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23 मार्च 2014

क्वीन - उथले तर्क और स्वाभाविक अभिनय वाली मनोरंजक फिल्म

भारतीय फ़िल्मकार न जाने क्यूँ हर बार असफल होते हैं जब वे कोई अच्छे मुद्दे उठाने की कोशिश करते हैं। अक्सर व्यावसायिकता के चलते ऐसे हर मुद्दे को उठाना तो दूर वे उचका भी नहीं पाते। क्वीन भी एक ऐसी ही फिल्म है। सुना था कि यह हीरोइन आधारित फिल्म है जो कि मुंबई फिल्म जगत में एक रिस्की काम है। फिल्म एक मध्यवर्गीय लड़की की शादी से शुरू होती है और लड़के द्वारा शादी से एक दिन पहले मना कर देने जैसे खतरनाक मोड से होती हुयी हनीमून पर अकेले जाने जैसे अभूतपूर्व निर्णय से गुजरती है और अंततः गुजरिया के सस्तेपन में खो कर साधारण रूप से खतम हो जाति है। लड़की अपने हनीमून के टिकट को बेकार ना करते हुये पहुँच जाती है पेरिस। यहाँ उसकी मुलाक़ात भारतीय मानस की एक ऐसी फेंटेसी से होती है जो बड़े अजीब ढंग से दशकों से जस की तस बनी हुयी है – विदेशी औरत – मतलब शराब पीने और सिगरेट पीने वाली व एक ऐसी औरत जो समान्यतः या तो तलाक़शुदा होती है या बिन ब्याही माँ और जो हर समय संगीत की धुन पर मटकती रहती है या सेक्स करती रहती है – इस फिल्म में उसका नाम विजयलक्ष्मी है। यह चरित्र मुख्यतः पेरिस जैसे हाइपरमेट्रोपॉलिटन शहर में रानी की सहायता करता है और हर भारतीय फिल्म चरित्र की तरह फिल्मी है। रानी अनेक पबों, स्ट्रिप क्लबों और ऐसी ही अन्य बदनाम जगहों में घूमती, दारू पीती और एम्स्टर्डम में के एक हॉस्टल में एक रूसी (शायद रुसियों का नाम एलेक्ज़ेंडर कि जगह एलेक्सान्द्र होता है), जापानी जिसे  और फ्रांसीसी लड़कों के साथ रूम शेयर करती एक इतावली को चूमती हुयी आखिर आत्मविश्वास पा लेती है और अपने उस मंगेतर से पीछा छुड़ा लेती है जो अचानक रानी द्वारा निराशा में भेजी चेंजिंगरूम कि एक तस्वीर को देख कर फिर उससे शादी करने की इच्छा जाहिर करता है। मुझ जैसे कहानी प्रिय व्यक्ति को यह समझने में थोड़ी दिक्कत हुयी की रानी को इस यात्रा में आखिर कौन से मूल्यों ने उसे आत्मविश्वास दिया और वह अपने मंगेतर की अंगूठी लौटाने का फैसला करती है।  इस फिल्म की एक किरदार रोक्ज़ेट या रुखसार है जो एक स्ट्रिप क्लब में इसलिए काम करती है कि करने को कोई काम नहीं है, रिसेशन है और जब तक जॉब नहीं है यही है। यह खतरनाक सांस्कृतिक प्रदूषण है। स्ट्रिप क्लबों में काम करने का यह तर्क निश्चित रूप से खतरनाक है और जिस आयु वर्ग के लिए है उसे स्ट्रिप क्लबों कि असलियत भी पता नहीं है। यह अमेरिकी संस्कृति का वह अंग है जिससे खुद अमेरिकी भी परेशान हैं। हाल ही में एक अमेरिकी पिता अपनी बेटी के द्वारा अपनी कॉलेज फीस के लिए पॉर्न फिल्म में काम करने के निर्णय से परेशान नज़र आया। वह बेटी भी शायद हॉलीवुड की ऐसी ही फिल्मों के उथले तर्कों से प्रभावित रही होगी। नारी सशक्तिकरण देह बेच कर नहीं बल्कि देह से मुक्त हो कर संभव है। देह से मुक्ति का मतलब आत्मनिर्णय का अधिकार है। स्ट्रिप क्लब ऐसी जगह नहीं होते जहां आप सुरक्षित घूम सकें। रानी स्ट्रिप क्लब में दोस्तों के साथ प्लेटोनिक भावना के साथ घूमती है जो दरअसल बचकाना है। गूगल पर जाइए और शूटिंग एट स्ट्रिप क्लब्स टाइप करके जान लीजिये कि ये जगहें अपराध, नशा और वेश्यावृत्ति के वे गहरे दलदल हैं जहां अमेरिकी सभ्य समाज नहीं जाता। ये जगहें उतनी ही बदनाम हैं जितनी भारत की सोनगाछी या जी बी रोड बस हालत पैसे के मुताबिक वहाँ चमक दमक ज्यादा है लेकिन शोषण उतना ही है। बताता चलूँ कि रोकजेन नाम से द पुलिस नामक बैंड का एक गाना है भी है जो एक ऐसे लड़के कि तरफ से है जो एक वेश्या को प्यार कर बैठता है और वह इसे ग्लोरीफ़ाई नहीं करता है।
इस फिल्म का मुद्दा एक लड़की का आत्मविश्वास है जिसे पाने का नुस्खा हमारे फ़िल्मकार आजकल बरास्ता पश्चिम, पब और सेक्स में खोज रहे हैं। ह्यू हैफनर (प्लेबॉय पत्रिका के मालिक और अमेरिका में अश्लीलता की गंगा बहाने वाले) के दर्शन वाली आज के “जो दिखता है वही बिकता है” की मार्केटिंग करने वाली, अस्वाभाविक पात्रों वाली हल्की फिल्म में अगर कुछ स्वाभाविक है तो कंगना का अभिनय। दिल्ली कि एक मध्यमवर्गीय लड़की के किरदार में जो स्वाभाविकता है वह फिल्म को मनोरंजक बनाए रखती है।  

12 नव॰ 2012

Oh My God: भगवान की सही व्याख्या

भगवान को देखा है? कैसा है वह? कहाँ रहता है ? हिन्दू है या मुसलमान? आदमी है या औरत? शक्ल कैसी है? ये और इन जैसे अनेक प्रश्न मनुष्य को आदि काल से मथते आए हैं। इसी मंथन से वेद, उपनिषद, वेदांग, गीता, बाइबल, अवेस्ता, क़ुरान जैसे ग्रंथ निकले हैं। इन्हें किसने रचा कोई नहीं जानता पर इनमें मानव जाति  के सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान का समावेश है। यह ज्ञान है अस्तित्व का, मनुष्य के होने के कारण का, उसकी कठनाइयों का और उसकी जिम्मेदारियों का। यह ज्ञान है मनुष्य के विकास का, उन्नयन का। पशुत्व से मानवत्व के विकास की कुंजी का। यह ज्ञान है आस्था का, भरोसे का और इसी ज्ञान से जब जब भरोसा टूटता है तब तब उसे फिर से स्थापित करने के लिए किसी मुहम्मद, ईसा, कृष्ण या बुद्ध को आना पड़ता है और इन ग्रन्थों की शिक्षाओं को फिर से नए संदर्भों में स्थापित करना पड़ता है। दुनियाँ के सबसे पुराने हिन्दू धर्म में यह प्रवृत्ति स्पष्ट दिखती है। इस धर्म में निरंतार नए तत्वों का समावेश होता रहा है। यह सबको अपने भीतर ले कर चलने वाला सही मायने में लोकतांत्रिकता का प्रतीक है। इसमें सनातन से लेकर पुरातन, नास्तिक, तांत्रिक, अघोर, शैव, शक्त, वैष्णव, बौद्ध, जैन, निरीश्वरवादी और हर तरह का वाद विवाद शामिल होता आया है। यह धर्म हर एक वाद को फलने फूलने का स्पेस देता आया है। इसीलिए जब ओह माई गॉड में कांजी भाई (कान्ह जी - कृष्ण का अपभ्रंश) भगवान को कोसते हैं और मूर्तियों का धंधा चोखा करते हैं तो कोई फतवा जारी नहीं होता। कोई मंत्री करोड़ों के ईनाम की घोषणा नहीं करता। लोग हँसते हैं और कांजी भाई की बातों पर कहीं गहरे ध्यान भी देते है। संतों के विद्रूप पर किसी का सिर कलम करने की घोषणा नहीं होती। OMG मज़ाक में उस धर्म की उस सड़न की ओर इशारा करती है जिसकी दुर्गंध के अब हम आदि हो गए हैं। अनेक बापू, बाबाओं और निर्मलो के चोखे धंधे से पर्दा फ़ाश करती यह फिल्म एक सरहनीय प्रयास है। भगवान का असली स्वरूप तो प्राणियों में है। देखने के लिए ज्ञान चक्षु नहीं प्रेम की दृष्टि चाहिए। एक शायर का कहना है

सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं, जिसको देखा ही नहीं उसको खुदा कहते हैं।

फिल्म कांजीभाई को नास्तिक कहती है और नास्तिक का अर्थ भी बताती है - वह जो प्रमाण में आस्था रखे। यह भारत की ही खूबी है की वैदिक दर्शन को ना मानने वाले नास्तिक दर्शन भी हिंदुओं के ही माने जाते हैं। चार्वाक के लोकायत दर्शन का भौतिकवाद, बुद्ध का क्षणिकवाद और जैन का इंद्रियनिग्रह एक ही समस्या के अलग अलग हल हैं। बौद्ध और जैन धर्मों ने मानवता, अहिंसा और क्षमा पर जो बल दिया है वह असल में इसी तथ्य पर बल है की असली धर्म है प्राणियों के प्रति दया, अहिंसा, शुद्ध विचार और सादा जीवन। आडंबर यज्ञ, कीर्तन, पूजा और मंत्रों से श्रेष्ठ है दया और मन की शुद्धता। मन चंगा तो कठौती में गंगा। दारम की सरलता में ही उसका कल्याणकारी स्वरूप निहित है। आज बापुओं, निर्मलो ने न केवल धर्म को दुकान में बदल दिया है बल्कि उसका विद्रूप भी बना दिया है। खैर दुकानें तो चलती ही रहेंगी संतोष बस इतना  ही है की इनके खिलाफ आवाज़ उठती रहनी चाहिए। जो समाज खुद की आलोचना नहीं करता वह विकसित नहीं हो सकता है।

19 मार्च 2012

डर्टी पिक्चर : एक दुखद कहानी का उत्सव

कहानी है विजय लक्ष्मी की। जिसकी शादी अल्पायु में ही हो गयी। पति और परिवार के निरंतर जुल्मों और महत्वाकांक्षा ने विजयलक्ष्मी को एक साहसी कदम उठाने को मजबूर कर दिया। वह घर से भाग गयी और पहुँच गयी मद्रास। फिर शुरू हुआ उसके दैहिक, आर्थिक और मानसिकशोषण  का वह सिलसिला जो उसकी मौत या ह्त्या के बाद भी आजतक जारी है। विजयलक्ष्मी से सिल्कस्मिता बनी एक सामान्य औरत के निरंतर शारीरिक, मानसिक और व्यावसायिक शोषण की दुखद लेकिन सत्यकथाको  इस प्रकार प्रस्तुत करना जैसे यह एक महान औरतवादी स्त्री की महान कहानी हो, एक विकृत प्रयास है। सत्य तो यह है की जिस सिल्क को इस फिल्म इंडस्ट्री ने हमेशा व्यावसायिक, हवस और नीची नज़रों से देखा वही फिल्म इंडस्ट्री आज उसकी महानता के दावे की चाशनी में लपेट कर  असल में सिल्क का नाम भुनाने की ही डर्टी कोशिश कर रही है। सिल्क का शोषण अभी तक रुका नहीं है। यह उसकी मौत के बाद भी इस रूप में जारी है। सिल्क जैसी अनेक हैं जो अलग अलग क्षेत्रों में इसी तरह के शोषण का शिकार होती हैं। चाहे वह सोनागाछी के वेश्यालय हों या बड़े फैशन घराने। सभी में महिलाओं की एक ही कीमत होती है - उनकी सेक्स अपील। उसका व्यक्तित्व, सोच, नाम सब इसी तराजू में तौले जाते हैं। घरों से भागी औरतों की यही कहानी है। उनका अंत आज भी वेश्यालयों में ही होता है, फिर चाहे वह जी बी रोड का रेड लाइट क्षेत्र हो या फिल्म नगरी। धंधे का अंदाज़ अलग होता है लेकिन ग्राहक की दृष्टि वही होती है। वे पैसा बनाने की मशीन होती हैं। जो लोग सिल्क की कहानी में औरत की आज़ादी की महानता खोज रहे हैं और सिल्क के विषादमय जीवन को विजय और संघर्ष की महान गाथा बना देने पर तुले हैं उन्हें शायद  अंदाज़ा नहीं है कि भारत ही नहीं विश्व की कई देशों की स्त्रियॉं के लिए ऐसे संघर्ष महानता का नहीं मजबूरी का नाम हैं। सेक्सुअलिटी  का सहारा ले कर चढ़ने वाली स्त्री अंततः शोषण का ही शिकार होती है। मीडिया, मार्केटिंग और बाज़ार ऐसी सभी कहानियों को ऐसे ही प्रस्तुत करता है। इन औरतों को ऐसे प्रस्तुत किया जाता है जैसे वे बेबाक, बिंदास और आज़ाद हैं, वे अपनी शर्तों पर जीना चाहतीं हैं और देह उनके लिए  आगे बढ्ने का वायस है। लेकिन इस सुनहरे वर्क के भीतर आपको मिलती है एक विषादमय दुनियाँ, अकेलापन और वेदना। अगर आइटम बनना ही अपनी शर्तों पर जीना है तो सबसे अधिक आजाद एक वेश्या ही है। ऐसी औरतें चाहे वह  मर्लिन मोनरो हो या सिल्क स्मिता दोनों को ही सामाजिक और व्यावसायिक शोषण के साये में ही ज़िंदगी जीनी पड़ती है और उसे तथाकथित सफलता भी तभी मिलती है जब वह किसी पुरुष का सहारा खोजती है। एक आध्यन के मुताबिक आज अमेरिका में लगभग 11 % परिवार गरीबी की रेखा से नीचे हैं। इनमें भी 28 % परिवारों की मुखिया स्त्री है जो या तो तलाकशुदा हैं या फिर अविवाहित माताएँ । यह दोनों ही वर्ग पुरुषों पर निर्भर थे और शुरुआती वर्षों में इसी निर्भरता ने उन्हें शिक्षा या हुनर सीखने से वंचित किया और आज जब वे परित्यक्त है तो गरीबी में जी रहे हैं। इस स्थिती में भी उनका सामाजिक, दैहिक, आर्थिक शोषण जारी रहता है। फैशन मॉडल्स का अधनगा कैटवाक हो , चीयर लीडर्स हों, फिल्मों में आइटम गर्ल्स हों सभी आखिर तो पुरुष की सेक्स भूख को ही शांत करने का काम करतीं हैं। आखिर कितनी महिलाएं किंगफिशर का कलेंडर खरीदतीं होंगी?  सिल्क स्मिता की कहानी एक दुखद सच्चाई है और शोषण की उस व्यवस्था प्रश्नचिन्ह लगाने की बजाय उसे महिमामंडित करने की व्यावसायिक कोशिश है यह फिल्म।काश यह फिल्म उसकी उफनती जवानी के जलवों की बजाय सिल्क स्मिता की होती ।  बेशक विद्या बालन की अदाएं लुभावनी हैं और शायद इतनी की राष्ट्रीय पुरस्कार ज्यूरी भी अपने को रोक ना पायी। फूल्स पैराडाइज़ में आपका स्वागत है। 

5 दिस॰ 2011

ज़िंदगी से इश्क़ का फसाना - देव आनंद

देव आनंद अब नहीं है लेकिन लगता है जैसे इस बात से खास फर्क नहीं पड़ता की वे सशरीर यहाँ हैं या नहीं। कुछ लोगों की शख्सियत उनसे भी बड़ी हो जाती है। देव आनंद बेशक अपने ज़िंदादिल अंदाज़ और ज़िंदगी की ललक के प्रतिमान बन कर हमारे बीच हमेशा रहेंगे और उनकी फिल्में, गाने तो हैं ही – सदाबहार। अभी कुछ दिन पहले ही उनका साक्षात्कार देखा था। बेबाक, खरी और भड़कीली बातें सभी को लुभातीं थी।  88 वर्ष की उम्र में भी देवानन्द की ज़िंदादिली में कोई कमी नहीं थी। वे सदाबहार थे ।  कोई शख्स सदाबहार कैसे हो सकता है। सदाबहार रहने के लिए आपको खुद को समय समय पर बदलना पड़ता है जैसे एक सदाबहार वृक्ष अपने पत्तों को निरंतर बदलता रहता है। बदलना एक कठिन काम है। लोग हमेशा बदलाव को ना पसंद करते हैं। लेकिन आगे बढ़ने के लिए बदलना जरूरी है। आगे बढ़ना भी जरूरी है,  एक दरिया की तरह,  ना कि एक पोखर की भांति, ठहरा हुआ ।  पोखर का पानी सड़ जाता है पर दरिया निर्मल रहता है,  क्यूंकी उसमें निरंतर नया जल आपूरित होता रहता है। इसी से दरिया प्रवाहमान बनाता है और उसमें  अपना रास्ता खुद बनाने कि ताकत भी इसी प्रवाह से आती है -
हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
जिधर भी चल पड़ेंगे उधर, रास्ता हो जाएगा
शायद देव साहब की यही नवीनता  उनके सदाबहार होने के पीछे की ताकत थी।  जब उनसे एक साक्षात्कार में पूछा गया की आप की सर्वश्रेष्ठ फिल्म कौन सी है तो उनका जवाब था अभी जो फिलम में बना रहा हूँ वही मुझे सर्वश्रेष्ठ लगती है हालांकि लोग कहते हैं की गाइड थी। वर्तमान में जीना ही भविष्य के लिए ऊर्जा देता है। बेशक गाइड उनकी बेहतरीन फिल्म थी लेकिन अगर कोई कलाकार यह मान ले कि वह अपना सर्वोत्तम दे चुका है तो बेहतरी की गुंजाइश नहीं रहती। देव आनंद ने यही नहीं किया। अपनी पहली हिट फिल्म के बाद ही जो कंपनी उन्होने बनाई उसका नाम ही उनके इस दर्शन को अभिव्यक्त करता है – नवकेतन। नवीनता के इस पुजारी ने निरंतर खुद को नए साँचे में ढाला। अभिनेता के बाद प्रोड्यूसर और फिर निदेशक व पटकथा लेखक। एक समय रोमांटिक हीरो की छवि वाले इस कलाकार के सह कलाकार राज कपूर जब  पिता का रोल करने लगे थे और दिलीप कुमार कि फिल्में पिटने लगीं थीं,  देवानन्द ने हरे रामा हरे कृष्णा और तेरे मेरे सपने जैसी दो बिलकुल भिन्न स्वभाव कि लेकिन सुपर हिट  फिल्में  दे कर जैसे घोषित कर दिया हो कि उनका समय अभी गया नहीं है। इसके बाद तो बनारसी बाबू, छुपा रुस्तम, अमीर गरीब, हीरा पन्ना  जैसी सफल फिल्मों की श्रंखला ने उन्हें पुनः स्थापित कर दिया।
और इतना ही नहीं परिवर्तन और नवीनता का यह प्रतीक अभिनेता अपनी सामाजिक उत्तरदायित्व को भी नहीं भूला और जहां 70 के उत्तरार्ध में इन्दिरा जी की इमरजेंसी के खिलाफ अच्छे अच्छों कि बोलती बंद हो गयी देवानन्द ने एक राजनीतिक पार्टी "नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया" बना कर 77 के चुनावों में इन्दिरा जी का विरोध भी किया था।

88 वर्ष का यह पुराना शख्स निरंतर नवीनता कि खोज में लगा रहा। चाहे वह फिल्में हों, फिल्में बनाने का तरीका हो, हीरोइने हों या असल जिंदगी में उनकी प्रेमिकाएँ हों। सुरैया, कामिनी कौशल और ज़ीनत अमान के साथ उनके रोमांस के किस्से भी चले और यह सभी असफल प्रेम कहानियों कि परिणति को प्राप्त हुये। इन पर सोचते हुये उन्हें कहते सुना कि हार असल में ग्रोथ है। असफलता नए दरवाजे खोलती है और हर बार जब में हारा तो मुझे नया मुकाम मिला। ऐसे ही फलसफे का बयान है उनकी आत्मकथा "रोमांसिंग विथ लाइफ" जिसमें अनेक किस्से रोचक भी हैं। आज उनके जाने से जो स्थान रिक्त हुआ है वह शायद ही भर पाये। मन तो नहीं हुआ उनकी मौत पर दुखी होने का पर फिर भी

शाम से आँख में नमी सी है,
आज फिर आपकी कमी सी है ।

 तो आइए अब से कुछ दिनों तक हम उनकी तरह ही इस ज़िंदगी का जश्न मनाएँ और इसके उन लम्हों को भरपूर जिएँ जो कि बस आज ही हैं - क्या पता कल हों न हों।
अंत में एक खूबसूरत गीत उन्हीं की फिल्म से।
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।

5 अग॰ 2011

बोल.................. ..........कि लब आज़ाद हैं तेरे


बोल एक फिल्म नहीं आवाज़ है। यह आवाज़  जहां से आई है वहाँ आवाज़ों को दबाने का रिवाज़ रहा है। यह राजनैतिक आवाज़ नहीं है -सामाजिक आवाज़ है। लाहौर की गलियों से निकाल कर हमारे दिल की गहराइयों में गूँजती यह आवाज़ हमें सोचने को मजबूर करती है । चाहे भारत हो या पाकिस्तान लड़की का जन्म दोज़ख की आग है। एक साथ कई प्रश्नों से रूबरू करती बोल धर्म की एकतरफा व्याख्या पर भी बहुत तीखा व्यंग्य है। फिल्म में हिंदुस्तान से आए एक हकीम साहब और उनके परिवार की कहानी है जो हकीम जी की लड़के की आरज़ू में सात बेटियों और एक ट्रांसजेंडर सैफुद्दीन सहित एक बड़ा कुनबा हो गया है। पर्दानशीन यह बेटियाँ घर में कैद हैं। स्कूल से दीवार सटी होते हुये भी स्कूल उनके लिए मीलों दूर है। हकीम साहब के दक़ियानूसी विचार, उच्च कुल की ऐंठ  और कम आमदनी के चलते परिवार अनेक मुसीबतों में घिरा है। दुनियाँ देखने की छटपटाहट और मुफ़लिसी का दोज़ख न केवल हकीम जी को बल्कि उनकी लड़कियों को भी बहुत से  अप्रिय फैसले लेने पर मजबूर करता है। हकीम जी की सबसे बड़ी लड़की जैनब ही फिल्म की केन्द्रीय पात्र है और कहानी उसी के नेरेशन के साथ आगे बढ़ती है। उसके जरिये मंसूर का कैमरा बेधड़क सच्चाइयाँ दिखाता रहता है। इस समाज में न हिजड़ों का कोई स्थान है और न ही बेटियों का। धर्म केवल औरतों के लिए है। हकीम साहब कर्ज़ के लिए तवायफ के साथ सो कर उतने नाराज़ और शर्मसार नहीं हैं और ना ही अपनी औलाद के कत्ल से बल्कि वे ज्यादा नाराज़ है कि उनकी एक बेटी शिया लड़के से शादी कर रही है। मुस्लिमों में आबादी नियंत्रण को ले कर फैली दक़ियानूसी सोच पर नश्तर चलाती यह फिल्म धीरे से वह कह देती है जिसे कहने की हिम्मत बहुतों में नहीं होती। फिल्म का अंत होते होते निदेशक न जाने कितनी समस्याओं को बखूबी उठा चुका होता है। फिल्म शिक्षा की आवश्यक्ता और उदार सोच की अहमियत भी बताती चलती है। किसी फिल्म के बहाने ही सही हमारे देश के दोनों समुदायों के के लोग अगर अपने कठमुल्लेपन पर कुछ शर्म महसूस करें तो फिल्म निर्देशक का  प्रयास सफल हो जाएगा।

24 मार्च 2011

चोरी चोरी - चुपके चुपके - गजनी



बौलीवुड की प्रेरणा - चोरी से (प्रेरित व्यक्ति प्रेरणा के स्रोत के बारे में बताता है पर चोर नहीं)
पसंद अपनी अपनी है भाई बिलकुल गजनी

2 फ़र॰ 2011

दिल तो बच्चा है जी - अंत ज़रा कच्चा है जी

दिल तो बच्चा है जी देखने गया था। मधुर भंडारकर की है इसलिए भी उत्सुकता थी। देखी। पर भंडारकर गच्चा खा गए। फिल्म इर्द गिर्द घूमती है महानगर में तीन अलग अलग लोगों कि ज़िंदगियों के आस पास। तीनों का ज़िंदगी को ले कर अपना दर्शन है। अभय वन नाईट स्टेंड में विश्वास रखने वाला पुरुष वेश्या है। परजीवी है। इसी से उसकी रोज़ी रोटी चलती है। दूसरी ओर अधेड़ उम्र का बैंक मैनेजर है जिसका तलाक हो चुका है और तलाक होते ही वह अपनी नई सेक्रेटरी जून पर फिदा हो जाता है। और जून भी नई पीढ़ी कि उस बिरादरी से है जिसका हर संदर्भ अमेरिका या यूरोप से शुरू होता है और वहीं खतम भी होता है, जिसमें मेक अप और ब्रेक अप रोजाना की बात है। एक तीसरा आयाम है मिलिंद का जो प्रेम को उसी नज़रिये से देखता है जिससे हम और आप और हमारा बॉलीवुड देखता आया है। वह पड़ा है गुनगुन के चक्कर में जो उसे यूज़ करती है। अब कहानी को कौमेडी बनाने पर जो ध्यान दिया जाना चाहिए था नहीं गया है और महानगर कि नंगी संस्कृति और अकेलेपन को जिस शिद्दत से दिखाया जा सकता था नहीं दिखाया जा सका है नतीजतन यह एक ऐसी फिल्म बन जाती है जिसमें बक़ौल फिल्म की एक पात्र " हुमर भी नहीं है और सेंस भी नहीं " पूरी फिल्म में दर्शक को पता होता है कि आगे क्या होगा और जहां कौमेडी की गई है वह भी इतनी बार दोहराई गई है कि अब उसमें से हंसी निकाल पाना वैसा ही है जैसे निचुड़े नींबू सी रस निकालने कि कोशिश। खैर फिल्म में एक कहानी है और यदि आप बहुत ऊंची अपेक्षाओं के साथ नहीं जाते है तो फिल्म देखी जा सकती है। मधुर खुद अपने जाल में फंस गए हैं। फिल्म के अंत से ठीक पहले अंत हो जाता है लेकिन मधुर हिम्मत नहीं कर पाये है इस अंत को अंत बना रहने देने को। अजय देवगन की माशूका की शादी उसके मेक अप ब्रेक अप बॉय फ्रेंड से हो जाती है तो अभय जो कि इस समय एक ऊबी हुयी औरत का रखैल बना हुआ है उसी की बेटी से दिल लगा लेता है। लेकिन यहाँ उसे सेर को सवा सेर मिल जाता है और उसे मक्खी की तरह निकाल कर फेक दिया जाता है। उधर गुनगुन का दीवाना मिलिंद गुनगुन को 200000 रुपये दे कर हेल्प करता है बदले में प्रेम की जगह एक गुलदस्ता और पत्र पा कर टूट जाता है।  फिल्म यहीं खतम होती तो सार्थक लगती। पर हाये रे हिन्दी फिल्मों का हैप्पी एंडिंग फंडा। मधुर को व्यंग और हास्य दोनों में तालमेल बैठने की जरूरत है। में इस फिल्म को 2.5 स्टार्स दे रहा हूँ।

24 जन॰ 2011

धोबी घाट और ऑस्कर की आस

धोबी घाट देखने गया था। सोचा था आमिर की है तो सोचना नहीं। अच्छी होगी। फिल्म शुरू हो कर खतम भी हो गई पर मुझे लगता रहा की शायद फिल्म अब रोचक हो जाए। हालांकि फिल्म का अच्छा लगना और ना लगना नितांत निजी समस्या है लेकिन जब फिल्म धोबी घाट जैसी हो तो राय सार्वजनिक की जा सकती है। वैसे में उस तरह का आदमी नहीं हूँ जो किसी फिल्म को इसलिए अच्छा कहे की समझ नहीं आई। मुझसे राजा के नए कपड़े नहीं पहने जाते (एम्परर्स न्यू क्लोथ्स)।

धोबी घाट में कई कहानियाँ समतांतर चलती है जो अंतरसंबंधित पात्रों को विकसित करती है पर पूरी फिल्म में एक साथ इतनी समस्याओं को उठाने की कोशिश की गई है की किसी भी समस्या को निर्देशक उचका भी नहीं पाया है। किसी पात्र का पूर्ण विकास नहीं होता और दर्शकों का ध्यान गैर जरूरी उप कथा पर केन्द्रित हो जाता है  कि शाई (जिसे शायद घाट घाट का पनि पीने का शौक है मुन्ना नमक धोबी घाट का  पानी पी पाती है या नहीं)। धोबियों को भी इसमें कोई आपत्ती नहीं हुयी आखिर ऐसी किस्मत कितने धोबियों की होती है। शायद अब कई जवान धोबी मुंबई का रुख कर लें।
उधर एक अच्छे विचार को भी अविकसित ही छोड़ दिया गया है जब कि एक घरेलू औरत अपने भाई को विडियो ब्लग की तर्ज़ पर मुंबई अपनी दृष्टि से दिखाती हुयी नज़र आती है । जब यह मोड फिल्म में आया था तो संभावनाएँ पैदा हुयी थीं पर पुनः फिल्म उसी मुन्ना और शायी के पचड़े में पड़ गई। मुन्ना और एक और एक औरत का एंगिल भी ज़बरदस्ती घुसाया हुआ था । फिल्म आखिर किस बारे में है? मुंबई के बारे में, धोबियों कि समस्याओं के बारे में, प्रवासियों के बारे में, कलाकारों की प्रेरणा के बारे में, स्त्री पुरुष के दैहिक सम्बन्धों के बारे में?  पता नहीं । कुल मिला कर फिल्म एक कोलाज भर है जिसमें अनगिनत असंबंधित चित्र भरे पड़े है जिन्हें बिना योजना के लगा दिया गया है। 

कुल मिला कर यह फिल्म आमिर कि ऑस्कर प्यास के लिए बनाई गयी लगती है। लेकिन आमिर या उनके डाइरेक्टर को कहानी कहने कि कला सीखनी होगी। कुछ इसी गति कि लेकिन बढ़िया फिल्में मेंने कुछ समय पूर्व वर्ल्ड मूवीज़ पर देखी थीं। अगर मौका लगे तो देखिये। यू ट्यूब पर भी मौजूद हैं। पहली है "द सॉन्ग ऑफ स्पैरो" (ईरानी ) और दूसरी है "द व्हाइट बलून" दोनों ही दिल को छू लेने वाली कहानियाँ है। कला फिल्मों का बोझिल होना जरूरी नहीं है और होना भी नहीं चाहिए क्यूंकी फिल्म एक संचार का माध्यम है और सफल संचार तभी संभव है जब यह निर्देशित जनता को समझ आ जाए। आशा है आमिर आगे ऐसे घाटों से बचने कि कोशिश करेंगे।