05/03/2012

होली पर पाया नया रंग

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इस होली पर नया रंग खोजा मैंने - चुनाव का रंग

18 वर्षों में पहली बार वोट डाला। बचपन में गाँव में बड़ा ज़बरदस्त उत्साह देखा था। परचियाँ, बिल्ले, भोंपू, टेम्पो, पोस्टर, बल्लियाँ गाने बाजे, किसी उत्सव का सा माहौल। सबसे बड़ा त्योहार। बाद में वारदातें, बूथ कैप्चरिंग, हत्या, धमकी और डर। बड़े हुये तो चुनावों से दूर रहने की आम सहमति के साथ। 18 वर्ष के होने से पहले ही वोटिंग की आयु 18 कर दी गयी थी लेकिन फिर भी नहीं निकले। 80 के दशक में टीवी पर पूरे दिन फिल्में आतीं थी। स्कूल में भी नागरिकशास्त्र बस यूं ही था। और फिर स्नातक में भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान तो जैसे समाज से कोसों दूर ही थे। बाद में जब विश्वविध्यालय में राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र और अर्थशस्त्र से परिचय हुया तो लगा की यह विषय आस पास के बारे में अधिक बताते हैं। संविधान पढ़ा, आर्थिक नीतियाँ पढ़ीं और समाज के गठन के बारे में पढ़ा तो लगा की यह जीवंत विज्ञान हैं। मन में नागरिक प्रक्रिया में शामिल होने का जज़्बा तो था पर आदत आलस की पड़ चुकी थी। हम नेहरू युग के बाद जन्मे थे सो करिश्मा के प्रभाव में नहीं थे। इन्दिरा युग का अवसान भी हो चुका था और राजनीति अपनी सबसे दायनीय अवस्था में पहुँच चुकी थी। यह युग मण्डल, कमंडल का था और प्रगतिशील युवा होने के नाते हम इन मुद्दों हमारी राय का प्रतिनिधित्व कोई राजनैतिक पार्टी नहीं करती थी। तो हमें अपना वोट डालना व्यर्थ लगा। आखिर किसे चुनें। ना हम जातिवाद के समर्थक थे, ना आरक्षण के, ना ही सांप्रदायिकता के। 90 के दशक के आरंभ से राजनीति में जो नंगा नाच चला तो हमने इस लोकतन्त्र से ही किनारा करना ठीक समझा। देशकी आर्थिक हालात बिगड़ रही थी और नेता अपनी नीच राजनीति में मशगूल थे। देश का सोना एक ऐसे प्रधानमंत्री और उसकी सरकार ने गिरवी रखा जिसे जनता का आदेश प्राप्त नहीं था। ठीक इसी समय देश की नीतियों में आमूल चूल परिवर्तन हुय और नेता, बाबू, लाला गठजोड़ ने नयी ऊँचाइयाँ और नए रास्ते पाये। देश में नए करोड़पति हुये और "ऋणम कृत्वा घृतम पिबेत" का अद्भुत दर्शन आरंभ हुया। जाति, धर्म और अपराध ही राजनीति के स्तम्भ बन गए। शेषन ने जब जनता को चुनाव आयोग से परिचित करवाया और चुनाव धीरे धीरे कम हिंसात्मक होने लगे तो हमने यह भी देखा की किस तरह चुनाव आयुक्त के पर कतरे गए और कैसे यह सुनिश्चित किया गया की आयुक्त मनपसंद ही हो। इसी समय युवाओं की आकांक्षाओं ने भी नए आयाम खोजे और चल पड़े उदारीकरण के रास्ते दूर देशों को "यहाँ का सिस्टम ही है खराब" कह कर। जी नहीं गए वे भी वोट और राजनीति से तो दूर ही हो गए। लोकतन्त्र में भला  भरोसा किसे रहा? कहाँ है लोकतन्त्र, कहाँ हैं मौलिक अधिकार? बस एक ही बात अच्छी है लोकतन्त्र के बारे में की कम से कम आप इसकी बुराई तो कर ही सकते हैं लेकिन आगरा आप व्यक्तिगत से समष्टिगत होते हैं इस बुराई में तो आप अपने अतीत को जरूर टटोल लें और कीचड़ से होली खेलने को तैयार रहें। वरना आप को रामदेवा और  अन्ना जैसा हश्र भी झेलना होगा।  देश में पैसा बढ़ा और साथ ही घोटालों का ग्राफ भी। राष्ट्रमण्डल खेलों में जैसा खुला खेल हुआ और फिर जिस तरह 2G घोटाले ने बाबू - नेता - पत्रकार- लाला के गठजोड़ का पर्दाफाश किया तो विश्वास हो गया की यही हैं लोकतन्त्र के चार स्तंभ। किसी दिन न्यायपालिका की भी कलई खुलेगी संकेत तो मिल ही रहे हैं। इसी समय आया अन्ना का आंदोलन और लगा की देश जाग गया है। पर यह भी इस देश की भीषण जनता को बस झकझोर ही पाया। राजनीति का बाहरी भरकम रथ इसे भी रोंद गया। चुनाव शुरू होते ही भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं रहा। मुद्दा है तो 40 साल के युवा राहुल की बातें, उनकी रातें। वे युवा हैं लेकिन राजनीति वे बुढ़ाती हुयी करते हैं। वही फार्मूला - जाति, धर्म और आरक्षण। तो सोचा किसे वोट दिया जाए। ना कोई पार्टी न ही प्रत्याशी इस लायक लगा जिसे वोट दिया जाए। फिर तय किया की नियम 49 - ओ का प्रयोग करूंगा। बूथ पर गाया, वॉटर पर्ची दी, स्याही लगवाई और पीठासीन अधिकारी से आग्रह किया वह तय प्रकीरिया के अंतर्गत दर्ज करे की में मत नहीं दे रहा हूँ। अफसोस की 49-ओ का फार्म वहाँ उपलब्ध नहीं था। अतः मैंने निश्चय किया की जब देश में अंधा युग हो और कानून भी अंधा हो तो वोट भी अंधा ही होगा अतः आँखें बंद किन और बिटिया से कहा की वह अक्कड़ - बक्कड़ बम्बे बो कहे और जैसे ही उसने कहा चोर निकल के भागा मेंने बटन दबा दिया। पता नहीं कौन सा बटन था और किसको मिला पर जब चौपट राजा हो तो ऐसे ही चौपट तरीके से वोट देना सबसे अच्छा है। खैर इस बार यह नया रंग अच्छा लग रहा है। होली मुबारक !

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