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27 अप्रैल 2019

भगत सिंह भी परेशान थे गोदी मिडिया से

ऐसा लगता है कि २०१४ के बाद भारत में न्यूज़ चैनलों के पास सिवाय मोदी के भजन गाने के और कोई मुद्दा , खबर या स्टोरी नहीं है . लेकिन क्या सचमुच में ऐसा है की यह मिडिया कलियुग २०१४ के बाद आया है और उससे पहले मिडिया का सतयुग था . रविश कुमार और सहयोगियों को यही लगता है  लेकिन रवीश भी असल में गोदी मिडिया ही हैं बस अंतर इतना है की गोदी मोदी विरोधी की है . उनके उठाये गए मुद्दे वाजिब हैं लेकिन उनका लहजा पत्रकार का नहीं "विपक्ष" का अधिक है . मिडिया आजकल ही बिकाऊ हो गयी है ऐसा नहीं है . यह तो अपने जन्म से ही बिकाऊ थी . लोकतंत्र से चौथे स्तम्भ के का दर्जा मिलने से इसे एक पवित्र दर्जा मिल भले ही गया लेकिन इसका चरित्र तो गोदी वाला ही था .दरअसल पत्रकारिता व्यवसाय ही ऐसा है की उससे निष्पक्षता की अपेक्षा करना ज्यादती है क्योंकि आखिर तो वह एक व्यवसाय ही है ना ? लेखन कला के आरम्भ से ही , लेखन का प्रोपेगैडा में बखूबी इस्तेमाल होने लगा था . लेखन कला का पहला विस्तृत अभिलेख " हम्मुराबी संहिता " भी दरअसल राजकीय प्रोपेगैंडा का हिस्सा था . इस अभिलेख में ईराक क्षेत्र के राजा ने आज से करीब ५००० साल पहले राज्य के सामान्य कानूनों को लिपिबद्ध करके सार्वजानिक रूप से राजा की प्रशंशा के साथ छपवा दिया था . 

अशोक के अभिलेख तो राजकीय प्रचार अभियान का ज़बरदस्त उदाहरण हैं जिनमें स्वयं अशोक खुद को देवताओं का प्रिय और सुन्दर दिखने वाला घोषित कर देता है (देवानं प्रिय प्रियदर्शी राजा अशोक ) और जनता को तरह तरह से आश्वस्त , शिक्षित और आदेश देता हुआ अशोक को अंततः लगभग अवतार सिद्ध कर देता है .अशोक द्वारा रौंदे गए कलिंग में अशोक की दम्भपूर्ण आवाज़ कलिग के अभिलेखों में  पुचकारने वाली आवाज़ बन जाती है . 

अशोक के बाद कलिंग नरेश खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख में तो खारवेल की प्रशंसा में प्रयुक्त शब्द देखने लायक हैं . इसमें लिख है की खारवेल ने मगध को रौंद दिया और अपने हाथी घोड़ों को गंगा में स्नान करवाया , मगध के राजा को घुटने टेकने पर मजबूर कर उसे राज्य के खेतों को गधों से जुतवाया. तमिल प्रदेश में जीत दर्ज की. खारवेल  प्रशस्ति भी तो गोदी मिडिया ही है. 

आगे फिर आपको समुद्रगुप्त मिलते हैं जिनके युद्ध मत्री ने ही प्रशस्ति लिखने का जिम्मा संभाला था और समुद्रगुप्त की प्रशंसा में एक विशाल अभिलेख प्रयाग में अशोक के ही स्तम्भ पर अंकित करवाया था . हरिशेण अपने स्वामी की प्रशंसा बेहद जोरदार तरीके से करता है - कुछ वैसे ही जैसे अंजना ओम कश्यप (आज तक) और सरदाना (आज तक ) करते हैं . ज़रा गौर फरमाइए - "वह विभिन्न प्रकार के सैकड़ों युद्धों में भाग लेने में कुशल था, दोनों भुजाओं के बल से अर्जित विक्रम ही जिसका एकमात्र बन्धु था, प्रताप ही जिसका प्रतीक था, परशु, बाण, भाला, शंकु, नाराच आदि अनेक शस्त्रों के प्रहार से उत्पन्न शोभा द्वारा जिसके शरीर की कान्ति द्विगुणित हो जाती थी… अनेक काव्यों की रचना द्वारा जिसने ‘कविराज’ की उपाधि प्राप्त की थी’ । (दुर्भाग्यवश हमें उसकी किसी भी रचना के विषय में ज्ञात नहीं है) वह महान् संगीतज्ञ था जिसे वीणावादन का बड़ा शौक था. उसकी तुलना पृथु, रघु आदि महान् शासकों के साथ की गयी है . उसे  ‘परमभागवत’ अर्थात स्वयं ईश्वर - विष्णु कहते थे । ‘विश्व में कौन-सा ऐसा गुण है जो उसमें नहीं है’. 


अब इसे उन सभी इंटरव्यू से मिला कर देखिये जो मोदी ने पिछले पांच वर्षों में दिए हैं - आपको कुछ नया नहीं लगेगा .


अब ज़रा यहाँ भी देखिये कि भगत सिंह इस बारे क्या कहते हैं . यह उद्धरण उनके 1928 के लेख से है - 


"यहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्रा कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज्य-स्वराज्य’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले हैं। सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो साम्प्रदायिक आन्दोलन में जा मिले हैं, जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं। जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं। और साम्प्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आयी हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे। ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है।दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, अखबार वाले हैं। पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था। आज बहुत ही गन्दा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक बहुत कम है जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो।" अखबारों का असली कर्त्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्त्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?"

तो गोदी हमेशा से थी और रहेगी . रविश भी उतने ही गोदी प्रेमी हैं जितने रोहित सरदाना . न वे क्रन्तिकारी हैं और न ये .


3 अक्टू॰ 2018

भगत सिंह ने की थी अपने पिता की गद्दार से तुलना - जानिए क्यों ?

२ अक्तूबर आते ही सोशल मीडिया पर गाँधी को लेकर बहुत सी गलत बातें फैलने लगती हैं . इनमें एक मुद्दा है भगत सिंह की फांसी का . गाँधी जी के प्रति घृणा का प्रदर्शन करते हुए कहा जाता है कि उनहोंने भगत सिंह को फांसी से नहीं बचाया क्योंकि गाँधी जी तब वायसराय इरविन से नमक आन्दोलन के बाद बातचीत कर रहे थे और उन्होंने कई कैदियों को रिहा भी कराया था . आइये जानें की सत्यता क्या है . 

भगत सिंह को गिरफ्तार क्यों किया गया और फांसी क्यों दी गयी :

भगत सिंह क्रन्तिकारी थे . वे भारत को हिंसक तरीकों का प्रयोग करके ब्रिटिश सरकार को डरा कर भारत को स्वतंत्रता दिलवाने में भरोसा रखते थे . साइमन कमीशन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए लाला लाजपत राय को लाठी चार्ज में चोटें आयीं थीं और भगत सिंह व साथियों ने ब्रिटिश सरकार से इसका बदला लेने के लिए पुलिस कप्तान स्कॉट की हत्या की योजना बनायी लेकिन नौसिखिये साथियों और हड़बड़ी में गलती से एक अन्य पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या हो गयी . पुलिस ने दबिश दे कर भगत सिंह के अनेक साथियों को पकड़ लिया . इधर साइमन कमीशन के वादों पर जब राष्ट्रीय नेता बहस कर रहे थे तभी सरकार ने पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल असेब्मली में पेश  किए . ये दोनों बिल दरअसल बढती क्रन्तिकारी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए थे. असेम्बली के अधिकांश भारतीय सदस्य इस बिल का विरोध कर रहे थे लेकिन वायसराय ने इसे अपने विशेषाधिकार से पारित कर सकते थे . भगत सिंह और साथियों ने तय किया कि उदारवादी राजनीती और सरकार के कानून का विरोध करने और क्रांतिकारियों की बात को कहने के लिए जिस समय ये कानून पारित हों उसी समय असेम्बली में बम का धमाका किया जाये . इसका उद्देश्य जान लेना नहीं था . भगत सिंह की योजना में यह भी शामिल था कि वे लोग गिरफ़्तारी का विरोध नहीं करेंगे  और अपना बयान जज के सामने प्रेस की उपस्थिति में देंगे . बम फैंकने के साथ ही उनहोंने एक परचा भी फैंका था जो इस तरह था -

सूचना
“बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊँची आवाज की आवश्यकता होती है,” प्रसिद्ध फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलियाँ के यह अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं।
पिछले दस वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने शासन-सुधार के नाम पर इस देश का जो अपमान किया है उसकी कहानी दोहराने की आवश्यकता नहीं.....आज फिर जब लोग ‘साइमन कमीशन’ से कुछ सुधारों के टुकड़ों की आशा में आँखें फैलाए हैं और इन टुकड़ों के लोभ में आपस में झगड़ रहे हैं,विदेशी सरकार ‘सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक’ (पब्लिक सेफ्टी बिल) और ‘औद्योगिक विवाद विधेयक’ (ट्रेड्स डिस्प्यूट्स बिल) के रूप में अपने दमन को और भी कड़ा कर लेने का यत्न कर रही है। इसके साथ ही आनेवाले अधिवेशन में ‘अखबारों द्धारा राजद्रोह रोकने का कानून’ (प्रेस सैडिशन एक्ट) जनता पर कसने की भी धमकी दी जा रही है। सार्वजनिक काम करनेवाले मजदूर नेताओं की अन्धाधुन्ध गिरफ्तारियाँ यह स्पष्ट कर देती हैं कि सरकार किस रवैये पर चल रही है।
राष्ट्रीय दमन और अपमान की इस उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति में अपने उत्तरदायित्व की गम्भीरता को महसूस कर ‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ’ ने अपनी सेना को यह कदम उठाने की आज्ञा दी है। इस कार्य का प्रयोजन है कि कानून का यह अपमानजनक प्रहसन समाप्त कर दिया जाए। 
जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियामेण्ट के पाखण्ड को छोड़ कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को लौट जाएं और जनता को विदेशी दमन और शोषण के विरूद्ध क्रांति के लिए तैयार करें। हम विदेशी सरकार को यह बतला देना चाहते हैं कि हम ‘सार्वजनिक सुरक्षा’ और ‘औद्योगिक विवाद’ के दमनकारी कानूनों और लाला लाजपत राय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर से यह कदम उठा रहे हैं। हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं। हम ऐसे उज्जवल भविष्य में विश्वास रखते हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शान्ति और स्वतन्त्रता का अवसर मिल सके। हम इन्सान का खून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। परन्तु क्रांति द्वारा सबको समान स्वतन्त्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर देने के लिए क्रांति में कुछ-न-कुछ रक्तपात अनिवार्य है। (https://www.marxists.org/hindi/bhagat-singh/1929/mein-feinka.htm). 



पुलिस ने भगत सिंह को गिरफ्तार किया तब सरदार सर सोभा सिंह वहां मौजूद थे और पुलिस ने उनके हवाले भगत सिंह के वहां होने की चश्मदीद गवाही शामिल की हैं . असेम्बली के अध्यक्ष श्री विट्ठल भाई पटेल थे जो पहले भारतीय अध्यक्ष थे . वे सरदार पटेल के भाई थे . isl

पुलिस ने असेम्बली बम कांड के साथ ही भगत सिंह और साथियों पर "लाहौर षड़यंत्र केस " भी चलाया . भगत सिंह के पकडे गए साथी गोपाल ने सांडर्स की हत्या में भगत सिंह का नाम ले दिया था . इसके साथ ही अन्य क्रांतिकारियों के नाम भी दे दिए थे. भगत सिंह को फांसी असेम्बली में बम फैंकने से नहीं बल्कि लाहौर षड़यंत्र केस में उनके "क्रन्तिकारी " साथियों की गद्दारी के कारण  मिली थी. 

गाँधी इरविन समझौता : 
यह वह घटना है जब सविनय अवज्ञा आन्दोलन या नमक आन्दोलन की सफलता ने गाँधी जी को निर्विवाद नेता स्थापित कर दिया था और देश के कोने कोने में गाँधी के इस आन्दोलन की धमक सुनाई दी थी. इसकी लोकप्रियता से मजबूर हो कर सरकार ने गाँधी से बातचीत का रास्ता निकला . गाँधी जी भी राजी हो गए . वार्ता हुयी और शर्तों में अनेक बातें शामिल हुयी जिन्स्में राजनितिक बंदियों को छोड़ने की बात भी शामिल थी . अनेक कैदियों को रिहा कर दिया गया लेकिन भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को छोड़ने से इरविन ने यह कह कर इनकार कर दिया की वे राजनितिक बंदी नहीं हत्यारोपी हैं .

 गाँधी जी का पक्ष : गाँधी जी ने खुद लिखा है - 'भगत सिंह की बहादुरी के लिए मेरे  मन में सम्मान है. लेकिन मुझे ऐसा तरीका चाहिए जिसमें खुद को न्योछावर करते हुए आप दूसरों को नुकसान न पहुंचाएं. उनहोंने कहा कि सरकार गंभीर रूप से उकसा रही है कि हम समझौते से पीछे हट जाएँ लेकिन समझौते की शर्तों में फांसी रोकना शामिल नहीं था. इसलिए इससे पीछे हटना ठीक नहीं है. "भगत सिंह और उनके साथियों के साथ बात करने का मौका मिला होता तो मैं उनसे कहता कि उनका चुना हुआ रास्ता ग़लत और असफल है. ईश्वर को साक्षी रखकर मैं ये सत्य ज़ाहिर करना चाहता हूं कि हिंसा के मार्ग पर चलकर स्वराज नहीं मिल सकता. सिर्फ मुश्किलें मिल सकती हैं. 

"मैं जितने तरीकों से वायसराय को समझा सकता था, मैंने समझाया , मेरे पास समझाने की जितनी शक्ति थी. वो मैंने इस्तेमाल की. 23वीं तारीख़ की सुबह मैंने वायसराय को एक निजी पत्र लिखा जिसमें मैंने अपनी पूरी आत्मा उड़ेल दी थी." पाठकों को सनद रहे की भगत सिंह और साथियों को २३ की रात को फांसी दी गयी. 

भगत सिंह की फांसी के बाद गाँधी ने  कहा - भगत सिंह अहिंसा के पुजारी नहीं थे, लेकिन हिंसा को धर्म नहीं मानते थे. इन वीरों ने मौत के डर को भी जीत लिया था. उनकी वीरता को नमन है. लेकिन उनके कृत्य का अनुकरण नहीं किया जाना चाहिए. उनके इस कृत्य से देश को फायदा हुआ हो, ऐसा मैं नहीं मानता. खून करके न्याय और प्रचार हासिल करने की प्रथा अगर शुरू हो गई तो लोग एक दूसरे के कत्ल में न्याय तलाशने लगेंगे." 

यह सही है की गाँधी जी जिस स्थिति में थे वे वायसराय पर अधिक दबाव बना सकते थे लेकिन फिर खुद गाँधी जी ही कहाँ रह जाते अगर वे हिंसा के प्रश्न को अनदेखा करते . उनहोंने असहयोग आन्दोलन हिंसा के कारण  ही वापस ले लिया था .  

भगत सिंह की प्रतिक्रिया : 
अब यह भी जान लें की भगत सिंह क्या सोचते थे अपनी फांसी के बारे में . 

जेल में जब एक पंजाबी नेता ने भगत सिंह से पुछा की उनहोंने अपना बचाव क्यों नहीं किया तो उनका जवाब था  "इन्कलाबियों को मरना ही होता है, क्योंकि उनके मरने से ही उनका अभियान मज़बूत होता है, अदालत में अपील से नहीं.

"भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह ने ट्रिब्यूनल को पत्र लिखा और कहा कि मेरे बेटे का जोन सोंडर की हत्या में कोई हाथ नहीं है और वो निर्दोष है. तब भगत सिंह ने उन्हें बेहद सख्त भाषा में जो पत्र लिखा था वह शब्शः आपके सामने रख रहा हूँ . जो लोग भगत सिंह की फांसी माफ़ करने को लेकर गाँधी जी को कोसते हैं , भगत सिंह ने उन्हें गद्दार कहा होता.

(यह पत्र यहाँ से लिया गया है https://www.marxists.org/hindi/bhagat-singh/1930/pitaji-ke-nam-patra.htm)


"मैं ये बात जानकर हैरान हूं कि आपने मेरे बचाव के लिए स्पेशल ट्रिब्यूनल को अर्जी दी है।आपका पुत्र होने के नाते मैं आपकी पैतृक भावनाओं और इच्छाओं का पूरा सम्मान करता हूँ लेकिन इसके बावजूद मैं समझता हूँ कि आपको मेरे साथ सलाह-मशविरा किये बिना ऐसे आवेदन देने का कोई अधिकार नहीं था। आप जानते थे कि राजनैतिक क्षेत्र में मेरे विचार आपसे काफी अलग हैं। मैं आपकी सहमति या असहमति का ख्याल किये बिना सदा स्वतन्त्रतापूर्वक काम करता रहा हूँ। मुझे यकीन है कि आपको यह बात याद होगी कि आप आरम्भ से ही मुझसे यह बात मनवा लेने की कोशिशें करते रहे हैं कि मैं अपना मुकदमा संजीदगी से लड़ूँ और अपना बचाव ठीक से प्रस्तुत करूँ लेकिन आपको यह भी मालूम है कि मैं सदा इसका विरोध करता रहा हूँ। मैंने कभी भी अपना बचाव करने की इच्छा प्रकट नहीं की और न ही मैंने कभी इस पर संजीदगी से गौर किया है।
आप जानते हैं कि हम एक निश्चित नीति के अनुसार मुकदमा लड़ रहे हैं। मेरा हर कदम इस नीति, मेरे सिद्धान्तों और हमारे कार्यक्रम के अनुरूप होना चाहिए। आज स्थितियाँ बिल्कुल अलग हैं लेकिन अगर स्थितियाँ इससे कुछ और भी अलग होतीं तो भी मैं अन्तिम व्यक्ति होता जो बचाव प्रस्तुत करता। इस पूरे मुकदमे में मेरे सामने एक ही विचार था और वह यह कि हमारे विरुद्ध जो संगीन आरोप लगाये गए हैं, बावजूद उनके हम पूर्णतया इस सम्बन्ध में अवहेलना का व्यवहार करें। मेरा नजरिया यह रहा है कि सभी राजनैतिक कार्यकर्ताओं को ऐसी स्थितियों में उपेक्षा दिखानी चाहिए और उनको जो भी कठोरतम सजा दी जाए, वह उन्हें हँसते-हँसते बर्दाश्त करनी चाहिए। इस पूरे मुकदमे के दौरान हमारी योजना इसी सिद्धान्त के अनुरूप रही है। हम ऐसा करने में सफल हुए या नहीं, यह फैसला करना मेरा काम नहीं। हम खुदगर्जी को त्यागकर अपना काम कर रहे हैं।मेरी ज़िन्दगी इतनी कीमती नहीं जितनी कि आप सोचते हैं। कम-से-कम मेरे लिए तो इस जीवन की इतनी कीमत नहीं कि इसे सिद्धान्तों को कुर्बान करके बचाया जाए। मेरे अलावा मेरे और साथी भी हैं जिनके मुकदमे इतने ही संगीन हैं जितना कि मेरा मुकदमा। हमने एक संयुक्त योजना अपनायी है और उस योजना पर हम अन्तिम समय तक डटे रहेंगे। हमें इस बात की कोई परवाह नहीं कि हमें व्यक्तिगत रूप में इस बात के लिए कितना मूल्य चुकाना पड़ेगा।पिता जी, मैं बहुत दुख का अनुभव कर रहा हूँ। मुझे भय है,आप पर दोषारोपण करते हुए या इससे बढ़कर आपके इस काम की निन्दा करते हुए मैं कहीं सभ्यता की सीमाएँ न लाँघ जाऊँ और मेरे शब्द ज्यादा सख्त न हो जायें। लेकिन मैं स्पष्ट शब्दों में अपनी बात अवश्य कहूँगा। यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार करता तो मैं इसे गद्दारी से कम न मानता, लेकिन आपके सन्दर्भ में मैं इतना ही कहूँगा कि यह एक कमजोरी है- निचले स्तर की कमजोरी।यह एक ऐसा समय था जब हम सबका इम्तिहान हो रहा था। मैं यह कहना चाहता हूँ कि आप इस इम्तिहान में नाकाम रहे हैं। मैं जानता हूँ कि आप भी इतने ही देशप्रेमी हैं, जितना कि कोई और व्यक्ति हो सकता है। मैं जानता हूँ कि आपने अपनी पूरी जिन्दगी भारत की आजादी के लिए लगा दी है, लेकिन इस अहम मोड़ पर आपने ऐसी कमजोरी दिखाई, यह बात मैं समझ नहीं सकता। 


पुलिस ने असेम्बली बम के साथ ही सांडर्स की हत्या का आरोपी बना कर भी चार्जशीट दाखिल की . उन्हें मौत की सजा सुनाई गयी . 

जो लोग गाँधी को कोसते हैं बेशक कोसें लेकिन भगत सिंह की माफ़ी के लिए ना कोसें . भगत सिंह बिलकुल नहीं चाहते थे की उन्हें फांसी से बचाया जाए . ये शहादत थी - एक ऊँचे दर्जे की शहादत . इसे इस तरह नीचा ना बनाईये .


16 नव॰ 2016

सक्षम नेता अक्षम तंत्र

मोदी जी ने राष्ट्रव्यापी ऑपरेशन तो कर दिया जिसके लिए वे बधाई के पात्र हैं । इतने साहसिक कदम के लिए जिस तरह की राजनीतिक इच्छाशक्ति और समर्थन की आवश्यकता होती है वह उनके पास है । वे अपनी आर्थिक दृष्टि का परिचय गुजरात के दिनों में दे चुके हैं जिसे गुजरात मॉडल माना जाता है । गुजरात में रहते हुये जिस प्रशासनिक दक्षता का उनहोनने परिचय दिया था वह सरहनीय है। इसीलिए जब 8 नवंबर की रात उन्होंने इस भीषण निर्णय की घोषणा की थी तब चौंकने के अलावा पीछे कहीं यह आश्वासन भी था की वे दक्ष प्रशासक हैं और कार्यपालिका के निर्देश के लिए उसके पीछे खड़े रहेंगे। लेकिन अपनी आर्थिक घोषणा की तरह ही वे सबको चकित करते हुये जापान चले गए तब जबकि देश को उनकी और उनके मार्गदर्शन की सबसे अधिक जरूरत थी। यही नहीं जब जनता में अफरा तफरी फैली और लंबी लाइनें लगने लगीं तब उनका जापान से मज़ाक के मूड में आया वीडियो जले पर नमक छिड़कने जैसा था । जब जनता मोदी मोदी करते हुये उनसे अक्षम नौकरशाही को दिशा देने की अपेकक्षा कर रही थी तब वे मज़ाक कर रहे थे की कांग्रेस ने चवन्नी बंद की थी हमने 1000 बंद किए जिसकी जैसे हैसियत । ऐसे मज़ाक फेसबुक पर तो अच्छे लगते हैं लेकिन गंभीर और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग अगर इस स्तर तक उतर आयें तो आसंवेदनशीलता प्रकट होती है । भारत लौटने पर जब उन्हें स्थिति की गंभीरता का एहसास हुआ होगा तो उनके आँसू निकल आए जिसे हम सबने उनकी गोवा रैली में भी देखा । स्वाभाविक है की जब आप इतना बड़ा कदम उठाएँ और वह फ़ेल होता नज़र आए तब आँसू निकालना वाजिब है । इन आंसुओं ने बेशक हमें यह दिखाया की हमारे प्रधानमंत्री उतने असंवेदनशील सनहीन है जीतने जापान से दिखरहे थे । प्रधानमंत्री क भी लगा की अब तो इस काम की योजना बनाना जरूरी है । यह साबरमती के घाट बनवाने जैसा काम नहीं था जिसमें बिना योजना के काम चल जाता । यहाँ तो 125 करोड़ प्यारे देशवासियों की बात थी । इसलिए रातों को भी ना सोने वाले और बिना छुट्टी के काम करने वाले पालनहार मोदी जी ने आधीरात को मीटिंग बुलाई वह भी 6 दिन बाद  । हालांकि यह मीटिंग अगर वे उसी दिन सुबह या दोपहर में बुलाते तो अगले दिन तक जनता में इसके कदमों की खबर पहुँच जाती । खैर उनकी कामकाजी शैली है । 6 दिन बाद की गयी इस मीटिंग के बाद जो सामने आया वह इस बात की पुष्टि करता था की हमारे देश की जनता बिलकुल किसी फौज की तरह इस निर्णय को मानने के लिए तैयार थी लेकिन सरकार के पास तैयारी नहीं थी । आर्थिक सचिव कहते नज़र आये की टास्क फोर्स बनाया "जाएगा", माइक्रो एटीएम लगाए "जाएंगे" इत्यादि । 6 दिन बाद भविष्य की प्लानिंग ? तब तक 16 लोग अपनी ज़िंदगी से हाथ धो चुके थे , कारोबार ठप्प हो चुका था , जनता काम धाम छोड़ कर लाइनों में थी। पहले की डेड लाइनें बढ़ायी जाने लगीं, और मोदी जी 50 दिन का समय मांगते नज़र आए । 50 दिन बाद सपनों के भारत का वादा भी किया और रोये भी । अपनी कुर्बानियों का भी हवाला दिया । हर प्रकार से जनता को आश्वस्त करते नज़र आए । अगले दिन गाजीपुर कि रैली में उनके भाषण में फिर तेज था हालांकि उनकी रैली में जो भीड़ थी पता नहीं उसे अपने नोट बदलवाने की चिंता क्यूँ नहीं थी । शायद उसे नए नोटों में पेमैंट मिल चुका था इसीलिए वह दुगने जोश से जादू के खेल की तरह ताली बजते नज़र आए और मोदी जी भी पूरे जादूगर । वे बार बार  कह रहे थे -- एक बार फिर ताली बजाईए" और तालियाँ बज रहीं थीं । लेकिन इस तालियों की गड़गड़ाहट के पीछे देश की जनता त्राहिमाम कर रही थी । वे क्रूर हो गए । काला धन वाले नींद की गोलियां ले रहे हैं और गरीब जनता आराम से सो रही है । शायद ताली बजने वालों को इकट्ठा करने वाले उनके दरबारियों ने उन्हें नहीं दिखाया कि गरीब सो नहीं रहा लाइन में खड़ा है और भविष्य को ले कर परेशान है। जबकि काला धन वाले अपने पैसे को ठिकाने लगा चुके हैं । खुद मोदी जी ने विदेशों में संपत्ति खरीदने, सोना खरीदने, निवेश करने और कंपनियाँ खोलने के मामलों में, धन  को आसान शर्तों पर विदेश भेजने की सीमा 3 साल पहले की 60000 डॉलर से बढ़ा कर 2 लाख डॉलर कर दी है जिससे 4 लाख करोड़ रु से अधिक धन बाहर गया है । सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों का 1.14 लाख करोड़ लोन अब  बट्टे खाते में हैं जिसे माफ कर दिया गया है । यादव सिंह जैसों तक पर भी कार्यवाही नहीं हुयी है । ऐसी भी घटनाएँ हैं कि बीजेपी के खातों में घोषणा से ठीक पहले करोड़ों जमा हुये थे । पार्टीसीपेटारी नोट और हवाला पर भी कोई कार्यवाही नहीं हुयी है । काला धन रखने वालों की जानकारी भी सरकार के पास है लेकिन इन पर भी कोई कार्यवाही नहीं हुयी है । राजनीतिक पार्टियां के चंदे पर भी कोई कदम नहीं है । कम से कम मोदी जी बीजेपी को ही सूचना कानून के दायरे में ले आते । लेकिन यह उनके लिए कठिन है । क्योकि 2 वर्ष के कार्यकाल देखते हुये यही लगता है कि वह बेचारे सरकार और पार्टी में अकेले हैं । विदेश मंत्री होते हुये भी सभी तरह के कम काज और यहाँ तक कि घोषणाएँ भी वे खुद करते हैं । वित्त मंत्री के होते हुये भी यह काम भी खुद ही करते हैं । सरकार में केवल वही हैं जिनके बारे में यह सुनाई देता है कि वे दिन रात काम में जुटे हैं । तभी वे छुट्टी नहीं ले पाते । बिना ठीक से आराम किए थकान के कारण भी आपके निर्णय लेने कि क्षमता पर असर पड़ता है । लेकिन मोदी जी बचपन से खतरों के खिलाड़ी रहे हैं । जहां माँ भारती के सपूत भरत , सिंह से खेलते थे तो मोदी घड़ियाल से । शायद आँसू इसी ट्रेनिग का नतीजा हैं । 

20 फ़र॰ 2016

देशभक्ति की मोनोपॉली

वे देश में ईसाइयों के खिलाफ हैं , वे देश के मुसलमान नागरिकों के खिलाफ हैं, वे वामपंथियों को पसंद नहीं करते , वे कांग्रेसियों के खिलाफ हैं,वे अन्ना के खिलाफ हैं , वे अरविंद केजरीवाल के खिलाफ हैं,  वे गांधी को मारते हैं, नेहरू को गालियां देते हैं, वे जेएनयू के खिलाफ हैं, वे फिल्म और अभिनय शिक्षण संस्थाओं के खिलाफ हैं, वे पत्रकारों के खिलाफ हैं, वे साहित्य के खिलाफ हैं , वे आमिर, शाहरुख और सलमान के खिलाफ हैं, वे वैलेंटाइन के विरोध में हैं, वे स्त्री की आज़ादी के विरोध में हैं, वे तसलीमा नसरीन और सलमान रुशदी के विरोध में हैं , वे वैज्ञानिक सोच के खिलाफ हैं, वे दाभोलकर के खिलाफ हैं, वे अंधविश्वास से लड़ने वालों के खिलाफ हैं, वे कला के विरोध में हैं, वे ज्ञान के विरोध में हैं,  वे मकबूल फिदा हुसैन के विरोध में हैं, वे मानवता की सेवा करने वाले लोगों के विरोध में हैं , वे मदर टेरेसा के विरोध में हैं ,  वे बीएचयू के उन शिक्षकों के खिलाफ हैं जो लोगों के हक़ में आवाज़ उठाते हैं , वे आदिवासियों, गरीबों और किसानों के खिलाफ हैं, वे खुद से अलग विचार के खिलाफ हैं।

 वे इन सब को देशद्रोही कहते हैं 

जो उनका समर्थक नहीं वह देशद्रोही है । 

केवल वे ही देशभक्त हैं । 

देशभक्ति उनके लिए "पाकिस्तान मुर्दाबाद" से शुरू हो कर "मोदी ज़िंदाबाद" पर खत्म हो जाती है। देशभक्ति की इस तंग सोच में वे आसाराम बापू के लिए जगह रखते हैं। उनके पास दारासिंह के लिए जगह है पर मदर टेरेसा के लिए नहीं , वे नाथुराम गोडसे के लिए मंदिर बनवा सकते हैं लेकिन इन मंदिरों में औरतों और दलितोंके लिए जगह नहीं । वे बेटा पैदा करने की दवा बेच सकते हैं और बेटियों के पहनावे पर ऐतराज कर सकते हैं, यहाँ तक की उन्हें सरे आम घसीट कर पीट भी सकते हैं । वे बलात्कार होने पर लड़कियों के चरित्र पर  प्रश्न उठा सकते हैं , वे किसी भी लड़के को देशद्रोही साबित किए बिना न्यायालय परिसर में ही जज से पहले उसे सजा दे सकते हैं , वे गलियाँ दे सकते हैं , हत्याएँ कर और करावा सकते हैं  - क्योंकि वे देशभक्त हैं । 

सोचिए! 
शायद वे जनता के समर्थन में हैं 

नहीं -------जनता उनके समर्थन में है।  अगर नहीं  होगी तो गद्दार कहलएगी जैसा दिल्ली और बिहार की जनता है । 

इस देश में केवल वे ही अकेले देशभक्त हैं । देशभक्ति के कॉपीराइट होल्डर वही हैं । देशभक्ति के बाज़ार में वे अपनी वैसी ही मोनोपोली चाहते हैं जैसी तालिबान की है । 

जय हिन्द 

17 अप्रैल 2015

बस इक देशद्रोही चाहिये ----देशभक्ति के लिये।

एक साधरण पत्थरबाज दो राजनीतिक  दलों  की सत्ता की हवस के चलते अब एक अलगाववादी  नेता  बन चुका है और पाकिस्तानी  हीरो भी। इधर घोर राष्ट्रवादी  देशभक्त  लोगों  को भी अपनी देशभक्ति  दिखाने का मौका मिल गया है ।

24 फ़र॰ 2015

विकास विकास .....क्या है विकास , कहाँ रहता है विकास ?

एक देश में जहां 70 प्रतिशत जनता ज़िंदगी से जूझ रही है और 47 % बच्चे कुपोषण का शिकार हैं वहाँ पिछले वर्ष लगभग 9 से 10 महीनों तक कॉर्पोरेट पूंजी की सहायता से दसियों हज़ार करोड़ फूँक कर एक विकासवादी सरकार जनता ने चुनी। कम से कम कहा तो यही जाता है ।  इस जनता के सपनों में कैसा विकास होगा यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है। जनता को एक ऐसा विकास चाहिए जिसे वे खुद भी महसूस कर सकें ना कि ऐसा विकास जिसे देख कर केवल वे आश्चर्यचकित और भयभीत हो सकें । जनता के विकास की परिभाषा बहुत सरल है । जनता को चाहिए अच्छा खाना, कपड़ा, स्वस्थ्य, शिक्षा और रहने की जगह। सरकारें, लोकतन्त्र में इसी वजह से होतीं हैं । कल्याणकारी सरकार का पहला उत्तरदायित्व जनता के प्रति है । जनता की पहली अपेक्षा वही मूलभूत मुद्दे हैं । भारत की सरकारों ने पिछले 65 वर्षों में समय समय पर यह आभास दिया है कि जब जरूरत होती है वह जनता का साथ देने के बजाय जनता के विरुद्ध खड़ी नज़र आती है। हर असंतोष को विरोध समझ कर उसे दबा दिया जाता है । भूमि अधिग्रहण कानून का मामला भी कुछ ऐसा ही है । भारत में 100 वर्ष से अधिक पुराना औपनिवेशिक कानून अस्तित्व में था जिसके आधार पर अनेक सार्वजनिक और निजी परियोजनओं के लिए जमीन लेने के नियम बनाए गए थे । अङ्ग्रेज़ी सरकार के बनाए ये कानून छोटे से छोटे विरोध को खत्म करने के उद्देश्य से ही बनाए गए थे । पिछले 65 वर्षों में इन्हें बदला नहीं गया और अब जब कि समय है सरकारें कॉर्पोरेट हितों की पोषक बनी हुयी हैं। 

ज़मीन हथियाने का धंधा : SEZ 

उदारीकरण के बीस वर्षों में कई बार बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण हुआ है  और इस प्रक्रिया में देश भर में  पिछले 65 वर्षों में कई बार विवाद पैदा हुआ है और मामले अदालतों में लंबित हैं । ये विवाद बहुधा मुआवजे और पुनर्वास को लेकर हैं । इस संदर्भ में महालेखा परीक्षकों की रिपोर्ट हैं जो यह कहतीं हैं की पिछले 20 वर्षों में जिन ज़मीनों को अधिग्रहीत किया गया उनमें से अधिकांश पर वह काम शुरू नहीं हुआ जिनके लिए उन्हें लिया गया था । इसके उलट अधिकांश या तो बंजर पड़ीं हैं या उनके प्रयोग को बदल कर आवासीय प्रयोजन के लिए ग्रुप हाउसिंग सोसायटियाँ बन गईं हैं।
हाल ही में वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने जब सेज़ यानी विशेष आर्थिक क्षेत्रों पर सीएजी की रिपोर्ट संसद में पेश की तो ये राज़ खुला कि सेज़ के कायदों का धड़ल्ले से उल्लंघन जारी है। सीएजी की इस रिपोर्ट के मुताबिक, एसईज़ेड के लिए देश में जो क़रीब 45,000 हेक्टेयर ज़मीन निकाली गई, उसमें सिर्फ 28,000 हेक्टेयर ज़मीन पर काम शुरू हुआ है।
रिपोर्ट के मुताबिक, कई समूहों ने एसईज़ेड के नाम पर सरकार से ज़मीन लेकर उसे ऊंचे दामों पर बेच दिया और 6 राज्यों में करीब 40000 हेक्टेयर ज़मीन सेज़ के नाम पर निकाली गई, लेकिन इसमें से करीब 5,400 हेक्टेयर ज़मीन का व्यावसायिक इस्तेमाल कर लिया गया। इस तरह एसईज़ेड पॉलिसी जमीन हथियाने की पॉलिसी थी। इसका इस्तेमाल ज़मीन लूटने के लिए किया गया। इसके अलावा इन कंपनियों को 83000 करोड़ से अधिक की कर छूट भी मिली । यहाँ एक तथ्य गौर तलब है की जब दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने महज़ 200 करोड़ रुपये की सब्सिडी देते हुये पानी और बिजली जैसी आधारभूत जरूरतों को गरीबों को राहत देने के लिए , दरें घटाईं थी तब राजनीतिक अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों ने इसे " लोकतन्त्र" के लिए खतरनाक बताया था । लेकिन किसी विश्लेषक को यह अपराधपूर्ण कृत्य बुरा नहीं लगता कि किसान से सार्वजनिक कार्य के नाम पर पहले ज़मीन ली जाए । 20 वर्ष पहले के दाम तय करके मुआवजा दिया जाए । फिर वर्षों तक प्रस्तावित कार्य ना हो पाने पर ज़मीन को निजी कंपनियों को बेच दिया जाए।  



ग्रामीण जनसंख्या का मलिन बस्ती में बदलना : 

 इन जगहों पर जो गाँव थे उनके लोग जहां पहले भूमि के मालिक थे अब भूमिहींन मजदूर हैं । जो मुआवजा मिला था वह बेहतर योजना के आभाव में खर्च हो चुका है और गाँव अब दमकती सोसाइटी के बीच एक झुग्गी में तब्दील हो चुका है जो उसी सोसायटी के लिए घरेलू नौकर, प्लमबर, बिजली और ड्राइवर का स्रोत बन गया है । ऐसे सामाजिक उथल पुथल से अपराध भी बढ़ते हैं, इसके सामाजिक अध्ययन मौजूद हैं । किसी सरकार ने यह शोध करने की ईमानदार कोशिश नहीं की है की आखिर भारत की जमीन की जरूरतों को कैसे पूरा किया जाए जिससे ऐसे दुष्प्रभाव ना हों। भारत की रक्षा, शिक्षा और ऊर्जा नीति की तरह कोई भूमि नीति नहीं है । इस मुद्दे पर पिछले वर्षों में जब विवाद अधिक बढ़ा था और दिल्ली व आस पास के क्षेत्रों में  हिंसक झड़पें भी हुईं थी उस समय राहुल गांधी ने अचानक बड़ा नाटकीय आंदोलन  रचा कर आनन फानन में एक बिल पास कर दिया था । अब केंद्र सरकार में सत्ता संभालने वाली बीजेपी ने एक अध्यादेश के द्वारा इस बिल में बड़े बदलाव कर दिये हैं और ये बदलाव महज़ मुआवजा वाले बिन्दु को यथावत रखते हुये कई कदम आगे बढ़ते हुये इसे पूरी तरह से थोड़े से उधयोगपतियों के पूर्णतः हित में बना दिया है ।

यमुना एक्स्प्रेस वे या पुणे एक्स्प्रेस वे जैसी परियोजनाएँ एक बढ़िया उदाहरण हैं । सरकार ने हाइवे बनाने के लिए ज़मीन ली । ठीक है । वह आवश्यक थी । जनहित की परियोजना थी । लेकिन साथ ही सरकार ने हाइवे में जितनी ज़मीन की जरूरत थी उससे कहीं अधिक मात्र में ज़मीन ली और बाद में उसे बिल्डरों को ऊंचे दामों पर बेच दिया । बिल्डरों ने उस ज़मीन पर मकान, दुकान,मॉल रोज़ोर्ट बना लिए और किसान अपनी आँखों के सामने अपनी ही ज़मीन को खुद को मिले मुआवज़े से 100 गुना अधिक मूल्य पर बिकते देख रहे हैं ।जेटली जी ने अपने ब्लॉग पर तर्क दिया है कि सड़क बने से कीमतें बढ़ेंगी और ग्रामीणों को फाइदा होगा । लेकिन कीमतें जहां कि बढ़नी थीं वह ज़मीन तो पहले ही बिल्डरों के पास पहुँच चुकी है और वे उसका फाइदा ले रहे हैं । कितने गांवों को फायदा हुआ है ? सरकार ने ऐसा कोई अध्ययन नहीं कराया।  यह तमाशा हरियाणा, यूपी, उड़ीसा, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश में चल रहा है ।

मुआवज़े का खेल : 

सरकारी मुआवजा भी खूब होता है । अव्वल तो इसे मिलने में ही इतने पैंच होते हैं कि मिलने में सालों लगते हैं। इसके अलावा इसका निर्धारण भी विवादित है  और नए अध्यादेश में तो मुआवजा कोई किसान वास्तव में ले या ना ले अगर सरकार ने बैंक में खाता खोल कर एक मुआवजा निधि बना कर उसमें मुआवजा राशि जमा करा दी तो इसे मुआवजा दिया मान लिया जाएगा । और अगर मुआवजा दे दिया गया है तो किसान अदालत नहीं जा सकते । मतलब मार कर रोने भी ना दिया जाए । 

नया , पुराना और वास्तविकता: छह बिन्दु 


पहला बिन्दु : 2013 का क़ानून : निजी प्रोजेक्ट के लिए 80%, PPP के लिए 70% लोगों की सहमति ज़रूरी  
2014 का अध्यादेश : रक्षा उत्पादन, ग्रामीण इन्फ़्रा, औद्योगिक कॉरीडोर के लिए सहमति ज़रूरी नहीं
वास्तविकता : उड़ीसा, यू पी में ऐसे अधिकांश मामले हैं जिनमें नियमों को तक पर रख कर अधिग्रहण किए गए । अधिकांश मामलों में एमर्जेंसी क्लौज लागू ही नहीं होता यह कैग की रिपोर्ट कहती है । ऐसे में 80 % सहमति बहुत से विवादों को खत्म कर सकती थी ।
दूसरा बिन्दु : 
दूसरा बिन्दु : 2013 का क़ानून : हर अधिग्रहण से पहले सामाजिक प्रभाव का आकलन ज़रूरी
2014 अध्यादेश : हर अधिग्रहण से पहले सामाजिक अध्ययन आवश्यक नहीं । 
वास्तविकता : सामाजिक प्रभाव का अध्ययन अति आवश्यक है । इससे प्रोजेक्ट में देरी नहीं बल्कि स्थिरता में ही बढ़ोत्तरी होती । अध्ययन के बाद यदि सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रख कर अधिहरहन किया जाएगा और उचित ढंग से मुआवजा और पुनर्वास किया जाएगा तो मुकद्दमों की संख्या में कमी होगी।

तीसरा बिन्दु : 2013 का क़ानून : बहु-फसली और उपजाऊ ज़मीन का विशेष परिस्थिति में ही अधिग्रहण
2014 का अध्यादेश : राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा, ग्रामीण इंफ्रा के लिए उपजाऊ ज़मीन का अधिग्रहण हो सकता है । 
बहु -फ़सली ज़मीन का अधिग्रहण नहीं होना चाहिए । यह ज़मीन पीढ़ियों तक को रोजगार और सुरक्षा देती है । इसे छीनना एक प्रकार से व्यक्ति के जीवन के अधिकार को छीनना है।

चौथा बन्दु : 2013 का क़ानून : ग्राणीण भूमि का मुआवज़ा बाज़ार से 4 गुना, शहरी ज़मीन का 2 गुना
2014 का अध्यादेश : कोई बदलाव नहीं । 
वास्तविकता : मुआवजा 4 गुना 10 गुना से अधिक महत्वपूर्ण  है मुआवजा निर्धारित कैसे किया जाए । आज की ज़मीन का भाव 20 वर्ष पूर्व के भाव पर कैसे लगाया जा सकता है ? रक्षा को छोड़ कर अन्य किसी क्षेत्र में सीधे किसानों से वर्तमान मूल्यों पर सौदा हो । वैसे किसानों कि मांग यह भी है कि ऐसी किसी भी प्रोजेक्ट के लिए किसानों से लीज़ पर ज़मीन ली जाए ।

पाँचवाँ बिन्दु :2013 का क़ानून : 5 साल में प्रोजेक्ट शुरू नहीं हुए तो ज़मीन किसानों को वापस
2014 का अध्यादेश : कोई समय सीमा नहीं । 
वास्तविकता : हाल ही मेँ हरियाणा के एक गाँव में नए आवासीय सेक्टर बसने के नाम पर किसानों से जमीने ली गईं । 6 वर्ष तक प्रस्तावित काम ना हो पाने पर अक्षमता जता कर इन ज़मीनों को निजी बिल्डरों को दे दिया गया । अब इन ज़मीनों कि बेहद ऊंचे दामों पर बिक्री हो रही है बल्कि कई ज़मीन पाने वाली कंपनियों ने इन ज़मीनों को ऊंचे दामों पर दूसरी कंपनियों को लीज़ पर दे दिया है । जब कंपनियाँ ज़मीन लीज़ पर दे सकतीं हैं तो किसानों से लीज़ पर लेने में क्या कठिनाई है ?

छठवाँ बिन्दु : 2013 का क़ानून : किसी नियम की अनदेखी करने वाले अधिकारियों पर क़ानूनी कार्रवाई होगी 
2014 का अध्यादेश : बिना अनुमति के कार्यवाही संभव नहीं । 
वास्तविकता : यह बिरले ही होता है । 

8 फ़र॰ 2015

बीजेपी की (प्रसव) वेदना : दिल्ली

भारत की राजनीति जिस तरह का स्वरूप ले चुकी है वह भविष्य की चुनौतियों का सामना करने में तो असमर्थ है ही बल्कि देश कू विशाल जनसंख्या को बेहतर अवसर, सुखद जीवन और सुरक्षा प्रदान करने में भी असफल रही है। इन चुनौतियों के लिए 20वीं शती के समाजवाद, पूंजीवाद या साम्यवाद आज उपायुक्त नहीं हैं । आज ज़माना एक की रोटी छीन कर दूसरे को खिलाने का नहीं है बल्कि ऐसी व्यवस्था करने का है जिसमें ना केवल रोटियाँ सभी के लिए पर्याप्त हों बल्कि कोई भूखा भी ना रहे । यह रोटियाँ बनाने का समय है ....सैंकने का नहीं । आप ईवेंट मैनेजमेंट से जनता को भरमा तो सकते हैं लेकिन भ्रम देर तक नहीं चलता । लोकतन्त्र की लोकप्रिय परिभाषा देने वाले अब्राहम लिंकन के एक और कथन को याद रखा जाना चाहिए ---- You can fool all the people some of the time, and some of the people all the time, but you cannot fool all the people all the time. (सभी लोगों को कुछ समय के लिए तो उल्लू बनाया जा सकता है और कुछ लोगों को हर समय उल्लू बनाया जा सकता है लेकिन सभी लोगों को सदा के लिए उल्लू नहीं बनाया जा सकता )  । 

बीजेपी की लोकसभा यात्रा जिन विकासवादी वादों और नारों के साथ शुरू हुयी थी उसने जनता में विकास की आशाएँ जागा दीं । जिस गुजरात मॉडल की घनी चर्चा थी वह अब गायब है । नौ महीनों जनता बिजली, पानी, स्वस्थ्य और शिक्षा की बात का इंतज़ार कर रही है लेकिन सुनाई पड़ रहा है "घर वापसी", "लव जिहाद", 4,6,8,10 बच्चे पैदा करने की सीख और रामजादे जैसी ओछी बातें। इन नौ महीनों का जमा हासिल कुछ विदेश यात्राओं और खुद को विश्व नेता स्थापित करने की असफल कोशिश के अलावा कुछ नहीं है । सरकार चुप है, मंत्री चुपचाप हैं, केवल प्रधानमंत्री जी मुखर हैं। बस यही वजह है की दिल्ली में नौ महीने के इंतज़ार के बाद पूरे देश , महाराष्ट्र, झारखंड, जम्मू में लगातार जीत के बाद अब दिल्ली में "अपवाद" स्वरूप "आप" की सरकार बनी है ।

बेशक बराक ने सही कहा है "भारत में आपस में लड़ कर विकास नहीं पैदा नहीं हो सकता"  यह तो आपस के प्यार से ही पैदा होगा।

22 दिस॰ 2014

मुखौटा

पीके - बीजेपी 
मुखौटा बहुपयोगी होता है। आपकी इज्जत बढ़ाता है। अपने दैनिक जीवन में हम सब मुखौटे ओढ़ते हैं । मुखौटे आज की दुनियाँ में सफलता की नींव हैं।लेकिन मुखौटों के साथ समस्या यही है कि उनका होना आपमें ऊहापोह पैदा करता है। साध्य को पाने के बाद आप मुखौटा हटाना चाहते हैं लेकिन यह आसान नहीं।

बीजेपी ने भी ये मुखौटे ओढ़े हैं और हर बार मुखौटों को उतारना उसके लिए द्विविधा का सबब रहा है। यह दुविधा गुजरात दंगों के दौरान भी देखी गयी थी जब पार्टी अंदर ही अंदर मुदित थी पर मुखौटा "राजधर्म" कह कर लानतें भेज रहा था और आज भी जब मुखौटा "विकास" कर रहा है तो असल "घर वापसी, पाठ्यक्रम सुधार, संस्कृत पाठन, लव जिहाद करा रहा है । हुआ तब भी कुछ नहीं था होना अब भी कुछ नहीं है। 

15 दिस॰ 2014

वे काम पर हैं

प्रधानमंत्री जी हवाई माध्यमों के मुरीद हैं । वे नेता हैं जो खुद में एक हवाई कैरियर है .... कुछ भी नहीं होता उसके पास फिर भी सब कुछ होता है । वह सेवक हो कर भी मालिक होता है । प्रधानमंत्री भी एक हवाई पद है । संविधान उसके बारे में सबसे कम पन्ने खर्च करता है लेकिन सबसे ज्यादा सत्ता उसी के पास है। वे भाषणबाजी की हवाई कला में भी माहिर हैं । वे हवाई दावे कर सकते हैं , हवाई किले बांध सकते हैं । वे फेसबुक, ट्विटर जैसी हवाई माध्यमों में खेलते हैं । उन्हें पता है 140 अक्षरों में "संक्षिप्तीकरण" से अच्छा कोई तरीका नहीं हो सकता । इसीलिए 3डी, 5टी, एफ़डीआई(फ़र्स्ट डवलप इंडिया) जैसे जुमले वे गढ़ते हैं । वे मन की बात करते हैं ...वही हवाई मन जिसे काबू में रखने की सलाह हमारे मनीषियों ने दी है। वे विदेशों की धरती से देश को संबोधित करते हैं ... वे वहाँ रॉक शो करके देश में विपक्ष की हवा निकाल देते हैं। तो बंधुओ वे काम पर हैं । विकास इतना होगा की अब ज़मीन नहीं आसमान पर दिखेगा ......... 

9 अप्रैल 2014

आज़म खाँ ने एक हाल ही में कहाँ कि कार्गिल युद्ध मुसलमान सैनिकों की वजह से जीता। बवाल मचने पर बयान से मुकर गए। अंदरखाने की खबर यह है कि वे कहना चाहते थे कि कारगिल में भारत ने तो पूरा ज़ोर लगाया लेकिन जीते हम इसलिए क्यूंकी मुसलमान सैनिक जो पाकिस्तान की सेना में थे भाग गए। जीते ना हम मुसलमान सैनिकों की वजह से।

(वैसे भी भारतीय सेना में इंसान होते हैं)

11 फ़र॰ 2014

60 वर्ष गए पिक्चर अभी बाकी है

60 वर्ष गए पिक्चर अभी बाकी है
आज भारतीय राजनीति जिस बहुराहे पर खड़ी है वहाँ से आगे जाने का रास्ता सावधानी और उच्च सिद्धांतों के आलोक में तय किया जाना चाहिए। हमारी राजनीतिक व्यवस्था बहुदलीय लोकतन्त्र पर आधारित है और इस व्यवस्था का मुख्य पहलू है दलीय प्रतिस्पर्धा। दुर्भाग्य से आज़ादी के आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाने वाले नेताओं और संस्थाओं ने पार्टियों का रूप लेकर इस प्रतिस्पर्धा का गला घोंट दिया और आज़ादी को महज़ सत्ता हस्तांतरण बना दिया गया। 1947 में चुनावी राजनीति में कांग्रेस और इसके सभी नेताओं से परे कोई सोच नहीं थी और इसी पूर्ण सहमति ने पहले आम चुनाव को जहां अभूतपूर्व रूप से सफल बनाया तो दूसरी ओर इसने बहुदलीय व्यवस्था को अप्रासंगिक बना दिया।  संसदीय व्यवस्थ में विपक्ष का महत्वपूर्ण स्थान होता है और एक मजबूत विपक्ष एक अच्छी सरकार का आश्वासन भी होता है। लेकिन कांग्रेस के सर्वाधिकार ने भारतीय संसदीय व्यवस्था में कभी भी एक मजबूत विपक्ष को उभरने नहीं दिया। आज़ादी को लेकर जो गरिमा, स्फूर्ति और आशा पूरे देश में फैली थी उसे आगे की पीढ़ियों में हस्तांतरित करने की प्रक्रिया को भी इस प्रवृत्ति ने बाधित किया। एकाधिकार और निर्विरोध चुनाव ने कांग्रेस को एक ओर वंशवादी बना दिया तो दूसरी ओर जनता को यथास्थितिवादी। विपक्ष का कमजोर विकास राजनीति में निजी स्वार्थों को सर्वोपरि रखने वाले लोगों के लिए वरदान बन कर आया। ऐसे में कुनिर्णयों, दुर्भाग्य और परिवार्तनों के दौर में सत्ता पर पकड़ बनाए रखने के लिए एकाधिकारवादी और अवसरवादी दोनों ने मिल कर देश की राजनीति को ठीक उन्हीं बिन्दुओं पर ला कर खड़ा कर दिया है जिनसे आज़ादी पाने के लिए हमने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी थी। इसी अवसरवाद ने ठीक अंग्रेजों की तरह भारतीय समाज के तानेबाने में मौजूद सभी दरारों को और बड़ा किया एवं नयी दरारें भी ईज़ाद की गईं। जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्रीयता के जिन मुद्दों के लिए आशा की गयी थी कि स्वशासन के दौर में ये मुद्दे पृष्ठभूमि में चले जाएंगे उन्हीं मुद्दों के सहारे गैर कांग्रेसी दलों ने अपने पैर जमाने की कोशिश की। इस तरह देश की राजनीति ने कल्याणकारी की बजाए जातिवाद, सांप्रदायिकता, क्षेत्रीयता और कट्टरवाद का रास्ता चुन लिया। इस राजनीति ने आज़ादी के बाद के सुनहरे सपनों को ज़मीन पर उतारने की कोशिश करने की बजाए यथास्थितिवाद को प्राथमिकता दी। इस राजनीति ने कर्तव्यबोध और काम करने की संस्कृति की बजाए चापलूसी, भाई भतीजावाद और रिश्वतख़ोरी को जन्म दिया। जनता के मोहभंग और क्षेत्रीय, भाषायी, धार्मिक और जातिवादी राजनीति के कारण जब कांग्रेस का एकाधिकार दरकने लगा तो अब यथास्थिति बनाए रखने के लिए इन्दिरा गांधी द्वारा प्रतिबद्ध नौकरशाही, न्यपालिका और दमन का सहारा लिया गया और फिर आपातकाल जैसे गैर लोकतान्त्रिक कदम भी उठये गए और अंततः पीछे के दरवाजे की राजनीति भी आरंभ हुयी जब कि बूथ कैप्चरिंग, राजनीतिक हत्याएँ, पुलिस और खुफिया तंत्र का इस्तेमाल सत्ता पाने या गिराने में होने लगा। बूथ कैप्चरिंग, आलोकतांत्रिक तरीकों के क्षेत्र में भारत का आविष्कार था। इस तरीके ने राजनीति में अपराधियों के लिए एक बेहतर रोजगार का अवसर पैदा किया और 70 के दशक में बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश में अनेक ऐसे अपराधी बकायदा विभिन्न चुनावी हथकंडों की संगठित सेवा देने लगे। राजनीति और अपराध नजदीक आ गए। प्रतिबद्ध नौकरशाही, न्यायपालिका और पुलिस की अवधारणा ने ट्रांसफर-पोस्टिंग, थानों की नीलामी, पदों की नीलामी और काले धन का प्रचलन बढ़ा दिया। सार्वजनिक जीवन से कर्तव्य, आदर्श और शुचिता के सभी आग्रह समाप्त हो गए और भारतीय जनता अपने संतोषी सदा सुखी को आदर्श मान कर अपने खोल में दुबक गयी। अनेक विफल और अधूरी क्रांतियों के बाद अंततः अब कोई राष्ट्रकवि भी नहीं है। देश के इतिहास में अनेक भीषण मानवीय त्रासदियाँ हुईं पर भारतीय कला चुप रही। समाज की अभिव्यक्ति लुप्त हो गयी। 84 के दंगे हुये, आपातकाल के सितम, नर-संहार, युद्ध, क्रांतियाँ, गरीबी, आतंकवाद और फिर दंगे लेकिन कलाकार, साहित्यकार, संगीतकार चुप रहे। जैसे जैसे देश में निराशा घर कर रही थी कला का फ़लक भी स्याह होता जा रहा था। फिल्मों, संगीत, चित्रकला में उत्तरोत्तर अश्लीलता भी बढ़ रही थी। साहित्य भी चुप ही रहा बल्कि साहित्य भी राजनीतिक-सामाजिक क्षरण के प्रभाव से नहीं बच पाया और इस दौर में प्रकाशस्तंभ की बजाए महज आईना बन कर रह गया। साहित्य भी राजनीति की भांति जातिवादी, खेमेबाजी, धार्मिक और अवसरवादी हो गया। अब हमारे पास कहानीकार नहीं बल्कि दलित या स्त्री या मुस्लिम कहानीकार होते हैं। अब साहित्य रसास्वादन के लिए नहीं बल्कि खेमेबाजी के लिए लिखा जाता है। साहित्य अब राजनीति की B टीम बन गया है। यह वह साहित्य नहीं जो जनसंवेदनाओं को जगाए बल्कि यह उसे भ्रमित करने वाला और बांटने वाला साहित्य है। उयाह कुरीतियों पर कुठराघात नहीं करता बल्कि नयी कुरीतियाँ पैदा और पुष्ट करता है। यह जनता से दूर है और राजनीति के करीब। यह वह आईना है जो उल्टी तस्वीर दिखाता है। यह मूल्यों को पीढ़ियों में हस्तांतरित करने में रुचि नहीं दिखाता। यह नई पीढ़ी के लिए कुछ नहीं देता।
आज़ादी के भंग सपने और जीवन की जद्दोजहद में हमने एक आलसी, यथास्थितिवादी, और असंवेदनशील समाज विकसित कर लिया है। पुरुषार्थ और कर्मवाद के जन्मदाता देश में इन्हीं मूल्यों को खो दिया गया। यह हताशाजनक ही है कि 65 आज़ाद वर्षों बाद भी आज विश्व में सर्वाधिक गरीब, अशिक्षित, कुशासित और प्रदूषित देशों में हम गिने जाते हैं। देश में शिक्षा का जो ढांचा अंग्रेज़ विकसित कर गए थे हम उसी के खंडहरों पर खड़े हैं। शिक्षा के क्षेत्र में नवीनता के नाम पर सिर्फ पब्लिक स्कूल और उनकी विशालकाय इमारतें, भारी बस्ते, भीषण फीस,  ठूँसे हुये दिमाग और ठस शिक्षक ही हैं हमारे पास। कोई नया विचार, आंदोलन नहीं है। सब कुछ सरकार पर निर्भर है।

भारतीय समाज के मानस में अंग्रेजों ने हीन भावनाओं ने जो बीज बोये थे और हमें भरोसा दिलाया था कि हम एक समाज के तौर पर विफल हैं, वे अब फल दे रहे थे। हम एक विफल समाज के रूप में विकसित होते जा रहे हैं। हमारे यहाँ व्यक्तिगत उपलब्धियां बहुत हैं पर सामूहिक सफलताएँ कम। व्यक्तिगत रूप से हम विदेशों में जा कर बड़ी सफलताएँ हासिल करते हैं पर सामाजिक तौर पर हमारी उपलब्धियां शून्य हैं। देश में धन का उदारीकरण तो हो गया पर मन का उदारीकरण होना बाकी है। पुराने मूल्यों को तो हमने त्याग दिया है पर नए श्रेष्ठ मूल्यों का निर्माण अभी बाकी है। देश पुनः एक बहुराहे पर खड़ा है। 

11 नव॰ 2013

होनी अनहोनी

गाना था बचपन में सुना था - होनी को अनहोनी कर दें अनहोनी को होनी, अमर अकबर एंथोनि। अपने बौडीवुड (BOWDYWOOD) वाले भी अक्सर बड़ी यूजफूल वस्तुएँ लोकसेवा में अर्पित करते रहते हैं। यह उसी की मिसाल है।
अब देखिये ना। गौहाटी से कैसी गोटियाँ खेली गईं है। याचिका सी बी आई को लेकर दायर हुयी और सरकार के नुमाइंदे कोर्ट में ऐसी कोई दलील नहीं रख पाये जो माननीय जज साहब को संतुष्ट कर पाती कि सी बी आई का गठन पूरी तरह वैध था। तो जो अनहोनी  तय थी वह हो गयी। सी बी आई असंवैधानिक घोषित कर दी गयी और आश्चर्य यह कि जो विपक्ष संसद ठप्प कर कर के जनता को अभी तक चला रहा था उसकी ज़ुबान भी खामोश। रस्म अदायगी के लिए सभी चैनलों ने तीसरी लाइन के नेताओं और दोयम दर्जे के विशेषज्ञों से चर्चा पूरी कर ली और टी आर पी की कृपा से जितने प्रचार मिले जेब में डाले। उधर जनता तो खैर लगी पड़ी है अपने खर्चे पूरे करने में। उसे क्या फरक पड़ रहा है कि सी बी आई सही तरह से गठित हुयी थी या नहीं। उसने तो जब से होश संभाला है यही देखा है कि सी बी आई भले ही कैसे भी गठित हुयी हो उसका गठन ऐसा है कि वह किसी भी तरह के अवैध कार्यों की जांच वैध तरीके से कर ही नहीं पाती। हर महत्वपूर्ण मुद्दे पर उसकी जांच बीरबल की खिचड़ी की तरह अनंत काल के लिए चलती है। सी बी आई कोई उसके लिए तो बनी नहीं जो चेन झपटने, चोरी, डकैती या घूस से उसे निजात दिलाये। 

तो भैया यह एक नया खेल है जिसमें खेल को बदलना होता है (अङ्ग्रेज़ी में गेम चेंजर कहलाता है ) और आज कल यह भारत की युवा राजनीति की देन माना जा रहा है। इसमें अक्सर ही देखने में आता है की किसी मुद्दे की बहस की हवा संवैधानिक या असंवैधानिक सिद्ध करके निकाल दी जाती है। देश के चिरयुवा नेता ने अभी कुछ दिन पहले जनलोकपाल की हवा ऐसे ही संवैधानिक हल दे कर निकाल दी थी। और अब सी बी आई की असंवैधानिकता ने सभी घोटालों की हवा निकाल दी है।  

खैर अभी तक देश में घोटाले होते थे तो लिमिट में पर जब यूपीए को अनलिमिटेड सत्ता जनता ने दी तब देश को कांग्रेस के नेता एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाने लगे और घोटालों की एक अनलिमिटेड सूची सामने आने लगी। कलमाड़ी, राजा राजनीति के धोनी बन कर रोज़ अनहोनी करने लगे और घोटाले की रकम के शून्य बढ़ते बढ़ते अनलिमिटेड हो कर राडिया टेप से होकर कोयला तक पहुँचने लगे तो सी बी आई की मुश्किलें भी बढ़ गईं। कोर्ट की निगरानी से बात हाथ से निकाल गयी। कोयला घोटाले की परतें खोली जाने लगीं तो लगा की देश का पूरा तंत्र असल में सड़ कर कोयले की तरह ही काला हो चुका है।

आए दिन यह कालिख कभी प्रधानमंत्री, कभी गृहमंत्री, विपक्ष, सपक्ष और अपक्ष यानि देश के धन कुबेरों तक उड़ने लगी। अब अनहोनी होने लगी थी। अब कालिख को झाड़ कर साफ करने का वक्त आ चुका था और यही इसी समय यह अनहोनी हुयी की सी बी आई असंवैधानिक घोषित हुयी और माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी गरिमामय हो कर इस पर स्टे लगा दिया। अब सभी प्रकार की जाँचें भी स्टे में ही रहेंगीं। सरकार को राहत मिली।

अब इस होनी और अनहोनी के समय को लेकर आप यह न कहिए की षड्यंत्र है क्यूंकी कवि कह गया है की जब अमर अकबर और एंथोनि (कृपया इसमें भी किसी तरह की साम्यता न खोजें) एक ही जगह जमा हो जाते हैं तो ऐसी होनी अनहोनी होती ही रहतीं हैं। बाकी आप तो खेल का आनंद लीजिये। 

12 नव॰ 2012

जनता है सोने की मुर्गी

2G घोटाले के बाद अब तक घोटालों के प्रति हमारी संवेदनाओं को तृप्त करने वाले और भीषण, विभीषण प्रकार के घोटाले सामने आ चुके हैं। पर जैसा की हर घोटाले में होता है - दोनों ओर से जनता ही हलाल होती है। पहले तो जनता के कारों के पैसों से विकसित तकनीक को कौड़ियों के दामों पर निजी कंपनियों को बेच दिया गया। इन कंपनियों ने इसके ज़बरदस्त दाम वसूले। शायद आपको वह ज़माना याद भी ना हो की 1997 में मोबाइल कॉल दरें 18 रू प्रति मिनट थीं और इंकमिंग भी फ्री नहीं थी। फिर घोटाला खुला और न्यायालय ने सभी आबंटन रद्द कर दिये। हालांकि सज़ा नहीं हुयी। न्यायालय असाहय है। आरोप सिद्ध करना जिसका काम है वह करबद्ध और नतमस्तक है। लेकिन न्यायालय के इस फैसले के बाद अब मंत्री जी का संकेत है की दाम बढ़ेंगे। यानि जनता को फिर से हलाल किया जाएगा। क्या न्यायालय सुओ मोटो इस मामले को ले कर न्याय दिलाएगा की स्पेक्ट्रम के आबंटन से जो घाटा हुया वह इन कंपनियों के प्रॉफ़िट से वसूला जाए, दोषी नेताओं के वेतनमान, भविष्यनिधि और पेंशन फंड से काटा जाए। स्पेक्ट्रम नीलामी के नाम पर कॉल दरों को बढ़ाना नैसर्गिक न्याय का स्पष्ट उल्लंघन है। आखिर जनता कितनी बार और क्यूँ टैक्स भरे? पहले तकनीक विकास के लिए, फिर उस तकनीक के उत्पाद को खरीदने और प्रयोग करने पर टैक्स, और अब घोटालेबाज कंपनियों को जब दोबारा पैसा देना पड़ रहा है तो बढ़ी कॉल दरों के रूप में अनुचित भुगतान और अनुचित टैक्स। क्या न्यायालय संज्ञान लेगा ? 

4 अक्टू॰ 2012

अखिलेश सरकार के 6 महीने और आशाओं का टूटना

अखिलेश सरकार को 6 महीने हो गए हैं और यूपी अब भी वैसा ही है। आशाएँ टूट रहीं हैं। प्राइमटाइमों में बैठ कर बकैती करने वाले बातों के वीर अखिलेश के युवा होने को ले कर ऐसे उत्साहित थे जैसे उनसे पहले और कोई युवा नहीं हुआ। एक और युवा हैं हमारे देश में जिनको ले कर ऐसे ही जानकारों को बहुत आशाएँ हैं।