कन्हैया देशद्रोही हो जाता है , तो स्मृति ईरानी का अभिनय सत्यमेव जयते । वे मंत्री , नेता जो असल में देशद्रोही हैं और हत्या, चोरी , बलात्कार के आरोपी हैं और संसद में बैठे हैं वे देशप्रेम का स्वांग रचते हैं , करोड़ों के बैंक लोन को डकार कर राज्य सभा सदस्य होने के नाते सज़ा में छूट चाहने वाले खुद को पवित्र मानते हैं । प्रधनमंत्री को सत्यमेव जयते का प्रयोग करना चाहिए लेकिन तब, जब वे इसकी शुचिता को सुनिश्चित कर सकें - लेकिन शायद उन्हें भी इसका अर्थ उल्टा ही सिखाया गया हो ।
विचार पक्षियों जैसे होते हैं। मस्तिष्क के विशाल और अनंत फलक पर वे बादलों की तरह अचानक आते हैं, आकृतियाँ बदलते हैं, पक्षियों की तरह मँडराते हैं और फिर दूर कहीं गुम हो जाते हैं। बाज़ीचा-ए-अत्फाल है दुनियाँ मेरे आगे, होता है शब ओ रोज़ तमाशा मेरे आगे। इन्हीं तमाशों पर जो विचार आकार लेते हैं उन्हें पकड़ने का प्रयास है यह चिट्ठा। आपको अच्छा लगे तो एक लघु चिप्पी चस्पा करना ना भूलें।
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6 मार्च 2016
सत्यमेव जयते
कन्हैया देशद्रोही हो जाता है , तो स्मृति ईरानी का अभिनय सत्यमेव जयते । वे मंत्री , नेता जो असल में देशद्रोही हैं और हत्या, चोरी , बलात्कार के आरोपी हैं और संसद में बैठे हैं वे देशप्रेम का स्वांग रचते हैं , करोड़ों के बैंक लोन को डकार कर राज्य सभा सदस्य होने के नाते सज़ा में छूट चाहने वाले खुद को पवित्र मानते हैं । प्रधनमंत्री को सत्यमेव जयते का प्रयोग करना चाहिए लेकिन तब, जब वे इसकी शुचिता को सुनिश्चित कर सकें - लेकिन शायद उन्हें भी इसका अर्थ उल्टा ही सिखाया गया हो ।
20 फ़र॰ 2016
देशभक्ति की मोनोपॉली
वे देश में ईसाइयों के खिलाफ हैं , वे देश के मुसलमान नागरिकों के खिलाफ हैं, वे वामपंथियों को पसंद नहीं करते , वे कांग्रेसियों के खिलाफ हैं,वे अन्ना के खिलाफ हैं , वे अरविंद केजरीवाल के खिलाफ हैं, वे गांधी को मारते हैं, नेहरू को गालियां देते हैं, वे जेएनयू के खिलाफ हैं, वे फिल्म और अभिनय शिक्षण संस्थाओं के खिलाफ हैं, वे पत्रकारों के खिलाफ हैं, वे साहित्य के खिलाफ हैं , वे आमिर, शाहरुख और सलमान के खिलाफ हैं, वे वैलेंटाइन के विरोध में हैं, वे स्त्री की आज़ादी के विरोध में हैं, वे तसलीमा नसरीन और सलमान रुशदी के विरोध में हैं , वे वैज्ञानिक सोच के खिलाफ हैं, वे दाभोलकर के खिलाफ हैं, वे अंधविश्वास से लड़ने वालों के खिलाफ हैं, वे कला के विरोध में हैं, वे ज्ञान के विरोध में हैं, वे मकबूल फिदा हुसैन के विरोध में हैं, वे मानवता की सेवा करने वाले लोगों के विरोध में हैं , वे मदर टेरेसा के विरोध में हैं , वे बीएचयू के उन शिक्षकों के खिलाफ हैं जो लोगों के हक़ में आवाज़ उठाते हैं , वे आदिवासियों, गरीबों और किसानों के खिलाफ हैं, वे खुद से अलग विचार के खिलाफ हैं।
वे इन सब को देशद्रोही कहते हैं
जो उनका समर्थक नहीं वह देशद्रोही है ।
केवल वे ही देशभक्त हैं ।
देशभक्ति उनके लिए "पाकिस्तान मुर्दाबाद" से शुरू हो कर "मोदी ज़िंदाबाद" पर खत्म हो जाती है। देशभक्ति की इस तंग सोच में वे आसाराम बापू के लिए जगह रखते हैं। उनके पास दारासिंह के लिए जगह है पर मदर टेरेसा के लिए नहीं , वे नाथुराम गोडसे के लिए मंदिर बनवा सकते हैं लेकिन इन मंदिरों में औरतों और दलितोंके लिए जगह नहीं । वे बेटा पैदा करने की दवा बेच सकते हैं और बेटियों के पहनावे पर ऐतराज कर सकते हैं, यहाँ तक की उन्हें सरे आम घसीट कर पीट भी सकते हैं । वे बलात्कार होने पर लड़कियों के चरित्र पर प्रश्न उठा सकते हैं , वे किसी भी लड़के को देशद्रोही साबित किए बिना न्यायालय परिसर में ही जज से पहले उसे सजा दे सकते हैं , वे गलियाँ दे सकते हैं , हत्याएँ कर और करावा सकते हैं - क्योंकि वे देशभक्त हैं ।
सोचिए!
शायद वे जनता के समर्थन में हैं
नहीं -------जनता उनके समर्थन में है। अगर नहीं होगी तो गद्दार कहलएगी जैसा दिल्ली और बिहार की जनता है ।
इस देश में केवल वे ही अकेले देशभक्त हैं । देशभक्ति के कॉपीराइट होल्डर वही हैं । देशभक्ति के बाज़ार में वे अपनी वैसी ही मोनोपोली चाहते हैं जैसी तालिबान की है ।
जय हिन्द
25 जुल॰ 2014
Clueless First post with eyeless writers
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फर्स्ट
पोस्ट में छपे लेख की प्रतिक्रिया
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http://www.firstpost.com/world/eyeless-gaza-clueless-india-shouldnt-care-1632867.html
1-First, the current Palestinian troubles are self-inflicted, as there is no point in provoking Israel and then complaining about their reaction.
यह कहना वैसे ही है जैसे गली के गुंडे के बारे में कोई कहे कि पहले उसे उकसाया अब
पछताओ ....लेकिन रहेगा तो वह गुंडा ही ना ?
2- Second, the refugee status and grievances of Palestinians can easily be solved by wealthy Arabs themselves if only they were willing to resettle them in their vast territories.
क्या लेखक महोदय
को बेघर कर दिया जाए और फिर कहा जाए कि जाओ अपने समृद्ध संबंधियों के साथ रहो जा
कर।
3- Third, there is the specious argument that Indians have in the past supported Palestine, and therefore they must do so now.This is like saying, “We’ve been defecating in public since Nehru’s days, and therefore we must continue to do so, QED”
श्रीनिवासन जी ने लिखा है “यह तो इस तरह है कि हम नेहरू के जमाने
से ही खुले में हगते आए हैं सो अब भी यही करेंगे” उनके तर्क और ज्ञान का स्तर इसी उदाहरण से
पता चलता है।
भारत ने अतीत में फिलिस्तीन का समर्थन सोचे
समझे सिद्धांतों के आधार पर किया था अगर भारतीय विदेश नीति के आज भी वही सिद्धान्त
हैं तो बेशक उसे फिलिस्तीन का समर्थन करना चाहिए। खुद गांधी जी ने लिखा था
"मेरी सहानुभूति यहुदिओं के साथ है.मैं उनसे दक्षिण अफ्रीका से ही नजदीकी रूप
से परिचित हूँ कुछ तो जीवन भर के लिए मेरे साथी बन गए हैं.... पर मेरी सहानुभूति
मुझे न्याय की आवश्यकता से विवेकशून्य नही करती यहूदियों के लिए एक राष्ट्र की
दुहाई मुझे ज्यादा आकर्षित नही करती. जिसकी मंजूरी बाईबल में दी गयी और जिस जिद से
वे अपनी वापसी में फिलिस्तीन को चाहने लगे हैं. क्यों नही वे, पृथ्वी के दुसरे लोगों से प्रेम करते हैं,
उस देश को अपना घर बनाते जहाँ पर उनका जन्म हुआ
और जहाँ पर उन्होंने जीविकोपार्जन किया. फिलिस्तीन अरबों का हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह ....इंग्लैंड अंग्रेजों का
और फ्रांस फ्रंसिसिओं का. यहूदियों को अरबों पर अधिरोपित करना अनुचित और अमानवीय
है जो कुछ भी आज फिलिस्तीन में हो रहा हैं उसे किसी भी आचार संहिता से सही साबित
नही किया जा सकता" श्रीनिवासन को गांधी जी का संदर्भ भी शायद अच्छा ना लगे।
इसमें भ्रांतिपूर्ण अगर कुछ है तो वह खुद राजीव श्रीनिवासन हैं
4 Fourth, the prevailing mythology about Palestinians suggest that they are somehow uniquely downtrodden and worthy of support.
अगर फिलिस्तीन
का शोषण एक मिथक है तो सत्य का उदघाटन राजीव श्रीनिवासन जी को करना चाहिए। या फिर प्रबंधन की पढ़ाई और
सलाहकर्म के बाद उन्हें इतिहास पढ़ने का मौका नहीं मिलता ? मुझे तो उनका विदेश नीति पर लिखना ही एक मिथक लग रहा है।
5-Fifth, by implying that the Palestinian cause is supported ipso facto by all Muslim Indians, the latter are stereotyped and ghettoised.
दरअसल श्री
श्रीनिवासन की सोच खुद संकुचित और स्टीरियोटाइप है। सभी भारतीय मुसलमानों को एक
खास नज़र से देखना ही इसका सबूत है।
6 - Sixth, there are no major Indian interests at play in the Israel-Gaza conflict, and therefore India should only give it the attention it deserves
इस्रायल -
फिलिस्तीन विवाद से और उस क्षेत्र से हमारे बहुत से हित जुड़े हैं । अगर हम अतीत
में इस्रायल का समर्थन करते तो हमें भारत के विभाजन के आधारों को भी मानना पड़ता।
आज भी अगर हम फिलिस्तीन के विभाजन को स्वीकार करेंगे तो कश्मीर पर समस्या खड़ी
होगी। अगर हम इस्रायल के हमलों को समर्थित करते हैं तो हमें चीन के हमलों पर चुप
रहने को तैयार हो जाना चाहिए। श्रीनिवासन फिर
कहते हैं कि अरबों ने इस्रायल के अस्तित्व के अधिकार को चुनौती दे रखी है .... अब
या तो फर्स्ट पोस्ट में किसी तरह के आर्काइव्स नहीं हैं या फिर श्रीनिवासन ने
मेहनत नहीं की है क्यूंकी तथ्य तो उल्टे हैं। इस्रायल के पास सब कुछ है ....ज़मीन,
लोग, सरकार, अमेरिका और फिलिस्तीन ?
एक ऐसा देश जिसे आप नक्शे पर नहीं खोज पाएंगे.
अगर हमास
ने अपराध किया और तीन किशोरों की हत्या की तो उसके बदले हजारों मासूमों की जानें लेना
जायज़ है ? क्या श्रीनिवासन इसी को विदेश नीति मानते हैं। इसके बदले क्या
कोई और रास्ता नहीं था ? दरअसल इस्रायल का यही दादगीरीपूर्ण रवैया
इस क्षेत्र की शांति का दुश्मन है। अगर हमास दोषी है तो इस्रायल भी एक आतंकवादी राष्ट्र
ही है।
और लीजिये अंत में वे गोधरा को भी ले आते हैं कि फिलिस्तीनीयों
ने इस्रायल को उकसाया लेकिन इस्रायल कि प्रतिक्रिया ज्यादा बदनाम हो गयी ठीक उसी तरह
गोधरा के बाद की प्रतिक्रिया ही ज्यादा बदनाम हुयी। श्रीनिवासन साहब ऊपर आप कह चुके
हैं कि इस्रायल – फिलिस्तीन विवाद का भारत के लिए महत्व नहीं है और अब आप गोधरा कि
प्रति हिंसा को जायज़ ठहराने के लिए प्रयोग कर रहे हैं .. खुद को ही विरोधाभासी सिद्ध
कर लिया ?
एक अन्य तर्क आपने कश्मीरी पंडितों के बारे में दिया है। अगर
हम इस्रायल को समर्थन करते हैं तो हमें कश्मीरी पंडितों का पलायन भी स्वीकार कर लेना
चाहिए। अगर पंडितों को अपनी ज़मीन पर लौटने का हक है तो फिलिस्तीनीयों को भी है। खुद
श्रीनिवासन आतंकियों का तर्क प्रयोग कर रहे हैं कि फिलिस्तीन को कतर, सऊदी और
कुवैतियों द्वारा जमीन देनी चाहिए थी। वही तर्क जो कश्मीरी अलगाववादी पंडितों के लिए
देते हैं कि भारतीय प्रदेशों को उन्हें जगह देनी चाहिए।
भारतीय संसद के प्रस्ताव कि प्रभावोत्पादकता को लेकर श्रीनिवासन
पता नहीं ऐसे क्यूँ कह रहे हैं? आखिर और किस देश की संसद के प्रस्ताव को उस
देश के बाहर विशेष ध्यान दिया जाता है सिवाय अमेरिका को छोड़ कर। संसद के प्रस्ताव बाहर
की बजाए भीतर के लिए अधिक होते हैं। सरकारें भारत कि जनता के प्रति जिम्मेदार होतीं
हैं इसलिए अगर इस्रायल के खिलाफ प्रस्ताव पास करने से भारत कि जनता सुकून महसूस करती
है तो यह होना चाहिए।
श्रीनिवासन को गुटनिरपेक्षता पिलपिला गणतन्त्र (बनाना रिपब्लिक)
लगता है तो यह उनकी समस्या है। नेहरू कि विदेश नीति में विश्व दृष्टि थी लेकिन आज तो
वह दृष्टि विहीन है। गुटनिरपेक्षता के कारण ही आज हम यहाँ है नहीं तो अमेरिका या रूस
के पुछलग्गू हो कर रह जाते और क्या मालूम “भारत” रह भी जाता या फिर वह भी गाज़ा, फिलिस्तीन
और इस्रायल जैसी ही गति पाता।
फर्स्ट पोस्ट को बेहतर लेखकों का चुनाव करना चाहिए।
4 जुल॰ 2014
वेदों का विरोध स्वीकार्य नहीं : स्वरुपानन्द
वेदों का विरोध स्वीकार्य नहीं : स्वरुपानन्द
शंकरचार्य (?) को वेदों का विरोध स्वीकार्य नहीं है। यह
होता रहा है। बहुत सी बातें इसलिए सही हैं की शास्त्रों में लिखा है। ये कौन से
शास्त्र है कोई नहीं बताता। क्यूँ बताएगा ? कोई देख लेगा कि लिखा
है या नहीं। शंकरचार्य ने भी नहीं बताया है की ठीक ठीक कौन सी बातों का विरोध
किसने किया है। शुरुआत तो द्वेष की स्वयं शंकरचार्य ने ही की थी जबकि अथर्व वेद का
कथन है
.....मा नो विदद्वृजिना द्वेष्या या
(ऐसे बुरे कार्यों से हम
दूर रहें जो द्वेष बढ़ाने वाले हों)
और इस तरह स्वयं स्वरूपनन्द ने साई बाबा को देवता और खुद को
मनुष्य सिद्ध कर दिया है क्यूंकी वैदिक साहित्य के अंग शतपथ ब्राह्मण में कहा गया
है
.....सत्यमेव देवाः, अनृतं मनुष्याः (देवता
सत्याचरण करने वाले और मनुष्य अनृत का आचरण करते हैं )
यजुर्वेद में मनुष्यता के लिए जो प्रार्थना है वह भी श्री
स्वरूपानन्द जी भूल गए जिसमें कहा गया है
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।
मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे।।
(“मैं सभी
प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखूँ । हम सब परस्पर मित्र की दृष्टि से देखें”)
साईं बाबा के प्रति अपने पूर्वगृह के कारण वे न केवल खुद
वैदिक विरोधी (वेदाभ्यासजडः) सिद्ध हुये हैं बल्कि वे जिस पीठ के स्वामी हैं उसी के प्रवर्तक आदि
गुरु शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन के भी विरोधी सिद्ध हुये हैं।
ॠग्वेद में कहा है
“एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति”
(एक ही मौलिक सत्ता को
विद्वान अलग अलग नामों से पुकारते हैं)
इसी ॠग्वेद के सामंजस्य सूक्त में कहा है
“ येन देवा न वी यंति नो चविद्विशते मिथः।
तत्कृण्मो ब्रह्म वो गृहे संज्ञानं
पुरुषेभ्यः ।। “
(जिस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद विद्वान एक दूसरे का
विरोध नहीं करते और आपसी द्वेष समाप्त कर लेते हैं वह सर्वश्रेष्ठ विद्या
ब्रह्मविद्या है जिसे हम सभी के घरों में पहुँचने की कामना करते हैं।) और आप तो
द्वेष को बढ़ावा दे रहे हैं। आप कैसे ब्रह्म ज्ञानी है ?
स्वयं आदि शंकर ने अद्वैत की स्थापना करते हुये सिद्ध किया
था की ब्रह्म ही परम तत्व है और उसकी कोई जाति या धर्म नहीं होता जीव और ब्रह्म दो
नहीं, एक हैं और जीव ही वस्तुतः वास्तविक रूप में ब्रह्म है । आदि शंकर प्रत्येक
जीव को ब्रह्म मान रहे हैं और आप एक मनुष्य को भगवान मानने से इंकार कर रहे हैं वह
भी धर्म के आधार पर ?
आप भी जानते हैं कि पत्थर देवता नहीं होता ....भक्ति उसे देवता बना देती है।
भक्ति की शक्ति का स्रोत “भज गोविंदम” में स्वयं आदिशंकर ने स्पष्ट
किया है -
“जब बुद्धिमत्ता परिपक्व होती है तो हृदय में जमकर जड़ें जमा लेती है, वह
प्रज्ञा बन जाती है। जब यह प्रज्ञा जीवन के साथ संयुक्त होती है तथा क्रिया का रूप
ले लेती है तब भक्ति बन जाती है। ज्ञान जो परिपक्व होता है भक्ति कहलाता है। यदि
यह भक्ति में नहीं बदलता तो निरुपयोगी है।“
साईं बाबा को आप नहीं मानते ना सही उनके करोड़ों अनुयायी उनके बताए रास्ते को
हृदय में जमा कर , उसे जीवन में उतार कर भक्ति के कारण पूजते हैं तो आप परेशान
क्यूँ होते हैं ? यदि आप साईं को गलत सिद्ध करना चाहते हैं तो
आपको बड़ी लकीर खींचनी पड़ेगी, जैसा की स्वयं आदि शंकरचार्य ने
बौद्ध धर्म के सापेक्ष किया था। आपको खुद को छोटा हो कर नहीं , बड़ा होकर जीतना होता है, यही हिन्दू परंपरा है ...उसका
पालन कीजिये।
9 अप्रैल 2014
आज़म खाँ ने एक हाल ही में कहाँ कि कार्गिल युद्ध मुसलमान सैनिकों की वजह से जीता। बवाल मचने पर बयान से मुकर गए। अंदरखाने की खबर यह है कि वे कहना चाहते थे कि कारगिल में भारत ने तो पूरा ज़ोर लगाया लेकिन जीते हम इसलिए क्यूंकी मुसलमान सैनिक जो पाकिस्तान की सेना में थे भाग गए। जीते ना हम मुसलमान सैनिकों की वजह से।
(वैसे भी भारतीय सेना में इंसान होते हैं)
(वैसे भी भारतीय सेना में इंसान होते हैं)
11 नव॰ 2013
होनी अनहोनी
गाना था बचपन में सुना था
- होनी को अनहोनी कर दें अनहोनी को होनी, अमर
अकबर एंथोनि। अपने बौडीवुड (BOWDYWOOD)
वाले भी अक्सर बड़ी यूजफूल
वस्तुएँ लोकसेवा में अर्पित करते रहते हैं। यह उसी की मिसाल है।
अब देखिये ना।
गौहाटी से कैसी गोटियाँ खेली गईं है। याचिका सी बी आई को लेकर दायर हुयी और सरकार के नुमाइंदे कोर्ट में ऐसी कोई दलील नहीं रख पाये जो माननीय जज साहब को संतुष्ट कर
पाती कि सी बी आई का गठन पूरी तरह वैध था। तो जो अनहोनी तय थी वह हो
गयी। सी बी आई असंवैधानिक घोषित कर दी गयी और आश्चर्य यह कि जो विपक्ष संसद ठप्प
कर कर के जनता को अभी तक चला रहा था उसकी ज़ुबान भी खामोश। रस्म अदायगी के लिए सभी
चैनलों ने तीसरी लाइन के नेताओं और दोयम दर्जे के विशेषज्ञों से चर्चा पूरी कर ली
और टी आर पी की कृपा से जितने प्रचार मिले जेब में डाले। उधर जनता तो खैर लगी पड़ी
है अपने खर्चे पूरे करने में। उसे क्या फरक पड़ रहा है कि सी बी आई सही तरह से गठित
हुयी थी या नहीं। उसने तो जब से होश संभाला है यही देखा है कि सी बी आई भले ही
कैसे भी गठित हुयी हो उसका गठन ऐसा है कि वह किसी भी तरह के अवैध कार्यों की जांच
वैध तरीके से कर ही नहीं पाती। हर महत्वपूर्ण मुद्दे पर उसकी जांच बीरबल की खिचड़ी
की तरह अनंत काल के लिए चलती है। सी बी आई कोई उसके लिए तो बनी नहीं जो चेन झपटने, चोरी, डकैती या घूस से उसे निजात दिलाये।
तो भैया यह एक नया खेल है जिसमें खेल को बदलना होता है (अङ्ग्रेज़ी में गेम चेंजर कहलाता है ) और आज कल यह भारत की युवा राजनीति की देन माना जा रहा है। इसमें अक्सर ही देखने में आता है की किसी मुद्दे की बहस की हवा संवैधानिक या असंवैधानिक सिद्ध करके निकाल दी जाती है। देश के चिरयुवा नेता ने अभी कुछ दिन पहले जनलोकपाल की हवा ऐसे ही संवैधानिक हल दे कर निकाल दी थी। और अब सी बी आई की असंवैधानिकता ने सभी घोटालों की हवा निकाल दी है।
खैर अभी तक देश में घोटाले होते थे तो लिमिट में
पर जब यूपीए को अनलिमिटेड सत्ता जनता ने दी तब देश को कांग्रेस के नेता एक प्राइवेट
लिमिटेड कंपनी की तरह चलाने लगे और घोटालों की एक अनलिमिटेड सूची सामने आने लगी। कलमाड़ी, राजा राजनीति के धोनी बन कर रोज़ अनहोनी करने लगे और घोटाले की
रकम के शून्य बढ़ते बढ़ते अनलिमिटेड हो कर राडिया टेप से होकर कोयला तक पहुँचने लगे तो
सी बी आई की मुश्किलें भी बढ़ गईं। कोर्ट
की निगरानी से बात हाथ से निकाल गयी। कोयला घोटाले की परतें खोली जाने लगीं तो लगा
की देश का पूरा तंत्र असल में सड़ कर कोयले की तरह ही काला हो चुका है।
आए दिन यह कालिख
कभी प्रधानमंत्री, कभी गृहमंत्री, विपक्ष, सपक्ष और अपक्ष यानि देश के धन कुबेरों तक उड़ने लगी। अब अनहोनी होने लगी थी।
अब कालिख को झाड़ कर साफ करने का वक्त आ चुका था और यही इसी समय यह अनहोनी हुयी की सी
बी आई असंवैधानिक घोषित हुयी और माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी गरिमामय हो कर इस पर स्टे
लगा दिया। अब सभी प्रकार की जाँचें भी स्टे में ही रहेंगीं। सरकार को राहत मिली।
अब इस होनी और अनहोनी के समय को लेकर आप यह न कहिए
की षड्यंत्र है क्यूंकी कवि कह गया है की जब अमर अकबर और एंथोनि (कृपया इसमें भी किसी
तरह की साम्यता न खोजें) एक ही जगह जमा हो जाते हैं तो ऐसी होनी अनहोनी होती ही रहतीं
हैं। बाकी आप तो खेल का आनंद लीजिये।
16 दिस॰ 2012
किसी रंजिश को हवा दो की मैं ज़िंदा हूँ अभी
किसी रंजिश को हवा दो की मैं ज़िंदा हूँ अभी
अमेरिका के राष्ट्रपति की आँखें फिर नम हैं। अभी बहुत दिन नहीं हुये हैं जब ऐसी ही घटना ने उन्हें आहत किया था। शब्द और माहौल भी वही हैं गमगीन, गंभीर और कुछ करने के वादे , कुछ नहीं बदला है और शायद कुछ बदलेगा भी नहीं। आखिर छोटे बच्चों की मौत पर भला अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसी महान और शानदार लाइनों को अमेरिकी संविधान से यूं ही तो नहीं मिटाया जा सकता। और भला इससे किसका फाइदा होगा? अगर अमरीकी शस्त्र कानून बदलाव किया जाता है तो बंदूकों की बिक्री बंद हो जाएगी। लोग बेरोजगार होंगे और अराजकता फैलेगी फिर लोग अवैध तरीके से हथियार लेकर यही काम करेंगे। इसलिए यह कानून रहेगा और ऐसा ही रहेगा। इसके पैरवी करने वाले इतने सजग हैं की जिस दिन यह घटना घटी ठीक उसी दिन डिस्कवरी चैनल पर मैंने एक कार्यक्रम देखा जिसका नाम था डूम्स डे प्रेपेयर्स। इसमें एक सज्जन ने प्रलय या डूम्स डे के लिए तैयारी में पानी से ज्यादा बंदूकें खरीद रखीं थीं और उसका पूरा चिंतन इसी एक तर्क पर टीका था की जब मंदी आएगी तो अराजकता फैलेगी और उससे रक्षा के लिए हमें ऐसी तैयारी की ही आवश्यकता होगी। तो ऐसे कार्यक्रम दरअसल एक डर पैदा करके उस भय के व्यावसायिक दोहन के लिए माहौल बनाते हैं। तो मुझे पूरा भरोसा है की अभिव्यक्ति की आज़ादी छीनी नहीं जाएगी।हाल की घटना में एक नौजवान ने एक स्कूल में फायरिंग करके 20 बच्चों और 8 वयस्कों की जान ले ली और खुद को एवं अपनी माँ को भी मौत के घाट उतार दिया। मामले की परतें खुलने पर पता चला है की यह नौजवान एक समृद्ध परिवार से था जिसके पिता बहुराष्ट्रीय कंपनी जीई कैपिटल में वाइस प्रेसिडेंट हैं और विश्व की सबसे बड़ी सलहकार फार्म अर्न्स्ट एंड यंग में पार्टनर भी हैं। लड़के का बड़ा भाई भी अर्न्स्ट एंड यंग में अच्छे पद पर है। बचपन में ही मटा पिता का अलगाव हुआ और फिर तलाक जिसके बाद दोनों अपनी माँ के साथ रहते थे जो इसी स्कूल में टीचर थी। आस पास के लोगों ने इस नौजवान को कभी बात करते या मिलते जुलते नहीं देखा और ना ही कोशिश की क्यूंकी उन्हें लगता था की वह अकेला ही रहना चाहता है। उसके एक सहपाठी के अनुसार वह होशियार था। उसकी कभी हिंसक गतिविधियां भी नहीं थीं। तब आखिर क्या बात थी जिसने उसे ऐसा कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया। क्या ऐसी घटनाओं के लिए अमेरिका ही अभिशप्त है ? भारत में ऐसी हृदयविदारक घटनाएँ क्यूँ नहीं होतीं? क्या यह संस्कृति से संबन्धित मामला है ? क्या ऐसा करने वाले आपराधिक मनोवृत्ति के लोग होते हैं?क्या यह कमजोर शस्त्र कानून का नतीजा है ? प्रश्न बड़े हैं और उत्तर नदारद।
मुझे याद है अपना बचपन जो एक छोटे कस्बे में बीता था। हमारे मुहल्ले में कोई अकेला हो ही नहीं सकता था। आप बाहर निकालिए तो पूरी गली पार करते करते चबूतरों पर धूप सेंकते बुजुर्ग और गली के लड़के अगर यह ना पूछें की "काए लला कहाँ जाय रहे ?" तो लानत है उनके वहाँ होने पर और आपको भी अपने अस्तित्व का बखूबी एहसास हो जाता था। अगर कभी कोई समस्या होती तो पूरा मुहल्ला शामिल होता और दुख तो खैर होता ही था सामूहिक। लड़की की शादी हो तो सहायता बिना मांगे मिलती थी। पड़ोसियों की खबर रखना अशिष्ट नहीं आवश्यक था। सब कुछ अच्छा अच्छा ही नहीं था बुराइयाँ भी थीं पर कम से कम उस स्थिति से तो बेहतर ही था जिसमें बगल के फ्लैट में आदमी चार दिन से मरा पड़ा हो और लोगों का ध्यान तब जाए जब बदबू आने लगे।
मुझे लगता है की हमें फिर से सोचना होगा हमारे विकास और सफलता के मापदण्डों के बारे में। क्या किसी एमएनसी का CEO बनना ही जबकि आपका परिवार बिखर रहा हो । क्या मशीन की तरह काम करना और पैसा कमाना ही सफलता का मापदंड होना चाहिए। इस आधार पर उस नौजवान के पिता सफल हैं परंतु क्या वे मानवीय पैमानों पर सफल हैं? जब आपका परिवार बिखर रहा हो तो सफलता की सिद्धियों का क्या मतलब है। और क्या ऊंची इमारतें, फ़्लाइओवर, एकप्रेसवे, बड़ी गाड़ियां, ऊंचे पुल और बड़ी कंपनियाँ बैंक ही किसी समाज की सफलता की गारंटी हैं। अगर एक समाज अपने बच्चों को सुरक्षा, शिक्षा और सही वातावरण नहीं दे सकता तो उसके सफल होने का क्या अर्थ ? क्या एक राज्य तभी सफल है जबकि वह सबसे ज्यादा हथियार, सेना और शक्ति का प्रदर्शन कर सकता है जबकि उसका समाज दरक रहा हो। क्या एक संविधान अभिव्यक्ति की आज़ादी के पीछे जीवन के अधिकार को पीछे धकेल कर सफल माना जा सकता है। आखिर व्यक्तिगत जीवन की सुरक्षा से अधिक महत्वपूर्ण सामाजिक जीवन की सुरक्षा होनी चाहिए। राज्य एक सामूहिक व्यवस्था है और इसमें व्यक्ति की निरपेक्ष स्वतन्त्रता नहीं होती इसलिए अमेरिकी क़ानूनो की निरपेक्षताएँ अक्सर विरोधाभासी नज़र आती हैं। इस घटना में नौजवान ने सभी हथियार कानूनी ढंग से खरीदे थे। उसे रोका नहीं जा सकता था यह उसकी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता थी लेकिन उन लोगों के जीवन के नैसर्गिक अधिकार का क्या ? क्या यह अधिकार कम महत्वपूर्ण हैं ? अमेरिकी समाज का यह अकेलापन ऐसी घटनाओं का कारक बनता है।
इस अकेलेपन में जब कोई नौजवान अपने अस्तित्व का आभास कराना चाहता है तब समाज व्यक्तिवादी हो कर उसके अकेलेपन को उस पर थोप देता है। उससे कोई नहीं पूछता की वह क्या चाहता है। उसके माँ बाप भी उसके कमरे के दरवाजे को अपनी सीमा मानते हैं और जब वह अकेलापन इतना असहनीय हो जाए तब वह एक ऐसी रंजिश को हवा देता है की जो समाज अभीतक उसके अस्तित्व से बेखबर था वह उसके होने और ना रहने के पलों को याद करके बरसों कांपता रहता है।
30 नव॰ 2012
धारा 19 बनाम धारा 66
पिछले
दिनों मुंबई के एक स्थानीय नेता के निधन के बाद जैसा माहौल बिके हुये समाचार
चैनलों ने बनाया उससे लगा जैसे इसके अलावा और कोई जरूरी मुद्दे नहीं हैं। बॉलीवुड
के घाघरे में हर समय घुसे रहने वाले इन चैनलों को शाहरुख, सलमान बच्चन से अगर फुर्सत मिलती है तो कैमरा टिकता है ऐसे नेताओं पर
जिनकी दुकान ही चलती है चुन चुन कर भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त गारंटियों को
ध्वस्त करने से। ये बिके चैनल हर सामान्य कलाकार से उसकी खबर के ऐवज में पैसे
मांगते हैं, हर अखबार खबर के बदले विज्ञापन चाहता है।
न्यूज़ चैनलों पर या तो नेताओं और एंकरों की फिक्स लफ़्फ़ाजियाँ होतीं हैं या फिर
करोड़ों रुपये ले कर फिल्मों और सीरियलों के प्रचार। कोई ढंग की स्टोरी, खबर से अब इनका नाता नहीं रहा। जनता का सरोकार जनता की रुचि के नाम पर
स्वाहा कर दिया गया है लेकिन मुंबई के कार्टूनिस्ट और स्वयंभू हिन्दू हृदय सम्राट
के
निधन पर लगभग पूरा पखवाड़ा ही स्वाहा कर दिया गया। उन महान नेता के व्यक्तित्व पर
खूब चाशनी लपेटी गयी और भरा पूरा श्रद्धांजली वाला माहौल बनाया गया।
फेसबुक पर एक लड़की द्वारा ऐसे ही माहौल पर प्रश्न खड़ा करना उस नेता
के पिछलग्गुओं (अनुयाई सिद्धांतों के लिए प्रयोग किया जाता है ) और इनसे
भयभीत राज्य का वह महकमा जो असल में जनता को भयमुक्त करने के लिए था, इन लड़कियों को भयभीत करने में जुट गया। मुंबई पुलिस को आधा घंटा भी नहीं
लगा यह सुनिश्चित करने में की इन लड़कियों ने, जिनमें से एक ने तो केवल उस पोस्ट को लाइक ही किया था, सूचना तकनीक कानून की धारा 66ए का उल्लंघन किया है और माननीय
न्यायाधीश को उससे भी कम समय लगा उन नागरिकों के प्रथम दृष्टया अपराध निर्धारित
करने में। और उन गुंडों को तो खैर और भी कम समय लगा लड़की के रिश्तेदार डॉक्टर का
क्लीनिक ध्वस्त करने में। इस चापलूसी, भय और राजनौतिक मजबूरी के
कुहासे में यह तथ्य कहीं खो गया की फेसबुक पर महाज़ 200 शब्दों की छोटी से टिप्पणी
अगर सेडिशन और व्यवस्था के लिए खतरा हो सकती है तो फिर उन दिवंगत महान नेता के वे
जहर बुझे वाक्य क्यूँ नहीं सेडिशन, अराजकता का खतरा जैसी
चिंताएँ नहीं उठा सके? आखिर धारा 19 का
ध्यान मुंबई पुलिस को क्यूँ नहीं आता और क्यूँ नहीं कोई न्यायालय धारा 19 के
उल्लंघन को निर्धारित नहीं कर पाते। (धारा 19 हमारे
संविधान में है और नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता कुछ प्रतिबंधों के साथ
देती है।)
संविधान द्वारा मिले अधिकार: संविधान
का अनुच्छेद १५ हमें आश्वासन देता है कि हमसे भारत देश में धर्म, जाति,मूलवंश, लिंग या
जन्मस्थान के आधार पर विभेद नहीं किया जाएगा. अनुच्छेद १६ के द्वारा संविधान
सरकारी नौकरियों में न केवल अवसर की समानता देता
है बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि हमसे धर्म, जाति, मूलवंश, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद ना हो. इसी प्रकार अनुच्छेद १९ प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति एवं
अन्तःकरण की स्वतंत्रता प्रदान करता है. हमें यही
अनुच्छेद सम्पूर्ण भारत में घूमने फिरने, कहीं भी बस जाने और कोई भी व्यवसाय कहीं भी करने का अधिकार देता है.
परन्तु
अभिव्यक्तिका यह अधिकार निर्बाध नहीं है. इन स्वतंत्रताओं पर रोक भी लग सकती है
यदि इनका प्रयोग भारत कि एकता, अखंडता, संप्रभुता, लोकव्यवस्था, विदेशी राज्यों के साथ मैत्री पूर्ण संबधों पर
विपरीत असर डालने में किया जायेगा. संवैधानिक पदों पर व्यक्ति
को प्रतिज्ञन करनी होती है उसका पूरा खाका भी संविधान कि एक अलग सूची (तीसरी अनुसूची) में किया गया है. प्रत्येक विधायक, सांसद और मंत्री को संविधान के प्रति निष्ठा कि
और एकता व अखंडता को सुरक्षित रखने कि शपथ लेनी होती हैं.
अब
यदि उपरोक्त तमाम कानूनों के प्रकाश में हम बाल ठाकरे, उद्धव ठाकरे और राजठाकरे के वक्तव्यों को देखें तो प्रथम दृष्टया यह
स्पष्ट हो जाता है कि उनके वक्तव्य संविधान विरोधी हैं.
बैंक
या रेलवे के परीक्षर्थियों पर हमला और उन्हें परीक्षा से वंचित करना अनु० १५ और १६ का उल्लंघन है. साथ ही यह ऐसी अभिव्यक्ति है जो लोकव्यवस्था, एकता, अखंडता,संप्रभुता पर विपरीत असर डालती है अतः इसकी अनुमति किसी
संगठन को नहीं दी जा सकती (अनु० १९).
पाकिस्तान
या ऑस्ट्रेलिया के खिलाडियों सम्बन्धी राज - बाल ठाकरे
के बयान निश्चित तौर पर विदेशी राज्यों से
संबंधों पर विपरीत असर डालते हैं और अनु ० १९ का उल्लंघन करते हैं.
उत्तर
भारतीयों को मुंबई से भगाने, उन पर हमला
करने जैसे कृत्य अनु० १५, १६ कीबखिया उधेड़ते हैं तो एक
राजनीतिक दल के रूप में चुनाव आयोग की आचार संहिता का उल्लंघन भी करते हैं. चुनाव आयोग एक संवैधानिक निकाय है और राजनैतिक दलों के लिए निर्धारित आचार संहिता के पहले पैराग्राफ में ही लिखा है कि "कोई भी पार्टी ऐसीकिसी गतिविधि में शामिल नहीं होगी जो धर्मं, जाति, समुदाय या
भाषा के आधार पर विभेद पैदा करती हो." पर शिवसेना
आदि दल ऐसा ही करते हैं औरखुले आम करते हैं.
ये
दल स्वयं को सांस्कृतिक दल कहते हैं परन्तु इनकी कार्यवाहियां हिंसक, फासीवादी और अलगाववादी हैं. यह दल इसी अराजकता के
सहारे थोड़ी सी राजनैतिक
शक्ति जुटा कर क्षेत्रीय राजनीति में सौदेबाजी करते हैं और तो और केंद्रीय राजनीती को भी प्रभावित करते हैं. यह भी संविधान का उल्लंघन ही है क्यूंकि संविधान
लोकतान्त्रिक व्यवस्था कि गारंटी देता है जबकि यह दल
हफ्ता वसूली दल कि भांति काम करते हैं. शिवसेना केवल
मुंबई कि राजनीती कर के स्वयं को पूरे महाराष्ट्र का ठेकेदार मानती है. २८८ में से केवल १३ सीटें जीतने वाले दल आखिर राजनीती कि दिशा
क्यूँ तय करें? इस प्रकार
शिवसेना हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर हर दृष्टि से प्रश्नचिंह लगाती है. है कोई कानून जो इन महान नेताओं को नाथ सके?
(भारत भाग्य विधाता के भरोसे अपलोड कर रहा हूँ )
3 अक्टू॰ 2012
क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है ?
क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है ?
इन्टरनेट पर गांधी जयंती के दिन ही फेसबुक पर एक पोस्ट टैग की गयी जिसका शीर्षक था - क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है ? इसने मुझे आहात कर दिया। इसमें वही गलत तथ्य थे जिन्हें ले कर गांधी जी को बदनाम किया जाता है मसलन भगत सिंह, 55 करोड़ आदि। प्रस्तुत है पूरी रिसर्च के साथ इन गलत तथ्यों के पीछे के सही तथ्य जो पिछले 60 वर्षों से अनेक गोडसे के पुत्र गांधी की बार बार हत्या करने के लिए प्रयोग करते हैं। आशा है आपमें से बहुतों की गलतफहमियां दूर होंगी और आप अपने प्यारे देश और इसके महान स्वतन्त्रता शहीदों को सम्मान देना सीख पाएंगे बजाय टुच्ची विचारधारा वाली राजनीति का शिकार बनने और खुद की नज़रों में गिरने के। यह लेख मैंने आरोप और उनके उत्तर के रूप में लिखा है। आरोप उन महोदय के हैं जिन्होंने मुझे टैग किया था और उत्तर मेरे हैं।
इन्टरनेट पर गांधी जयंती के दिन ही फेसबुक पर एक पोस्ट टैग की गयी जिसका शीर्षक था - क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है ? इसने मुझे आहात कर दिया। इसमें वही गलत तथ्य थे जिन्हें ले कर गांधी जी को बदनाम किया जाता है मसलन भगत सिंह, 55 करोड़ आदि। प्रस्तुत है पूरी रिसर्च के साथ इन गलत तथ्यों के पीछे के सही तथ्य जो पिछले 60 वर्षों से अनेक गोडसे के पुत्र गांधी की बार बार हत्या करने के लिए प्रयोग करते हैं। आशा है आपमें से बहुतों की गलतफहमियां दूर होंगी और आप अपने प्यारे देश और इसके महान स्वतन्त्रता शहीदों को सम्मान देना सीख पाएंगे बजाय टुच्ची विचारधारा वाली राजनीति का शिकार बनने और खुद की नज़रों में गिरने के। यह लेख मैंने आरोप और उनके उत्तर के रूप में लिखा है। आरोप उन महोदय के हैं जिन्होंने मुझे टैग किया था और उत्तर मेरे हैं।
8 फ़र॰ 2012
उदार हृदय और खुला दिमाग
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