समाज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
समाज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

11 फ़र॰ 2014

60 वर्ष गए पिक्चर अभी बाकी है

60 वर्ष गए पिक्चर अभी बाकी है
आज भारतीय राजनीति जिस बहुराहे पर खड़ी है वहाँ से आगे जाने का रास्ता सावधानी और उच्च सिद्धांतों के आलोक में तय किया जाना चाहिए। हमारी राजनीतिक व्यवस्था बहुदलीय लोकतन्त्र पर आधारित है और इस व्यवस्था का मुख्य पहलू है दलीय प्रतिस्पर्धा। दुर्भाग्य से आज़ादी के आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाने वाले नेताओं और संस्थाओं ने पार्टियों का रूप लेकर इस प्रतिस्पर्धा का गला घोंट दिया और आज़ादी को महज़ सत्ता हस्तांतरण बना दिया गया। 1947 में चुनावी राजनीति में कांग्रेस और इसके सभी नेताओं से परे कोई सोच नहीं थी और इसी पूर्ण सहमति ने पहले आम चुनाव को जहां अभूतपूर्व रूप से सफल बनाया तो दूसरी ओर इसने बहुदलीय व्यवस्था को अप्रासंगिक बना दिया।  संसदीय व्यवस्थ में विपक्ष का महत्वपूर्ण स्थान होता है और एक मजबूत विपक्ष एक अच्छी सरकार का आश्वासन भी होता है। लेकिन कांग्रेस के सर्वाधिकार ने भारतीय संसदीय व्यवस्था में कभी भी एक मजबूत विपक्ष को उभरने नहीं दिया। आज़ादी को लेकर जो गरिमा, स्फूर्ति और आशा पूरे देश में फैली थी उसे आगे की पीढ़ियों में हस्तांतरित करने की प्रक्रिया को भी इस प्रवृत्ति ने बाधित किया। एकाधिकार और निर्विरोध चुनाव ने कांग्रेस को एक ओर वंशवादी बना दिया तो दूसरी ओर जनता को यथास्थितिवादी। विपक्ष का कमजोर विकास राजनीति में निजी स्वार्थों को सर्वोपरि रखने वाले लोगों के लिए वरदान बन कर आया। ऐसे में कुनिर्णयों, दुर्भाग्य और परिवार्तनों के दौर में सत्ता पर पकड़ बनाए रखने के लिए एकाधिकारवादी और अवसरवादी दोनों ने मिल कर देश की राजनीति को ठीक उन्हीं बिन्दुओं पर ला कर खड़ा कर दिया है जिनसे आज़ादी पाने के लिए हमने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी थी। इसी अवसरवाद ने ठीक अंग्रेजों की तरह भारतीय समाज के तानेबाने में मौजूद सभी दरारों को और बड़ा किया एवं नयी दरारें भी ईज़ाद की गईं। जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्रीयता के जिन मुद्दों के लिए आशा की गयी थी कि स्वशासन के दौर में ये मुद्दे पृष्ठभूमि में चले जाएंगे उन्हीं मुद्दों के सहारे गैर कांग्रेसी दलों ने अपने पैर जमाने की कोशिश की। इस तरह देश की राजनीति ने कल्याणकारी की बजाए जातिवाद, सांप्रदायिकता, क्षेत्रीयता और कट्टरवाद का रास्ता चुन लिया। इस राजनीति ने आज़ादी के बाद के सुनहरे सपनों को ज़मीन पर उतारने की कोशिश करने की बजाए यथास्थितिवाद को प्राथमिकता दी। इस राजनीति ने कर्तव्यबोध और काम करने की संस्कृति की बजाए चापलूसी, भाई भतीजावाद और रिश्वतख़ोरी को जन्म दिया। जनता के मोहभंग और क्षेत्रीय, भाषायी, धार्मिक और जातिवादी राजनीति के कारण जब कांग्रेस का एकाधिकार दरकने लगा तो अब यथास्थिति बनाए रखने के लिए इन्दिरा गांधी द्वारा प्रतिबद्ध नौकरशाही, न्यपालिका और दमन का सहारा लिया गया और फिर आपातकाल जैसे गैर लोकतान्त्रिक कदम भी उठये गए और अंततः पीछे के दरवाजे की राजनीति भी आरंभ हुयी जब कि बूथ कैप्चरिंग, राजनीतिक हत्याएँ, पुलिस और खुफिया तंत्र का इस्तेमाल सत्ता पाने या गिराने में होने लगा। बूथ कैप्चरिंग, आलोकतांत्रिक तरीकों के क्षेत्र में भारत का आविष्कार था। इस तरीके ने राजनीति में अपराधियों के लिए एक बेहतर रोजगार का अवसर पैदा किया और 70 के दशक में बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश में अनेक ऐसे अपराधी बकायदा विभिन्न चुनावी हथकंडों की संगठित सेवा देने लगे। राजनीति और अपराध नजदीक आ गए। प्रतिबद्ध नौकरशाही, न्यायपालिका और पुलिस की अवधारणा ने ट्रांसफर-पोस्टिंग, थानों की नीलामी, पदों की नीलामी और काले धन का प्रचलन बढ़ा दिया। सार्वजनिक जीवन से कर्तव्य, आदर्श और शुचिता के सभी आग्रह समाप्त हो गए और भारतीय जनता अपने संतोषी सदा सुखी को आदर्श मान कर अपने खोल में दुबक गयी। अनेक विफल और अधूरी क्रांतियों के बाद अंततः अब कोई राष्ट्रकवि भी नहीं है। देश के इतिहास में अनेक भीषण मानवीय त्रासदियाँ हुईं पर भारतीय कला चुप रही। समाज की अभिव्यक्ति लुप्त हो गयी। 84 के दंगे हुये, आपातकाल के सितम, नर-संहार, युद्ध, क्रांतियाँ, गरीबी, आतंकवाद और फिर दंगे लेकिन कलाकार, साहित्यकार, संगीतकार चुप रहे। जैसे जैसे देश में निराशा घर कर रही थी कला का फ़लक भी स्याह होता जा रहा था। फिल्मों, संगीत, चित्रकला में उत्तरोत्तर अश्लीलता भी बढ़ रही थी। साहित्य भी चुप ही रहा बल्कि साहित्य भी राजनीतिक-सामाजिक क्षरण के प्रभाव से नहीं बच पाया और इस दौर में प्रकाशस्तंभ की बजाए महज आईना बन कर रह गया। साहित्य भी राजनीति की भांति जातिवादी, खेमेबाजी, धार्मिक और अवसरवादी हो गया। अब हमारे पास कहानीकार नहीं बल्कि दलित या स्त्री या मुस्लिम कहानीकार होते हैं। अब साहित्य रसास्वादन के लिए नहीं बल्कि खेमेबाजी के लिए लिखा जाता है। साहित्य अब राजनीति की B टीम बन गया है। यह वह साहित्य नहीं जो जनसंवेदनाओं को जगाए बल्कि यह उसे भ्रमित करने वाला और बांटने वाला साहित्य है। उयाह कुरीतियों पर कुठराघात नहीं करता बल्कि नयी कुरीतियाँ पैदा और पुष्ट करता है। यह जनता से दूर है और राजनीति के करीब। यह वह आईना है जो उल्टी तस्वीर दिखाता है। यह मूल्यों को पीढ़ियों में हस्तांतरित करने में रुचि नहीं दिखाता। यह नई पीढ़ी के लिए कुछ नहीं देता।
आज़ादी के भंग सपने और जीवन की जद्दोजहद में हमने एक आलसी, यथास्थितिवादी, और असंवेदनशील समाज विकसित कर लिया है। पुरुषार्थ और कर्मवाद के जन्मदाता देश में इन्हीं मूल्यों को खो दिया गया। यह हताशाजनक ही है कि 65 आज़ाद वर्षों बाद भी आज विश्व में सर्वाधिक गरीब, अशिक्षित, कुशासित और प्रदूषित देशों में हम गिने जाते हैं। देश में शिक्षा का जो ढांचा अंग्रेज़ विकसित कर गए थे हम उसी के खंडहरों पर खड़े हैं। शिक्षा के क्षेत्र में नवीनता के नाम पर सिर्फ पब्लिक स्कूल और उनकी विशालकाय इमारतें, भारी बस्ते, भीषण फीस,  ठूँसे हुये दिमाग और ठस शिक्षक ही हैं हमारे पास। कोई नया विचार, आंदोलन नहीं है। सब कुछ सरकार पर निर्भर है।

भारतीय समाज के मानस में अंग्रेजों ने हीन भावनाओं ने जो बीज बोये थे और हमें भरोसा दिलाया था कि हम एक समाज के तौर पर विफल हैं, वे अब फल दे रहे थे। हम एक विफल समाज के रूप में विकसित होते जा रहे हैं। हमारे यहाँ व्यक्तिगत उपलब्धियां बहुत हैं पर सामूहिक सफलताएँ कम। व्यक्तिगत रूप से हम विदेशों में जा कर बड़ी सफलताएँ हासिल करते हैं पर सामाजिक तौर पर हमारी उपलब्धियां शून्य हैं। देश में धन का उदारीकरण तो हो गया पर मन का उदारीकरण होना बाकी है। पुराने मूल्यों को तो हमने त्याग दिया है पर नए श्रेष्ठ मूल्यों का निर्माण अभी बाकी है। देश पुनः एक बहुराहे पर खड़ा है। 

16 दिस॰ 2012

किसी रंजिश को हवा दो की मैं ज़िंदा हूँ अभी

किसी रंजिश को हवा दो की मैं ज़िंदा हूँ अभी 

अमेरिका के राष्ट्रपति की आँखें फिर नम हैं। अभी बहुत दिन नहीं हुये हैं जब ऐसी ही घटना ने उन्हें आहत किया था। शब्द और माहौल भी वही हैं गमगीन, गंभीर और कुछ करने के वादे , कुछ नहीं बदला है और शायद कुछ बदलेगा भी नहीं। आखिर छोटे बच्चों की मौत पर भला अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसी महान और शानदार लाइनों को अमेरिकी संविधान से यूं ही तो नहीं मिटाया जा सकता। और भला इससे किसका फाइदा होगा? अगर अमरीकी शस्त्र कानून बदलाव किया जाता है तो बंदूकों की बिक्री बंद हो जाएगी। लोग बेरोजगार होंगे और अराजकता फैलेगी फिर लोग अवैध तरीके से हथियार लेकर यही काम करेंगे। इसलिए यह कानून रहेगा और ऐसा ही रहेगा। इसके पैरवी करने वाले इतने सजग हैं की जिस दिन यह घटना घटी ठीक उसी दिन डिस्कवरी चैनल पर मैंने एक कार्यक्रम देखा जिसका नाम था डूम्स डे प्रेपेयर्स। इसमें एक सज्जन ने प्रलय या डूम्स डे के लिए तैयारी में पानी से ज्यादा बंदूकें खरीद रखीं थीं और उसका पूरा चिंतन इसी एक तर्क पर टीका था की जब मंदी आएगी तो अराजकता फैलेगी और उससे रक्षा के लिए हमें ऐसी तैयारी की ही आवश्यकता होगी। तो ऐसे कार्यक्रम दरअसल एक डर पैदा करके उस भय के व्यावसायिक दोहन के लिए माहौल बनाते हैं। तो मुझे पूरा भरोसा है की अभिव्यक्ति की आज़ादी छीनी नहीं जाएगी।

हाल की घटना में एक नौजवान ने एक स्कूल में फायरिंग करके 20 बच्चों और 8 वयस्कों की जान ले ली और खुद को एवं अपनी माँ को भी मौत के घाट उतार दिया। मामले की परतें खुलने पर पता चला है की यह नौजवान एक समृद्ध परिवार से था जिसके पिता बहुराष्ट्रीय कंपनी जीई कैपिटल में वाइस प्रेसिडेंट हैं और विश्व की सबसे बड़ी सलहकार फार्म अर्न्स्ट एंड यंग में पार्टनर भी हैं। लड़के का बड़ा भाई भी अर्न्स्ट एंड यंग में अच्छे पद पर है। बचपन में ही मटा पिता का अलगाव हुआ और फिर तलाक जिसके बाद दोनों अपनी माँ के साथ रहते थे जो इसी स्कूल में टीचर थी। आस पास के लोगों ने इस नौजवान को कभी बात करते या मिलते जुलते नहीं देखा और ना ही कोशिश की क्यूंकी उन्हें लगता था की वह अकेला ही रहना चाहता है। उसके एक सहपाठी के अनुसार वह होशियार था। उसकी कभी हिंसक गतिविधियां भी नहीं थीं। तब आखिर क्या बात थी जिसने उसे ऐसा कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया। क्या ऐसी घटनाओं के लिए अमेरिका ही अभिशप्त है ? भारत में ऐसी हृदयविदारक घटनाएँ क्यूँ नहीं होतीं? क्या यह संस्कृति से संबन्धित मामला है ? क्या ऐसा करने वाले आपराधिक मनोवृत्ति के लोग होते हैं?क्या यह कमजोर शस्त्र कानून का नतीजा है ? प्रश्न बड़े हैं और उत्तर नदारद। 

मुझे याद है अपना बचपन जो एक छोटे कस्बे में बीता था। हमारे मुहल्ले में कोई अकेला हो ही नहीं सकता था। आप बाहर निकालिए तो पूरी गली पार करते करते चबूतरों पर धूप सेंकते बुजुर्ग और गली के लड़के अगर यह ना पूछें की "काए लला कहाँ जाय रहे ?" तो लानत है उनके वहाँ होने पर  और आपको भी अपने अस्तित्व का बखूबी एहसास हो जाता था। अगर कभी कोई समस्या होती तो पूरा मुहल्ला शामिल होता और दुख तो खैर होता ही था सामूहिक। लड़की की शादी हो तो सहायता बिना मांगे मिलती थी। पड़ोसियों की खबर रखना अशिष्ट नहीं आवश्यक था। सब कुछ अच्छा अच्छा ही नहीं था बुराइयाँ भी थीं पर कम से कम उस स्थिति से तो बेहतर ही था जिसमें बगल के फ्लैट में आदमी चार दिन से मरा पड़ा हो और लोगों का ध्यान तब जाए जब बदबू आने लगे। 

मुझे लगता है की हमें फिर से सोचना होगा हमारे विकास और सफलता के मापदण्डों के बारे में। क्या किसी एमएनसी का CEO बनना ही जबकि आपका परिवार बिखर रहा हो । क्या मशीन की तरह काम करना और पैसा कमाना ही सफलता का मापदंड होना चाहिए। इस आधार पर उस नौजवान के पिता सफल हैं परंतु क्या वे मानवीय पैमानों पर सफल हैं? जब आपका परिवार बिखर रहा हो तो सफलता की सिद्धियों का क्या मतलब है। और क्या ऊंची इमारतें, फ़्लाइओवर, एकप्रेसवे, बड़ी गाड़ियां, ऊंचे पुल और बड़ी कंपनियाँ बैंक ही किसी समाज की सफलता की गारंटी हैं। अगर एक समाज अपने बच्चों को सुरक्षा, शिक्षा और सही वातावरण नहीं दे सकता तो उसके सफल होने का क्या अर्थ ? क्या एक राज्य तभी सफल है जबकि वह सबसे ज्यादा हथियार, सेना और शक्ति का प्रदर्शन कर सकता है जबकि उसका समाज दरक रहा हो। क्या एक संविधान अभिव्यक्ति की आज़ादी के पीछे जीवन के अधिकार को पीछे धकेल कर सफल माना जा सकता है। आखिर व्यक्तिगत जीवन की सुरक्षा से अधिक महत्वपूर्ण सामाजिक जीवन की सुरक्षा होनी चाहिए। राज्य एक सामूहिक व्यवस्था है और इसमें व्यक्ति की निरपेक्ष स्वतन्त्रता नहीं होती इसलिए अमेरिकी क़ानूनो की निरपेक्षताएँ अक्सर विरोधाभासी नज़र आती हैं। इस घटना में नौजवान ने सभी हथियार कानूनी ढंग से खरीदे थे। उसे रोका नहीं जा सकता था यह उसकी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता थी लेकिन उन लोगों के जीवन के नैसर्गिक अधिकार का क्या ? क्या यह अधिकार कम महत्वपूर्ण हैं ? अमेरिकी समाज का यह अकेलापन ऐसी घटनाओं का कारक बनता है। 
इस अकेलेपन में जब कोई नौजवान अपने अस्तित्व का आभास कराना चाहता है तब समाज व्यक्तिवादी हो कर उसके अकेलेपन को उस पर थोप देता है। उससे कोई नहीं पूछता की वह क्या चाहता है। उसके माँ बाप भी उसके कमरे के दरवाजे को अपनी सीमा मानते हैं और जब वह अकेलापन इतना असहनीय हो जाए तब वह एक ऐसी रंजिश को हवा देता है की जो समाज अभीतक उसके अस्तित्व से बेखबर था वह उसके होने और ना रहने के पलों को याद करके बरसों कांपता रहता है। 

21 नव॰ 2012

हंगामा है क्यूँ बरपा !

एक भारतीय दांत चिकित्सक महिला की आयरलैंड में इसलिए मौत हो गयी क्यूंकी डॉक्टर ने उसकी जान बचाने के लिए आवश्यक होते हुये भी गर्भपात करवाने से इनकार कर दिया क्यूंकी उसका कानून इसकी इजाज़त नहीं देता। इससे पुनः आइरिश कानून पर बहस छिड़ गयी है और भारत ने तो बकायदा आयरलैंड को सलाह भी दे डाली है की इस मामले की निष्पक्ष जांच करा ली जाए (जैसी की अपने यहाँ के नताओं को आदत सी हो गयी है) अनेक भारतीय समाचार चैनल इस मसले पर हंगामा बरपा रहे हैं । उस महिला की मौत दुर्भाग्यपूर्ण है और वह डॉक्टर तो निश्चित ही निंदनीय है जिसने उसका सही इलाज करने के अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं किया लेकिन ज़रा यहाँ ठहरिए और सोचिए क्या हमें अधिकार है इतना हंगामा खड़ा करने का ?

  • भारत के लोग हर वर्ष लाखों बच्चियों को गर्भ में मार डालते हैं। भारत के छोटे से छोटे कस्बे में अल्ट्रासाउंड सबसे चोखा धंधा है। इसे ले कर किसी डाक्टर को कानून क्या भगवान भी याद नहीं आते। आयरलैंड के डाक्टर कम से कम कानून का तो पालन करते हैं। 
  • भारत में हर वर्ष असुरक्षित प्रसव से लाखों माताओं की मौत होती और लाखों बच्चे मर जाते हैं तब कोई हँगामा नहीं सुनाई देता बस हर दस वर्ष में रस्मी तौर पर जनगणना के आंकड़ों पर बहसें हो जाया करतीं हैं। 
  • भारत में हर वर्ष लाखों बच्चियों की अल्पवयस्क होते हुये भी शादी की जाती है तब कोई हंगामा नहीं होता। 
  • भारत के चौराहों पर, मंदिरों में, और उनके बाहर, रेलवे स्टेशनों पर लाखों बच्चे भीख मांगते हैं पर तब हमें शर्म, गुस्सा या खीज नहीं होती। 
  • भारत के लाखों बच्चे आज भी भूख से मर जाते हैं पर किसी के कण पर जूँ तक नहीं रेंगती । 
  • भारत में हर वर्ष लाखों विवाहित महिलाएं दहेज के लिए मार डालीं जातीं हैं पर हमें फर्क नहीं पड़ता। 
  •  भारत जो एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है ( हम आयरलैंड की कैथोलिक एंगिल से भी आलोचना कर रहे हैं ) औरतों के लिए अलग अलग कानून हैं - हिंदुओं के लिए अलग और मुसलमानों के लिए अलग।
  • भारत में हर वर्ष सैकड़ों लड़कियां इसलिए मार दी जाती हैं क्यूंकी वे अपनी पसंद का जीवन साथी चुन लेतीं हैं। 
इन सबके लिए -----ध्यान से देखिये सरकार नहीं लोग दोषी हैं ----यही सबसे बड़ा भ्रष्ट आचरण है ---- स्विस बैंकों में दौलत जमा करने से बड़ा पाप है अजन्मी बच्चियों की हत्या, पैसे के लिए अपनी पत्नी, बहू की हत्या, धर्म की आड़ में बच्चों को टीकाकरण से दूर रखना, स्त्रियॉं को सामान्य मानव के हकों से दूर रखना। चिंता हमें आयरलैंड के क़ानूनों की नहीं अपने समाज की करनी चाहिए। आयरलैंड का क़ानून ो मुझे स्पष्ट लगा की अगर माँ की जान बचाने के लिए गर्भपात आवश्यक है तो इसकी अनुमति है पर हमारे देश के उन क़ानूनों की चिंता कीजिये जो ऐसे छेद छोड़ देते हैं जिससे उन्हें तोडा जा सके। आइये चिंता करें उन क़ानूनों की जो किसी स्त्री को उसका अधिकार नहीं दे सकते। आयरलैंड को निपटने दीजिये इस मुद्दे से वे इसे अपनी तरह से हल कर ही लेंगे। 

13 जुल॰ 2012

गुवाहाटी का अफसोस


गुवाहाटी की शर्मसार करने वाली घटना कई सवाल खड़े करती है। यह केवल गुवाहाटी में ही नहीं हर कहीं मौजूद है। एक प्रतिष्ठित अङ्ग्रेज़ी समाचार चैनल की वाचिका की प्रतिकृया ट्विटर पर थी। उनके अनुसार हम खुद को सुपर पावर कहते हैं और ऐसी घटनाएँ होतीं हैं। प्रश्न यह है की क्या सुपर पावर नैतिक भी होता है। बल्कि अगर आप देखें तो पाएंगे की सुपर पावर ही सबसे अनैतिक भी होता है। शक्ति है ही ऐसी चीज़। तभी किसी दार्शनिक ने कहा था "power corrupts and absolute power corrupts absolutely" शक्ति भ्रष्ट करती है और सम्पूर्ण शक्ति पूर्णतया भ्रष्ट कर देती है। दुनियाँ में जो भी सुपर पावर है वह उसका दुरुपयोग ही कर करहा है। हमारे समाज का ढांचा ही ऐसा बन गया है। अमेरिका ने अपने गुंडों के साथ (नैटो पढ़िये) इराक का जो हाल किया वह इसी गुवाहाटी जैसी घटना ही थी। जब से इंसान ने यह शक्ति और सत्ता का आविष्कार किया है वह इन पर कब्जे को लेकर लड़ता रहा है। दुनियाँ का इतिहास उठाइए तो पाएंगे की यह असल में युद्धों और संघर्षों का ही इतिहास है। समाज का अध्यययन करें तो वहाँ भी सत्ता और संपत्ति का संघर्ष मौजूद है। हमारा समाज पितृसत्तात्मक समाज है जहां संपत्ति का उत्तराधिकार पिता से पुत्र को जाता है। पुत्री का अधिकार नहीं है। मातृसत्तात्मक समाजों में यह उत्तराधिकार माँ से पुत्री को मिलता है। पर ऐसे समाजों में विवाह और परिवार की व्यवस्था वैसी नहीं होती। यहाँ पुरुष ढीले रूप से माँ-पुत्री से जुड़े रहते हैं। ऐसे समाज अब विश्व में बहुत कम हैं। पितृसत्तात्मक समाज अपने पुत्रों को सर्वोच्च स्थान देता है। उसकी प्रस्थिती और भूमिका उसे समाज में ताकतवर बनती है और यही ताकत उसे भ्रष्ट बना देती है। इस अव्यवस्था से निपटने के लिए ही समाज ने विवाह और संपत्ति के कानून बनाए  और उन्हें धार्मिक, राजनैतिक और आर्थिक ताकतों  से लागू करवाया गया। समाज के नैतिक मूल्य ताकत के दुरुपयोग की प्रवृत्ति को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। लेकिन आधुनिक अर्थव्यवस्था और व्यक्तिवादी दर्शन ने इस मूल्यों को तिलांजली दे दी है। इन्हें विक्टोरिया युगीन कह कह कर खारिज किया जाता है पर विडम्बना है की जो नए मूल्य पनप रहे हैं वे तो बर्बर हैं( विक्टोरिया युग से पहले यूरोप में पूर्वी ताकतों - हूणों, को बर्बर कहा जाता था) । आज नयी व्यवस्था नारी स्वातंत्र्य की पक्षधर है पर यही व्यवस्था इस स्वतन्त्रता का केवल विभ्रम पैदा करती है। असली स्वतन्त्रता नहीं देती। यह व्यवस्था नारी को देह तक ही सीमित करती है और उसे एक उत्पाद के रूप में देखने को प्रेरित करती है। यह व्यवस्था अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की आड़ में स्त्री का अनैतिक प्रदर्शन जारी रखती है। यह व्यवस्था स्त्री को एक सेंट पर मर मिटने के लिए तैयार दिखाती है। यह व्यवस्था स्त्री को आइटम बनती है - चिकनी चमेली बनाती है, शीला और मुन्नी बनाती है। एक अखबार तो 18 वर्ष की उम्र में शराब पीने  के अधिकार को ले कर बाकायदा एक जंग चला रहा है। अनेक अखबार जो छाप नहीं सकते उसे अपने वेब पोर्टल पर रखते है। फिल्में हमारी निरंतर अपनी सामाजिक हदें पार कर रहीं है। निरंतर गालियां, अश्लील और द्वियार्थी संवाद और आइटम नंबर आपको जल्दी ही इंका आदि बना रहे हैं। टीवी कार्यक्रमों में आप घर बैठे यह सब देख सकते हैं और अगर आप परेशान हैं तो जल्दी ही आप बहिष्कृत भी महसूस करेंगे। तो बेहतर है की आप समाजस्य बैठा लें। आप समाज में अधनंगे घूमें और आधुनिक कहलाए जाने को अधिक पसंद करेंगे  बजाए ओल्ड फैशन और आउटडेटेड के। बच्चों के आदर्श आज यहाँ नहीं वहाँ है - अमेरिका में। उनका संदर्भ भारतीय नहीं है अमरीकी है। आज बच्चे एकोन और एमिनेम को सुनते हैं जिनमें हिंसा, सेक्स और गलियों का तड़का लगा है। एकोन 14 वर्षीय बालिका के साथ स्टेज पर जो करता है वह हमारे लिए आघात है पर उनके लिए आदर्श है जो उसे सुनते हैं। हाल ही में हिन्दी फिल्म जोकर का एक गाना यू ट्यूब पर "लीक" हो गया है और उसके बोल "I wanna F**k you baby"। शराब, अश्लील गाने और वीडियो और नेट पर सर्वसुलभता और बेटा होने का दर्प। यह माहौल घातक है। इसका सुपरपावर होने और ना होने से मतलब नहीं है। यह तो उस व्यवस्था की स्वाभाविक उपज है जिसे हम बना रहे हैं।  इसके नियम और मूल्य भी हमें ही बनाने हैं। और नियमों को बनाने का मतलब होता है सीमाएं खींचना। अगर समाज को अराजक नहीं बनाना है तो कुछ हदें तो हमें बनानी ही होंगी। ऐसी घटनाएँ कानून का नहीं समाज का विषय होती हैं और यहीं आज का समाज असफल है। पहले समाज का दबाव और डर ऐसे आपराधिक तत्वों को दबाता था। केवल दबंग ही बच पाता था। लेकिन आज समाज अनुपस्थित है। गुवाहाटी की चलती फिरती रोड पर 8 - 10 लड़के एक लड़की का  शोषण करते रहे और दसियों लोग मूक दर्शक बने रहे? समाज इतना मूक बाघिर कभी नहीं था। गाँव में हमारे पैर बाहर पड़ते ही गली में दसियों लोग पूछ बैठते " काए लला कहाँ जाय रहे" जवाब दीजिये नहीं तो शिकायत घर हमसे पहले पहुँच जाती थी। और आज सोसाइटी में सामने वाले फ्लेट में कौन रहता है पता नहीं। सोचिए कैसा समाज हम बना रहे हैं। आधुनिकता कपड़ों से नहीं, सड़कों से नहीं, ऊंची इमारतों से नहीं सोच से आती है।

27 फ़र॰ 2012

नोर्वे को सबक

दो भारतीय बच्चों को तथाकथित सुरक्षा गृह में रखने का मामला बड़ा विचित्र है और साथ ही संस्कृतियों की विभिन्नता भी दर्शाता है। नॉर्वे के क़ानूनों के अनुसार ये भारतीय दंपति बच्चों के पालन में सक्षम नहीं थे अतः बच्चों को किन्हीं दूसरे घरों में भेज दिया गया। यह अक्षमता थी - बच्चों को हाथ से खाना खिलाना, साथ सुलाना आदि। ऐसा केवल यही मामला नहीं है बल्कि नॉर्वे हर वर्ष बड़ी मात्र में बच्चों को मटा पिता से अलग करता आया है इन्हीं क़ानूनों के आधार पर। कोई राजा महाराजा सनकी हो सकता है पर एक कल्याणकारी राज्य की पूरी मशीनरी यदि सनकी हो जाए तो चिंता होती है। कानून बेशक सनक में नहीं बनाए जाते और अगर नॉर्वे में ऐसी कानून हैं तो इनकी ठोस वजह भी होनी चाहिए। और यही तथ्य मुझे चिंता में डाल देता है। कानून ईश्वर नहीं बनाता बल्कि क़ानूनों के पीछे समाज होता है। अगर नॉर्वे बड़ी मात्र में बच्चों को फॉस्टर होम्स में भेजता है तो यह तथ्य यही बताता है की नॉर्वे के समाज में बड़ी गड़बड़ है। समाज विज्ञान की भाषा में कहें तो वहाँ समाज डिसफंकशनल हो चुका है। यदि समाज अपने बच्चों को सुरक्षा नहीं दे सकता और समाज में यदि बच्चों को अपने ही माँ बाप से असुरक्षा हो तो केवल कानून नहीं बल्कि बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। भारतीय बच्चे तो खैर हमें वापस मिल ही जाएंगे पर स्वयं नॉर्वे यदि अपने विकृत समाज को सही करने की दिशा में कदम नहीं उठाएगा तो यह मानवता के लिए खतरा बन जाएगा। इस घटना से सीख मिलती है खास तौर पर उन लोगों के लिए जो पश्चिम की हर चीज़ को बेहतर मानते हैं और भारत के लिए कहा करते हैं "यहाँ का तो सिस्टम ही है खराब" । शायद नॉर्वे का सिस्टम उन्हें भी रास नहीं आएगा।