15 अग॰ 2025

दो पाटों के बीच: महाशक्तियों की छाया में भारत की रणनीतिक दुविधा

 

– अनुपम दीक्षित

मेरी प्लेलिस्ट में आजकल मैरी मैकग्रेगर का टर्न बिटवीन टू लवर्स भारत की दुविधा को बखूबी व्यक्त करता है . इसके बोलों पर गौर कीजिए -

इसकी भावनात्मक पंक्तियां Torn between two lovers, feeling like a fool, Loving both of you is breaking all the rules , आज भारत की स्थिति को बखूबी अभिव्यक्त करती हैं जब वह हाल के दशकों के सबसे कठिन कूटनीतिक संतुलन को साधने की कोशिश कर रहा है . अब जरा इन पंक्तियों को देखिए जिसमें गीत की नायिका कहती है — "There's been another man that I've needed, and I've loved, But that doesn't mean I love you less" — यह ऐसे ही है जैसे भारत रूस के साथ अपने गहरे ऐतिहासिक रिश्तों को निभाते हुए अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत करना चाहता है लेकिन दोहरी निष्ठा तो नियमों के विरुद्ध ही है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की "रणनीतिक स्वायत्तता" वॉशिंगटन की एकनिष्ठता की अपेक्षाओं से टकरा रही है.


टैरिफ़: रिपब्लिकन हाथी का ट्रम्पनाद

क्या हुआ ? 

अगस्त 2025 में तनाव तब चरम पर पहुँचा, जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारतीय निर्यात पर 50% का चौंकाने वाला शुल्क लगा दिया — पहले के 25% शुल्क को दोगुना करते हुए — ताकि रूस से तेल ख़रीद जारी रखने के लिए नई दिल्ली को दंडित किया जा सके। इससे भारत एशिया का सबसे अधिक कर-भार झेलने वाला देश बन गया। 

असर क्या होगा?
ट्रंप  के 50% टैरिफ का सीधा मतलब है भारत के व्यापार में 50 अरब डॉलर की कमी. यह एक बड़ी कमी है .बात सिर्फ डॉलर्स की ही नहीं है बल्कि इसके अन्य पहलू भी हैं . इससे भारत में बड़े पैमाने पर नौकरियां जा सकती हैं. प्रमुख क्षेत्र — कपड़ा, रत्न-आभूषण, चमड़ा, रसायन और समुद्री उत्पाद — लंबे संकट में बुरी तरह प्रभावित होंगे। ट्रंप के टैरिफ भारत में बड़े पैमाने पर रोजगार का संकट पैदा करेंगे. गौरतलब है की ये सभी क्षेत्र श्रम प्रधान हैं. 

अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है (सालाना 87 अरब डॉलर)। इन टैरिफ़ ट्रम्पके बाद भारतीय निर्यातक वियतनाम, बांग्लादेश और जापान जैसे प्रतिस्पर्धियों से पिछड़ सकते हैं। हमारे पास लागत के अलावा कोई खास तकनीकी , आपूर्ति श्रृंखला जैसे प्रतिस्पर्धी लाभ नहीं हैं , और काम लागत भी संरक्षणवादी नीतियों के कारण है। भारत के विदेश मंत्रालय ने अमेरिका के इस कदम को "बेहद दुर्भाग्यपूर्ण" बताते हुए कहा कि अमेरिका समेत दूसरे देश भी रूस से तेल खरीद रहे हैं और भारत की ख़रीद बाज़ार की परिस्थितियों व ऊर्जा ज़रूरतों से तय होती है।

ट्रंप और मोदी की केमिस्ट्री तो हम सबने हाउडी मोदी के दौरान देखी ही थी लेकिन ट्रम्प प्रशासन के विशिष्ट आक्रामक अंदाज़ में की गई इस घोषणा ने भारत -अमेरिकी संबंधों को कूटनीतिक संकट में डाल दिया है, जिससे पिछले दशकों में बनी भारत-अमेरिका साझेदारी की बुनियाद हिल गई है .
भारत - अमेरिका व्यापार समझौते के लिए जारी बातचीत अबतक पाँच दौर के बाद भी बेनतीजा रही है. अब छठा दौर अगस्त अंत में होगा। वाणिज्य मंत्रालय ने कहा है कि सरकार "राष्ट्रीय हितों की रक्षा और संवर्द्धन के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगी"। इस बीच, भारत ने तेल आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने के प्रयास तेज़ किए हैं — अमेरिका से तेल आयात छह महीने में 120% बढ़ा है।

आखिर ट्रंप चाहते क्या हैं? ट्रंप ने टैरिफ लगाते हुए कहा — "भारत अच्छा व्यापार साझेदार नहीं रहा… वे युद्ध मशीन को ईंधन दे रहे हैं, और अगर वे ऐसा करेंगे, तो मैं खुश नहीं रहूंगा"। उनके शब्दों में MAGA की राजनीतिक गूँज भी थी और और MAIGA के नारे की विफलता का संकेत भी जिसे हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने अमरीका यात्रा के दौरान दिया था. MAIGA दरअसल MAGA ( Make America Great Again)  और MIGA ( Make India Great Again) के मिलने से बनता है. इस तरह के संक्षेपण गढ़ना मोदी और ट्रंप दोनों को ही पसंद है . 

क्या ट्रंप को नोबल चाहिए ? अनेक लोग कयास लगा रहे हैं की ट्रंप इसलिए नाराज हैं क्योंकि उन्हें पाकिस्तान -भारत जंग रोकने का श्रेय नहीं मिला और नोबल पुरस्कार हाथ से निकल गया. मेरा मानना है की ये बेहद सतही कारण है. बेशक उनके मन में यह आकांक्षा हो तो गलत नहीं हैं लेकिन वे भारत के टैरिफ पर तो निर्भर नहीं ही हैं.

तो फिर  क्या ट्रंप पाकिस्तान - भारत झड़प को शांत करने के प्रयासों में उनकी भूमिका भारत ने स्वीकार नहीं की इसलिए वे नाराज हैं ? अमेरिका की सैन्य और व्यापारिक ताकत बेशक किसी देश को प्रभावित कर सकती है लेकिन भारत जैसे देश को यह स्वीकार करवाना की वह मध्यस्थता के कारण पीछे हटा , नामुमकिन ही है और ट्रंप यह जानते हैं . लेकिन फिर वे यह भी जानते हैं की यह एक बढ़िया दबाव रणनीति है इसलिए वे लगभग 30 बार ट्रुथ सोशल पर यह बात दोहरा चुके हैं. उन्हें जो हासिल करना था वे मुनीर को डिनर पर बुला कर पाकिस्तानन से ट्रेड डील कर के, कर चुके हैं. 

ट्रंप के कथन से यह संकेत मिला कि वे भारत से अपने कृषि, रत्न-आभूषण, फार्मा जैसे बाज़ार अमेरिकी कंपनियों के लिए खोलने की उम्मीद रखते हैं बल्कि वे इससे ज्यादा भी चाहते हैं जिनमें अमरीकी कंपनियों के लिए अधिक रियायतें, अमेरिकी उत्पादों की बाजार तक पहुंच बढ़ाना भी शामिल है .

यदि ट्रंप की कार्यशैली को देखें तो ऐसा लगता जरूर है कि वे एक स्कूल बुली की तरह पेश आ रहे हैं लेकिन हाल ही में जो भी समझौते हुए हैं उनमें अमेरिका को ही फायदा दिख रहा है जापान (550 अरब डॉलर ), EU (600 अरब डॉलर), दक्षिण कोरिया (350 अरब डॉलर) उल्लेखनीय है की ये सभी टैरिफ डील्स ही हैं इसके अलावा कई अन्य समझौते भी हैं जैसे कतर, सऊदी अरब और ब्रिटेन से जिनमें अमेरिका को स्पष्ट फायदा पहुंचेगा . ट्रंप अपने मतदाताओं को दिखाना चाहते हैं कि  MAGA सिर्फ जुमला नहीं हकीकत है.

तो फिर कारण क्या हैं ?  मेरा मानना है कि भारत के  टैरिफ  ट्रंप के लिए तुरुप का पत्ता हैं. ट्रंप तीन-आयामी दृष्टिकोण अपना रहे हैं: (1) रूस के तेल राजस्व को कम करने के लिए भारत और चीन जैसे देशों पर टैरिफ लगा कर उसे बातचीत की टेबल पर लाना, (2) यूरोप के साथ व्यापारिक और सैन्य साझेदारी को अमेरिका के लिए फायदेमंद बनाना, और (3) पुतिन के साथ प्रत्यक्ष बातचीत के माध्यम से यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने का प्रयास. ध्यान रहे कि भारत पर टैरिफ की गाज 7 अगस्त को स्टीव विटकॉफ की मास्को यात्रा, जिसका उद्देश्य रूस और यूक्रेन के बीच शांति सुनिश्चित करना था, के बाद ही गिरी है. 

अगर वे इन तीनों आयामों में सफल सिद्ध होंगे तो यह अमेरिकी कूटनीति की एक जबदस्त सफलता होगी और ठीक यही वे चाहते हैं . और कौन जाने इसका जश्न वे नोबल ले कर मनाएं.

इसके संकेत भी मिलने लगे हैं . जब मैं इन पंक्तियों को लिख रहा हूं , ट्रंप ब्रेकिंग न्यूज में घोषणा कर रहे हैं की वे राष्ट्रपति पुतिन से 15 अगस्त को अलास्का में शीर्ष वार्ता में मिलने जा रहे हैं . उन्होंने संकेत दिया है की रूस -यूक्रेन युद्ध पर जरूरी डील हो सकती है . 

भारत के पास 21 जुलाई तक का समय है किसी भी राजनयिक प्रयास के लिए . राष्ट्रपति पुतिन की प्रस्तावित भारत यात्रा की घोषणा भी 8 अगस्त को हुई है और  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सात साल बाद पहली बार चीन की यात्रा की तैयारी कर रहे हैं — ऐसे समय में जब वॉशिंगटन से रिश्ते तनावपूर्ण हैं, GOP (Grand Old Party) के "हाथी" की चिंघाड़ के बीच "ड्रैगन" और "हाथी" का नृत्य, और  रूसी "भालू" का किनारे से देखना, एक दिलचस्प दृश्य होगा।

The Elephant - Dragon Tango 


रूसी रीछ की झप्पी कितनी ऊष्म है ? 

भारत को रूस की कितनी जरूरत है ?  

भारत और रूस के बीच 78 साल पुराना गहरा दोस्ताना रिश्ता है, जो द्विपक्षीय शिखर सम्मेलनों और उच्च स्तरीय राजनयिक संपर्कों से मजबूत हुआ है। अक्टूबर 2000 में राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा में "भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी की घोषणा" हुई और  2010 में पुनः  इस रिश्ते को मजबूती देते हुए भारत को  "विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी" का दर्जा मिला।

2024–25 में द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड ऊँचाई पर पहुंचकर 68.7 बिलियन डॉलर हो गया, जिसमें भारत का निर्यात 4.9 बिलियन और आयात 63.8 बिलियन डॉलर था।

रूस से भारत को आने वाला कच्चा तेल भारत की कुल आवश्यकता का लगभग 43% है, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित होती है। भारत का तेल आयात रूस के यूक्रेन आक्रमण के बाद ही बढ़ा है.

रक्षा क्षेत्र में रूस भारत का प्रमुख साझेदार है - S-400 वायु रक्षा प्रणाली के पाँच रेजीमेंटों में से तीन पहले ही तैनात हो चुके हैं, ब्रह्मोस मिसाइल कार्यक्रम सफलतापूर्वक चल रहा है, और सुखोई Su-30MKI के लिए HAL लाइसेंस निर्माण सुविधा में 62.6% स्वदेशी सामग्री का उपयोग हो रहा है।

अंतरिक्ष सहयोग में GLONASS और NavIC नेवीगेशन सिस्टम के इंटरऑपरेबिलिटी के लिए दोनों देशों ने ग्राउंड स्टेशन स्थापित किए हैं, और गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान परियोजना में रूसी तकनीकी सहायता शामिल हैं .

इसके अलावा बहुपक्षीय मंचों—BRICS, SCO, G20—में भारत और रूस ने अक्सर समान रुख अपनाया, और रूस ने भारत के UNSC स्थायी सदस्यता समर्थन का आह्वान किया। आर्थिक दबावों और वैश्विक प्रतिबंधों के बावजूद, दोनों देशों ने रुपया-रूबल भुगतान तंत्र और डी-डॉलराइजेशन के माध्यम से व्यवहारिक समाधान अपनाए हैं।

गौर करने वाली बात है कि टैरिफ़ ऐलान के समय, भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल मॉस्को में रक्षा सहयोग बढ़ाने की बात कर रहे थे। रूस ने भारत के "स्वतंत्र रूप से व्यापार साझेदार चुनने के  अधिकार" का खुलकर समर्थन किया।  ट्रंप की घोषणाओं के बाद राजनयिक एकजुटता दिखाते हुए पुतिन और मोदी के बीच फोन वार्ता 8 अगस्त 2025 को संपन्न हुई जिसमें  यूक्रेन स्थिति पर चर्चा, "विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी" की पुष्टि और राष्ट्रपति पुतिन की 2025 के अंत तक भारत यात्रा की पुष्टि शामिल है . इस घोषणा की टाइमिंग से लगता है की भारत ने संदेश दे दिया है कि रूस से संबंध उसके इन घोषणाओं से नहीं प्रभावित होंगे .

भारत को यह भी पता है की जरूरत पड़ने पर रूसी  सहयोग ही काम आता है. भारत को रूस की जरूरत चीन को काबू में रखने के लिए भी है क्योंकि SCO, BRICS और G20 जैसे संगठनों में रूस भारत का सहयोगी रहा है .

अमेरिका -चीन व्यापार युद्ध के चलते रूस के चीन के साथ भी संबंध गहरे हो रहे हैं और भारत रूस से बेहतर संबंध बनाए रखना चाहेगा जिससे एशिया में वह इन दोनों को नजदीकी सहयोगी बनाने से रोक सके. भारत रूस के संबंध सिर्फ तेल पर नहीं टिके हैं . इसलिए अगर भारत ऐसे संकेत देता है की वह अमेरिकी टैरिफ के लिए तेल का आयात कम करेगा तब भी रूस -भारत संबंधों पर कोई आंच नहीं आने वाली.  ऐसा भी नहीं है की अमेरिकी दबाव में भारत ने प्रतिक्रिया ना दिखाई हो, व्यवहारिकता को देखते हुए भारत ने रूस से अपने रक्षा आयात को 2010 - 2014 के 72% से चरणबद्ध तरीके से घटाया है. 2015-2019 में 55% और अंततः 2020-2024 में 36% कर दिया गया है .  



क्या भारतीय हाथी और चीनी ड्रैगन साथ में नृत्य करेंगे ? 

भारत-चीन द्विपक्षीय संबंध : 2025 में भारत और चीन ने अपने 75वें राजनयिक वर्ष की वर्षगांठ मनाई है, लेकिन 2020 में गलवान में हुई झड़पों के बाद विश्वास डगमगा गया है. सीमा गतिरोध के बाद दोनों पक्ष धीरे-धीरे सामान्यीकरण की ओर बढ़ रहे हैं। भारत की प्रसिद्ध कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जहां कुछ आशा बनी है वहीं कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिन पर गतिरोध अभी भी बाकी है. 

चीन ने रेयर अर्थ धातुओं के भारत को निर्यात पर रोक लगा दी है जो अभी भी जारी है और भारत को गहरा आघात पहुंचा रही है. रेयर अर्थ पर रोक से भारतीय अर्थव्यवस्था के अनेक सेक्टर्स खतरे में पड़ गए हैं जिनमें ऑटोमोबाइल, मोबाइल, रक्षा, अंतरिक्ष, खनन जैसे बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं . दरअसल अगर ट्रंप के टैरिफ और चीन के प्रतिबंध लंबे समय तक चलते हैं तो भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार में .5% से 1% तक की कमी देखी जा सकती है.

गलवान के बाद से ही बंद पड़ी दिल्ली - बीजिंग सीधी वायु सेवा भी अभी तक शुरू नहीं हो पाई है .

भारत की हानि , चीन को फायदा :

अमेरिका द्वारा चीन पर 100% टैरिफ़ की धमकी और भारत पर पहले से 50% शुल्क लगाने से दोनों ही देश अमेरिकी आर्थिक दबाव के शिकार हैं। यद्यपि चीन ने सफलतापूर्वक अमेरिका को बातचीत के लिए तैयार कर लिया है और ट्रंप दो बार 100% टैरिफ की डेड लाइन बढ़ा चुके हैं.

उल्लेखनीय है की ट्रंप के भारत पर टैरिफ में जिन क्षेत्रों को मुक्त रखा गया है वे हैं , मोबाइल फोन, रेयर अर्थ, फार्मास्यूटिकल, लिथियम आयन बैटरी और सौर ऊर्जा. इन सभी क्षेत्रों में भारत चीन पर पूरी तरह से निर्भर है. ऐसे में भारत पर लगे टैरिफ से चीन को कोई हानि नहीं हैं.  चीन का विशाल निर्यात, विकल्पों की उपलब्धता और रेयर अर्थ जैसे तकनीकों में महारथ ने उसे मोलभाव में ऊपरी स्तर पर रखा है.

भारत की स्थिति इससे बिलकुल अलग है. भारत अभी भी उच्च तकनीक के मामले में दूसरे देशों पर निर्भर है. ऐसे में ट्रंप के टेरिफ भारत को असहज स्थिति में डाल रहे हैं . 

चीन के लिए अवसर ?
चीन इस अवसर का लाभ उठाना चाहेगा. चीन ने आधिकारिक रूप से भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का समर्थन भी किया है और भारत में चीन के राजदूत ने 1+1=11 का सुझाव दिया है. अगर कुछ लोगों को यह लग रहा हो की यह भारत - चीन संबंधों का स्वर्णिम युग होने जा रहा है तो उन्हें वैसी ही निराशा होगी जैसी हिंदीचिनी भाई भाई के नारे के फेल होने पर हुई थी . दरअसल भारत की रणनीतिक स्वायत्त का समर्थन चीन इसलिए भी कर रहा है ताकि इसके द्वारा पश्चिम और भारत की बढ़ती नजदीकियों को रोक सके . चीन के ग्लोबल टाइम्स ने टिप्पणी की है कि रणनीति की मेज़ पर वॉशिंगटन की सूची में भारत कभी नहीं रहा . दरअसल चीन इस मौके पर दुनियां को यह दिखा रहा है कि जोर शोर से प्रचारित मोदी-ट्रंप कैमिस्ट्री और भारत को रणनीतिक साझेदारी में दरअसल कोई गहराई नहीं है.

इसके अलावा चीन ग्लोबल साउथ के लीडर की अपनी उस धूमिल होती छवि को सुधारना चाहता है जिसपर श्री लंका, मालदीव, पाकिस्तान और कई अफ्रीकी देशों को ऋण के बोझ से लाद देने और ऋण को इक्विटी में बदलने के कारण दाग लग चुके हैं . वह यह दिखाना चाहता है की बिना पश्चिम जैसी शर्तों के चीन एक बेहतर और सम्मानजनक साझेदार है . 

इसके अलावा चीन यह भी चाहता है कि भारत उसके ब्रिक्स - रोड इनिशिएटिव (BRI) का हिस्सा बने और चीनी कंपनियों को भारत में और अधिक अवसर मिलें, विश्व में रणनीतिक स्तर पर अमेरिका के स्थान पर चीन को विकल्प के रूप में देखा जाए, दलाई लामा, ताइवान जैसे मुद्दों पर भारत अपने रुख में बदलाव लाए.

भारत कुछ ही दशकों में विकास दर के मामले में चीन से आगे निकल जायेगा. यद्यपि भारत को चीन के स्तर तक पहुंचने में कई दशक लगेंगे लेकिन फिर भी भारत को कमजोर रख कर वह उसे विकास की दौड़ में पीछे रखना चाहता हैं और साथ ही वह भारत के विशाल बाजार में अपनी ऐसी पैठ बनाने में कुछ हद तक कामयाब भी हो गया है कि मोलभाव की मेज़ पर भारत को परेशानी हो . 

घरेलू राजनीति और ड्राइंग रूम विदेश नीति :

आर्थिक पक्ष के अलावा यह पहली बार हुआ है जबकि किसी भारतीय सरकार ने अपनी विदेश नीति और रक्षा को घरेलू राजनीति में मुद्दा बनाया है . यह हमने पीएम मोदी की अनगिनत विदेश यात्राओं , पाकिस्तान के साथ झड़पों, नेपाल, मालदीव और बांग्लादेश के साथ देखा है . अमेरिकी राष्ट्रपतियों की यात्राएं हों या राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा, सभी घरेलू राजनीति को लक्ष्य करके आयोजित थीं. यह नीति चमक दमक के साथ भारत को पेश करती रही और मीडिया ने इसके प्रचार में खुली छूट ली. अब यह अति प्रचार ही भारत को वैदेशिक नीति के फ्रंट पर थोड़ा फीका कर रहा है जबकि वैश्विक नेता इस सरकारी कमजोरी को पकड़ चुके हैं .

विदेश नीतियां भावनाओं पर नहीं पारस्परिक हितों पर आधारित होती हैं . कई बार ऐसे मौके भी होते हैं जब आपको कदम पीछे हटने पड़ते हैं ताकि आगे बढ़ सकें. इसे ही कूटनीति  कहते हैं लेकिन अगर निर्णायक पदों पर बैठे लोग इन पर जन भावनाओं के अनुरूप निर्णय लेने लगेंगे तो परिणाम अच्छे नहीं होंगे. विदेश नीति लोगों के ड्राइंग रूम में तय नहीं होती.

प्रधानमंत्री मोदी की 31 अगस्त–1 सितंबर को शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के लिए चीन यात्रा 2018 के बाद पहली होगी, और 2020 की गलवान झड़प के बाद पहली और इस पर अभी से सोशल मीडिया.  अच्छा यही रहेगा कि परंपराओं के अनुकूल ही सरकार इस विषय पर विपक्ष को सूचित रखे और उनसे सहयोग लेकर ही आगे बढ़े. 

भारत के विकल्प क्या हैं ? 

भारत चीन पर दबाव बनाने की हर संभव रणनीति अपनाना चाहेगा. लेकिन चीन के मुकाबले , भारत के पास सीमित विकल्प उपलब्ध हैं. यद्यपि भारत multi-alliance के अनुरूप ही रूस, अमेरिका, चीन और यूरोप सभी से वार्ता कर रहा है और सभी संभव क्षेत्रीय मंचों का प्रयोग कर रहा है .  (RIC - Russia -India -China) त्रिकोणीय सहयोग, जो सीमा तनाव के कारण वर्षों से निष्क्रिय था, फिर से सक्रिय होने के संकेत दे रहा है। रूस के विदेश मंत्री लावरोव ने कहा कि "बीजिंग और नई दिल्ली दोनों RIC बनाए रखने में स्पष्ट रुचि दिखा रहे हैं"। 

भारत का एक साथ क्वाड, SCO, BRICS संगठनों में शामिल होना भारत की मल्टीएलायंस की जांची परखी नीति के अनुरूप ही है जिसका विकास नेहरू की गुटनिरपेक्षता नीति से ही हुआ है. या यूं कहें कि यह गुटनिरपेक्षता का नया नाम है और असल में नया भी नहीं है . खुद नेहरू ने गुट निरपेक्षता को समझते हुए कहा था कि यह सबसे दूरी बनाने की बजाए सबसे संबंध रखने की नीति है . यह किसी एक गुट से नहीं बल्कि स्वतंत्र रूप से संबंधों की नीति है . भारत इन मंचों का प्रयोग वॉशिंगटन और चीन दोनों  पर बेहतर दबाव बनाने के लिए कर सकता है .

प्रधान मंत्री की चीन यात्रा से मुझे बहुत उम्मीदें नहीं है लेकिन फिर भी कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर यदि चीन से बात बने तो भविष्य के लिए अच्छा होगा. भारत हीरों किया कटाई , पॉलिशिंग और फिनिशिंग का सबसे बड़ा केंद्र है और विष की अनेक हीरा कंपनियां यहां की सेवाएं लेटिन हैं . उधर चीन पूरे विश्व में कृत्रिम हीरों का 40%  से अधिक का उत्पादन करता है . दोनों देश इस मुद्दे पर यदि सहमत हों तो भारत के लिए जेम और ज्वैलरी बाजार में विविधता बनाने में आसानी होगी और ट्रंप टैरिफ का असर भी काम रहेगा.

दूसरा क्षेत्र फार्मास्यूटिकल API आउट निर्यात का है जिस पर भारत ने संरक्षण नीतियां अपनाएं हैं . अनेक भारतीय कंपनियों के एपीआई के लिए चीन में निवेश किया है . दोनों देश अगर इसमें किसी नतीजे पर पहुंचते हैं तो यह win-win स्थिति होगी.

 इसके अलावा भारत बुनियादी ढांचे में चीन से तकनीकी सहयोग , सूचना प्रौद्योगिकी और कृत्रिम -बुद्धिमत्ता , विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में असीम संभावनाएं हैं . भारत को आगामी बैठक का पूरा फायदा उठाना चाहिए

भारत के लिए यह रोमांस नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता है।

भारतीय हाथी और चीनी ड्रैगन का डांस दिलचस्प तो है लेकिन यह एक दुर्लभ से भी दुर्लभ अवसर होगा और रिपब्लिकन हाथी की चिंघाड़ दोनों में से किसी के लिए भी “संगीत” जैसी तो नहीं है .



13 जून 2025

एक कप इतिहास: चाय की प्याली में छुपे किस्से

लेखक: अनुपम दीक्षित


“ज़रा एक कप चाय बना देना।” ये शायद भारतीय घरों में सुबह - शाम की चिर परिचित आवाज है - लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस  गरम पानी, अदरक और पत्तियों के मिश्रण के पीछे संस्कृतियों का अद्भुत मिश्रण भी है . चाय की चुस्कियों के बीच पढ़िए यह कहानी. 

☯️ चाय: कहां से आई ये पत्ती?

चाय की शुरुआत चीन से मानी जाती है। एक पौराणिक कथा कहती है चीन के सम्राट शेन नुंग को पानी उबाल कर पीना पसंद था. ऐसा वह स्वाद के लिए नहीं, स्वास्थ्य के लिए करते थे . असल में  वह जड़ी बूटियों के औषधीय गुणों के अच्छे जानकार थे और उन्होंने महसूस किया था की उबला पानी बीमारियों को दूर रखता है . आधुनिक चिकित्साशास्त्र में यह बहुत बाद में पता चला. तो ऐसे ही एक दिन जब उनके लिए पानी उबाला जा रहा था, तभी कुछ पत्तियां उड़कर पानी में गिर गईं। पानी का रंग बदल गया, और जब सम्राट ने उसे चखा तो यह बन गई इतिहास की पहली चाय की चुस्की और साथ ही उन्हें अपने दिमाग में ऊर्जा का प्रवाह भी महसूस हुआ . तब से चीन में इसे औषधीय पेय के रूप में पिया जाने लगा . इसे बनाने की विधि को चीनियों ने वर्षों तक गुप्त रखा . 

🌍 जब चाय ने दुनिया घूमी

तिब्बती बौद्ध मठों में चाय खूब लोकप्रिय थी और भिक्षु ध्यान लगाने में इसके सहायक मानते थे . बौद्ध भिक्षुओं के साथ चाय का स्वाद धीरे-धीरे जापान, तिब्बत, और मंगोलिया पहुंचा।  भारत में असम में चाय की पत्तियों को यूं ही चबा लिया जाता था . पीने की परंपर  नहीं थी . ऐसा भी संभव है कि चाय का पौधा बौद्ध भिक्षुओं के साथ ही चीन पहुंचा हो जहां इसे पानी में मिला कर पिएं की परंपरा विकसित हुई हो . जो भी हो , एक बात तो तय है कि चाय का घर असम और दक्षिणी चीन ही है  लेकिन दुनियां को इस अद्भुत पेय की जानकारी तभी  हुई जब साहसी पुर्तगाली, ब्रितानी और डच उद्यमी यहां पहुंचे. 

🚢 पुर्तगाली व्यापारियों का पहला वर्णन. 

हालांकि चाय को दुनियां से परिचित कराने का श्रेय पश्चिमी इतिहासकार पुर्तगालियों को देते हैं लेकिन चाय भारत और चीन के व्यापारिक मार्गों पर पहले से ही एक लोकप्रिय औषधीय पेय के रूप में जानी जाती रही है . 

चाय का पहला, लेकिन कानों सुना वर्णन एक पुर्तगाली लेखक जियोवानी बतिस्ता रामुसियो की पुस्तक Navigationi et Viaggi (1559) में मिलता है . यह  वेनिस  में मिले एक फारसी व्यापारी हाजी मोहम्मद ने उन्हें सुनाया था . 

हाजी मोहम्मद ने खिताई या कताई ( cathey)  के एक प्रांत में "चिआई काताई" (Chiai Catai) नाम के पौधे के औषधीय गुणों के बारे में बताया था. उनके अनुसार - लोग इस पौधे की पत्तियाँ, ताज़ी या सूखी, पानी में उबालकर उसका काढ़ा पीते हैं। इसे गरम-गरम, ख़ाली पेट पिया जाता है . इसे बुखार, सिरदर्द, पेट दर्द, बग़ल/जोड़ों के दर्द और गठिया में आराम देने वाला पेय कहा जाता है .  यह ज़्यादा खाने पर पचाने में मदद करता है. हाजी मुहम्मद के अनुसार यह बहुत सम्मानित चीज है जिसका दूर दूर तक व्यापार होता है . जिओवन्नी ने मार्को पोलो का जिक्र करते हुए यह बात नोट की है की उसने चाय का जिक्र कहीं नहीं किया है . सबसे गौर करने वाली बात यह है कि व्यापारी अपने साथ "चिआई काताई" रखते थे क्योंकि इसके बदले बहुमूल्य औषधियां मिल जाया करती थीं . 

मध्य एशिया, अरब और फारस के लोग चीन को खितान के नाम से जानते थे . मंगोलिया की खितान जनजाति ने दसवीं से बारहवीं शताब्दियों में चीन के बड़े हिस्से पर शासन किया था . तेरहवीं शताब्दी में मध्य एशिया में इन्हीं खिताओं ने कारा-खिताई नाम से साम्राज्य बनाया था . यही हिस्सा सिल्क मार्गों के जरिए अरबी और फारसी मुस्लिम विश्व से जुड़ा था और खितान नाम से जाना जाता था . इसी से पश्चिम ने चीन को cathay के नाम से मार्को पोलो ने परिचित कराया . रूसी , मगोलियाई और मध्याशियाई भाषाओं में चीन के लिए खितान के रूप ही प्रचलित हैं . जिओवन्नी ने जिस "चिआई काताई" का जिक्र किया है वह असल में फ़ारसी में चा-ए-ख़िताई यानी "चीन की चाय"। 

यह तो रहा कानों सुना वर्णन लेकिन चाय के पहले अनुभव भी पुर्तगाली यात्रियों ने किए हैं . पुर्तगाली गैस्पर दा क्रूज़ चीन गए और चाय का प्रत्यक्ष विवरण लिखा (लगभग 1569-70)। इन्हें अक्सर चाय का वर्णन करने वाले पहले यूरोपीय लेखकों में गिना जाता है।  वे पुर्तगाली डोमिनिकन पादरी थे। 1548 में वे पुर्तगाल से धर्म-प्रचार के लिए निकले, मलक्का में अपने संघ का मठ बनाया और कंबोडिया में दो साल मिशन खड़ा करने की असफल कोशिश की। 1556 में वे मकाऊ पहुँचे और दिसंबर 1556 में कैंटन (ग्वांगझू) जाने की अनुमति पाकर वहाँ एक महीने से अधिक रहे। इस दौरान उन्होंने स्थानीय लोगों से मिलकर विस्तृत नोट्स बनाए। उन्होंने लिखा है -

किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के घर जो भी आता है, उसे थाली में रख कर चीनी मिट्टी की प्याली में एक गुनगुना, कुछ लालिमा लिए, बहुत औषधीय पानी "चा" नाम से पेश किया जाता है, जो कुछ कड़वी जड़ी-बूटियों के काढ़े से बनता है। जान-पहचान हो या न हो, हर सम्मानित व्यक्ति का स्वागत इसी से होता है, और उन्हें भी यह कई बार दिया गया।

बौद्ध भिक्षुओं के साथ चाय जापान पहुंची . पश्चिम के लिए जापान से खबर लाने वाले थे जेसुइट पादरी लुई दे अल्मेइदा . उन्होंने 1560 के दशक में जापान से चाय का ज़िक्र अपने पत्र में किया। उन्होंने लिखा -

जापान के कुलीन और धनी लोग विदा होते सम्मानित अतिथि को अपने क़ीमती सामान दिखाते हैं। इनमें "चा" पीने के बर्तन होते हैं, यानी लोहे की केतली, चीनी मिट्टी का कटोरा, पानी का पात्र, केतली के ढक्कन का तिपाया, चाय-चूर्ण का डिब्बा, चम्मच, कलछी और अंगीठी। आधा नारियल-खोल चूर्ण कटोरे में डालकर बहुत गरम पानी मिलाकर पीते हैं, और आदत पड़ने पर यह स्वादिष्ट लगता है। 

जापानी चाय की पत्तियों को चूरे में पीस लेते थे . इसी से "माचा" का विकास हुआ है . आगे के पत्र में उन्होंने साकाई के एक ईसाई बने व्यापारी के बुलावे पर हुए औपचारिक चाय-आयोजन का वर्णन किया। ये पत्र मानुएल दा कोस्ता के Historia das missões do Oriente में शामिल हुए, जिसका लैटिन अनुवाद मैफ़ेई ने 1571 में डिलिंगन (जर्मनी) में छापा। यानी यूरोप के पाठकों तक यह जानकारी इसी रास्ते पहुँची।

 जापान और डच संबंध : चाय की पहली खेप यूरोप में 

जापान में तोकूगावा - शोगुन साम्राज्य ने 220 वर्षों तक जापान में ईसाई धर्म पर सख्त नियंत्रण रखा और सिर्फ चुनिंदा देशों को सीमित व्यापार की छूट मिली . जापान ने सिर्फ डच व्यापारियों को अनुमति दी क्योंकि वे सिर्फ व्यापार चाहते थे , धर्म प्रचार नहीं . 

पहली बार लगभग नौ महीने  की कठिन समुद्री यात्रा के बाद 1600ई0 में पहला डच जहाज़ Liefde जापान पहुँचा . याकोब स्पेक्स ने 1609 में शासक तोकुगावा इयेयासु से व्यापारिक अधिकार लिए और 20 सितंबर 1609 को हिराडो में डच व्यापारिक कोठी (factory) स्थापित की  और इस तरह जापान से व्यापार की नींव डाली. अगले वर्ष ही उनकी पहली खेप होलेंड पहुंची तो उसमें अन्य वस्तुओं के साथ चाय भी थी जो जापान के हिराडो द्वीप से लाई गई थी । यह ग्रीन टी थी . 

🇬🇧 कैथरीन, चाय और इंग्लैंड में इसकी एंट्री

चाय ने इंग्लैंड की धरती पर पहली बार 1662 में कदम रखा, जब ब्रिटेन के राजा चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तगाल की राजकुमारी कैथरीन ऑफ ब्रगेंज़ा से हुआ। कैथरीन अपने साथ चाय की परंपरा और पत्तियों का खज़ाना लेकर आईं। वे खुद चाय की दीवानी थीं और इंग्लैंड के शाही दरबार इस तरह शुरू हुई ब्रिटेन की सांस्कृतिक पहचान “आफ्टरनून टी” 


☠️ चाय, तस्करी और अफीम युद्ध

चाय ने चीन-ब्रिटेन संबंधों में जहर घोल दिया। चीन से चाय, पोर्सलीन और रेशम  यूरोप आता था लेकिन यूरोप के पास कुछ नहीं था जो वह चीन को इसके बदले दे सके इसलिए चीन केवल चाँदी के बदले इन चीज़ों को बेचता था, जो ब्रिटेन के लिए घाटे का सौदा था। इसका जवाब मिला उन्हें  अफीम में । ब्रिटिश भारत में अफीम उगाई गई और चीन को बेची गई, जिससे वहाँ नशाखोरी बढ़ी और चीन में असंतोष फैला। नतीजा — 1839 में पहला अफीम युद्ध। चाय को लेकर एक और अफ़ीम युद्ध लड़ा गया और चीन ने अपनी आज़ादी खो दी । 

🇺🇸 चाय की बग़ावत: बॉस्टन टी पार्टी

1773 में अमेरिका की धरती पर चाय क्रांति का कारण भी बनी। जब अंग्रेजों ने अमेरिका पर भारी चाय कर लगाया, तो बोस्टन के नागरिकों ने इसका विरोध करते हुए ब्रिटिश जहाज पर लदी चाय की पेटियाँ समंदर में फेंक दीं। यह घटना "बॉस्टन टी पार्टी" कहलाती है और अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी बन गई।

🇮🇳 भारत में चाय की बगान और बग़ावत

19वीं सदी में अंग्रेजों ने भारत में चाय उगाने का निर्णय लिया — खासतौर से असम, दार्जिलिंग और नीलगिरि में। जबरन मजदूरी, जंगलों की कटाई और आदिवासी जीवनशैली का हनन हुआ।इसका परिणाम अहोम विद्रोह , ख़ासी विद्रोह , नागा विद्रोह ,कूकी संघर्ष जैसे विद्रोहों में हुआ । गांधी जी के सविनय अवज्ञा आंदोलन (नमक आंदोलन) के दौरान नागालैंड की किशोरी गाइडिनल्यू ने जो शौर्य दिखाया उससे प्रभावित हो कर नेहरू जी ने उसे “रानी” गाइडिनल्यू कहा । 

 शुरुआत में भारतीयों को चाय कुछ ख़ास पसंद नहीं थी, पर बाद में अंग्रेजों ने Indian Tea Association के ज़रिए चाय का प्रचार शुरू किया — रेलवे स्टेशनों, मिलों और स्कूलों में चाय फ्री में बाँटी गई।

🫖 भारतीय पहचान में घुली चाय

अब चाय भारत की पहचान बन चुकी है। रेलवे स्टेशन की सीटी, कुल्हड़ की गर्मी, अदरक-इलायची की खुशबू और गली के नुक्कड़ पर चाय वाला — ये सब मिलकर एक सांस्कृतिक दस्तावेज हैं। चाय अब सिर्फ एक पेय नहीं — एक भावना है।

🏭महलों से चायख़ानों तक - चाय-सुट्टा ब्रेक

भारत में चाय की बाग़वानी शुरू होते ही ब्रिटेन में चाय सस्ती होने लगी। कामगारों को कारख़ानों की लंबी पालियों में जगाये रखने के लिए चाय अवकाश दिये गये और इस तरह शुरू हुई आज के ऑफिसों की चाय-सुट्टा ब्रेक की परंपरा । 

✊🏽क्रांतियों का ईंधन - बुद्धिजीवियों का शग़ल 

बीसवीं शताब्दी में चाय बुद्धिजीवियों का पेय बना और चायखाने बन गये क्रांतिकारियों के अड्डे। भारत से ले कर सोवियत संघ तक और क्यूबा से क्योटो तक चाय ने अपना एक नया रूप ले लिया -प्रगतिशील , जागरूक और अधिकारों का प्रतीक । 

आज दुनियाँ में चाय , पानी के बाद सबसे अधिक पिया जाने पेय है ।तो अगली बार जब आप एक कप चाय पीएं, तो ध्यान रहे  — आपकी चाय सिर्फ दूध-पत्ती-चीनी का मिश्रण ही नहीं है, बल्कि पूरी दुनियाँ का इतिहास समेटे है । 


1 अप्रैल 2021

शहीदों के हत्यारे

शहीदों के हत्यारे - प्रकाश के रे की कलम से 
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शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत के बाद आंदोलन को धोखा देनेवालों, जेल के अधिकारियों तथा रात के अँधेरे में शहीदों के शव को जलानेवाले पुलिस अधिकारियों को ब्रिटिश सरकार ने बड़े-बड़े ईनाम दिए थे. इन क्रांतिकारियों के निकट सहयोगी रहे हंसराज वोहरा की कहानी तो लोग जानते ही हैं कि इनकी गवाही शहीदों के फ़ाँसी का सबसे बड़ा आधार बनी थी. वोहरा ने आर्थिक लाभ लेने के बजाय लंदन में पढ़ाई का ख़र्च पंजाब सरकार से लिया. वापसी में सरकारी अधिकारी बने, फिर लाहौर के एक अख़बार के संवाददाता बने और बाद में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अमेरिका में संवाददाता हुए. कई दशक बाद उन्होंने राजगुरु के भाई को पत्र में अपनी सफ़ाई देने की कोशिश की, पर यह भी लिखा कि वह दौर उन्हें आक्रांत करता है और उनकी इच्छा है कि लोग उन्हें बिसार दें. 

क्रांतिकारी से सरकारी गवाह बने जयगोपाल को बीस हज़ार रुपए मिले, जबकि दो अन्य गवाहों (ये भी क्रांतिकारी रहे थे)- फणीन्द्र घोष और मनमोहन बनर्जी को बिहार के चंपारण में पचास-पचास एकड़ ज़मीन मिली. विभिन्न ओहदों के जेल अधिकारियों- एफ़ए बारकर, एनआर पुरी और पीडी चोपड़ा को प्रोन्नति और मेडल हासिल हुए. फ़ाँसी देखकर रोनेवाले जेल उपाधीक्षक अकबर खान को पहले निलंबित किया गया, खान बहादुर की पदवी छीनी गयी, लेकिन बाद में नौकरी पर रख लिया गया. 

लाहौर षड्यंत्र केस के जाँच अधिकारी शेख़ अब्दुल अज़ीज़ को विशेष प्रोन्नति मिली. ये सारी जानकारियाँ देते हुए पंजाब के पुलिस अधिकारी आरके कौशिक ने कुछ साल पहले के एक लेख में बताया है कि अज़ीज़ का मामला दो सौ साल की ब्रिटिश हुकूमत का अकेला मामला है, जिसमें हेड कान्स्टेबल के रूप में भर्ती हुआ आदमी डीआइजी होकर सेवानिवृत्त हुआ था. अज़ीज़ के बेटे को उसी साल डीएसपी भी बना दिया गया था. इसके अलावा उसे पचास एकड़ ज़मीन भी मिली थी. 

लाहौर के एसएसपी हैमिल्टन हार्डिंग को भी पुरस्कार मिला. शहीदों के शव को जलानेवाले अधिकारी सुदर्शन सिंह, अमर सिंह और जेआर मॉरिस तथा इस काम में शामिल तमाम पुलिसकर्मियों को भी प्रोमोशन और पुरस्कार मिले. लाहौर व कसूर के प्रशासनिक अधिकारियों- पंडित श्री किशन, शेख़ अब्दुल हामिद और लाला नाथू राम- को भी ओहदे और मेडल मिले.  

अब फ़ाँसी देनेवाले जल्लादों को क्या कोसना! उन्हें तब भी और अब भी बहुत मामूली रक़म मिलती है. बहरहाल, कौशिक साहब ने बताया है कि शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के जल्लाद काला मसीह के बेटे तारा मसीह ने बहुत सालों बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को फ़ाँसी दी थी.

27 अप्रैल 2019

भगत सिंह भी परेशान थे गोदी मिडिया से

ऐसा लगता है कि २०१४ के बाद भारत में न्यूज़ चैनलों के पास सिवाय मोदी के भजन गाने के और कोई मुद्दा , खबर या स्टोरी नहीं है . लेकिन क्या सचमुच में ऐसा है की यह मिडिया कलियुग २०१४ के बाद आया है और उससे पहले मिडिया का सतयुग था . रविश कुमार और सहयोगियों को यही लगता है  लेकिन रवीश भी असल में गोदी मिडिया ही हैं बस अंतर इतना है की गोदी मोदी विरोधी की है . उनके उठाये गए मुद्दे वाजिब हैं लेकिन उनका लहजा पत्रकार का नहीं "विपक्ष" का अधिक है . मिडिया आजकल ही बिकाऊ हो गयी है ऐसा नहीं है . यह तो अपने जन्म से ही बिकाऊ थी . लोकतंत्र से चौथे स्तम्भ के का दर्जा मिलने से इसे एक पवित्र दर्जा मिल भले ही गया लेकिन इसका चरित्र तो गोदी वाला ही था .दरअसल पत्रकारिता व्यवसाय ही ऐसा है की उससे निष्पक्षता की अपेक्षा करना ज्यादती है क्योंकि आखिर तो वह एक व्यवसाय ही है ना ? लेखन कला के आरम्भ से ही , लेखन का प्रोपेगैडा में बखूबी इस्तेमाल होने लगा था . लेखन कला का पहला विस्तृत अभिलेख " हम्मुराबी संहिता " भी दरअसल राजकीय प्रोपेगैंडा का हिस्सा था . इस अभिलेख में ईराक क्षेत्र के राजा ने आज से करीब ५००० साल पहले राज्य के सामान्य कानूनों को लिपिबद्ध करके सार्वजानिक रूप से राजा की प्रशंशा के साथ छपवा दिया था . 

अशोक के अभिलेख तो राजकीय प्रचार अभियान का ज़बरदस्त उदाहरण हैं जिनमें स्वयं अशोक खुद को देवताओं का प्रिय और सुन्दर दिखने वाला घोषित कर देता है (देवानं प्रिय प्रियदर्शी राजा अशोक ) और जनता को तरह तरह से आश्वस्त , शिक्षित और आदेश देता हुआ अशोक को अंततः लगभग अवतार सिद्ध कर देता है .अशोक द्वारा रौंदे गए कलिंग में अशोक की दम्भपूर्ण आवाज़ कलिग के अभिलेखों में  पुचकारने वाली आवाज़ बन जाती है . 

अशोक के बाद कलिंग नरेश खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख में तो खारवेल की प्रशंसा में प्रयुक्त शब्द देखने लायक हैं . इसमें लिख है की खारवेल ने मगध को रौंद दिया और अपने हाथी घोड़ों को गंगा में स्नान करवाया , मगध के राजा को घुटने टेकने पर मजबूर कर उसे राज्य के खेतों को गधों से जुतवाया. तमिल प्रदेश में जीत दर्ज की. खारवेल  प्रशस्ति भी तो गोदी मिडिया ही है. 

आगे फिर आपको समुद्रगुप्त मिलते हैं जिनके युद्ध मत्री ने ही प्रशस्ति लिखने का जिम्मा संभाला था और समुद्रगुप्त की प्रशंसा में एक विशाल अभिलेख प्रयाग में अशोक के ही स्तम्भ पर अंकित करवाया था . हरिशेण अपने स्वामी की प्रशंसा बेहद जोरदार तरीके से करता है - कुछ वैसे ही जैसे अंजना ओम कश्यप (आज तक) और सरदाना (आज तक ) करते हैं . ज़रा गौर फरमाइए - "वह विभिन्न प्रकार के सैकड़ों युद्धों में भाग लेने में कुशल था, दोनों भुजाओं के बल से अर्जित विक्रम ही जिसका एकमात्र बन्धु था, प्रताप ही जिसका प्रतीक था, परशु, बाण, भाला, शंकु, नाराच आदि अनेक शस्त्रों के प्रहार से उत्पन्न शोभा द्वारा जिसके शरीर की कान्ति द्विगुणित हो जाती थी… अनेक काव्यों की रचना द्वारा जिसने ‘कविराज’ की उपाधि प्राप्त की थी’ । (दुर्भाग्यवश हमें उसकी किसी भी रचना के विषय में ज्ञात नहीं है) वह महान् संगीतज्ञ था जिसे वीणावादन का बड़ा शौक था. उसकी तुलना पृथु, रघु आदि महान् शासकों के साथ की गयी है . उसे  ‘परमभागवत’ अर्थात स्वयं ईश्वर - विष्णु कहते थे । ‘विश्व में कौन-सा ऐसा गुण है जो उसमें नहीं है’. 


अब इसे उन सभी इंटरव्यू से मिला कर देखिये जो मोदी ने पिछले पांच वर्षों में दिए हैं - आपको कुछ नया नहीं लगेगा .


अब ज़रा यहाँ भी देखिये कि भगत सिंह इस बारे क्या कहते हैं . यह उद्धरण उनके 1928 के लेख से है - 


"यहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्रा कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज्य-स्वराज्य’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले हैं। सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो साम्प्रदायिक आन्दोलन में जा मिले हैं, जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं। जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं। और साम्प्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आयी हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे। ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है।दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, अखबार वाले हैं। पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था। आज बहुत ही गन्दा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक बहुत कम है जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो।" अखबारों का असली कर्त्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्त्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?"

तो गोदी हमेशा से थी और रहेगी . रविश भी उतने ही गोदी प्रेमी हैं जितने रोहित सरदाना . न वे क्रन्तिकारी हैं और न ये .


7 दिस॰ 2018

अंबेडकर भारत नहीं पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य थे

जब कांग्रेस से संविधान सभा के लिए अंबेडकर न चुने जा सके तब अविभाजित बंगाल में दलित-मुस्लिम एकता के आर्किटेक्ट जोगेंद्र नाथ मंडल ने आंबेडकर को मुस्लिम लीग की मदद से बंगाल से संविधान सभा में पहुंचाया.

यह जानना आपको दिलचस्प लगेगा कि जिस आंबेडकर को आज हम जानते हैं वह मुस्लिम लीग की देन हैं ।

लीग ने ही अंबेडकर के समाप्त होते राजनीतिक कैरियर को पुनर्स्थापित किया ।

मंडल कांग्रेस को सांम्प्रदायिक मानते थे और जिन्ना के धर्मनिरपेक्ष विचारों को पसंद करते थे इसलिए मंडल ने मुस्लिम लीग का समर्थन किया।

वो मानते थे कि सांप्रदायिक कांग्रेस पार्टी शासित भारत की तुलना में जिन्ना के धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तान में अनुसूचित जाति की स्थिति बेहतर होगी. वो जिन्ना के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के बड़े प्रशंसक थे और अनुसूचित जातियों के सरपरस्त के रूप में उन्हें गांधी और नेहरू की तुलना में कहीं ऊपर आंकते थे।

इसलिए मंडल भारत से पलायन कर न केवल पाकिस्तान के पहले क़ानून मंत्री बने बल्कि वो इसके जनकों में से एक थे.वो पाकिस्तान की सरकार में सबसे ऊंचे ओहदे वाले हिंदू थे और मुस्लिम बहुल वाले इस देश में धर्मनिरपेक्षता के अकेले पैरोकार.

हालांकि, जिन्ना की मौत के बाद उनके सपने कुचले गए. तत्कालीन पाकिस्तान ने उन्हें गलत साबित कर दिया।

अंबेडकर ने राजनीतिक फायदे के लिए और कांग्रेस की राजनीति को नाकाम करने के लिए मंडल की सहायता से अवसर का फायदा उठाया और बंगाल के चार जिलों से वोट ले कर वे संविधान सभा के लिए चुन लिए गये।

लेकिन एक खास परिस्थिति के चलते फिर उनके प्रयास को धक्का पहुंचा। विभाजन की योजना के तहत इस पर सहमति बनी थी कि जिन इलाकों में हिंदुओं की आबादी 51 फ़ीसदी से अधिक है उसे भारत में रखा जाए और जहां मुस्लिम 51 फ़ीसदी से अधिक है उन्हें पाकिस्तान को दे दिया जाए. जिन चार ज़िलों- जस्सोर, खुलना, बोरीसाल और फरीदपुर- से गांधी और कांग्रेस की इच्छा के विरुद्ध आंबेडकर संविधान सभा के लिए चुने गए वहां हिंदुओं की आबादी 71% थी. मतलब, इन सभी चार ज़िलों को भारत में रखा जाना चाहिए था, लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने शायद आंबेडकर के पक्ष में वोट देने की सामूहिक सज़ा के तौर पर इन सभी चार ज़िलों को पाकिस्तान को दे दिया.

इसके परिणामस्वरूप आंबेडकर पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य बन गए और भारतीय संविधान सभा की उनकी सदस्यता रद्द कर दी गई.

पाकिस्तान बनने के साथ ही बंगाल अब विभाजित हो गया था और संविधान सभा के लिए पश्चिम बंगाल में नए चुनाव किए जाने थे.

जब यह स्पष्ट हो गया कि आंबेडकर अब संविधान सभा में नहीं रह सकते तब उन्होंने सार्वजनिक स्टैंड लिया कि वो संविधान को स्वीकार नहीं करेंगे और इसे राजनीतिक मुद्दा बनाएंगे. इसके बाद ही कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें जगह देने का फ़ैसला किया.

बॉम्बे के क़ानून विशेषज्ञ एम. आर. जयकर ने संविधान सभा से इस्तीफ़ा दिया था जिनकी जगह को जी. वी. मावलंकर ने भरा. मंसूबा था कि उन्हें (मावलंकर को) तब संविधान सभा का अध्यक्ष बनाया जाएगा जब 15 अगस्त 1947 से यह भारत के केंद्रीय विधायिका के तौर पर काम करने लगेगा. लेकिन कांग्रेस पार्टी ने यह फ़ैसला किया कि जयकर की खाली जगह आंबेडकर भरेंगे।

(यह लेख  बी बीबीसी हिंदी से लिया गया है )