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27 अप्रैल 2019

भगत सिंह भी परेशान थे गोदी मिडिया से

ऐसा लगता है कि २०१४ के बाद भारत में न्यूज़ चैनलों के पास सिवाय मोदी के भजन गाने के और कोई मुद्दा , खबर या स्टोरी नहीं है . लेकिन क्या सचमुच में ऐसा है की यह मिडिया कलियुग २०१४ के बाद आया है और उससे पहले मिडिया का सतयुग था . रविश कुमार और सहयोगियों को यही लगता है  लेकिन रवीश भी असल में गोदी मिडिया ही हैं बस अंतर इतना है की गोदी मोदी विरोधी की है . उनके उठाये गए मुद्दे वाजिब हैं लेकिन उनका लहजा पत्रकार का नहीं "विपक्ष" का अधिक है . मिडिया आजकल ही बिकाऊ हो गयी है ऐसा नहीं है . यह तो अपने जन्म से ही बिकाऊ थी . लोकतंत्र से चौथे स्तम्भ के का दर्जा मिलने से इसे एक पवित्र दर्जा मिल भले ही गया लेकिन इसका चरित्र तो गोदी वाला ही था .दरअसल पत्रकारिता व्यवसाय ही ऐसा है की उससे निष्पक्षता की अपेक्षा करना ज्यादती है क्योंकि आखिर तो वह एक व्यवसाय ही है ना ? लेखन कला के आरम्भ से ही , लेखन का प्रोपेगैडा में बखूबी इस्तेमाल होने लगा था . लेखन कला का पहला विस्तृत अभिलेख " हम्मुराबी संहिता " भी दरअसल राजकीय प्रोपेगैंडा का हिस्सा था . इस अभिलेख में ईराक क्षेत्र के राजा ने आज से करीब ५००० साल पहले राज्य के सामान्य कानूनों को लिपिबद्ध करके सार्वजानिक रूप से राजा की प्रशंशा के साथ छपवा दिया था . 

अशोक के अभिलेख तो राजकीय प्रचार अभियान का ज़बरदस्त उदाहरण हैं जिनमें स्वयं अशोक खुद को देवताओं का प्रिय और सुन्दर दिखने वाला घोषित कर देता है (देवानं प्रिय प्रियदर्शी राजा अशोक ) और जनता को तरह तरह से आश्वस्त , शिक्षित और आदेश देता हुआ अशोक को अंततः लगभग अवतार सिद्ध कर देता है .अशोक द्वारा रौंदे गए कलिंग में अशोक की दम्भपूर्ण आवाज़ कलिग के अभिलेखों में  पुचकारने वाली आवाज़ बन जाती है . 

अशोक के बाद कलिंग नरेश खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख में तो खारवेल की प्रशंसा में प्रयुक्त शब्द देखने लायक हैं . इसमें लिख है की खारवेल ने मगध को रौंद दिया और अपने हाथी घोड़ों को गंगा में स्नान करवाया , मगध के राजा को घुटने टेकने पर मजबूर कर उसे राज्य के खेतों को गधों से जुतवाया. तमिल प्रदेश में जीत दर्ज की. खारवेल  प्रशस्ति भी तो गोदी मिडिया ही है. 

आगे फिर आपको समुद्रगुप्त मिलते हैं जिनके युद्ध मत्री ने ही प्रशस्ति लिखने का जिम्मा संभाला था और समुद्रगुप्त की प्रशंसा में एक विशाल अभिलेख प्रयाग में अशोक के ही स्तम्भ पर अंकित करवाया था . हरिशेण अपने स्वामी की प्रशंसा बेहद जोरदार तरीके से करता है - कुछ वैसे ही जैसे अंजना ओम कश्यप (आज तक) और सरदाना (आज तक ) करते हैं . ज़रा गौर फरमाइए - "वह विभिन्न प्रकार के सैकड़ों युद्धों में भाग लेने में कुशल था, दोनों भुजाओं के बल से अर्जित विक्रम ही जिसका एकमात्र बन्धु था, प्रताप ही जिसका प्रतीक था, परशु, बाण, भाला, शंकु, नाराच आदि अनेक शस्त्रों के प्रहार से उत्पन्न शोभा द्वारा जिसके शरीर की कान्ति द्विगुणित हो जाती थी… अनेक काव्यों की रचना द्वारा जिसने ‘कविराज’ की उपाधि प्राप्त की थी’ । (दुर्भाग्यवश हमें उसकी किसी भी रचना के विषय में ज्ञात नहीं है) वह महान् संगीतज्ञ था जिसे वीणावादन का बड़ा शौक था. उसकी तुलना पृथु, रघु आदि महान् शासकों के साथ की गयी है . उसे  ‘परमभागवत’ अर्थात स्वयं ईश्वर - विष्णु कहते थे । ‘विश्व में कौन-सा ऐसा गुण है जो उसमें नहीं है’. 


अब इसे उन सभी इंटरव्यू से मिला कर देखिये जो मोदी ने पिछले पांच वर्षों में दिए हैं - आपको कुछ नया नहीं लगेगा .


अब ज़रा यहाँ भी देखिये कि भगत सिंह इस बारे क्या कहते हैं . यह उद्धरण उनके 1928 के लेख से है - 


"यहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्रा कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज्य-स्वराज्य’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले हैं। सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो साम्प्रदायिक आन्दोलन में जा मिले हैं, जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं। जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं। और साम्प्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आयी हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे। ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है।दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, अखबार वाले हैं। पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था। आज बहुत ही गन्दा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक बहुत कम है जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो।" अखबारों का असली कर्त्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्त्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?"

तो गोदी हमेशा से थी और रहेगी . रविश भी उतने ही गोदी प्रेमी हैं जितने रोहित सरदाना . न वे क्रन्तिकारी हैं और न ये .


24 फ़र॰ 2015

विकास विकास .....क्या है विकास , कहाँ रहता है विकास ?

एक देश में जहां 70 प्रतिशत जनता ज़िंदगी से जूझ रही है और 47 % बच्चे कुपोषण का शिकार हैं वहाँ पिछले वर्ष लगभग 9 से 10 महीनों तक कॉर्पोरेट पूंजी की सहायता से दसियों हज़ार करोड़ फूँक कर एक विकासवादी सरकार जनता ने चुनी। कम से कम कहा तो यही जाता है ।  इस जनता के सपनों में कैसा विकास होगा यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है। जनता को एक ऐसा विकास चाहिए जिसे वे खुद भी महसूस कर सकें ना कि ऐसा विकास जिसे देख कर केवल वे आश्चर्यचकित और भयभीत हो सकें । जनता के विकास की परिभाषा बहुत सरल है । जनता को चाहिए अच्छा खाना, कपड़ा, स्वस्थ्य, शिक्षा और रहने की जगह। सरकारें, लोकतन्त्र में इसी वजह से होतीं हैं । कल्याणकारी सरकार का पहला उत्तरदायित्व जनता के प्रति है । जनता की पहली अपेक्षा वही मूलभूत मुद्दे हैं । भारत की सरकारों ने पिछले 65 वर्षों में समय समय पर यह आभास दिया है कि जब जरूरत होती है वह जनता का साथ देने के बजाय जनता के विरुद्ध खड़ी नज़र आती है। हर असंतोष को विरोध समझ कर उसे दबा दिया जाता है । भूमि अधिग्रहण कानून का मामला भी कुछ ऐसा ही है । भारत में 100 वर्ष से अधिक पुराना औपनिवेशिक कानून अस्तित्व में था जिसके आधार पर अनेक सार्वजनिक और निजी परियोजनओं के लिए जमीन लेने के नियम बनाए गए थे । अङ्ग्रेज़ी सरकार के बनाए ये कानून छोटे से छोटे विरोध को खत्म करने के उद्देश्य से ही बनाए गए थे । पिछले 65 वर्षों में इन्हें बदला नहीं गया और अब जब कि समय है सरकारें कॉर्पोरेट हितों की पोषक बनी हुयी हैं। 

ज़मीन हथियाने का धंधा : SEZ 

उदारीकरण के बीस वर्षों में कई बार बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण हुआ है  और इस प्रक्रिया में देश भर में  पिछले 65 वर्षों में कई बार विवाद पैदा हुआ है और मामले अदालतों में लंबित हैं । ये विवाद बहुधा मुआवजे और पुनर्वास को लेकर हैं । इस संदर्भ में महालेखा परीक्षकों की रिपोर्ट हैं जो यह कहतीं हैं की पिछले 20 वर्षों में जिन ज़मीनों को अधिग्रहीत किया गया उनमें से अधिकांश पर वह काम शुरू नहीं हुआ जिनके लिए उन्हें लिया गया था । इसके उलट अधिकांश या तो बंजर पड़ीं हैं या उनके प्रयोग को बदल कर आवासीय प्रयोजन के लिए ग्रुप हाउसिंग सोसायटियाँ बन गईं हैं।
हाल ही में वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने जब सेज़ यानी विशेष आर्थिक क्षेत्रों पर सीएजी की रिपोर्ट संसद में पेश की तो ये राज़ खुला कि सेज़ के कायदों का धड़ल्ले से उल्लंघन जारी है। सीएजी की इस रिपोर्ट के मुताबिक, एसईज़ेड के लिए देश में जो क़रीब 45,000 हेक्टेयर ज़मीन निकाली गई, उसमें सिर्फ 28,000 हेक्टेयर ज़मीन पर काम शुरू हुआ है।
रिपोर्ट के मुताबिक, कई समूहों ने एसईज़ेड के नाम पर सरकार से ज़मीन लेकर उसे ऊंचे दामों पर बेच दिया और 6 राज्यों में करीब 40000 हेक्टेयर ज़मीन सेज़ के नाम पर निकाली गई, लेकिन इसमें से करीब 5,400 हेक्टेयर ज़मीन का व्यावसायिक इस्तेमाल कर लिया गया। इस तरह एसईज़ेड पॉलिसी जमीन हथियाने की पॉलिसी थी। इसका इस्तेमाल ज़मीन लूटने के लिए किया गया। इसके अलावा इन कंपनियों को 83000 करोड़ से अधिक की कर छूट भी मिली । यहाँ एक तथ्य गौर तलब है की जब दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने महज़ 200 करोड़ रुपये की सब्सिडी देते हुये पानी और बिजली जैसी आधारभूत जरूरतों को गरीबों को राहत देने के लिए , दरें घटाईं थी तब राजनीतिक अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों ने इसे " लोकतन्त्र" के लिए खतरनाक बताया था । लेकिन किसी विश्लेषक को यह अपराधपूर्ण कृत्य बुरा नहीं लगता कि किसान से सार्वजनिक कार्य के नाम पर पहले ज़मीन ली जाए । 20 वर्ष पहले के दाम तय करके मुआवजा दिया जाए । फिर वर्षों तक प्रस्तावित कार्य ना हो पाने पर ज़मीन को निजी कंपनियों को बेच दिया जाए।  



ग्रामीण जनसंख्या का मलिन बस्ती में बदलना : 

 इन जगहों पर जो गाँव थे उनके लोग जहां पहले भूमि के मालिक थे अब भूमिहींन मजदूर हैं । जो मुआवजा मिला था वह बेहतर योजना के आभाव में खर्च हो चुका है और गाँव अब दमकती सोसाइटी के बीच एक झुग्गी में तब्दील हो चुका है जो उसी सोसायटी के लिए घरेलू नौकर, प्लमबर, बिजली और ड्राइवर का स्रोत बन गया है । ऐसे सामाजिक उथल पुथल से अपराध भी बढ़ते हैं, इसके सामाजिक अध्ययन मौजूद हैं । किसी सरकार ने यह शोध करने की ईमानदार कोशिश नहीं की है की आखिर भारत की जमीन की जरूरतों को कैसे पूरा किया जाए जिससे ऐसे दुष्प्रभाव ना हों। भारत की रक्षा, शिक्षा और ऊर्जा नीति की तरह कोई भूमि नीति नहीं है । इस मुद्दे पर पिछले वर्षों में जब विवाद अधिक बढ़ा था और दिल्ली व आस पास के क्षेत्रों में  हिंसक झड़पें भी हुईं थी उस समय राहुल गांधी ने अचानक बड़ा नाटकीय आंदोलन  रचा कर आनन फानन में एक बिल पास कर दिया था । अब केंद्र सरकार में सत्ता संभालने वाली बीजेपी ने एक अध्यादेश के द्वारा इस बिल में बड़े बदलाव कर दिये हैं और ये बदलाव महज़ मुआवजा वाले बिन्दु को यथावत रखते हुये कई कदम आगे बढ़ते हुये इसे पूरी तरह से थोड़े से उधयोगपतियों के पूर्णतः हित में बना दिया है ।

यमुना एक्स्प्रेस वे या पुणे एक्स्प्रेस वे जैसी परियोजनाएँ एक बढ़िया उदाहरण हैं । सरकार ने हाइवे बनाने के लिए ज़मीन ली । ठीक है । वह आवश्यक थी । जनहित की परियोजना थी । लेकिन साथ ही सरकार ने हाइवे में जितनी ज़मीन की जरूरत थी उससे कहीं अधिक मात्र में ज़मीन ली और बाद में उसे बिल्डरों को ऊंचे दामों पर बेच दिया । बिल्डरों ने उस ज़मीन पर मकान, दुकान,मॉल रोज़ोर्ट बना लिए और किसान अपनी आँखों के सामने अपनी ही ज़मीन को खुद को मिले मुआवज़े से 100 गुना अधिक मूल्य पर बिकते देख रहे हैं ।जेटली जी ने अपने ब्लॉग पर तर्क दिया है कि सड़क बने से कीमतें बढ़ेंगी और ग्रामीणों को फाइदा होगा । लेकिन कीमतें जहां कि बढ़नी थीं वह ज़मीन तो पहले ही बिल्डरों के पास पहुँच चुकी है और वे उसका फाइदा ले रहे हैं । कितने गांवों को फायदा हुआ है ? सरकार ने ऐसा कोई अध्ययन नहीं कराया।  यह तमाशा हरियाणा, यूपी, उड़ीसा, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश में चल रहा है ।

मुआवज़े का खेल : 

सरकारी मुआवजा भी खूब होता है । अव्वल तो इसे मिलने में ही इतने पैंच होते हैं कि मिलने में सालों लगते हैं। इसके अलावा इसका निर्धारण भी विवादित है  और नए अध्यादेश में तो मुआवजा कोई किसान वास्तव में ले या ना ले अगर सरकार ने बैंक में खाता खोल कर एक मुआवजा निधि बना कर उसमें मुआवजा राशि जमा करा दी तो इसे मुआवजा दिया मान लिया जाएगा । और अगर मुआवजा दे दिया गया है तो किसान अदालत नहीं जा सकते । मतलब मार कर रोने भी ना दिया जाए । 

नया , पुराना और वास्तविकता: छह बिन्दु 


पहला बिन्दु : 2013 का क़ानून : निजी प्रोजेक्ट के लिए 80%, PPP के लिए 70% लोगों की सहमति ज़रूरी  
2014 का अध्यादेश : रक्षा उत्पादन, ग्रामीण इन्फ़्रा, औद्योगिक कॉरीडोर के लिए सहमति ज़रूरी नहीं
वास्तविकता : उड़ीसा, यू पी में ऐसे अधिकांश मामले हैं जिनमें नियमों को तक पर रख कर अधिग्रहण किए गए । अधिकांश मामलों में एमर्जेंसी क्लौज लागू ही नहीं होता यह कैग की रिपोर्ट कहती है । ऐसे में 80 % सहमति बहुत से विवादों को खत्म कर सकती थी ।
दूसरा बिन्दु : 
दूसरा बिन्दु : 2013 का क़ानून : हर अधिग्रहण से पहले सामाजिक प्रभाव का आकलन ज़रूरी
2014 अध्यादेश : हर अधिग्रहण से पहले सामाजिक अध्ययन आवश्यक नहीं । 
वास्तविकता : सामाजिक प्रभाव का अध्ययन अति आवश्यक है । इससे प्रोजेक्ट में देरी नहीं बल्कि स्थिरता में ही बढ़ोत्तरी होती । अध्ययन के बाद यदि सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रख कर अधिहरहन किया जाएगा और उचित ढंग से मुआवजा और पुनर्वास किया जाएगा तो मुकद्दमों की संख्या में कमी होगी।

तीसरा बिन्दु : 2013 का क़ानून : बहु-फसली और उपजाऊ ज़मीन का विशेष परिस्थिति में ही अधिग्रहण
2014 का अध्यादेश : राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा, ग्रामीण इंफ्रा के लिए उपजाऊ ज़मीन का अधिग्रहण हो सकता है । 
बहु -फ़सली ज़मीन का अधिग्रहण नहीं होना चाहिए । यह ज़मीन पीढ़ियों तक को रोजगार और सुरक्षा देती है । इसे छीनना एक प्रकार से व्यक्ति के जीवन के अधिकार को छीनना है।

चौथा बन्दु : 2013 का क़ानून : ग्राणीण भूमि का मुआवज़ा बाज़ार से 4 गुना, शहरी ज़मीन का 2 गुना
2014 का अध्यादेश : कोई बदलाव नहीं । 
वास्तविकता : मुआवजा 4 गुना 10 गुना से अधिक महत्वपूर्ण  है मुआवजा निर्धारित कैसे किया जाए । आज की ज़मीन का भाव 20 वर्ष पूर्व के भाव पर कैसे लगाया जा सकता है ? रक्षा को छोड़ कर अन्य किसी क्षेत्र में सीधे किसानों से वर्तमान मूल्यों पर सौदा हो । वैसे किसानों कि मांग यह भी है कि ऐसी किसी भी प्रोजेक्ट के लिए किसानों से लीज़ पर ज़मीन ली जाए ।

पाँचवाँ बिन्दु :2013 का क़ानून : 5 साल में प्रोजेक्ट शुरू नहीं हुए तो ज़मीन किसानों को वापस
2014 का अध्यादेश : कोई समय सीमा नहीं । 
वास्तविकता : हाल ही मेँ हरियाणा के एक गाँव में नए आवासीय सेक्टर बसने के नाम पर किसानों से जमीने ली गईं । 6 वर्ष तक प्रस्तावित काम ना हो पाने पर अक्षमता जता कर इन ज़मीनों को निजी बिल्डरों को दे दिया गया । अब इन ज़मीनों कि बेहद ऊंचे दामों पर बिक्री हो रही है बल्कि कई ज़मीन पाने वाली कंपनियों ने इन ज़मीनों को ऊंचे दामों पर दूसरी कंपनियों को लीज़ पर दे दिया है । जब कंपनियाँ ज़मीन लीज़ पर दे सकतीं हैं तो किसानों से लीज़ पर लेने में क्या कठिनाई है ?

छठवाँ बिन्दु : 2013 का क़ानून : किसी नियम की अनदेखी करने वाले अधिकारियों पर क़ानूनी कार्रवाई होगी 
2014 का अध्यादेश : बिना अनुमति के कार्यवाही संभव नहीं । 
वास्तविकता : यह बिरले ही होता है । 

8 फ़र॰ 2015

बीजेपी की (प्रसव) वेदना : दिल्ली

भारत की राजनीति जिस तरह का स्वरूप ले चुकी है वह भविष्य की चुनौतियों का सामना करने में तो असमर्थ है ही बल्कि देश कू विशाल जनसंख्या को बेहतर अवसर, सुखद जीवन और सुरक्षा प्रदान करने में भी असफल रही है। इन चुनौतियों के लिए 20वीं शती के समाजवाद, पूंजीवाद या साम्यवाद आज उपायुक्त नहीं हैं । आज ज़माना एक की रोटी छीन कर दूसरे को खिलाने का नहीं है बल्कि ऐसी व्यवस्था करने का है जिसमें ना केवल रोटियाँ सभी के लिए पर्याप्त हों बल्कि कोई भूखा भी ना रहे । यह रोटियाँ बनाने का समय है ....सैंकने का नहीं । आप ईवेंट मैनेजमेंट से जनता को भरमा तो सकते हैं लेकिन भ्रम देर तक नहीं चलता । लोकतन्त्र की लोकप्रिय परिभाषा देने वाले अब्राहम लिंकन के एक और कथन को याद रखा जाना चाहिए ---- You can fool all the people some of the time, and some of the people all the time, but you cannot fool all the people all the time. (सभी लोगों को कुछ समय के लिए तो उल्लू बनाया जा सकता है और कुछ लोगों को हर समय उल्लू बनाया जा सकता है लेकिन सभी लोगों को सदा के लिए उल्लू नहीं बनाया जा सकता )  । 

बीजेपी की लोकसभा यात्रा जिन विकासवादी वादों और नारों के साथ शुरू हुयी थी उसने जनता में विकास की आशाएँ जागा दीं । जिस गुजरात मॉडल की घनी चर्चा थी वह अब गायब है । नौ महीनों जनता बिजली, पानी, स्वस्थ्य और शिक्षा की बात का इंतज़ार कर रही है लेकिन सुनाई पड़ रहा है "घर वापसी", "लव जिहाद", 4,6,8,10 बच्चे पैदा करने की सीख और रामजादे जैसी ओछी बातें। इन नौ महीनों का जमा हासिल कुछ विदेश यात्राओं और खुद को विश्व नेता स्थापित करने की असफल कोशिश के अलावा कुछ नहीं है । सरकार चुप है, मंत्री चुपचाप हैं, केवल प्रधानमंत्री जी मुखर हैं। बस यही वजह है की दिल्ली में नौ महीने के इंतज़ार के बाद पूरे देश , महाराष्ट्र, झारखंड, जम्मू में लगातार जीत के बाद अब दिल्ली में "अपवाद" स्वरूप "आप" की सरकार बनी है ।

बेशक बराक ने सही कहा है "भारत में आपस में लड़ कर विकास नहीं पैदा नहीं हो सकता"  यह तो आपस के प्यार से ही पैदा होगा।

22 दिस॰ 2014

मुखौटा

पीके - बीजेपी 
मुखौटा बहुपयोगी होता है। आपकी इज्जत बढ़ाता है। अपने दैनिक जीवन में हम सब मुखौटे ओढ़ते हैं । मुखौटे आज की दुनियाँ में सफलता की नींव हैं।लेकिन मुखौटों के साथ समस्या यही है कि उनका होना आपमें ऊहापोह पैदा करता है। साध्य को पाने के बाद आप मुखौटा हटाना चाहते हैं लेकिन यह आसान नहीं।

बीजेपी ने भी ये मुखौटे ओढ़े हैं और हर बार मुखौटों को उतारना उसके लिए द्विविधा का सबब रहा है। यह दुविधा गुजरात दंगों के दौरान भी देखी गयी थी जब पार्टी अंदर ही अंदर मुदित थी पर मुखौटा "राजधर्म" कह कर लानतें भेज रहा था और आज भी जब मुखौटा "विकास" कर रहा है तो असल "घर वापसी, पाठ्यक्रम सुधार, संस्कृत पाठन, लव जिहाद करा रहा है । हुआ तब भी कुछ नहीं था होना अब भी कुछ नहीं है। 

30 नव॰ 2012

धारा 19 बनाम धारा 66


पिछले दिनों मुंबई के एक स्थानीय नेता के निधन के बाद जैसा माहौल बिके हुये समाचार चैनलों ने बनाया उससे लगा जैसे इसके अलावा और कोई जरूरी मुद्दे नहीं हैं। बॉलीवुड के घाघरे में हर समय घुसे रहने वाले इन चैनलों को शाहरुख, सलमान बच्चन से अगर फुर्सत मिलती है तो कैमरा टिकता है ऐसे नेताओं पर जिनकी दुकान ही चलती है चुन चुन कर भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त गारंटियों को ध्वस्त करने से। ये बिके चैनल हर सामान्य कलाकार से उसकी खबर के ऐवज में पैसे मांगते हैं, हर अखबार खबर के बदले विज्ञापन चाहता है। न्यूज़ चैनलों पर या तो नेताओं और एंकरों की फिक्स लफ़्फ़ाजियाँ होतीं हैं या फिर करोड़ों रुपये ले कर फिल्मों और सीरियलों के प्रचार। कोई ढंग की स्टोरी, खबर से अब इनका नाता नहीं रहा। जनता का सरोकार जनता की रुचि के नाम पर स्वाहा कर दिया गया है लेकिन मुंबई के कार्टूनिस्ट और स्वयंभू हिन्दू हृदय सम्राट 
के निधन पर लगभग पूरा पखवाड़ा ही स्वाहा कर दिया गया। उन महान नेता के व्यक्तित्व पर खूब चाशनी लपेटी गयी और भरा पूरा श्रद्धांजली वाला माहौल बनाया गया। 
                             फेसबुक पर एक लड़की द्वारा ऐसे ही माहौल पर प्रश्न खड़ा करना उस नेता के पिछलग्गुओं (अनुयाई सिद्धांतों के लिए प्रयोग  किया जाता है ) और इनसे भयभीत राज्य का वह महकमा जो असल में जनता को भयमुक्त करने के लिए था, इन लड़कियों को भयभीत करने में जुट गया। मुंबई पुलिस को आधा घंटा भी नहीं लगा यह सुनिश्चित करने में की इन लड़कियों ने, जिनमें से एक ने तो केवल उस पोस्ट को लाइक ही किया था, सूचना तकनीक कानून की धारा 66ए का उल्लंघन किया है और माननीय न्यायाधीश को उससे भी कम समय लगा उन नागरिकों के प्रथम दृष्टया अपराध निर्धारित करने में। और उन गुंडों को तो खैर और भी कम समय लगा लड़की के रिश्तेदार डॉक्टर का क्लीनिक ध्वस्त करने में। इस चापलूसी, भय और राजनौतिक मजबूरी के कुहासे में यह तथ्य कहीं खो गया की फेसबुक पर महाज़ 200 शब्दों की छोटी से टिप्पणी अगर सेडिशन और व्यवस्था के लिए खतरा हो सकती है तो फिर उन दिवंगत महान नेता के वे जहर बुझे वाक्य क्यूँ नहीं सेडिशन, अराजकता का खतरा जैसी चिंताएँ नहीं उठा सके? आखिर धारा 19 का ध्यान मुंबई पुलिस को क्यूँ नहीं आता और क्यूँ नहीं कोई न्यायालय धारा 19 के उल्लंघन को निर्धारित नहीं कर पाते। (धारा 19 हमारे संविधान में है और नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता कुछ प्रतिबंधों के साथ देती है।)


संविधान द्वारा मिले अधिकार: संविधान का अनुच्छेद १५ हमें आश्वासन देता है कि हमसे भारत देश में धर्म, जाति,मूलवंश, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद नहीं किया जाएगा. अनुच्छेद १६ के द्वारा संविधान सरकारी नौकरियों में  न केवल अवसर की समानता देता है बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि हमसे धर्म, जाति, मूलवंश, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद ना हो. इसी प्रकार अनुच्छेद १९ प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति एवं अन्तःकरण की स्वतंत्रता प्रदान करता है. हमें यही अनुच्छेद सम्पूर्ण भारत में घूमने फिरने, कहीं भी बस जाने और कोई भी व्यवसाय कहीं भी करने का अधिकार देता है.
परन्तु अभिव्यक्तिका यह अधिकार निर्बाध नहीं है. इन स्वतंत्रताओं पर रोक भी लग सकती है यदि इनका प्रयोग भारत कि एकता, अखंडता, संप्रभुता, लोकव्यवस्था, विदेशी राज्यों के साथ मैत्री पूर्ण संबधों पर विपरीत असर डालने में किया जायेगा. संवैधानिक पदों पर व्यक्ति को प्रतिज्ञन करनी होती है उसका पूरा खाका भी संविधान कि एक अलग सूची (तीसरी अनुसूची) में किया गया है. प्रत्येक विधायक, सांसद और मंत्री को संविधान के प्रति निष्ठा कि और एकता व अखंडता को सुरक्षित रखने कि शपथ लेनी होती हैं.

अब यदि उपरोक्त तमाम कानूनों के प्रकाश में हम बाल ठाकरे, उद्धव ठाकरे और राजठाकरे के वक्तव्यों को देखें तो प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके वक्तव्य संविधान विरोधी हैं.

बैंक या रेलवे के परीक्षर्थियों पर हमला और उन्हें परीक्षा से वंचित करना अनु० १५ और १६ का उल्लंघन है. साथ ही यह ऐसी अभिव्यक्ति है जो लोकव्यवस्था, एकता, अखंडता,संप्रभुता पर विपरीत असर डालती है अतः इसकी अनुमति किसी संगठन को नहीं दी जा सकती (अनु० १९).

पाकिस्तान या ऑस्ट्रेलिया के खिलाडियों सम्बन्धी राज - बाल ठाकरे के बयान निश्चित तौर पर विदेशी राज्यों से संबंधों पर विपरीत असर डालते हैं और अनु ० १९ का उल्लंघन करते हैं.

उत्तर भारतीयों को मुंबई से भगाने, उन पर हमला करने जैसे कृत्य अनु० १५, १६ कीबखिया उधेड़ते हैं तो एक राजनीतिक दल के रूप में चुनाव आयोग की आचार संहिता का उल्लंघन भी करते हैं. चुनाव आयोग एक संवैधानिक निकाय है और राजनैतिक दलों के लिए निर्धारित आचार संहिता के पहले पैराग्राफ में ही लिखा है कि "कोई भी पार्टी ऐसीकिसी गतिविधि में शामिल नहीं होगी जो धर्मं, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर विभेद पैदा करती हो." पर शिवसेना आदि दल ऐसा ही करते हैं औरखुले आम करते हैं. 

ये दल स्वयं को सांस्कृतिक दल कहते हैं परन्तु इनकी कार्यवाहियां हिंसक, फासीवादी और अलगाववादी हैं. यह दल इसी अराजकता के सहारे थोड़ी सी राजनैतिक शक्ति जुटा कर क्षेत्रीय राजनीति में सौदेबाजी करते हैं और तो और केंद्रीय राजनीती को भी प्रभावित करते हैं. यह भी संविधान का उल्लंघन ही है क्यूंकि संविधान लोकतान्त्रिक व्यवस्था कि गारंटी देता है जबकि यह दल हफ्ता वसूली दल कि भांति काम करते हैं. शिवसेना केवल मुंबई कि राजनीती कर के स्वयं को पूरे महाराष्ट्र का ठेकेदार मानती है. २८८ में से केवल १३ सीटें जीतने वाले दल आखिर राजनीती कि दिशा क्यूँ तय करें? इस प्रकार शिवसेना हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर हर दृष्टि से प्रश्नचिंह लगाती है.  है कोई कानून जो इन महान नेताओं को नाथ सके? 



(भारत भाग्य विधाता के भरोसे अपलोड कर रहा हूँ )

21 नव॰ 2012

हंगामा है क्यूँ बरपा !

एक भारतीय दांत चिकित्सक महिला की आयरलैंड में इसलिए मौत हो गयी क्यूंकी डॉक्टर ने उसकी जान बचाने के लिए आवश्यक होते हुये भी गर्भपात करवाने से इनकार कर दिया क्यूंकी उसका कानून इसकी इजाज़त नहीं देता। इससे पुनः आइरिश कानून पर बहस छिड़ गयी है और भारत ने तो बकायदा आयरलैंड को सलाह भी दे डाली है की इस मामले की निष्पक्ष जांच करा ली जाए (जैसी की अपने यहाँ के नताओं को आदत सी हो गयी है) अनेक भारतीय समाचार चैनल इस मसले पर हंगामा बरपा रहे हैं । उस महिला की मौत दुर्भाग्यपूर्ण है और वह डॉक्टर तो निश्चित ही निंदनीय है जिसने उसका सही इलाज करने के अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं किया लेकिन ज़रा यहाँ ठहरिए और सोचिए क्या हमें अधिकार है इतना हंगामा खड़ा करने का ?

  • भारत के लोग हर वर्ष लाखों बच्चियों को गर्भ में मार डालते हैं। भारत के छोटे से छोटे कस्बे में अल्ट्रासाउंड सबसे चोखा धंधा है। इसे ले कर किसी डाक्टर को कानून क्या भगवान भी याद नहीं आते। आयरलैंड के डाक्टर कम से कम कानून का तो पालन करते हैं। 
  • भारत में हर वर्ष असुरक्षित प्रसव से लाखों माताओं की मौत होती और लाखों बच्चे मर जाते हैं तब कोई हँगामा नहीं सुनाई देता बस हर दस वर्ष में रस्मी तौर पर जनगणना के आंकड़ों पर बहसें हो जाया करतीं हैं। 
  • भारत में हर वर्ष लाखों बच्चियों की अल्पवयस्क होते हुये भी शादी की जाती है तब कोई हंगामा नहीं होता। 
  • भारत के चौराहों पर, मंदिरों में, और उनके बाहर, रेलवे स्टेशनों पर लाखों बच्चे भीख मांगते हैं पर तब हमें शर्म, गुस्सा या खीज नहीं होती। 
  • भारत के लाखों बच्चे आज भी भूख से मर जाते हैं पर किसी के कण पर जूँ तक नहीं रेंगती । 
  • भारत में हर वर्ष लाखों विवाहित महिलाएं दहेज के लिए मार डालीं जातीं हैं पर हमें फर्क नहीं पड़ता। 
  •  भारत जो एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है ( हम आयरलैंड की कैथोलिक एंगिल से भी आलोचना कर रहे हैं ) औरतों के लिए अलग अलग कानून हैं - हिंदुओं के लिए अलग और मुसलमानों के लिए अलग।
  • भारत में हर वर्ष सैकड़ों लड़कियां इसलिए मार दी जाती हैं क्यूंकी वे अपनी पसंद का जीवन साथी चुन लेतीं हैं। 
इन सबके लिए -----ध्यान से देखिये सरकार नहीं लोग दोषी हैं ----यही सबसे बड़ा भ्रष्ट आचरण है ---- स्विस बैंकों में दौलत जमा करने से बड़ा पाप है अजन्मी बच्चियों की हत्या, पैसे के लिए अपनी पत्नी, बहू की हत्या, धर्म की आड़ में बच्चों को टीकाकरण से दूर रखना, स्त्रियॉं को सामान्य मानव के हकों से दूर रखना। चिंता हमें आयरलैंड के क़ानूनों की नहीं अपने समाज की करनी चाहिए। आयरलैंड का क़ानून ो मुझे स्पष्ट लगा की अगर माँ की जान बचाने के लिए गर्भपात आवश्यक है तो इसकी अनुमति है पर हमारे देश के उन क़ानूनों की चिंता कीजिये जो ऐसे छेद छोड़ देते हैं जिससे उन्हें तोडा जा सके। आइये चिंता करें उन क़ानूनों की जो किसी स्त्री को उसका अधिकार नहीं दे सकते। आयरलैंड को निपटने दीजिये इस मुद्दे से वे इसे अपनी तरह से हल कर ही लेंगे। 

12 नव॰ 2012

जनता है सोने की मुर्गी

2G घोटाले के बाद अब तक घोटालों के प्रति हमारी संवेदनाओं को तृप्त करने वाले और भीषण, विभीषण प्रकार के घोटाले सामने आ चुके हैं। पर जैसा की हर घोटाले में होता है - दोनों ओर से जनता ही हलाल होती है। पहले तो जनता के कारों के पैसों से विकसित तकनीक को कौड़ियों के दामों पर निजी कंपनियों को बेच दिया गया। इन कंपनियों ने इसके ज़बरदस्त दाम वसूले। शायद आपको वह ज़माना याद भी ना हो की 1997 में मोबाइल कॉल दरें 18 रू प्रति मिनट थीं और इंकमिंग भी फ्री नहीं थी। फिर घोटाला खुला और न्यायालय ने सभी आबंटन रद्द कर दिये। हालांकि सज़ा नहीं हुयी। न्यायालय असाहय है। आरोप सिद्ध करना जिसका काम है वह करबद्ध और नतमस्तक है। लेकिन न्यायालय के इस फैसले के बाद अब मंत्री जी का संकेत है की दाम बढ़ेंगे। यानि जनता को फिर से हलाल किया जाएगा। क्या न्यायालय सुओ मोटो इस मामले को ले कर न्याय दिलाएगा की स्पेक्ट्रम के आबंटन से जो घाटा हुया वह इन कंपनियों के प्रॉफ़िट से वसूला जाए, दोषी नेताओं के वेतनमान, भविष्यनिधि और पेंशन फंड से काटा जाए। स्पेक्ट्रम नीलामी के नाम पर कॉल दरों को बढ़ाना नैसर्गिक न्याय का स्पष्ट उल्लंघन है। आखिर जनता कितनी बार और क्यूँ टैक्स भरे? पहले तकनीक विकास के लिए, फिर उस तकनीक के उत्पाद को खरीदने और प्रयोग करने पर टैक्स, और अब घोटालेबाज कंपनियों को जब दोबारा पैसा देना पड़ रहा है तो बढ़ी कॉल दरों के रूप में अनुचित भुगतान और अनुचित टैक्स। क्या न्यायालय संज्ञान लेगा ? 

13 जुल॰ 2012

गुवाहाटी का अफसोस


गुवाहाटी की शर्मसार करने वाली घटना कई सवाल खड़े करती है। यह केवल गुवाहाटी में ही नहीं हर कहीं मौजूद है। एक प्रतिष्ठित अङ्ग्रेज़ी समाचार चैनल की वाचिका की प्रतिकृया ट्विटर पर थी। उनके अनुसार हम खुद को सुपर पावर कहते हैं और ऐसी घटनाएँ होतीं हैं। प्रश्न यह है की क्या सुपर पावर नैतिक भी होता है। बल्कि अगर आप देखें तो पाएंगे की सुपर पावर ही सबसे अनैतिक भी होता है। शक्ति है ही ऐसी चीज़। तभी किसी दार्शनिक ने कहा था "power corrupts and absolute power corrupts absolutely" शक्ति भ्रष्ट करती है और सम्पूर्ण शक्ति पूर्णतया भ्रष्ट कर देती है। दुनियाँ में जो भी सुपर पावर है वह उसका दुरुपयोग ही कर करहा है। हमारे समाज का ढांचा ही ऐसा बन गया है। अमेरिका ने अपने गुंडों के साथ (नैटो पढ़िये) इराक का जो हाल किया वह इसी गुवाहाटी जैसी घटना ही थी। जब से इंसान ने यह शक्ति और सत्ता का आविष्कार किया है वह इन पर कब्जे को लेकर लड़ता रहा है। दुनियाँ का इतिहास उठाइए तो पाएंगे की यह असल में युद्धों और संघर्षों का ही इतिहास है। समाज का अध्यययन करें तो वहाँ भी सत्ता और संपत्ति का संघर्ष मौजूद है। हमारा समाज पितृसत्तात्मक समाज है जहां संपत्ति का उत्तराधिकार पिता से पुत्र को जाता है। पुत्री का अधिकार नहीं है। मातृसत्तात्मक समाजों में यह उत्तराधिकार माँ से पुत्री को मिलता है। पर ऐसे समाजों में विवाह और परिवार की व्यवस्था वैसी नहीं होती। यहाँ पुरुष ढीले रूप से माँ-पुत्री से जुड़े रहते हैं। ऐसे समाज अब विश्व में बहुत कम हैं। पितृसत्तात्मक समाज अपने पुत्रों को सर्वोच्च स्थान देता है। उसकी प्रस्थिती और भूमिका उसे समाज में ताकतवर बनती है और यही ताकत उसे भ्रष्ट बना देती है। इस अव्यवस्था से निपटने के लिए ही समाज ने विवाह और संपत्ति के कानून बनाए  और उन्हें धार्मिक, राजनैतिक और आर्थिक ताकतों  से लागू करवाया गया। समाज के नैतिक मूल्य ताकत के दुरुपयोग की प्रवृत्ति को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। लेकिन आधुनिक अर्थव्यवस्था और व्यक्तिवादी दर्शन ने इस मूल्यों को तिलांजली दे दी है। इन्हें विक्टोरिया युगीन कह कह कर खारिज किया जाता है पर विडम्बना है की जो नए मूल्य पनप रहे हैं वे तो बर्बर हैं( विक्टोरिया युग से पहले यूरोप में पूर्वी ताकतों - हूणों, को बर्बर कहा जाता था) । आज नयी व्यवस्था नारी स्वातंत्र्य की पक्षधर है पर यही व्यवस्था इस स्वतन्त्रता का केवल विभ्रम पैदा करती है। असली स्वतन्त्रता नहीं देती। यह व्यवस्था नारी को देह तक ही सीमित करती है और उसे एक उत्पाद के रूप में देखने को प्रेरित करती है। यह व्यवस्था अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की आड़ में स्त्री का अनैतिक प्रदर्शन जारी रखती है। यह व्यवस्था स्त्री को एक सेंट पर मर मिटने के लिए तैयार दिखाती है। यह व्यवस्था स्त्री को आइटम बनती है - चिकनी चमेली बनाती है, शीला और मुन्नी बनाती है। एक अखबार तो 18 वर्ष की उम्र में शराब पीने  के अधिकार को ले कर बाकायदा एक जंग चला रहा है। अनेक अखबार जो छाप नहीं सकते उसे अपने वेब पोर्टल पर रखते है। फिल्में हमारी निरंतर अपनी सामाजिक हदें पार कर रहीं है। निरंतर गालियां, अश्लील और द्वियार्थी संवाद और आइटम नंबर आपको जल्दी ही इंका आदि बना रहे हैं। टीवी कार्यक्रमों में आप घर बैठे यह सब देख सकते हैं और अगर आप परेशान हैं तो जल्दी ही आप बहिष्कृत भी महसूस करेंगे। तो बेहतर है की आप समाजस्य बैठा लें। आप समाज में अधनंगे घूमें और आधुनिक कहलाए जाने को अधिक पसंद करेंगे  बजाए ओल्ड फैशन और आउटडेटेड के। बच्चों के आदर्श आज यहाँ नहीं वहाँ है - अमेरिका में। उनका संदर्भ भारतीय नहीं है अमरीकी है। आज बच्चे एकोन और एमिनेम को सुनते हैं जिनमें हिंसा, सेक्स और गलियों का तड़का लगा है। एकोन 14 वर्षीय बालिका के साथ स्टेज पर जो करता है वह हमारे लिए आघात है पर उनके लिए आदर्श है जो उसे सुनते हैं। हाल ही में हिन्दी फिल्म जोकर का एक गाना यू ट्यूब पर "लीक" हो गया है और उसके बोल "I wanna F**k you baby"। शराब, अश्लील गाने और वीडियो और नेट पर सर्वसुलभता और बेटा होने का दर्प। यह माहौल घातक है। इसका सुपरपावर होने और ना होने से मतलब नहीं है। यह तो उस व्यवस्था की स्वाभाविक उपज है जिसे हम बना रहे हैं।  इसके नियम और मूल्य भी हमें ही बनाने हैं। और नियमों को बनाने का मतलब होता है सीमाएं खींचना। अगर समाज को अराजक नहीं बनाना है तो कुछ हदें तो हमें बनानी ही होंगी। ऐसी घटनाएँ कानून का नहीं समाज का विषय होती हैं और यहीं आज का समाज असफल है। पहले समाज का दबाव और डर ऐसे आपराधिक तत्वों को दबाता था। केवल दबंग ही बच पाता था। लेकिन आज समाज अनुपस्थित है। गुवाहाटी की चलती फिरती रोड पर 8 - 10 लड़के एक लड़की का  शोषण करते रहे और दसियों लोग मूक दर्शक बने रहे? समाज इतना मूक बाघिर कभी नहीं था। गाँव में हमारे पैर बाहर पड़ते ही गली में दसियों लोग पूछ बैठते " काए लला कहाँ जाय रहे" जवाब दीजिये नहीं तो शिकायत घर हमसे पहले पहुँच जाती थी। और आज सोसाइटी में सामने वाले फ्लेट में कौन रहता है पता नहीं। सोचिए कैसा समाज हम बना रहे हैं। आधुनिकता कपड़ों से नहीं, सड़कों से नहीं, ऊंची इमारतों से नहीं सोच से आती है।

30 नव॰ 2011

जय सोनिया मैया की !

क्या बात है !! हमारी सरकार बड़ी ही बेमुरव्वत है। वह तो सोनियाँ गाँधी जी ना होतीं तो मनमोहन सिंह तो सिंह की तरह हम सबको खा गए होते। बड़े  सख्त हैं जी हमारे प्रधानमंत्री।   सोनियाँ जी की दया है जो हमें मनरेगा मिला, उन्हीं की दया से सरकार रसोई गैस के दाम नहीं बढ़ा रही। पैट्रोल के दामों को भी उन्हीं की वजह से कम किया जा सका।  जब जब इस देश पर कलमाड़ी और राजा जैसे राक्षसों का साया आता है तो सिंह की दहाड़ ही नहीं निकलती। सन्नाटे को तोड़ने का काम तो मम्मी जी या बाबा जी (रामदेव नहीं बाबासूट वाले बाबा - राहुल बाबा ) ही करते हैं। सोनियाँ जी ने ही हमें सूचना का अधिकार दिलवाया और वही हम सब देशवासियों को एक निराली पहचान भी दिलवा रहीं है - युनीक आई डी कार्ड। सोनिया जी दानवीर हैं। वे कर्ण, हर्ष और हरिश्चंद्र जैसे मिथकों को साकार करतीं है। भारत देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी का त्याग कोई छोटा कृत्य तो नहीं है।
वे भ्रष्टाचार पर अध्ययन करती रहीं हैं । हाल ही में उनकी रिसर्च से पता चला है की दरअसल भ्रष्टाचार प्लेग नामक बीमारी की तरह होता है। इसकी घोषणा उन्होंने युवा कांग्रेस सम्मेलन में की। उन्होंने इसे उखाड़ फैंकने की वैसी ही प्रतिबद्धता जाहिर की जैसी उनकी सासू माँ ने गरीबी को ले कर की थी। और देखिये आज देश के 58% सांसद करोड़पति हैं और सांसद चूंकि जनता के प्रतिनिधि होते है तो वे करोडपतियों के ही प्रतिनिधि तो हुये ना?  सोनियाँ जी की रिसर्च के अनुसार  जैसे प्लेग के कीटाणु चूहे के शरीर में रहते हुये भी चूहे को नुकसान नहीं पहुंचाते लेकिन उसके संपर्क में आने वाले मनुष्य को भयंकर कष्ट देते हैं ऐसे ही मंत्रियों, अधिकारियों और कर्मचारियों में बसने वाले भ्रष्टाचार के कीटाणु उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाते लेकिन उनके संपर्क में आने वाली जनता को बहुत दुख देते हैं। इसका इलाज वे खोज रहीं हैं। वैसे यह भी सही है की दोषी तो प्लेग का कीटाणु होता है न की चूहा। उसी तरह दोष तो भ्रष्टाचार का है न की मंत्री या अफसर का। सजा भ्रष्टाचार को दो भ्रष्टाचारी को नहीं। इसीलिए वे और राहुल बाबा हमेशा भ्रष्टाचार को कटघरे में खड़ा करने का कोई मौका नहीं छोड़ते और प्लेग कोई कानून बना कर तो ठीक होगा नहीं। रोग की सही जानकारी होना जरूरी है और इसी लिए सर्वज्ञानी सोनिया मैया का कहना है की भ्रष्टाचार के लिए सूचना का अधिकार ठीक है। इसी से तो पता लगता है की हाँ कोई नेता या अफसर भ्रष्टाचार के कीटाणु से पीड़ित है। यह डाइग्नोसिस है और कहते हैं न की रोग अगर पकड़ में आ जाए तो ठीक हो जाता है तो सूचना का अधिकार यही करता है। अब भला लोकपाल की यहाँ क्या जरूरत?  यह भी कोई अच्छी बात है की पीड़ित को और पीड़ित किया जाए। टीम अन्ना तो असल में परपीड़ा में आनंद लेती है। जब यह पता चल गया है की किसी मंत्री में   भ्रष्टाचार नामक रोग के कीटाणु हैं  तो हमें उसके कीटाणु नष्ट करने का इलाज खोजना होगा और हम पिछले 60 वर्षों से यही शोध तो कर रहे हैं और इसीलिए तो इतने सालों से लोकपाल बिल लटका रखा है। यूपीए की मैया सोनिया जी ने  तो अपनी सुविधाजनक कानून निर्मात्री मिनी विधायिका अर्थात राष्ट्रीय विकास परिषद में अन्ना जी से पहले लोकपाल बिल पर चर्चा की थी और जो सरकारी जोकपाल बिल था वह दरअसल इसी अध्ययन पर आधारित था वह तो बुरा हो अन्ना जी का की मुद्दा वे ले उड़े। सोनियाँ जी का तो  हमें और अन्ना जी को शुक्रगुजार होना चाहिए की उन्हों ने जनलोकपाल आंदोलन में जो भूमिका विदेश जा कर निभाई है वह अतुलनीय है। आंदोलन को यहाँ तक पहुंचाने का श्रेय भी उन्हीं को है। भला अन्ना जी तिहाड़ में बैठ कर क्या कर लेते। यह तो सोनिया अरे रे रे रे राहुल बाबा का भला हो जो उन्होने अन्ना को तिहाड़ से छुड़वा दिया। बड़े लोग ऐसे ही होते हैं। जब चाहें किसी को बंद करा दें जब चाहें छोड़ दें। असल में असली प्लेग तो अन्ना जी हैं और हमें उनसे निपटने के तरीके खोजने चाहिए। भ्रष्टाचार तो एक शरमीले किस्म का प्लेग है। अंदर ही अंदर सक्रिय रहता है लेकिन अन्ना प्लेग तो बड़ी तेज़ी से फैलता है। इस प्रकार भ्रष्टाचार के मूल स्वरूप पर प्रकाश डाल कर उन्होंने देश पर एहसान किया है।
और अब सोनियाँ जी ने देश के 85% प्रतिशत किसानों पर जो एहसान किया है वह तो आहहा नारायण के पालनकर्ता के स्वरूप के  समान ही है। सोचिए वाल मार्ट आयेगा। आसमान से उतरे दूत की तरह। वह किसानों के लिए सड़कें, कोल्ड स्टोरेज, परिवहन के साधन उपलब्ध कराएगा। फिर उनसे अधिक दामों पर सब्जियाँ, फल, दूध वगैरह खरीदेगा। अपने स्टोर में वह बेरोजगारों को अच्छी तनख्वाह पर नौकरी देगा और देश की जनता को पहले से कम दाम पर यह सब चीज़ें बेचेगा। ऐसा एहसान तो ईसा मसीह ने भी नहीं किया होगा। जो काम पिछले 60 वर्षों में हर तरह की सरकारें नहीं कर पाई वह एफ़डीआई के गलीचे पर सवार वालमार्ट कर देगा। तो क्यूँ ना हम इस बार चुनाव में वालमार्ट को ही चुन लें?  नहीं। वालमार्ट तो सिर्फ एक जरिया है असल किरपा तो मैया की है ना! अरे एहसान फरामोश भूल गए उन सभी एहसानों को जो ऊपर गिनाए हैं। तुम्हें इसी लिए सोनियाँ मैया को ही चुनना होगा। नेहरू, इन्दिरा और  राजीव  जैसे बलिदानी और त्यागी परिवार के अलावा भला दुनियाँ में भारत की जनता के लिए विकल्प ही कहाँ हैं।

21 नव॰ 2011

माउण्टबेटन और मायावती


क्या समानता है माउंटबेटन और मायावती में ? दरअसल मायावती या फिर अधिक सटीक रहेगा की भारत की गटर राजनीति उस काम में सफल हो जाएगी जिसमें माउण्टबेटन असफल रहे थे। 1947 में माउण्टबेटन ने एक ऐसी योजना बनाई थी जिसे प्लान बाल्कन के नाम से जाना जाता है।बाल्कन प्रदेश यूरोप का ऐसा क्षेत्र है जिसमें भाषाई, सांस्कृतिक आधार पर बनते हुये  छोटे छोटे देश हैं जो आपस में लड़ते रहते थे। दोनों महायुद्धों की जड़ें इसी बाल्कन प्रदेश में थीं और इसे यूरोप का नासूर कहा जाता था। आज भी यह क्षेत्र यूरोप का सबसे अशांत क्षेत्र है। इसमें बोस्निया, सर्बिया, क्रोएशिया, हर्जगवेना, मेसीडोनिया आदि देश शामिल हैं। 


 इस योजना के अनुसार भारत को भारत ना मानते हुये कई रियासतों का एक झुंड माना गया था और अंग्रेजों ने उन सभी रियासतों को स्वतंत्र होने का अधिकार दिया था। उस समय भारत में ऐसी 600 से अधिक रियासतें थीं। अगर यह योजना सफल हो जाती तो आज यह क्षेत्र 600 छोटे छोटे देशों का एक ऐसा झुंड होता जो भाषा, संसाधनों, और अन्य मसलों पर झगड़ता  रहता और एशिया का नासूर बन जाता। पर नेहरू की माउण्टबेटन से दोस्ती के कारण यह प्रयास सफल ना हो सका और आखिर में भारत के दो टुकड़े किए गए। भारत और पाकिस्तान। सभी रियासतों को इन्हीं दो में शामिल होने का अवसर दिया गया। वह आज़ादी के जमाने की राजनीति थी जिसमें नेहरू और पटेल ने भारत को  जोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। और एक यह राजनीती है जो ठीक अंग्रेजों की तर्ज़ पर भारत के समाज में मौजूद हर दरार को ढूंढती है और फिर उसे चौड़ा करके खाई बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखती। मायावती द्वारा उत्तर प्रदेश के चार टुकड़े करने का प्रयास इसी घटिया और रद्दी राजनीति का फल है। हिन्दू, मुसलमान तो अब पुरानी बात हैं अब तो नयी दरारें खोजी जा चुकीं हैं क्षेत्रवाद, भाषा,  जाति, उपजाति, वर्ग, वंश आदि। यद्यपि संविधान इस प्रवृत्ति को देश द्रोह मानता है पर यहाँ संविधान मानता कौन है?  छोटे प्रदेश अगर विकास की गारंटी हैं तो मेघालय, असम, नागालैंड, झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ अविकसित क्यूँ हैं और महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक जैसे बड़े प्रदेश अधिक विकसित क्यूँ हैं? विकास आकार पर नहीं सही नीतियों, दृढ़ इच्छा शक्ति, मेहनत और लगन पर आधारित होता है। 90 के दशक में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला था जिसे मंदिर के चक्कर में नष्ट कर दिया गया। यदि भाजपा ने प्रदेश के विकास पर ध्यान दिया होता तो आज यह दुर्दशा न होती। मायावती को भी ऐसा ही बहुमत मिला था और लोकतन्त्र विशेषज्ञ स्पष्ट बहुमत के फायदे गिनाते नहीं थकते थे पर वे भूल गए थे की स्पष्ट बहुमत तब अच्छा होता है जब नेतृत्व कुछ करना चाहे नहीं तो कमजोर विपक्ष और जोड़ तोड़ के चलते यह भ्रष्टाचार का सबसे बढ़िया अवसर होता है।  और उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य यही रहा है कि इसे कोई नेता नहीं मिला जो इसका भला सोचे। अब तो जनता को ही सोचना है कि मुद्दे राजनैतिक दल नहीं जनता तय करे। क्यूँ न चुनावों के समय एक मांगपत्र जनता प्रस्तुत करे और उसे हो वोट करे जो इसका समर्थन करे। जाग जाइए वरना माउण्टबेटन (उन्हें तब मनबांटन भी कहा जाता था ) के देसी अवतार कहीं अधिक खतरनाक हैं। 

19 अग॰ 2011

अन्ना का आंदोलन


आज अभूतपूर्व दिन है। अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में हजारों लोग वंदेमातरम के नारे लगते हुये तिहाड़ जेल से मायापुरी चौराहे तक गए। इनके हाथों में बैनर तो थे लेकिन उस से ज्यादा तादाद में तिरंगे थे। लबों पर गलियाँ नहीं देशभक्ति के तराने थे, मुट्ठियाँ तनीं थीं लेकिन संकल्प से। आज से पहले वन्देमातरम विवादों का केंद्र था, आज से पहले देशभक्ति के तराने रस्मी हो चले थे और आज से पहले लोग धर्म, भाषा, प्रांत, जाति, वंश, वर्ग को भुला कर एक ही जगह इकट्ठे होते थे - क्रिकेट का स्टेडियम। आज से पहले लोग गांधी जी को मजबूरी का नाम बताते थे, स्कूलों में शिक्षक निबंध लिखवाते थे क्या गांधी जी 21वी सदी में प्रासंगिक हैं। आज से पहले हम निराश और हताश थे जब हमने देखा संसद में हमारे प्रतिनिधि हमारी भलाई के विषय में प्रश्न पूछने के बजाय कॉर्पोरेट हितों के लिए प्रश्न पूछते हैं और इसके एवज़ में पैसे लेते हैं, जब हमने जाना और देखा कि कैसे जरूरी मुद्दों पर संसद के अंदर मतदान को करोड़ों रुपये के काले धन से सांसदों को खरीदा गया, जब हमने देखा कि कैसे सभी राजनीतिक पार्टियां सिर्फ और सिर्फ पैसा बनाने के लिए ही बनीं हैं, जब हमने देखा कि देश को शर्मसार करते हुये कैसे कलमाड़ी और उसके गिरोह ने खुले आम लूट की, जब हमने देखा कैसे एक नाम का राजा देश के पैसे को दांव पर लगा कर सचमुच का राजा बन गया। और हमारा दिल हर बार टूटा था जब सरकार और हमारे तथाकथित प्रधानमंत्री जी हर मौके पर उन्हीं लोगों के साथ खड़े नज़र आए जो हमारे विरोध में थे। लेकिन आज कुछ बादल गया था। आज आशा की लहरें ज़ोर पकड़ रहीं थीं। आज हमने देख कि लोग खुद ब खुद अन्ना के समर्थन में जुड़ रहे थे और देशभक्ति के तराने गा रहे थे, तिरंगे फहरा रहे थे। ये लोग किसी प्री-पेड रैली का हिस्सा नहीं थे। इन्हें गाड़ियों में ढो कर नहीं लाया गया था। यह वोट बैंक नहीं थे। ये लोग आज़ाद देश के इतिहास में दूसरी बार इतनी बड़ी संख्या में एकत्रित हुये और दुनियाँ ने भी देखा और सराहा कि चार दिनों से हजारों लोग पूर्ण शांति से आंदोलन में शामिल है। अन्ना के मतवालों ने अचानक गांधी को प्रासंगिक बना दिया और तथाकथित गांधी परिवार को अप्रासंगिक। वर्षों से बिसर चुके रघुपति राघव राजा राम कि गूंज फिर सुनाई दी। देश के लिए जज़्बा फिर दिखाई दिया। अन्ना का आंदोलन सरकार को याद दिला गया कि इतिहास खुद को इसलिए दुहराता है क्यूंकी लोग इससे शिक्षा नहीं लेते। कपिल सिब्बल, कमलनाथ और चिदम्बरम ने हरवर्ड, स्टीफेंसन और ऑक्सफोर्ड में तो पढे हैं लेकिन जनता को पड़ना यहाँ नहीं सिखाया जाता। इसे सीखने के लिए तो गांधी जी ग्रामीण भारत की ओर गए थे तो अन्न स्वयं वहीं से आते हैं। कपिल सिब्बल चुनाव तो जीत सकते हैं पर जनता का दिल तो अन्ना ने ही जीता है। सरकार ने ठीक वही रणनीतिअपनाई जो अक्सर दमनकारी सारकरें अपनातीं है तो अन्ना ने भी गांधी जी के सबसे खतरनाक औज़ार को अपनाया - सविनय अवज्ञा। यह एक ऐसा हथियार है जो दमनकारी को हाशिये पर पहुंचा देता है। सरकार ने यदि अन्ना को पहले ही रामलीला मैदान दे दिया होता तो शायद बात इतनी ना बढ़ती लेकिन सरकार के दमनकारी कदम ने निश्चित ही अन्ना के आंदोलन का दायरा बढ़ा दिया और यह देश व्यापी हो गया।
यद्यपि अभी भी इस आंदोलन के स्वरूप और पहुँच व सरोकारों पर बहस हो सकती है कि यह आंदोलन क्या केवल शहरी माध्यम वर्ग का आंदोलन है,या फिर  इसे जनांदोलन कहने कि बजाय मात्र भद्र समाज (सिविल सोसायटी) का आंदोलन कहा जाए। आपत्तियाँ कुछ और भी हैं जैसे कि यह आंदोलन मात्र उच्च जाति आंदोलन है और दलित वर्ग इसमें अपना हिस्सा नहीं देखता और बड़ा प्रश्न मुस्लिम वर्ग की अनुपस्थिती का भी है लेकिन फिर भी हम यह कह सकते हैं कि अपनी समस्त सीमाओं में यह आंदोलन निश्चित ही ऐसी घटना है जिससे भारत और भारतीयता मजबूत होगी और सांप्रदायिक ताक़तें कमजोर होंगी और जातिवाद पर आघात होगा। मिससे एक फायदा मुझे और भी दिख रहा है और वह यह कि यह भारतीय राजनीति के स्वरूप और दिशा पर गहरा असर डालेगा। जनता को जागरूकता की जिस घुट्टी और ट्रेनिंग की जरूरत थी वह इस आंदोलन ने उसे दी है। बेशक यह आंदोलन हो सकता है कुछ दिनों में ठंडा पड़ जाए लेकिंग जो आग दिलों भड़क चुकी है वह इतनी जल्दी बुझने वाली नहीं और यदि सरकार ने जल्दी ही ठोस कदम नहीं उठाए तो जनता जो अभी तक जुलूस कि शक्ल में थी अब दावानल बन कर लील जाएगी।
एक अन्य अहम प्रश्न इस आंदोलन के मुद्दे को ले कर भी है अर्थात जन लोकपाल। बेशक जन लोकपाल आज हमारी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए अत्यंत आवश्यक हैऔर एक प्रभावी लोकपाल व्यवस्था में पारदर्शिता के अभाव को दूर कर सकेगा परंतु आवश्यकता इस बात कि भी है कि हम ऐसी व्यवस्था बना सकें कि लोकपाल एक सुपर पवार ना बन जाए।आप प्रधान मंत्री को लोकपाल के डायरे में लाएँ या न लाएँ पर संविधान में एक उपबंध तो यह भी होना चाहिए कि यदि प्रधानमंत्री या उनका कार्यालय अपने उत्तर दायित्व सही तरह से ना निभा पाये तो जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। बेशक न्यायपालिका को आप बाहर रखिए पर यह एक विडम्बना ही है कि अन्ना के आंदोलन के बीच आज़ादी के बाद दूसरी बार एक न्यायाधीश को महाभियोग के द्वारा हटाया गया। इसलिए इस बात की भी आवश्यकता है कि न्यायपालिका के भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एक प्रभावी न्यायिक आयोग का बिल भी साथ ही साथ लाया जाए। लोकपाल को सांसदों और नौकरशाहों के विरुद्ध अधिक प्रभावशाली होना ही पड़ेगा। यह ऐसे प्रश्न हैं जिंका हल ऐसे आंदोलनों से संभव नहीं है। सरकार के पास मौका था जब वह अन्ना के सहयोगियों से बात कर रहे थे। उस मौके को अब गंवा दिया गया है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अब अन्ना आर पार कि लड़ाई लड़ रहे हैं। अन्ना को समझना होगा कि जनांदोलनों की एक सीमा होती है। कोई भी आंदोलन अनंत काल तक उतना ही स्फूर्त नहीं रह सकता जितना कि वह आरंभ में था। अतः अन्ना को इन्हीं 15 दिनों के अंदर ऐसा रास्ता निकालना होगा जो सरकार को भी मौका दे और जनता को भी। स्वयं गांधी जी ने भी यही रणनीति अपनाई थी संघर्ष-विराम-संघर्ष अन्यथा सरकार इस आंदोलन को भी टीवी आंदोलन प्रचारित कर पाने में सफल हो जाएगी और क्रांति फिर अधूरी रह जाएगी।
इस आंदोलन के बारे में यह भी कहा जा रहा है कि यह कंस्ट्रक्टिव कनसेनसस की उपज है अर्थात मीडिया द्वारा उत्पन्न किया गया आंदोलन। हो सकता है कि इसमें सत्यता हो। हम सभी फेसबुक, ट्विटर और खबरिया चैनलों से ही ऊर्जा ले रहे हैं लेकिन यह भी सही है कि हर आंदोलन को विकसित होने में किसी न किसी मेडिया की जरूरत होती ही है। गांधी जी ने प्रिंट का प्रयोग किया था तो आज टीवी का हो रहा है। दूसरी बात यह है कि हर आंदोलन फसबुक पर ऐसे नहीं फैलता जैसे यह फ़ेल रहा है। इतना प्रचार फकेबुक पर पाने को आपको लाखों पैसे देने होंगे लेकिन यह लोक शक्ति ही है जो ऑनलाइन आंदोलन को ज़िंदा रहे है।
मेरा मानना हैं कि  इस आंदोलन की संभावनाओं को उभारिए न कि उसे खारिज कीजिये क्यूंकी अगर ऐसा होगा तो यह देश के लिए ही बुरा होगा।

16 अग॰ 2011

अन्ना का आंदोलन, सरकारी दमन और संविधान

अन्ना का आंदोलन, सरकारी दमन और संविधान
मैं 1975 में पैदा हुआ था और मैंने आज़ादी की लड़ाई को नहीं देखा पर इतिहास में पढ़ा था की कैसे गांधी जी के अहिंसक आंदोलनों ने अंग्रेजों को हर बार और गहरी मुसीबत में दाल दिया था। उस दौरान हमें ऐसे जुमले सुनाई देते थे “यह अधनंगा बुड्ढा” या फिर “सिरफिरा फकीर” या फिर “पागल आदमी”। ब्रिटिश सरकार के कारनामे भी भयानक थे। नेताओं को गिरफ्तार किया गया, आवाज़ दबाई गई। यह सब मैंने केवल पढ़ा ही था। आश्वस्त था की आज़ादी के बाद अब कभी ऐसे ज़ुल्म देखने को नहीं मिलेंगे और किसी की भी शांतिपूर्वक कही गयी बात को दबाया नहीं जाएगा। हमारा संविधान हमें कुछ मौलिक अधिकार देता है और इसके भाग 3 के पैरा नंबर 13(2) में यह साफ साफ कहा गया है कि -
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और ठीक इसके बाद खंड 19 मुझे अधिकार देता है स्वतन्त्रता का जिसमें बहुत से अधिकार शामिल हैं ।
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इन अधिकारों की रोशनी आज धुंधली पड़ गयी जब मैंने सरकार को, उसमें शामिल चुने हुये प्रतिनिधियों को ठीक वही भाषा बोलते सुना। मेंने सुना महाराष्ट्र के एक कद्दावर नेता को अन्ना को पागल कहते हुये, मैंने सुना कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को अन्ना के आंदोलन को ढोंग, नाटक, राजनीति, अवसरवाद ठहराते हुये। मैंने देखा सरकार को दिल्ली में लोगों पर लठियाँ भँजते हुये, निहत्थे लोगों पर ताकत आजमाते हुये। आज 16 अगस्त 2011 को आज़ादी की 64वीं वर्षगांठ के ठीक एक दिन बाद मेंने सरकार को हमारे पवित्र संविधान की धज्जियां उड़ाते हुये देखा। सरकार ने अन्ना को गिरफ्तार किया पर उनका कसूर नहीं बताया। सरकार ने उन्हें शांतिपूर्वक आंदोलन करने की अनुमति नहीं दी। उन्हें उसी जेल में रखा जिसमें महा भ्रष्ट मगरमच्छ रखे गए हैं। मुझे अपने संविधान पर भरोसा है। इसी संविधान में हमारी सर्वोच्च न्यायपालिका को यह शक्ति दी गयी है की वह ऐसे मामलों पर बिना किसी याचिका का इंतज़ार किए स्वयं सक्रिय हो कर आवश्यक कदम उठा सकती है। सरकारों को जवाब देना होगा।

9 जून 2011

सत्ता और शक्ति

सत्ता भ्रष्ट करती है और पूर्ण सत्ता पूर्णतः भ्रष्ट करती है। राजनीति के एक गुरू का यह कथन 5 जून की रात मेरे सामने साक्षात खड़ा था जब भारत की लोकतान्त्रिक रूप से चुनी सरकार ने भारत के लाखों लोगों के भ्रष्टाचार के विरुद्ध शांतिपूर्ण अनशन को बर्बरता से कुचलने का प्रयास किया। कांग्रेस को पिछले आम चुनावों में सफलता क्या मिली वह अपना असली काम भूल कर न केवल जनता को लूटने में लग गई बल्कि उसे यह भी गुमान हो चला है की उसका अब कोई विकल्प नहीं है और जनता की मजबूरी है कांग्रेस को चुनना। कहते हैं इतिहास अपने को दुहराता है लेकिन यह उन्हीं के लिए सही है जो इतिहास से सबक नहीं लेते और शायद कांग्रेस ने यह सबक नहीं लिया है की जनता के आंदोलनों में शाश्वत लगने वाली सत्ताएँ भी तिनकों की तरह उड़ गईं। कांग्रेस द्वारा दमन कार्यवाही इसी गुरूर का नतीजा है।
इसमें वही बू है जो उपनिवेशवादी ब्रिटिश सत्ता की कार्यवाही में होता था। जलियाँवाला कांड की अनुगूँज यहाँ सुनाई देती है और शायद इस बार कांग्रेस सत्ता में आती है तो वोह दिन दूर नहीं लगता जब देश के पास एक और जलियाँवाला कांड होगा। इस बार तो शायद कोई गांधी भी नहीं होगा हमारे पास। एक ऐसे देश ने जिसने अपनी आज़ादी और संविधान को अहिंसा, अनशन और सत्याग्रह के रास्ते पाया था और संविधान ने भी इस रास्ते को सही मानते हुये इस प्रकार के प्रदर्शन की अनुमति दी है, सरकार की कार्यवाही ने संविधान के मूल ढाँचे पर ही कुठराघात किया है। उस पर प्रधानमंत्री का यह कहना की इस कार्यवाही का कोई विकल्प नहीं था। यदि किसी सरकार के पास अपने ही नागरिकों से आँसू गैस, लाठीबाजी दमन के जरिये निपटने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाता तो हमें समझ लेना चाहिए की सरकार की मंशा खतरनाक है और वह एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लायक नहीं है क्यूंकी लोकतन्त्र में हमेशा शांतिपूर्ण विकल्प मौजूद रहते हैं और सरकार का काम उन्हीं विकल्पों को खोजना है न की रामलीला मैदान को थिएन अन मन चौक बनाने की योजनाएँ तैयार करना। जो हुआ वह संवैधानिक और नैतिक दृष्टि से नाजायज था। संविधान हमें भारत का नागरिक होने के नाते यह मौलिक अधिकार देता है की हम अपने असंतोष को शांतिपूर्ण तरीके से सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित कर सकते हैं। लेकिन सरकार ने लोगों के इसी मौलिक अधिकार पर आघात तो किया ही है साथ ही भारतीय लोकतंत्र की अंतर्राष्ट्रीय साख पर भी कलंक लगाया हैं।

बाबा का आंदोलन चाहे जो हो पर अंततः वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध ही था, और सरकार इसे अपने विरुद्ध मान बैठी। इससे यही सिद्ध होता है की सरकार और भ्रष्टाचार एक ही हैं। भ्रष्टाचार के विरुद्ध हर आंदोलन सरकार को अपने विरुद्ध लगता है मतलब साफ है की चोर की दाड़ी में तिनका। यह ठीक है की बाबा की मांगें सरकारी दृष्टि से अव्यवहारिक हैं और विदेशों में रखी संपत्ति को राष्ट्रिय घोषित करना और उसे वापस लाना एक लंबी प्रक्रिया से ही संभव है पर सरकार इस पर ठोस कार्यवाही शुरू कर के भ्रष्टाचार के विरुद्ध गंभीर होने का संदेश भेज सकती थी और सरकार ठीक यही करने में हर बार विफल रही फिर चाहे वह राष्ट्रमंडल खेल हों, 2जी घोटाला हो, अन्ना का अनशन हो या फिर बाबा का सत्याग्रह। हर बार सरकार की भ्रष्टाचार के विरुद्ध कदम उठाने में आनाकानी से जनता को यही संदेश गया है की दाल में बहुत कुछ काला है। शायद कपिल सिब्बल ब्रिग्रेड की सोच यही है की भारत में भ्रष्टाचार एक जीवन शैली बन चुका है और इस पर चलने वाले आंदोलन प्रभावहीन है लेकिन वे यह भूल जाते है की सत्य का एक विशिष्ट गुण है कि सत्य का पाखंड भी सत्य के करीब ले जाता है। लेकिन सिब्बल साहब शायद हिटलरी मुहावरे को पसंद करते हैं जो कहता है कि झूठ को सौ बार दुहराने पर वह सत्य प्रतीत होने लगता है। वे हर बार आरोपी का बचाव करते हैं, शगूफे छोड़ते हैं, मुद्दे से भटकने कि कोशिश करते हैं और प्रोपेगेंडा फैलाते हैं। पर सनद रहे की सत्य शाश्वत होता है और झूठ अल्पजीवी और सत्य यही है की सरकार की विश्वसनीयता घटी है।

2 फ़र॰ 2011

एक देशद्रोही की दुविधा

एक देशद्रोही की दुविधा
मैं भारत का नागरिक हूँ और मुझे अन्य सभी की भांति अपने देश से प्यार और गर्व होना चाहिए पर अभी एक दिन एक बहस के दौरान जबकि मैं ट्रेन में सफर कर रहा था मुझे साथी यात्रियों की आलोचना झेलनी पड़ी। मुझे देश द्रोही कह दिया गया तो में आवक रह गया। मेरा कसूर सिर्फ इतना था की कॉमनवेल्थ खेलों के उदघाटन समारोह के बाद भी में इनकी आलोचना करने की गुस्ताखी कर रहा था और मेरे साथी यात्रियों का कहना था की अब हम सबको आलोचना भुला कर खेलों का समर्थन करना चाहिए। मैं भारत में रहता हूँ और भारत के हित में सोचता हूँ पर जब ओबामा आते हैं और हमें हवाई वादे करके तगड़े सौदे करले जाते हैं तो मुझे गर्व भारत पर नहीं ओबामा की देशभक्ति और उनकी शक्ति पर होता है। सर्कोज़ी आते हैं तो देते कुछ नहीं हैं बल्कि देने के बदले ऐसी शर्तें लगा देते हैं जिससे उनकी जिम्मेदारियाँ कम हो जाएंगी (नाभकीय उत्तरदायित्व ) और मुझे यहाँ भी भारत पर नहीं फ्रांस पर गर्व होता है और भरोसा है की वे हमसे अपने हित में यह कानून बनवा ही लेंगे, फिर जियाबाओ आते है और जैसा की चीन के साथ अक्सर होता है वे कुछ नहीं कहते और हम अटकलें लगते हैं  पर वे आते हैं और चुप चाप हमें चीन पर निर्भर बनाने का अपना अजेंडा पक्का करके चले जाते हैं  फिर अरुणाचल में भी नत्थी वीज़ा जारी करके तमाचा भी मारते हैं। मुझे पूरा भरोसा है की हमारे लोक सभा में बैठे प्रतिनिधि निश्चित ही जियाबाओ और चीनी जनता का ध्यान रखेंगे और इस कृत्य में हमारी नौकरशाही, न्यायपालिका उनका पूरा साथ देगी। मुझे गर्व होता है चीन पर। मुझे तो पाकिस्तान पर भी गर्व होता है। एक हम हैं की अपनी सम्पदा, बाज़ार, और व्यापार जैसी सही चीजों के बल पर सौदे बाज़ी नहीं कर पाते और एक वो हैं जो आतंकवाद जैसी घटिया चीज़ को भी भुना लेते हैं। मेरे देश में अरुंधति हैं जिनसे पाकिस्तान और चीन के नागरिकों को बहुत आशाएँ हैं और भारत का खाँटी नागरिक होने के कारण मुझे पता है के वे बहुत संवेदनशील लेखिका हैं (यह अलग बात है की छोटी चीजों का देवता लिखने के बाद उन्हें लिखते नहीं देखा हाँ छपती जरूर हैं और खबरों में बनी रहती हैं) और वे इसी संवेदनशीलता के चलते निश्चित ही उनकी अपेक्षाओं को पूरा करेंगी। क्या हुआ जो वे छोटी चीजों के बारे में लिखती हैं, उनकी सोच छोटी बिल्कुल नहीं है। भला वे भारत में ऐसे ही थोड़े ही रह रहीं हैं। यह सुविधा और किस देश में मिलेगी कि कोई अपने खाने की थाली में ही छेद करे और कोई कुछ ना कहे। इसी देश में एसे बिनायक सेन भी हैं जो देशद्रोहियों के लिए काम करते हैं और तथाकथित बुद्धिजीवियों के बीच लोकप्रिय हैं।
इसी देश में हैं सोनिया जी जो अक्सर चुप रहती हैं और इसी में अपनी भलाई समझती हैं। चुप्पी को हथियार बना कर वे आज देश की सबसे ताकतवर नेता हैं यह और बात है की इस देश की जनता जो वर्षों से चुप्प है, सबसे निरीह है। चुप्पी का यह गुण मेरे देश के एक और कर्णधार राहुल गांधी में नहीं है। वे जो मन में आता है बोल देते है – किसी से कुछ भी और किसी को कुछ भी। वे जानते हैं की भीषण मीडिया के इस दौर में वे जो बोलेंगे वही खबर बन जाएगी। वे कहते हैं की देश में सबसे बड़ा खतरा हिन्दू आतंकवाद से है। वे यह बात अमेरिकी राजदूत से कहते हैं। जब वे बच्चे थे तो उनकी दादी को सिक्ख आतंकवादियों ने मार डाला था और किशोर अवस्था में उनके पिता को तमिल आतंकवादियों ने। उन्हें परिस्थितियों ने यही सिखाया है की आतंकवाद का बाकायदा धर्म होता है और उसे उसी तरह बाँट कर देखना चाहिए। दादी की हत्या के बाद सिक्खों का कत्ले आम हुआ, पता नहीं वह कौन सा आतंकवाद था शायद सोचा नहीं उन्होंने शायद कांग्रेसी आतंकवाद। भारत एक अरब लोगों का देश है, यहाँ की अर्थव्यवस्था दुनियाँ की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से है, विशाल संसाधन हैं, अनेक समस्याएँ है। राहुल गांधी जी तो अपने आलीशान आवास से कभी निकले ही नहीं (यहाँ तक की वीज़ा पर दस्तखत के लिए भी नहीं – पता नहीं वे उन गरीबों की झोंपड़ियों में कैसे चले जाते हैं) चाँदी के अनगिनत चमचों के साथ पैदा हुये राहुल बाबा अब प्रधानमंत्री बनने वाले हैं पता नहीं वे क्या करेंगे। मुझे तो घबराहट होती है पर मुझे गर्व होता हैं अमेरिका पर कि वहाँ ओबामा “चुने” जाते हैं। हमारे यहाँ तो देश के सर्वोच्च पद पर भी लोग विरासत से आते हैं। जब मुख्य परिवार राज नहीं कर रहा हो तो इस गद्दी को अनेक बैरम खान सहेजते हैं । इस कुर्सी पर अक्सर वे लोग आ बैठते हैं जो जनता से जुड़े ही नहीं हैं, वे चुने नहीं जाते। नेहरू जी और शास्त्री जी को छोड़ दें तो इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी (वे सुपर प्रधान मंत्री हैं – पता नहीं जब उप प्रधान मंत्री हो सकता हैं तो सुपर प्रधान मंत्री होने में क्या बुराई हैं? आखिर हैं तो दोनों ही होमोलोगस- एक ही स्रोत से उत्पन्न – राजनीतिक मजबूरी) मनमोहन सिंह( वे लोक सभा से नहीं चुने गए हैं, राज्य सभा का सदस्य उन्हें बनवाया गया हैं – संवैधानिक मजबूरी के कारण) और अब राहुल जी तय हैं। यह भाई भतीजावाद और वंशवाद आज चारो तरफ है। क्या राजनीति और क्या बौलीवुड। नेताओं की कुर्सी नेता बच्चों के लिए, अफसर की कुर्सी अफसर बच्चों के लिए, जज की कुर्सी के आसपास ऊपर नीचे रिश्तेदार, बंबई में स्टार के बच्चों के लिए स्टार की कुर्सी। और देशों में राजनीतिज्ञ जनता के बल पर चुन कर आते हैं, यहाँ का नेता जनता पर बल प्रयोग करके आता है। सारे गुंडों, हत्यारों, बलत्कारियों को अपने मुख्य कार्य के अलावा यहाँ एक वैकल्पिक करियर भी उपलब्ध है जो उन्हें ना केवल शक्ति, धन और सत्ता देता है बल्कि उनके अपराधों पर पर्दा डाल कर उन्हें भयमुक्त करता है। आज अगर किसी स्कौर्पियो, सफारी, एनडेवर आदि पर विधायक,लिखा हुआ देखते हैं लोग तो सुकून के स्थान पर उनका खून सूख जाता है। लाल बत्ती, काले शीशे, हुंकारता हुआ हूटर किसी राक्षस से कम नहीं लगता। भला किसकी हिम्मत होगे इन्हें अपना प्रतिनिधि कहने की। किस पर गर्व करूँ एसे नेताओं पर, उनकी गाड़ियों पर, उनके हूटरों पर?  
मुझे नहीं पता हमारे आजादी के नेताओं ने देश के लिए क्या सपने देखे थे (बल्कि अब तो लगता है उनके सपने असल में खुद तक ही सीमित थे) लेकिन आज तो यह देश स्वप्नहीन हो कर केवल दूसरे देशों के सपने साकार कर रहा है। मेरे देश के होनहार कभी हिम्मत नहीं करते अपने सपने देखने की, वे नहीं देखते सपने ऐसी भारतीय कंपनियों के जो दुनियाँ में फैली हों, वे नहीं देखते सपने ऐसे आविष्कारों के जो दुनियाँ को हिला दें वे बस देखते हैं की बिल गेट्स, लैरी पेज के सपनों में कैसे शामिल हुआ जाय। भारतीय आईआईटी इंजीनियर माइक्रोसॉफ्ट, गूगल में नौकरी कर के संतुष्ट है, भारतीय डॉक्टर अमेरिका, ब्रिटेन में पैसे कमा रहा है। हम सब दूसरों के सपनों को साकार कर रहे हैं। हम सो रहे हैं और वे हमें सपने दिखा कर लूट रहे हैं। उनकी पत्रिकाएँ कहती हैं की भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था है लेकिन असल में वे इसे दुनिया के सबसे बड़े बाज़ार के रूप में देखना पसंद करते हैं। वे हमें दना दान मिस यूनिवर्स, मिस वर्ल्ड के खिताब बांटते हैं, वे हमें स्लमडॉग कहते हैं ( फिल्म में दरअसल भारत की ही कहानी है जिसे स्लमडॉग के टाइटल से नवाजा गया है) और हम गर्वित हो कर जय हो को राष्ट्रिय गीत बना बैठे हैं, पिछले 15 अगस्त को कई स्कूलों और कार्यक्रमों में यह गीत सारे देशभक्ति गीतों को दबा गया। आखिर देश भक्ति का एक लफ्ज भी इसमें नहीं है में कैसे गर्व करूँ इस उपलब्धि पर।
कहा जाता हैं कि यहाँ जन्म लेने को देवता भी तरसते हैं – शायद यहाँ जन्म लेने की होड़ के कारण ही एक अरब हो गए हैं हम और देवता तो बस तरस कर ही रह गए, शायद कहीं और जन्म ले लिया तभी यह देश आज देवताओं से मरहूम है और अनेक अवसरवादी राक्षसों से भरा है। यहाँ जन्म लेने को शायद अब इसलिए तरसा जाता है कि ऐसी खुले आम लूट भला और किस देश में संभव है। तभी शायद किसी ने कहा है “मेरे देश कि धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती” राजा, कलमाड़ी, तेलगी आदी को देख कर कवि की यह पंक्ति सत्य लगती है। यह धरती यह सब उगलती है और ये सरकारी आँखों के तारे उसे ठिकाने लगाते रहते है। निश्चित ही यह भूमि स्वर्ग से सुंदर है पर शायद राजा, अंबानी, टाटा, रडिया, कलमाड़ी, सोनिया, मीरा यादव, थॉमस जैसे लोगों के लिए ही।
मेरे देश में कुछ और लोग भी हैं। जैसे करकरे, विजयराघवन, सत्येंद्र दुबे, आदि जिन्हें हम शहीद कहते हैं।मुझे गर्व होता है फ्रांस, रूस और अमेरिका पर की वहाँ वीर बहादुरों को लोग याद करते हैं। उनके लिए मूजियम हैं और उनकी जीवनियाँ स्कूल की किताबों में हैं पर हमारा भारत- यहाँ न मूजियम हैं, ना उन्हें याद करने की फुर्सत है। है तो बस उनके नाम पर घोटाले दर घोटाले – कभी ताबूत घोटाला, कभी शहीद पेंशन घोटाला और कभी आदर्श घोटाला। जैसे मूजियम के स्थान पर शहीदों को घोटालों के जरिये ही याद किया जाएगा।
भारत का एक संविधान है, कानून हैं, कानून के रखवाले हैं लेकिन प्रति दिन बेशर्मी से इसकी धज्जियां उड़ाई जाती हैं और रखवाले चुचाप बैठे रहते हैं। इस देश के कानून में इतनी शक्ति नहीं है की स्वयं अपनी रक्षा कर सके। देश की सर्वोच्च अदालत में भी यह ताकत नहीं है की अपराधियों को जनता की छाती पर मूंग दलने से रोक सके। क्या सर्वोच्च अदालत के महान न्यायधीशों में इतनी बौद्धिक क्षमता नहीं है जो संविधान की ऐसी व्याख्या कर सके की राजनीति अपराधियों के सिर छुपाने की जगह न बने। यहाँ अदालतों में 25 वर्षों में तलाक के मामले निपटाए जाते हैं तो भूमि के विवाद अनंत काल तक घसीटते हैं। न्याय पिछले 400 वर्षों से आम आदमी से कई प्रकाश वर्ष दूर बना हुआ है। जहांगीरी घंटे के दिन आखिर कब लौटेंगे।
            में भारत का रहने वाला हूँ और भारत की ही बात सुनाता हूँ पर अतीत की नहीं वर्तमान की। यहाँ लोग शादियों में भयानक खर्चा करते हैं फिर उसी से डर कर लड़कियों को मारते भी हैं। यहाँ लोग बहुओं को जलाते हैं, यहाँ लोग सतियों को जिंदा आग के हवाले करते हैं,विधवाओं को शोषित करते हैं यहाँ लोग आदमी को सड़क पर मरता छोड़ देते हैं पर एक गाय के नाम पर सैकड़ों को मार डालते हैं, यह भारत है जहां बजबजाते शहर हैं, गंदे गाँव हैं, भीषण गरीबी है, भुखमरी है, लेकिन यह भारत है जहां एक साल मैं करीब 500000 करोड़ के घोटाले होते हैं (तेलगी, कौमनवेल्थ, 2जी, प्रोविडेंट फंड, व अन्य ) यह भारत है। कृषि प्रधान देश । यहाँ अजीब कृषि होती है। किसान फसल उगाता है। कृषि मंत्री सट्टेबाजों, जमाखोरों की मदद करते हुये बयान देते हैं की अब दूध के दाम बदेंगे, सब्जियों के दाम बढ़ेंगे या प्याज़ के दाम बढ़ेंगे। जमाखोर गोदामों में जमा कर लेता है। सरकार भी उपज को  खरीद कर सड़ने के लिए छोड़ देती है। किसान को सही दाम नहीं मिलते, भूखे को अनाज नहीं मिलता पर इसी सड़े अनाज से दारू बन कर उस किसान और उस भूखे को बेची जाती है। वह इसे पी कर धुत्त हो जाता है, गरीबी और भुखमरी भूल जाता है उसे यह दुनिया हसीन लगती है। सरकार सही लगती है, देशभक्ति उमड़ पड़ती है। घोटाले भूल कर वह फिर दुनियादारी में मस्त हो जाता है। टीवी देखता। न्यूज़ सुनता है जिसमें सास बहू की साजिश होती हैं, इंडिया का ज़ायका होता है, साँपों के चमत्कार होते हैं शीला की जवानी होती है, अपराध की दुनिया होती है और इतनी सारी चीख़ों में खबर कहीं गुम हो जाती है । पर मैं क्या करूँ। मुझे पीने की आदत नहीं इसलिए मुझे भारत पर अब गर्व नहीं होता।