग़ल हों। जय शंकर प्रसाद की इन पंक्तियों का शायद यही अर्थ भी है -


अरुण यह मधुमय देश हमारा,
जहां पहुँच अंजान क्षितिज को मिलता एक सहारा । 

और तभी विदेशियों के दिल से निकलता है 

"गर फिरदौस बर रूए ज़मीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त।"

यह सभी विदेशी जनजातियाँ यहाँ आयीं और यहाँ की संस्कृति में घुल मिल गईं। वे लुटेरे नहीं थे। उन्होंने यहाँ की दौलत अपने देशों को नहीं भेजी  । और इनके आने से भारतीय संस्तृति और विविधतापूर्ण  हुयी। इस उपमहाद्वीप को हिंदुस्तान नामक देश बनाने में इस प्रक्रिया का भी हाथ है। यही मेल मिलाप का वह आंतरिक सूत्र है जो अंग्रेजों के आने से पहले भी सांस्कृतिक रूप में मौजूद था। यही कारण है कि हिंदुस्तान महज़ एक भौगोलिक इकाई नहीं था जैसा कि अंग्रेज़ इतिहासकारों ने लिखा है बल्कि एक देश था जिसे आप आस पास के अन्य देशों से अलग करके पहचान सकते थे। 
                                     दुनियाँ लोकतन्त्र का जन्मदाता फ्रांस को मानती है पर मेरे विचार से तो भारतीय हिन्दू संस्कृति ही लोकतन्त्र का जीता जागता उदाहरण है । आखिर और कौन सा धर्म इतनी विविधताओं को समेत सकता है वह भी अद्भुत समन्वय के साथ। यहाँ वैदिक देवताओं के साथ ही शैव, शाक्त, गाणपत्य, सौर, वैष्णव, जैन और बौद्ध धर्मों का संगम निरंतर प्रवाहित है।

 मुझे गर्व है अपने भारत पर और अपनी संगमी संस्कृति पर। इसीलिए मैं गुजरात गया और वहाँ की प्रशंसा कर रहा हूँ तो इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं नरेंद्र मोदी जी के हिन्दुत्व प्रयोगों से सहमत हूँ। बेशक गुजरात प्रभावित करता है और उनमें विकास की संभावनाएं हैं परंतु अपनी स्वतन्त्रता की कीमत पर मैं उन्हें स्वीकार नहीं कर सकता पीएम के तौर पर। याद रखिए कि दुनियाँ के सभी तानाशाहों ने बहुत तेज़ आर्थिक विकास का दावा किया था, चाहे वह हिटलर हो, सोवियत रूस के शासक हों, मुसोलिनी, या जापान और चीन हों, लेकिन लोगों और समाज के प्रति उनकी सोच संकुचित, खतरनाक और पश्चगामी थी - इतिहास गवाह है। 


सोमनाथ मंदिर का खंडित बाहरी हिस्सा 
कच्छ मूजियम में वह पखवाड़ा सोमनाथ मंदिर दर्शन पखवाड़ा भी था और इस अवसर पर सोमनाथ मंदिर के कुछ पुराने अवशेष और एक चित्र प्रदर्शनी भी आयोजित की गयी थी। सोमनाथ पर कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी की "जय सोमनाथ" जब से पढ़ी थी सोमनाथ देखने का मन था। यहाँ इस इच्छा की आंशिक पूर्ति हो गयी। अनेक चित्रों और लेखों से समृद्ध यह प्रदर्शनी सोमनाथ के इतिहास के बारे में अनेक तथ्य बताती है। लीजिये आप भी देखिये एक चित्र। पूरा मजा तो वहाँ जा कर ही आएगा। 


धोलावीरा : 
धोलावीरा का प्रस्तर कुंड 
कच्छ के खादर प्रदेश में भुज के उत्तर में स्थित है एक छोटा सा गाँव धोलावीरा डॉ आर एस बिष्ट और उनकी टीम के अद्भुत प्रयासों से आज प्राचीन विश्व इतिहास के नक्शे पर सबसे महत्वपूर्ण जगहों में से एक है। यह युनेस्को के विश्व धरोहर सूची में भी शामिल है। श्री बिष्ट के अथक प्रयासों का आरंभ 1960 ई0 में हुआ था और एक प्राचीन शहर का यह उत्खनन 1990 तक चलता रहा। विभाजन के बाद सिंधु सभ्यता का भारत में स्थित यह सबसे बड़ा स्थल बन गया और साथ ही यह उन छ्ह सैन्धव महानगरों में से अभी सबसे बड़ा है जो आज से तकरीबन 5000 वर्ष पहले भारत की शान हुआ करते थे। जब यूरोप जंगलों में घूम रहा था तब सात नदियों से सिंचित इस प्रदेश के मानव अपने शिल्प, उद्यमशीलता और नवीन प्रयोगों से मानव के भविष्य का इतिहास रचने में व्यस्त थे। सिंधु प्रदेश के इन निवासियों ने न केवल व्यापार और कृषि का विकास किया बल्कि दुनियाँ में सबसे पहली बार व्यवस्थित नगरों , पक्के मकानों, जल प्रबंधन, मानक माप और तौल की प्रणालियाँ और नगर सफाई व्यवस्था का भी ईजाद किया। सिंधु वासियों ने ही विश्व को सुई और कपास से परिचित कराया और सिले वस्त्र बनाए थे। सिंधु सभ्यता ही उस समय एकमात्र ऐसी सभ्यता थी जिसमें पक्की ईटों से बने घर और उनसे निकालने वाली गंदगी के प्रबंधन के लिए पूरे नगर में नालियों की व्यवस्था की गयी थी और सबसे ज्यादा ध्यान इस बात पर जाता है की ये नालियाँ ढँकी हुयी थीं। सफाई का ऐसा आग्रह न जाने आज कहाँ खो गया है! न जाने क्यूँ जिस देश ने आधुनिक शहरी स्वच्छता की नींव डाली उसी के शहर गंदगी से बजबजाते क्यूँ हैं? ढोलावीरा तो इन सभी नगरों में खास था। यह सिंधु नदी के मुहाने पर मनसर और मनहर नदियों के दोआब (आब शब्द फ़ारसी से आया है और इसका अर्थ है पानी या नदी, आबोहवा या आबोदाना भी अब शायद आपको समझ में आगए होंगे और ध्यान पेशाब पर भी गया होगा वैसे संस्कृत "आप" भी इसके नजदीक है  और आपको पता होना चाहिए की संस्कृत और फ़ारसी दोनों बहनें हैं - दोनों ही इंडो-ईरानियन भाषा से निकलीं हैं और ऐसा ही रिश्ता अङ्ग्रेज़ी और हिन्दी का है दोनों भाषाएँ इंडो - यूरोपियन भाषा से निकलीं दो बहनों लैटिन और संस्कृत की बेटियाँ हैं । तो हिन्दी हमारी मातृभाषा है और अङ्ग्रेज़ी मौसी है और मौसी चाहे जितनी अच्छी क्यूँ ना हो माता सदैव प्यारी ज्यादा होती है। इसीलिए यह ब्लॉग भी हिन्दी में है ) में बसा यह शहर एक औद्योगिक महानगर था और शायद सबसे समृद्ध भी। इसका खूबसूरत स्थापत्य और अनोखी जल प्रबंधन व्यवस्था सबसे उल्लेखनीय है। जल प्रबंधन के लिए इस नागर में एक 80 मीटर लंबा विशाल चट्टान को काट कर बनाया गया टैंक अनोखा है। पूरे नगर के चारों ओर कुओं और कृत्रिम तालाबों की एक व्यवस्था थी। ढोलावीरा भारत के अनेक स्थानों से व्यापारियों को आकर्षित करता था जो अपने सामान को सिंधु मुहाने स्थित लोथल बन्दरगाह से मकरान तट, अदन की खाड़ी, लाल सागर और मिस्र व मेसोपोटामिया (आज का ईराक) तक ले जाते थे। 


यहाँ पर्यटकों के रुकने के लिए जीटीडीसी का होटल तोरण है। भुज से अगर आप 6 -7 बजे तक निकल सकें तो यहाँ 12 बजे तक पहुंचा जा सकता है। रोड से यह 230 KM के लगभग है। खाना वगैरह साथ रखें और पहुँचने से पहले ही खा पी लें तो 2 घंटे में आप इस जगह को देख कर अगर 3 बजे तक भी निकाल सकें तो रात 8 बजे तक वापस भुज लौट आएंगे। एक व्यावहारिक सलाह है की अगर साथ में छोटे बच्चे हों तो ऐसा तूफानी दौरा न करें। बच्चों को इन खंडहरों में कोई मज़ा नहीं आएगा। 





क्रमशः 




9 जन॰ 2013

कच्छ नहीं देखा तो कुच्छ नहीं देखा


कच्छ नहीं देखा तो कुच्छ नहीं देखा

गाजियाबाद स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार 
यात्रा की तैयारी और प्रस्थान: मेरे श्वसुर जब से रिटायर हुये हैं अपने अधूरे सपनों को पूरा करने के मिशन पर हैं। वर्षों तक राज्य कर विभाग की शुष्क नौकरी करने के बावजूद जिंदगी में रस वे खोज ही लेते हैं। इस मिशन का आरंभ उनकी अंडमान यात्रा से हुआ था। उसकी प्लानिंग में मैंने सहयोग किया था। उसी दौरान कच्छ के रण उत्सव का प्रचार किसी अखबार में निकला तो उनहोने वहाँ भी नव वर्ष मनाने की ठान ली। अब इतनी यात्रा की प्लानिंग आप करेंगे तो मन में कुबुलाहट तो होने ही लगेगी ना सो मेरे मन में भी कच्छ देखने की लालसा जाग उठी। फिर तीन दिन टेंट में बिताने की बात ही कुछ और है। पर जाने आने और ठहरने में कुल 7 दिन चाहिए थे और भला आजकल की जिंदगी में इतनी बड़ी छुट्टी के बारे में सोचना ही अपने आप में एडवेंचर स्पोर्ट जैसा है। मन फिर भी वहीं लगा रहा। पत्नी भी डॉक्टर है और 7 दिन की छुट्टी मुश्किल है। तो लगभग आइडिया ड्रॉप ही कर दिया था की तभी चाचा जी कानपुर से सपरिवार आए हुये थे। बातों बातों में चर्चा पापा जी की यात्राओं की योजनाओं पर चल पड़ी तो जैसा की होना था आनन फानन में उनहोने भी कच्छ देखने की इच्छा व्यक्त कर डाली। चर्चा हुयी और तय पाया गया की 7 दिन की छुट्टी किसी भी तरह हासिल और प्रबंधित की ही जाए। चाचा जी ने फौरन अपने ट्रेवेल प्लानर को फोन करके 6 ट्रेन टिकट गाजियाबाद से भुज आला हज़रत एकक्स्प्रेस से बुक करने का आदेश दे डाला। फिर क्या था। मैंने भी अगली साप्ताहिक छुट्टी में दिल्ली कनाट प्लेस में स्थित गुजरात टूरिज़म के दफ्तर पहुँच कर टेंट बुक करा ही दिये।एसी टेंट का किराया 9500 रुपये प्रति व्यक्ति था और साथ में प्रत्येक यात्री की फोटो और मुख्य लोगों का पहचान पत्र आवश्यक था। एक टेंट 2 व्यक्तियों के लिए है और अतिरिक्त बिस्तर के लिए 4500 रुपये और लगेंगे। यह एक महंगा सौदा लगा। इसके बाद शुरू हुयी छुट्टियों की प्लानिंग। जैसे तैसे कर के हम सब ने छुट्टियों की प्लानिंग कर ही डाली। बीच में एक वह भी पल आया जब लगा कि अब कोई नहीं जा पाएगा। पर आखिर अमिताभ की पुकार ही भारी पड़ी। इस बीच मैंने इन्टरनेट,  गूगल मैप, यात्रा डॉट कॉम आदि स्रोतों से भुज के मौसम, होटल और दर्शनीय स्थलों की वास्तविकता के बारे में कुछ जानकारी हासिल कर ली। मेरा यात्रा के विषय में यह विश्वास है कि होटलों का चुनाव करते समय अगर आप 5 स्टार के व्यसनी नहीं हैं तो सबसे पहले राज्य टूरिज़म के होटलों को देख लेना चाहिए। ये होटल ना केवल अच्छी जगहों पर स्थित होते हैं बल्कि सस्ते, ठीक ठाक सेवा वाले होते हैं। जिन राज्यों का टूरिज़म विभाग बहुत अच्छा है उनमें मुझे सबसे बढ़िया केरल और गुजरात ही लगा। लेकिन भुज में GTDC (Gujarat Tourism Development Corporation) का कोई होटल नहीं था अतः GTDC की वेब साइट पर ही सुझाए गए एक होटल प्रिस रेसिडेन्सी को चुन लिया। मेरा एक ममेरा भाई भी भुज में 4 वर्षों तक रह चुका था अतः उससे भी जानकारी ले ली गई।उसके अनुसार ही दिन में आप एक स्वेटर या कोट के साथ काम चला सकते हैं लेकिन रात में तापमान 14 डिग्री के करीब पहुँचने पर आपको जैकेट आदि की जरूरत पड़ती है। भुज में हवाएँ तेज़ चलतीं हैं इसलिए टोपी और मफ़लर भी आवश्यक हैं। बच्चों के लिए विशेष तौर पर। बच्चे साथ में थे और मौसम ठंडा था अतः हम यात्री धर्म की एक शर्त निभाने में नाकाम रहे - सीमित सामान। हमारे और पापा जी के मिला कर कुल 14 अदद हो चुके थे और गाजियाबाद स्टेशन पर कुली नहीं मिलते हैं यह सोच कर मैं थोड़ा परेशान था। अतः ड्राइवर के साथ ही ऑफिस में काम करने वाले गुड्डू को भी साथ ले लिया गया। ट्रेन 10:50 AM पर थी और हम ठीक 10 बजे स्टेशन पर पहुँच गए। इसका एक कारण यह भी था कि मैंने सभी को ट्रेन का समय 9:50 एएम बता रखा था। 31 दिसंबर 2012 को गाजियाबाद स्टेशन घने कुहासे में ढका था। स्टेशन की गंदगी, बू और भीड़ से जूझते हमने आखिरकार सारा सामान एक जगह लगा लिया। अब शुरू हुआ ट्रेन का इंतज़ार और जैसी कि स्वाभाविक ही था ट्रेन तय समय से 1 घंटा विलंब से पहुंची। A-1 और B-2 बोगी में हमारी सीटें थीं। सारा सामान जमा कर हम भी अपनी सीटों पर जम गए और ट्रेन चल पड़ी।
आला हज़रत एक्स्प्रेस  से सूर्यास्त 
भारतीय रेलवे की दुर्दशा : दुनिया की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण रेल प्रणाली पर हमें गर्व है लेकिन उतना ही दुख भी कि यह अपने यात्रियों को सही सेवा उपलब्ध नहीं करा पाती। बेहद गंदी और उपेक्षित इस ट्रेन में एसी 2 टायर में भी बाथरूम प्रयोग लायक नहीं थे, कूड़ेदान बजबजा रहे थे और सीटों से काकरोच झांक रहे थे। पर्दे अपनी जगह रहें इसलिए यात्रियों ने ही पिनों और कीलों से उन्हें रोक रखा था। भारतीय रेल को अपनी दशा सुधारनी ही चाहिए। थोड़ा किराया बढ़ा कर अगर व्यवस्था सुधरती हो तो क्या बुरा है? फिर अकेले किराए से ही काम नहीं चलेगा कार्यसंस्कृति भी विकसित होनी चाहिए। कर्मचारियों की ज़िम्मेदारी ताया होनी चाहिए और यात्रियों को भी शिकायत पुस्तिका का प्रयोग करना चाहिए। कम से कम दो क्षेत्र तो ऐसे है जिनमें बिना पैसे बढ़ाए ही सुधार लाया जा सकता है पहला है कि प्रत्येक स्टेशन पर कूड़े की सफाई और बाथरूम की सफाई होनी चाहिए और दूसरा खान पान को ले कर बेहतर विकल्प उपलब्ध होने चाहिए। ट्रेन में जो भी खाना हमने लिया वह बिलकुल भी खाने लायक नहीं था। यह कोई सरकारी खैरात नहीं थी जिसे बिना गुणवत्ता देखे ले लिया जाए जैसा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली या मिड ड़े मील मैं होता है। यहाँ तो हम निजी वेंडरों से पैसे दे कर खाना खरीद रहे हैं। 40 रुपये की प्लेट में चावल, 2 रोटियाँ, तीन सब्जियाँ, पापड़, आचार, गुलाबजामुन और दही शामिल करने की क्या जरूरत है अगर ये सब खाने लायक ही ना हों। इसके बजाए अगर आप 40 रुपये में केवल 4 पूरियाँ और एक सब्जी ही रखें लेकिन वह उचित गुणवत्ता की हो तो अधिक सुकून मिलेगा। दाल में दाल थी ही नहीं और आलू सड़े हुये थे। चावल तो ऐसे कि छूने को बन ना करे। दही तो सफ़ेद पानी था और गुलाब जामुन की तो जाने दीजिये। रेलवे प्रबंधन को इस ओर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। खैर अन्य सभी यात्रियों कि तरह और एक अच्छे भारतीय नागरिक की तरह हमने संतोषी सदा सुखी का आदर्श मानते हुये यात्रा का आनन्द लेने लगे। साथ में और भी कई परिवार थे जो रण उत्सव में ही जा रहे थे। बातें करते और खाने पीने में दिन बीता और रात सोने में। अन्वी ने आस पास के बच्चों से दोस्ती कर ली और सारे रास्ते बतियाते,रूठते मानते रहे। विश्वम ने भी यात्रा का मज़ा लिया और सारे रास्ते गुजरात का इंतज़ार करता रहा। यह उसकी पहली लंबी ट्रेन यात्रा थी। मुझे अपना बचपन याद आ गया। मुझे ट्रेन बहुत पसंद है। इसकी तुलना आप किसी से नहीं कर सकते विशेष तौर पर भाप के इंजन वाली ट्रेन से। ऐसी खूबसूरत मशीन मानव ने शायद ही और कोई बनाई हो। शायद ट्रेन कि इसी हसीन चाल से प्रेरित हो कर दुष्यंत कुमार ने लिखा होगा

 “वोह ट्रेन सी गुजरती है मैं पुल सा थरथराता हूँ”

ट्रेनों और स्टेशनों पर मुझे हमेशा ही अच्छा लगता है। शायद आप महसूस कर सकें कि स्टेशन की आवाजें, बू, स्टाल, यात्रियों की भीड़ और चहल पहल, पीली और सफ़ेद रोशनियाँ, एनाउंसमेंट सब कुछ मिल जुल कर कैसा माहौल बनाते हैं। कम ही होंगे जिनहोने ट्रेन की खिड़की से बाहर पटरियों का तेज़ खेल ना देखा हो। ती इन्हीं विचारों में खोया जागा पहुँच गया गुजरात के शहर भुज।