29 मार्च 2015

या तो नूँई चलैगी

या तो नूँई चलैगी


भारत की राजनीति : या तो नूँई चलैगी
मैं जहां से आता हूँ (इटावा) वहाँ बसों के पीछे एक जाति विशेष का नाम देख कर लोग समझ जाते हैं कि हॉर्न देना, कुछ कहना बेकार है। ये तो ऐसे ही चलेगी और पिछले 20 वर्षों से जिस क्षेत्र में रह रहा हूँ वहाँ बसों के पीछे लिखा होता है “या तो नूँई चलैगी” और आप समझ जाते हैं कि यह एक जाति विशेष से संबन्धित बस है और इससे कुछ भी कहना आफत मोल लेना है। इधर आम आदमी की अपनी पार्टी ने भी अपने मुखिया के क्षेत्र की विशेषता ओढ़ पहन कर खुले आम घोषित कर दिया है कि “या तो नूँई चलैगी हालांकि यह अड़ियलपन सिर्फ उनके क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसे अब हम सबने पूरी तरह अपना लिया है । “या तो नूँई चलैगी” अब नए भारत की बुलंद आवाज़ बन चुका है। न जाने कितने आंदोलनों ने हमें और हमारी राजनीति को बदलने की कोशिश की लेकिन हमारी राजनीति की बस को तो उन्हीं 15वी शती की गलियों में हिचकोले खाना है जिनमें आदमी धर्म, कर्मकांड, जातिवाद और रूढ़ियों के मकड़जालों से जूझता है । “आप” के उद्भव से बहुत से लोगों को आशा हुयी थी की उस सड़ी हुयी राजनीति से छुटकारा मिलेगा जिसमें लोकतन्त्र के नाम पर धनिकतंत्र की स्थापना हो चुकी है लेकिन आप में लात जूता यही सिद्ध करता है कि
“या तो नूंई चलैगी”

24 फ़र॰ 2015

मेरे देश के मंत्रालय सोना उगलें .......


विकास विकास .....क्या है विकास , कहाँ रहता है विकास ?

एक देश में जहां 70 प्रतिशत जनता ज़िंदगी से जूझ रही है और 47 % बच्चे कुपोषण का शिकार हैं वहाँ पिछले वर्ष लगभग 9 से 10 महीनों तक कॉर्पोरेट पूंजी की सहायता से दसियों हज़ार करोड़ फूँक कर एक विकासवादी सरकार जनता ने चुनी। कम से कम कहा तो यही जाता है ।  इस जनता के सपनों में कैसा विकास होगा यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है। जनता को एक ऐसा विकास चाहिए जिसे वे खुद भी महसूस कर सकें ना कि ऐसा विकास जिसे देख कर केवल वे आश्चर्यचकित और भयभीत हो सकें । जनता के विकास की परिभाषा बहुत सरल है । जनता को चाहिए अच्छा खाना, कपड़ा, स्वस्थ्य, शिक्षा और रहने की जगह। सरकारें, लोकतन्त्र में इसी वजह से होतीं हैं । कल्याणकारी सरकार का पहला उत्तरदायित्व जनता के प्रति है । जनता की पहली अपेक्षा वही मूलभूत मुद्दे हैं । भारत की सरकारों ने पिछले 65 वर्षों में समय समय पर यह आभास दिया है कि जब जरूरत होती है वह जनता का साथ देने के बजाय जनता के विरुद्ध खड़ी नज़र आती है। हर असंतोष को विरोध समझ कर उसे दबा दिया जाता है । भूमि अधिग्रहण कानून का मामला भी कुछ ऐसा ही है । भारत में 100 वर्ष से अधिक पुराना औपनिवेशिक कानून अस्तित्व में था जिसके आधार पर अनेक सार्वजनिक और निजी परियोजनओं के लिए जमीन लेने के नियम बनाए गए थे । अङ्ग्रेज़ी सरकार के बनाए ये कानून छोटे से छोटे विरोध को खत्म करने के उद्देश्य से ही बनाए गए थे । पिछले 65 वर्षों में इन्हें बदला नहीं गया और अब जब कि समय है सरकारें कॉर्पोरेट हितों की पोषक बनी हुयी हैं। 

ज़मीन हथियाने का धंधा : SEZ 

उदारीकरण के बीस वर्षों में कई बार बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण हुआ है  और इस प्रक्रिया में देश भर में  पिछले 65 वर्षों में कई बार विवाद पैदा हुआ है और मामले अदालतों में लंबित हैं । ये विवाद बहुधा मुआवजे और पुनर्वास को लेकर हैं । इस संदर्भ में महालेखा परीक्षकों की रिपोर्ट हैं जो यह कहतीं हैं की पिछले 20 वर्षों में जिन ज़मीनों को अधिग्रहीत किया गया उनमें से अधिकांश पर वह काम शुरू नहीं हुआ जिनके लिए उन्हें लिया गया था । इसके उलट अधिकांश या तो बंजर पड़ीं हैं या उनके प्रयोग को बदल कर आवासीय प्रयोजन के लिए ग्रुप हाउसिंग सोसायटियाँ बन गईं हैं।
हाल ही में वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने जब सेज़ यानी विशेष आर्थिक क्षेत्रों पर सीएजी की रिपोर्ट संसद में पेश की तो ये राज़ खुला कि सेज़ के कायदों का धड़ल्ले से उल्लंघन जारी है। सीएजी की इस रिपोर्ट के मुताबिक, एसईज़ेड के लिए देश में जो क़रीब 45,000 हेक्टेयर ज़मीन निकाली गई, उसमें सिर्फ 28,000 हेक्टेयर ज़मीन पर काम शुरू हुआ है।
रिपोर्ट के मुताबिक, कई समूहों ने एसईज़ेड के नाम पर सरकार से ज़मीन लेकर उसे ऊंचे दामों पर बेच दिया और 6 राज्यों में करीब 40000 हेक्टेयर ज़मीन सेज़ के नाम पर निकाली गई, लेकिन इसमें से करीब 5,400 हेक्टेयर ज़मीन का व्यावसायिक इस्तेमाल कर लिया गया। इस तरह एसईज़ेड पॉलिसी जमीन हथियाने की पॉलिसी थी। इसका इस्तेमाल ज़मीन लूटने के लिए किया गया। इसके अलावा इन कंपनियों को 83000 करोड़ से अधिक की कर छूट भी मिली । यहाँ एक तथ्य गौर तलब है की जब दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने महज़ 200 करोड़ रुपये की सब्सिडी देते हुये पानी और बिजली जैसी आधारभूत जरूरतों को गरीबों को राहत देने के लिए , दरें घटाईं थी तब राजनीतिक अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों ने इसे " लोकतन्त्र" के लिए खतरनाक बताया था । लेकिन किसी विश्लेषक को यह अपराधपूर्ण कृत्य बुरा नहीं लगता कि किसान से सार्वजनिक कार्य के नाम पर पहले ज़मीन ली जाए । 20 वर्ष पहले के दाम तय करके मुआवजा दिया जाए । फिर वर्षों तक प्रस्तावित कार्य ना हो पाने पर ज़मीन को निजी कंपनियों को बेच दिया जाए।  



ग्रामीण जनसंख्या का मलिन बस्ती में बदलना : 

 इन जगहों पर जो गाँव थे उनके लोग जहां पहले भूमि के मालिक थे अब भूमिहींन मजदूर हैं । जो मुआवजा मिला था वह बेहतर योजना के आभाव में खर्च हो चुका है और गाँव अब दमकती सोसाइटी के बीच एक झुग्गी में तब्दील हो चुका है जो उसी सोसायटी के लिए घरेलू नौकर, प्लमबर, बिजली और ड्राइवर का स्रोत बन गया है । ऐसे सामाजिक उथल पुथल से अपराध भी बढ़ते हैं, इसके सामाजिक अध्ययन मौजूद हैं । किसी सरकार ने यह शोध करने की ईमानदार कोशिश नहीं की है की आखिर भारत की जमीन की जरूरतों को कैसे पूरा किया जाए जिससे ऐसे दुष्प्रभाव ना हों। भारत की रक्षा, शिक्षा और ऊर्जा नीति की तरह कोई भूमि नीति नहीं है । इस मुद्दे पर पिछले वर्षों में जब विवाद अधिक बढ़ा था और दिल्ली व आस पास के क्षेत्रों में  हिंसक झड़पें भी हुईं थी उस समय राहुल गांधी ने अचानक बड़ा नाटकीय आंदोलन  रचा कर आनन फानन में एक बिल पास कर दिया था । अब केंद्र सरकार में सत्ता संभालने वाली बीजेपी ने एक अध्यादेश के द्वारा इस बिल में बड़े बदलाव कर दिये हैं और ये बदलाव महज़ मुआवजा वाले बिन्दु को यथावत रखते हुये कई कदम आगे बढ़ते हुये इसे पूरी तरह से थोड़े से उधयोगपतियों के पूर्णतः हित में बना दिया है ।

यमुना एक्स्प्रेस वे या पुणे एक्स्प्रेस वे जैसी परियोजनाएँ एक बढ़िया उदाहरण हैं । सरकार ने हाइवे बनाने के लिए ज़मीन ली । ठीक है । वह आवश्यक थी । जनहित की परियोजना थी । लेकिन साथ ही सरकार ने हाइवे में जितनी ज़मीन की जरूरत थी उससे कहीं अधिक मात्र में ज़मीन ली और बाद में उसे बिल्डरों को ऊंचे दामों पर बेच दिया । बिल्डरों ने उस ज़मीन पर मकान, दुकान,मॉल रोज़ोर्ट बना लिए और किसान अपनी आँखों के सामने अपनी ही ज़मीन को खुद को मिले मुआवज़े से 100 गुना अधिक मूल्य पर बिकते देख रहे हैं ।जेटली जी ने अपने ब्लॉग पर तर्क दिया है कि सड़क बने से कीमतें बढ़ेंगी और ग्रामीणों को फाइदा होगा । लेकिन कीमतें जहां कि बढ़नी थीं वह ज़मीन तो पहले ही बिल्डरों के पास पहुँच चुकी है और वे उसका फाइदा ले रहे हैं । कितने गांवों को फायदा हुआ है ? सरकार ने ऐसा कोई अध्ययन नहीं कराया।  यह तमाशा हरियाणा, यूपी, उड़ीसा, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश में चल रहा है ।

मुआवज़े का खेल : 

सरकारी मुआवजा भी खूब होता है । अव्वल तो इसे मिलने में ही इतने पैंच होते हैं कि मिलने में सालों लगते हैं। इसके अलावा इसका निर्धारण भी विवादित है  और नए अध्यादेश में तो मुआवजा कोई किसान वास्तव में ले या ना ले अगर सरकार ने बैंक में खाता खोल कर एक मुआवजा निधि बना कर उसमें मुआवजा राशि जमा करा दी तो इसे मुआवजा दिया मान लिया जाएगा । और अगर मुआवजा दे दिया गया है तो किसान अदालत नहीं जा सकते । मतलब मार कर रोने भी ना दिया जाए । 

नया , पुराना और वास्तविकता: छह बिन्दु 


पहला बिन्दु : 2013 का क़ानून : निजी प्रोजेक्ट के लिए 80%, PPP के लिए 70% लोगों की सहमति ज़रूरी  
2014 का अध्यादेश : रक्षा उत्पादन, ग्रामीण इन्फ़्रा, औद्योगिक कॉरीडोर के लिए सहमति ज़रूरी नहीं
वास्तविकता : उड़ीसा, यू पी में ऐसे अधिकांश मामले हैं जिनमें नियमों को तक पर रख कर अधिग्रहण किए गए । अधिकांश मामलों में एमर्जेंसी क्लौज लागू ही नहीं होता यह कैग की रिपोर्ट कहती है । ऐसे में 80 % सहमति बहुत से विवादों को खत्म कर सकती थी ।
दूसरा बिन्दु : 
दूसरा बिन्दु : 2013 का क़ानून : हर अधिग्रहण से पहले सामाजिक प्रभाव का आकलन ज़रूरी
2014 अध्यादेश : हर अधिग्रहण से पहले सामाजिक अध्ययन आवश्यक नहीं । 
वास्तविकता : सामाजिक प्रभाव का अध्ययन अति आवश्यक है । इससे प्रोजेक्ट में देरी नहीं बल्कि स्थिरता में ही बढ़ोत्तरी होती । अध्ययन के बाद यदि सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रख कर अधिहरहन किया जाएगा और उचित ढंग से मुआवजा और पुनर्वास किया जाएगा तो मुकद्दमों की संख्या में कमी होगी।

तीसरा बिन्दु : 2013 का क़ानून : बहु-फसली और उपजाऊ ज़मीन का विशेष परिस्थिति में ही अधिग्रहण
2014 का अध्यादेश : राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा, ग्रामीण इंफ्रा के लिए उपजाऊ ज़मीन का अधिग्रहण हो सकता है । 
बहु -फ़सली ज़मीन का अधिग्रहण नहीं होना चाहिए । यह ज़मीन पीढ़ियों तक को रोजगार और सुरक्षा देती है । इसे छीनना एक प्रकार से व्यक्ति के जीवन के अधिकार को छीनना है।

चौथा बन्दु : 2013 का क़ानून : ग्राणीण भूमि का मुआवज़ा बाज़ार से 4 गुना, शहरी ज़मीन का 2 गुना
2014 का अध्यादेश : कोई बदलाव नहीं । 
वास्तविकता : मुआवजा 4 गुना 10 गुना से अधिक महत्वपूर्ण  है मुआवजा निर्धारित कैसे किया जाए । आज की ज़मीन का भाव 20 वर्ष पूर्व के भाव पर कैसे लगाया जा सकता है ? रक्षा को छोड़ कर अन्य किसी क्षेत्र में सीधे किसानों से वर्तमान मूल्यों पर सौदा हो । वैसे किसानों कि मांग यह भी है कि ऐसी किसी भी प्रोजेक्ट के लिए किसानों से लीज़ पर ज़मीन ली जाए ।

पाँचवाँ बिन्दु :2013 का क़ानून : 5 साल में प्रोजेक्ट शुरू नहीं हुए तो ज़मीन किसानों को वापस
2014 का अध्यादेश : कोई समय सीमा नहीं । 
वास्तविकता : हाल ही मेँ हरियाणा के एक गाँव में नए आवासीय सेक्टर बसने के नाम पर किसानों से जमीने ली गईं । 6 वर्ष तक प्रस्तावित काम ना हो पाने पर अक्षमता जता कर इन ज़मीनों को निजी बिल्डरों को दे दिया गया । अब इन ज़मीनों कि बेहद ऊंचे दामों पर बिक्री हो रही है बल्कि कई ज़मीन पाने वाली कंपनियों ने इन ज़मीनों को ऊंचे दामों पर दूसरी कंपनियों को लीज़ पर दे दिया है । जब कंपनियाँ ज़मीन लीज़ पर दे सकतीं हैं तो किसानों से लीज़ पर लेने में क्या कठिनाई है ?

छठवाँ बिन्दु : 2013 का क़ानून : किसी नियम की अनदेखी करने वाले अधिकारियों पर क़ानूनी कार्रवाई होगी 
2014 का अध्यादेश : बिना अनुमति के कार्यवाही संभव नहीं । 
वास्तविकता : यह बिरले ही होता है । 

8 फ़र॰ 2015

बीजेपी की (प्रसव) वेदना : दिल्ली

भारत की राजनीति जिस तरह का स्वरूप ले चुकी है वह भविष्य की चुनौतियों का सामना करने में तो असमर्थ है ही बल्कि देश कू विशाल जनसंख्या को बेहतर अवसर, सुखद जीवन और सुरक्षा प्रदान करने में भी असफल रही है। इन चुनौतियों के लिए 20वीं शती के समाजवाद, पूंजीवाद या साम्यवाद आज उपायुक्त नहीं हैं । आज ज़माना एक की रोटी छीन कर दूसरे को खिलाने का नहीं है बल्कि ऐसी व्यवस्था करने का है जिसमें ना केवल रोटियाँ सभी के लिए पर्याप्त हों बल्कि कोई भूखा भी ना रहे । यह रोटियाँ बनाने का समय है ....सैंकने का नहीं । आप ईवेंट मैनेजमेंट से जनता को भरमा तो सकते हैं लेकिन भ्रम देर तक नहीं चलता । लोकतन्त्र की लोकप्रिय परिभाषा देने वाले अब्राहम लिंकन के एक और कथन को याद रखा जाना चाहिए ---- You can fool all the people some of the time, and some of the people all the time, but you cannot fool all the people all the time. (सभी लोगों को कुछ समय के लिए तो उल्लू बनाया जा सकता है और कुछ लोगों को हर समय उल्लू बनाया जा सकता है लेकिन सभी लोगों को सदा के लिए उल्लू नहीं बनाया जा सकता )  । 

बीजेपी की लोकसभा यात्रा जिन विकासवादी वादों और नारों के साथ शुरू हुयी थी उसने जनता में विकास की आशाएँ जागा दीं । जिस गुजरात मॉडल की घनी चर्चा थी वह अब गायब है । नौ महीनों जनता बिजली, पानी, स्वस्थ्य और शिक्षा की बात का इंतज़ार कर रही है लेकिन सुनाई पड़ रहा है "घर वापसी", "लव जिहाद", 4,6,8,10 बच्चे पैदा करने की सीख और रामजादे जैसी ओछी बातें। इन नौ महीनों का जमा हासिल कुछ विदेश यात्राओं और खुद को विश्व नेता स्थापित करने की असफल कोशिश के अलावा कुछ नहीं है । सरकार चुप है, मंत्री चुपचाप हैं, केवल प्रधानमंत्री जी मुखर हैं। बस यही वजह है की दिल्ली में नौ महीने के इंतज़ार के बाद पूरे देश , महाराष्ट्र, झारखंड, जम्मू में लगातार जीत के बाद अब दिल्ली में "अपवाद" स्वरूप "आप" की सरकार बनी है ।

बेशक बराक ने सही कहा है "भारत में आपस में लड़ कर विकास नहीं पैदा नहीं हो सकता"  यह तो आपस के प्यार से ही पैदा होगा।

21 जन॰ 2015

 दिल्ली कहते हैं दिल वालों की है । लेकिन हमारे नेता दिल वाले नहीं हैं । पिछले 2 सालों से दिल्ली को लेकर जैसी लै लै -दै दै मची हुयी है उससे दिल्ली फिर ढिल्ली हो गयी है । दिल्ली पिछले 2 साल से हरेक राजनीतिक दल के लिए दूर बनी हुयी है और इनमें इसे पाने के लिए खिंचतान जारी है। केजरीवाल कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए निज़ामुद्दीन औलिया बने हुये हैं और कहते रहे हैं "हनुज दिल्ली दूर अस्त " दिल्ली अभी दूर है । देखना है क्रेन बेदी , मफ़लर की गुंजलक से दिल्ली को आजाद करा पातीं हैं या मफ़लर की पकड़ में दिल्ली सहज होगी। जो भी हो राजनीति तो बदलेगी ।  

5 जन॰ 2015

"पद्मश्री" नहीं "पंकश्री"



इससे बड़ा पुरस्कार क्या होगा !
प्रिय सायना तुम्हें पिछले वर्ष की शानदार सफलताओं के लिए बधाई और शुक्रिया।
शुक्रिया इसलिए की तुम भारत में खेल की मोनोपोली को तोड़ने में सफल हुयी हो। तुम्हारी सफलता का शानदार जश्न इसलिए भी जरूरी है कि तुमने भारतीय समाज में यह उपलब्धियां हासिल कीं हैं जिसमें लड़कियों को अपने समुचित स्थान के लिए लड़ना पड़ता है। तुम हम सबके लिए प्रेरणा हो। लेकिन आज जब तुम्हें संकोच, नाराजगी और अपमान की किंचित मिश्रित भावनाओं के साथ पद्म पुरस्कारों के लिए गुहार लगते सुना तो कुछ अच्छा नहीं लगा। इसलिए नहीं कि तुम इनके योग्य नहीं हो । बेशक तुम्हारी उपलब्धियों की तुलना पद्म से बेहतर और किस्से कर सकते हैं । आखिर इस कीचड़ जैसे समाज में तुम कमल ही तो हो लेकिन मैं तुम्हें सूर्य के समान भारतीय टेनिस की पताका विश्व में फहराते देखना चाहता हूँ और इसके लिए यह जरूरी है कि तुम भारतीय पुरस्कारों की राजनीति के कीचड़ से ऊपर उठ कर प्रशस्त आसमान में एक हंसिनी की तरह अपने डैनों की ताकत आज़माओ । पद्म की तरह बस कीचड़ में खिलो भर मत, जकड़ी ना रहो उन गैर जिम्मेदार परजीवियों कि गंदगी में जिन्होंने इन पुरस्कारों पद्म नहीं पंक बना दिया है ।ये पुरस्कार तुम्हारी उपलब्धियों से कहीं छोटे हैं इसलिए मत गिड़गिड़ाओ इन क्षुद्र पुरस्कारों के लिए । तुम पुरस्कारों से नहीं ये पुरस्कार तुमसे हैं । इस खेल राजनीति के पंक ने ना जाने कितने पद्म लील लिए हैं ....तुम दूर रहो ...बस खेलो .....खिलौना ना बनो।

तुम्हारा प्रशंसक


अनुपम दीक्षित 

22 दिस॰ 2014

मुखौटा

पीके - बीजेपी 
मुखौटा बहुपयोगी होता है। आपकी इज्जत बढ़ाता है। अपने दैनिक जीवन में हम सब मुखौटे ओढ़ते हैं । मुखौटे आज की दुनियाँ में सफलता की नींव हैं।लेकिन मुखौटों के साथ समस्या यही है कि उनका होना आपमें ऊहापोह पैदा करता है। साध्य को पाने के बाद आप मुखौटा हटाना चाहते हैं लेकिन यह आसान नहीं।

बीजेपी ने भी ये मुखौटे ओढ़े हैं और हर बार मुखौटों को उतारना उसके लिए द्विविधा का सबब रहा है। यह दुविधा गुजरात दंगों के दौरान भी देखी गयी थी जब पार्टी अंदर ही अंदर मुदित थी पर मुखौटा "राजधर्म" कह कर लानतें भेज रहा था और आज भी जब मुखौटा "विकास" कर रहा है तो असल "घर वापसी, पाठ्यक्रम सुधार, संस्कृत पाठन, लव जिहाद करा रहा है । हुआ तब भी कुछ नहीं था होना अब भी कुछ नहीं है। 

15 दिस॰ 2014

वे काम पर हैं

प्रधानमंत्री जी हवाई माध्यमों के मुरीद हैं । वे नेता हैं जो खुद में एक हवाई कैरियर है .... कुछ भी नहीं होता उसके पास फिर भी सब कुछ होता है । वह सेवक हो कर भी मालिक होता है । प्रधानमंत्री भी एक हवाई पद है । संविधान उसके बारे में सबसे कम पन्ने खर्च करता है लेकिन सबसे ज्यादा सत्ता उसी के पास है। वे भाषणबाजी की हवाई कला में भी माहिर हैं । वे हवाई दावे कर सकते हैं , हवाई किले बांध सकते हैं । वे फेसबुक, ट्विटर जैसी हवाई माध्यमों में खेलते हैं । उन्हें पता है 140 अक्षरों में "संक्षिप्तीकरण" से अच्छा कोई तरीका नहीं हो सकता । इसीलिए 3डी, 5टी, एफ़डीआई(फ़र्स्ट डवलप इंडिया) जैसे जुमले वे गढ़ते हैं । वे मन की बात करते हैं ...वही हवाई मन जिसे काबू में रखने की सलाह हमारे मनीषियों ने दी है। वे विदेशों की धरती से देश को संबोधित करते हैं ... वे वहाँ रॉक शो करके देश में विपक्ष की हवा निकाल देते हैं। तो बंधुओ वे काम पर हैं । विकास इतना होगा की अब ज़मीन नहीं आसमान पर दिखेगा ......... 

4 सित॰ 2014

जब गांधी जी ने बचाया बोस के सैनिकों को फांसी के तख्ते से

Photograph: Credit Wikipedia 
गांधी जी ने जब से भारत के स्वतन्त्रता आंदोलन का नेतृत्व संभाला, उनसे लोगों की अपेक्षाएँ भी बढ़ गईं थीं। यह स्वाभाविक ही था क्यूंकी ब्रिटिश राज के अंतहीन निराशा में डूबे दिनों में एक गांधी जी ही थे जिनमें लोगों को आशा की किरण दिखाई देती थी। उनके अबूझ तरीकों से विरोध होते हुये भी राजनीतिक वर्ग उनके पीछे चलता रहा। यही गांधी जी के तौर तरीकों की खासियत थी की वे विरोधी और समर्थकों दोनों से अपनी बात मनवा ही लेते थे यद्यपि कभी कभी पूरी तरह से नहीं। गांधी जी की इसी ताकत के भरोसे लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया था कि गांधी जी क्रांतिकारियों की फांसी को बचा लेंगे। उनके लिए यह दुश्वारी नहीं होगी। आखिर जब साम्राज्य का वाइसराय बराबरी पर बात करने को उतर आया तो क्या वह उनकी बात नहीं मानेगा? लोगों को निराशा हुयी जब इरविन और क्रांतिकारियों दोनों ने फांसी माफी से मना कर दिया। भगत सिंह ने असेंबली में बम पूरी समझ के साथ फैका था और पकड़े गए थे। रही बची कसर अदालत में बम दर्शन पढ़ कर पूरी कर दी थी। यह बलिदान था। गांधी जी के भरोसे किया गया अपराध नहीं। लोग भावुक होते हैं इसलिए चाहते थे कि भारत माँ के वीर सपूत ज़िंदा रहें। वे गांधी जी से निराश हो गए। गांधी जी जहां आशा की किरण थे वहीं क्रांतिकारी खीज और निराशा के प्रति गुस्से की अभिव्यक्ति लेकिन दोनों ने ही जनता को अन्याय के सामने ना झुकना सिखाया। दोनों ने दिलों से अंग्रेजों का डर दूर कर दिया। आज़ादी के बाद जनता के एक बड़े वर्ग में बहुत सी बातें गलतफहमियों के रूप में प्रचलित रहीं हैं जिनमें पाकिस्तान को 50 लाख रुपये देना और भगत सिंह को ना बचाना मुख्य हैं। इसी वर्ष एक सुभाष चन्द्र बोस की गुप्तचर सेवा के अधिकारी कि डायरी पर आधारित पुस्तक में 7 ऐसे पत्र हैं जिन्हें गांधी जी ने ब्रिटिश हुकूमत को लिखा था। इनमें भारतीय राष्ट्रीय सेना (आईएनए ) के उन 4 स्वयंसेवकों की रिहाई और फांसी माफी की प्रार्थना की गयी है। अंततः उन्हें रिहा कर दिया गया था। इनमें श्री हरिदास मित्रा भी थे जो बंगाल के प्रमुख नेता अमित मित्रा के पिता थे। शायद गांधी जी से खफा लोगों के जले दिल पर कुछ पानी पड़ा हो। साथ ही बोस के साथ उनके सम्बन्धों को लेकर विचलित बंगाली मानस भी राहत महसूस करे। इतिहास तो तथ्य बताता है। आप उसे कैसे समझते हैं यह आपकी समझ पर निर्भर है।

(खबर साभार TOI कोलकाता 2 फरवरी 2014 ऑनलाइन) 

16 अग॰ 2014

रिमोट कंट्रोल: एक शोध

रिमोट कंट्रोल: एक शोध
अगर कोई आपसे पूछे कि रिमोट कंट्रोल का जनक कौन है तो स्मार्ट फोन के जरिये गूगल करके स्मार्ट बनने की कोशिश मत कीजिये, मैंने इस पर काफी शोध किया है और बता दूँ कि इसका आविष्कार निकोला टेस्ला ने नहीं बल्कि हिंदुस्तान ने ही किया था।
रिमोट परंपरा: हमारे यहाँ रिमोट कंट्रोल की सुदीर्घ परंपरा रही है। आपको तो केवल एक ही रिमोट कंट्रोल का नाम पता है ...दस जनपथ लेकिन मैंने इतिहास का विषद अध्ययन करके ऐसे बहुत से रिमोट और कंट्रोल दोनों खोज निकाले हैं।
अब अगर शुरू से ही शुरू करें तो यह सृष्टि ही रिमोट और कंट्रोल का अनूठा उदाहरण है।ॠग्वेद की ॠचाएँ भी यही बताती हैं कि इस संसार का नियंता कोई और है। रिमोट की खोज वहीं से शुरू हुयी थी। ऋग्वेद के हिरण्यगर्भ सूक्त में हमें उसी रहस्य की खोज के दर्शन होते हैं। 

सृष्टि का कौन है कर्ता ! कर्ता है वा अकर्ता !
ऊंचे आकाश में रहता । सदा अध्यक्ष बना रहता। 

वही सचमुच में जानता, या नहीं भी जानता !

हैं किसी को नहीं पता ! नहीं है पता !!!!!

यानि रिमोट की चिंता आदि कालीन है। हमें रिमोट का अभी तक कोई दृश्य प्रमाण तो नहीं मिल पाया है लेकिन महसूस यही होता है कि हम सब नाचने के लिए ही पैदा होते हैं। परम ज्ञानी श्री राजेश खन्ना जी ने भी कुछ ऐसा ही संकेत अपनी फिल्म “आनंद” में दिया था जब वे कह रहे थे “बाबू मोशाय....हम सब उसके हाथ कि कठपुतलियाँ हैं...” कुछ ऐसे ही तुलसी ने भी कहा है
“उमा दारु-जोशित की नाई, सबहीं नचवात राम गोसाईं”
उपनिषदों में भी इस रिमोट कि दूर ध्वनि सुनाई देती है। बुद्ध को रिमोट के बारे में ज्ञान प्राप्त हो गया था इसलिए उन्होंने माध्यम मार्ग निकाला और रिमोट के चक्कर से निर्वाण या मुक्ति पाने के रास्ते बताने लगे। यह रास्ता बहुत उम्दा था बहुत कुछ गांधी जी के असहयोग जैसा। सब कुछ छोड़ कर सन्यासी बन जाओ। जब किसी काम के ही नहीं रहोगे तो रिमोट क्या खाक चलाएगा तुम्हें। कठपुतली जनता ने उनके रास्ते को हाथों हाथ लिया क्यूंकी वह रिमोट से संचालित होती रह कर भ्रमित ही गयी थी। फिर तो बुद्ध भी अपने बोधिसत्वों सहित इस रिमोट से मुक्ति दिलाने में सक्रिय हो गए, ऐसा ग्रंथ हमें बताते हैं। हालांकि जब भी बुद्ध से रिमोट और इसकी प्रकृति के बारे में पूछा गया तो वे चुप्पी साध गए। उन्होंने इस चर्चा को अव्याकृत कह कर टाल दिया था।
बहुत बाद में जा कर शंकरचार्य ने “ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या” के सूत्र द्वारा इस उपनिषदों की ध्वनि को स्पष्ट किया और बताया कि यह सूक्त रिमोट की सर्वोच्चता और कंट्रोल की ओर ही संकेत करता है। जिस प्रकार ब्रह्म कण कण में है, रिमोट भी कण कण में है। यह रिमोट असल में किस के पास है यह पता लगाना ज़रा टेढ़ीखीर है। आखिर कौन किसे कंट्रोल कर रहा है यह बड़ी भ्रम पूर्ण स्थिति है। एक ओर तो भजन गायक का कहना है –
“भगत के बस में हैं भगवान”
तो उधर तुलसी कहते हैं कि -
“होयहि सोई जो राम रची राखा”
कुछ ऐसी ही स्थिति यहाँ भी है। अब लोकतन्त्र में मतदाता सोचता है कि नेता का कंट्रोल उसके हाथ में है तो नेता सोचता है कि जनता का कंट्रोल उसके पास है लेकिन उपनिषद के नेति नेति सूत्र की मानें तो “न यह है ना ही वह” बल्कि असली कंट्रोल तो कहीं और है। आज ब्रह्म पूंजी है और पूंजीपति ही असली कंट्रोलर है।
अगर आपको साहित्यिक प्रमाण कुछ हल्के लगते हैं तो ऐतिहासिक प्रमाण भी मौजूद हैं। ऐसा ही रिमोट और कंट्रोल का जबर्दस्त तंत्र कौटिल्य और चन्द्रगुप्त मौर्य का था। पर्दे के पीछे कौटिल्य था और सामने चन्द्रगुप्त। कौटिल्य आज के रिमोट कंट्रोलरों से अधिक चालाक थे इसलिए रिमोट कंट्रोल की उस व्यवस्था पर, इससे पहले कि कोई और नटवर प्रसिद्दि कमाए, खुद ही एक पुस्तक “अर्थशास्त्र” लिख डाली जो अब तक उनके लिए प्रसिद्धि का जरिया है और अनेक प्रकाशकों के लिए कमाई का। 
सोनियाँ जी तो अब लिखने का प्लान बना रहीं हैं। काश मैं उनका “रिमोट सलहकार” होता तो बता देता कि उन्हें चुनाव के ठीक बाद एक किताब लिख देनी चाहिए “एक्सपेरिमेंट विद रिमोट कंट्रोल”। खैर अब बिन मांगी सलाह मोदी जी के लिए है, इससे पहले कि नृपेन्द्र मिश्रा जी 2019 या 2024 में ऐसी ही कोई खुलासू पुस्तक लिखें एक किताब मोदी जी को पहले से लिख रखनी चाहिए “वन रिमोट इस नॉट इनफ़” आखिर उन्हे एक से अधिक रिमोटों का अनुभव है जैसे संघ, अडानी और अंबानी आदि।

मध्यकाल में रिमोट कंट्रोल का प्रचलन बहुत बढ़ गया था। इस काल में स्त्रियों ने अपनी रिमोट ताकत को पहचाना और कई पेटीकोट सरकारों की स्थापना की जिनमें अकबर की माहम अनघा, शाहजहां की नूरजहां आदि प्रमुख हैं।
अंग्रेजों के काल में भी रिमोट कंट्रोल का प्रयोग खूब हुआ। बंगाल में अंग्रेजों ने रिमोट कंट्रोल को वह अर्थ दिया जिसकी जरूरत आज हर रिमोट कंट्रोल महसूस करता है। यह था द्वैध शासन। मतलब शासन के लड्डू का लुत्फ खुद उठाओ और डायबिटीज़ के दुःख दूसरे को भोगने दो।
एक तरफ तो हमारे देसी रजवाड़े भोगविलास में डूब कर इतने नाकारा हो चुके थे कि कोई वारिस पैदा करने में अक्षम हो जाते थे। अब राजे-रजवाड़े  के जमाने में भारत की इस राष्ट्रिय बीमारी का शर्तिया इलाज का दावा करते किसी हाकिम उसमानी का अस्तित्व तो शायद नहीं था , अंग्रेजों ने इसका इलाज कर दिया। इसी बीमारी के सहारे अंग्रेजों ने रिमोट कंट्रोल सरकारों कि एक श्रंखला ही खड़ी कर दी और भारत पर कब्जा कर लिया। स्कूलों में इसे सहायक संधि के नाम से पढ़ाया जाता है।

आज़ादी के बाद यू पी ए युग में इस प्रथा का पूर्ण विकास हुआ जब इसे द्वैध शासन के स्थान पर “त्याग का शासन” कहा जाने लगा और रिमोट कंट्रोलर एक मसीहा के रूप में देखा जाने लगा। इस प्रथा का लोगों पर इतना असर हुआ है कि लोग किताबें लिख कर इसका विश्लेषण कर रहे हैं। 

इस प्रकार अपने वर्षों के अध्ययन से मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि भविष्य रिमोट कंट्रोल का ही है।