रण उत्सव : ट्रेन से हम लोग भुज पहुँच कर होटल में रुके। वहाँ रात को चाचा जी, चाची जी और मेरी बहन आयुषी भी अहमदाबाद तक हवाई मार्ग से व भुज तक सड़क मार्ग से आ पहुंचे। उनका कमरा हमने पहले ही ले लिया था। अगले दिन चाचा जी की एक शिष्या, जो प्रशासनिक सेवा में चयनित हो कर अहमदाबाद में ही पोस्टेड है द्वारा उपलब्ध कराई गयी इनोवा में बैठ कर रण उत्सव की ओर चले। लगभग 12 बजे तक हम टेण्ट सिटी पहुंचे। यहा काउंटर पर हमें तीन दिन के फूड कूपन, कैप, पहचान पत्र इत्यादि मिल गए और पोर्टर सेवा ने हमारा सामान हमारे तयशुदा टेंटों में पहुँच दिया। इसके बाद सीधे हम लोग डायनिंग हॉल में गए क्यूंकी नाश्ता 12:30 तक ही मिलना था। डायनिंग हॉल पहुँच कर हमें लगा की अगर आगाज ऐसा तो अंजाम कैसा होगा । और आगाज तो बहुत ही अच्छा था। बिना किसी अव्यवस्था के करीने से लगे स्वादिष्ट पकवानों की मेज़ों से आती खुशबू ने भूख बढ़ा दी थी। गुजरती, राजस्थानी और सामान्य पकवानो के विकल्प मौजूद थे। तृप्त हो कर वहाँ से निकले और पहुंचे सीधे अपने टेंट में। यह स्थान बहुत ही खूबसूरत था। अर्ध चंद्राकार में अनेक टेंट लगे थे। A से शायद K तक के ब्लॉक थे और हर ब्लॉक में लगभग 50 टेंट थे। हर टेंट में अटैच बाथरूम था और एसी एवं हीटर दोनों का प्रबंध था। चाय बनाने का सामान व केतली भी मौजूद थी और किसी जरूरत के लिए रूम सर्विस को फोन से इत्तिला दी जा सकती थी। हम सब फ्रेश होकर थोड़ा घूमने निकाल गए। तभी सूचना दी गयी की 3 बजे टूर बसें हडको विलेज और व्हाइट सेंड व सूर्यास्त दिखने के लिए चल पड़ेंगी अतः हम जल्दी से तैयार हो कर बसों के साथ ही निकाल पड़े।
हडको विलेज: यह एक अनावश्यक पड़ाव था और वस्तुतः इस गाँव में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे दर्शनीय कहा जा सकता। मेरी आगामी पर्यटकों से गुजारिश है की यदि आप अपने वहाँ से हैं तो बेहतर है की थोड़ा रुक कर सीधे सनसेट प्वाइंट पहुंचा जा सकता हैं।
श्वेतरज पर सूर्यास्त : मीलों तक जहां दृष्टि जाती थी मानो श्वेत धवल हिम की पर्त बिछी हो। पावों तले नीचे देखने पर काली मिट्टी में मिश्रित यह श्वेतवर्णी कर्क रेखीय हिम वस्तुतः नमक निकला। कच्छ के इस भाग में समुद्री पानी अंदर तक चला आता है और तेज़ धूप में पानी सूख कर लवण बच जाता है जी श्वेत पर्त के रूप में मीलों तक फैला दिखाई देता है । अन्वी और विश्वम ने तो एक पोलीथिन ले कर लवण भरने में मशगूल हो गए। हम सबने यहाँ फोटो खींची। बच्चों ने पतंग भी उड़ाई। कच्छ के मैदान तक जाने के लिए हमने ऊँट गाड़ी भी ले ली थी और बच्चों को तो ऊँट गाड़ी व ऊँट की सवार में बेहद आनंद आया। कच्छ के श्वेत धवल विस्तार के वर्णन के लिए शब्द कम हैं। प्रकृति को सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है, अभिव्यक्त नहीं, फिर मैं कवि भी नहीं। हम सब देर तक धीरे धीरे अस्त होते सूर्य के साथ इस सौंदर्य को पीते रहे। अनेक पर्यटक वहाँ फ़ोटोग्राफ़ी, ऊँट गाड़ी की सवारी और रण के लावणीय जालनिधि के किनारे टहल रहे थे। हमारे दोनों बच्चों को यहाँ बेहद मज़ा आया। सूर्यास्त होने के बाद भी अंधेरा छाने तक हम सब वहाँ रहे और आख़िर में चाय पीते हुए बस में बैठ कर पुनः अपने टेंट में आ गये। जब बस ने हमें छोड़ा तो शाम की चाय का समय हो चुका था अतः हम सब पहले डाइनिंग हाल टेंट में गये। वहाँ चाय और नाश्ते का नायब इंतज़ाम था जिसे हमने पुनः स्वाद लेकर खाया। डाइनिंग हॉल से निकल कर अब टेंट सिटी की ख़ूबसूरती निहारते हुए, वहाँ लगे बाज़ारों में घूमते हुए, फ़ोटो खींचते, खींचते लगभग ९:०० बजे हम पुनः टेंट में पहुँचे और पहुँचते ही संदेश मिला की डिनर के लिए डाइनिंग हाल पुनः तैयार है। हम सब थके थे अतः थोड़ा आराम कर के पुनः डाइनिंग हॉल चल दिये। इस ताँत और डाइनिंग हॉल के अनवरत चक्करों पर हमारे बेटे कि टिप्पणी थी " यहाम हम घूमने आये हैं या खाने, हर समय जब देखो टेंट से डाइनिंग हॉल और डाइनिंग हाल से टेंट" सभी लोगों को उसकी बात बड़ी मज़ेदार लगी लेकिन थी भी सही।
भारत - पाकिस्तान बॉर्डर : अगला दिन तय था टूर कि और से काली पहाड़ी और भारत - पाकिस्तान बॉर्डर तक बस यात्रा का। इस यात्रा में अधिकांश लोगों की रुचि नहीं थी। सिर्फ़ मैं, बहन और चाचा चाची ही गए। यह एक था देने वाली यात्रा थी। सड़क अच्छको नहीं थी और समय काफ़ी लगा। बॉर्डर पर भी देखने या सहने लायक़ कुछ भी नहीं था। ऊँची कँटीली बाड़ों के बीच एक ज़मीन की पट्टी " नो मेंस लैंड " के तौर पर थी। दूसरी ओर दूर पर कुछ टावर दिखायी दिये । गाइड के अनुसार वे पाकिस्तानी टावर हैं और उनमें पक्सितानी सैनिक घाट लगाये बैठे हैं, जो सिर्फ़ उसे ही दिखायी दिये, बाक़ी सबने आँखें फाड़ फाड़ कर देखने के बाद "ऐंपरर्स न्यू क्लॉथ्स" की भाँति सबने स्वीकार कर लिए की हाँ उसे पाकिस्तानी सैनिक हाथ में बंदूक़ लिए, घात लगाये बैठे दिखाई दिये हैं। किसी सैन्य बटालियन के दफ़्तर में रुक कर हमने चाय और नाश्ता भी किया। और पुनः एक लंबी थकाऊ यात्रा के बाद देर रात डिनर के समय तक हम फिर टेंट सीटी आ गये। आज यहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी था और इसमें गुजराती पारंपरिक नृत्य और संगीत का कार्यक्रम हुआ जो मनोरंजक था। हम देर रात तक इस कार्यक्रम का आनद लेते रहे और अंततः अपने टेंट में देर रात ही गये।
हडको विलेज: यह एक अनावश्यक पड़ाव था और वस्तुतः इस गाँव में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे दर्शनीय कहा जा सकता। मेरी आगामी पर्यटकों से गुजारिश है की यदि आप अपने वहाँ से हैं तो बेहतर है की थोड़ा रुक कर सीधे सनसेट प्वाइंट पहुंचा जा सकता हैं।
श्वेतरज पर सूर्यास्त : मीलों तक जहां दृष्टि जाती थी मानो श्वेत धवल हिम की पर्त बिछी हो। पावों तले नीचे देखने पर काली मिट्टी में मिश्रित यह श्वेतवर्णी कर्क रेखीय हिम वस्तुतः नमक निकला। कच्छ के इस भाग में समुद्री पानी अंदर तक चला आता है और तेज़ धूप में पानी सूख कर लवण बच जाता है जी श्वेत पर्त के रूप में मीलों तक फैला दिखाई देता है । अन्वी और विश्वम ने तो एक पोलीथिन ले कर लवण भरने में मशगूल हो गए। हम सबने यहाँ फोटो खींची। बच्चों ने पतंग भी उड़ाई। कच्छ के मैदान तक जाने के लिए हमने ऊँट गाड़ी भी ले ली थी और बच्चों को तो ऊँट गाड़ी व ऊँट की सवार में बेहद आनंद आया। कच्छ के श्वेत धवल विस्तार के वर्णन के लिए शब्द कम हैं। प्रकृति को सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है, अभिव्यक्त नहीं, फिर मैं कवि भी नहीं। हम सब देर तक धीरे धीरे अस्त होते सूर्य के साथ इस सौंदर्य को पीते रहे। अनेक पर्यटक वहाँ फ़ोटोग्राफ़ी, ऊँट गाड़ी की सवारी और रण के लावणीय जालनिधि के किनारे टहल रहे थे। हमारे दोनों बच्चों को यहाँ बेहद मज़ा आया। सूर्यास्त होने के बाद भी अंधेरा छाने तक हम सब वहाँ रहे और आख़िर में चाय पीते हुए बस में बैठ कर पुनः अपने टेंट में आ गये। जब बस ने हमें छोड़ा तो शाम की चाय का समय हो चुका था अतः हम सब पहले डाइनिंग हाल टेंट में गये। वहाँ चाय और नाश्ते का नायब इंतज़ाम था जिसे हमने पुनः स्वाद लेकर खाया। डाइनिंग हॉल से निकल कर अब टेंट सिटी की ख़ूबसूरती निहारते हुए, वहाँ लगे बाज़ारों में घूमते हुए, फ़ोटो खींचते, खींचते लगभग ९:०० बजे हम पुनः टेंट में पहुँचे और पहुँचते ही संदेश मिला की डिनर के लिए डाइनिंग हाल पुनः तैयार है। हम सब थके थे अतः थोड़ा आराम कर के पुनः डाइनिंग हॉल चल दिये। इस ताँत और डाइनिंग हॉल के अनवरत चक्करों पर हमारे बेटे कि टिप्पणी थी " यहाम हम घूमने आये हैं या खाने, हर समय जब देखो टेंट से डाइनिंग हॉल और डाइनिंग हाल से टेंट" सभी लोगों को उसकी बात बड़ी मज़ेदार लगी लेकिन थी भी सही।
भारत - पाकिस्तान बॉर्डर : अगला दिन तय था टूर कि और से काली पहाड़ी और भारत - पाकिस्तान बॉर्डर तक बस यात्रा का। इस यात्रा में अधिकांश लोगों की रुचि नहीं थी। सिर्फ़ मैं, बहन और चाचा चाची ही गए। यह एक था देने वाली यात्रा थी। सड़क अच्छको नहीं थी और समय काफ़ी लगा। बॉर्डर पर भी देखने या सहने लायक़ कुछ भी नहीं था। ऊँची कँटीली बाड़ों के बीच एक ज़मीन की पट्टी " नो मेंस लैंड " के तौर पर थी। दूसरी ओर दूर पर कुछ टावर दिखायी दिये । गाइड के अनुसार वे पाकिस्तानी टावर हैं और उनमें पक्सितानी सैनिक घाट लगाये बैठे हैं, जो सिर्फ़ उसे ही दिखायी दिये, बाक़ी सबने आँखें फाड़ फाड़ कर देखने के बाद "ऐंपरर्स न्यू क्लॉथ्स" की भाँति सबने स्वीकार कर लिए की हाँ उसे पाकिस्तानी सैनिक हाथ में बंदूक़ लिए, घात लगाये बैठे दिखाई दिये हैं। किसी सैन्य बटालियन के दफ़्तर में रुक कर हमने चाय और नाश्ता भी किया। और पुनः एक लंबी थकाऊ यात्रा के बाद देर रात डिनर के समय तक हम फिर टेंट सीटी आ गये। आज यहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी था और इसमें गुजराती पारंपरिक नृत्य और संगीत का कार्यक्रम हुआ जो मनोरंजक था। हम देर रात तक इस कार्यक्रम का आनद लेते रहे और अंततः अपने टेंट में देर रात ही गये।
1 टिप्पणी:
आपका ये यात्रा वृत्तांत कुच्छ ज़्यादा ही मज़ेदार लगा। विशेषकर ... श्वेतरज का सूर्यास्त। मन कर रहा अब घूम ही आऊँ। :)
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