विचार पक्षियों जैसे होते हैं। मस्तिष्क के विशाल और अनंत फलक पर वे बादलों की तरह अचानक आते हैं, आकृतियाँ बदलते हैं, पक्षियों की तरह मँडराते हैं और फिर दूर कहीं गुम हो जाते हैं। बाज़ीचा-ए-अत्फाल है दुनियाँ मेरे आगे, होता है शब ओ रोज़ तमाशा मेरे आगे। इन्हीं तमाशों पर जो विचार आकार लेते हैं उन्हें पकड़ने का प्रयास है यह चिट्ठा। आपको अच्छा लगे तो एक लघु चिप्पी चस्पा करना ना भूलें।
27 अप्रैल 2019
7 दिस॰ 2018
अंबेडकर भारत नहीं पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य थे
जब कांग्रेस से संविधान सभा के लिए अंबेडकर न चुने जा सके तब अविभाजित बंगाल में दलित-मुस्लिम एकता के आर्किटेक्ट जोगेंद्र नाथ मंडल ने आंबेडकर को मुस्लिम लीग की मदद से बंगाल से संविधान सभा में पहुंचाया.
यह जानना आपको दिलचस्प लगेगा कि जिस आंबेडकर को आज हम जानते हैं वह मुस्लिम लीग की देन हैं ।
लीग ने ही अंबेडकर के समाप्त होते राजनीतिक कैरियर को पुनर्स्थापित किया ।
मंडल कांग्रेस को सांम्प्रदायिक मानते थे और जिन्ना के धर्मनिरपेक्ष विचारों को पसंद करते थे इसलिए मंडल ने मुस्लिम लीग का समर्थन किया।
वो मानते थे कि सांप्रदायिक कांग्रेस पार्टी शासित भारत की तुलना में जिन्ना के धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तान में अनुसूचित जाति की स्थिति बेहतर होगी. वो जिन्ना के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के बड़े प्रशंसक थे और अनुसूचित जातियों के सरपरस्त के रूप में उन्हें गांधी और नेहरू की तुलना में कहीं ऊपर आंकते थे।
इसलिए मंडल भारत से पलायन कर न केवल पाकिस्तान के पहले क़ानून मंत्री बने बल्कि वो इसके जनकों में से एक थे.वो पाकिस्तान की सरकार में सबसे ऊंचे ओहदे वाले हिंदू थे और मुस्लिम बहुल वाले इस देश में धर्मनिरपेक्षता के अकेले पैरोकार.
हालांकि, जिन्ना की मौत के बाद उनके सपने कुचले गए. तत्कालीन पाकिस्तान ने उन्हें गलत साबित कर दिया।
अंबेडकर ने राजनीतिक फायदे के लिए और कांग्रेस की राजनीति को नाकाम करने के लिए मंडल की सहायता से अवसर का फायदा उठाया और बंगाल के चार जिलों से वोट ले कर वे संविधान सभा के लिए चुन लिए गये।
लेकिन एक खास परिस्थिति के चलते फिर उनके प्रयास को धक्का पहुंचा। विभाजन की योजना के तहत इस पर सहमति बनी थी कि जिन इलाकों में हिंदुओं की आबादी 51 फ़ीसदी से अधिक है उसे भारत में रखा जाए और जहां मुस्लिम 51 फ़ीसदी से अधिक है उन्हें पाकिस्तान को दे दिया जाए. जिन चार ज़िलों- जस्सोर, खुलना, बोरीसाल और फरीदपुर- से गांधी और कांग्रेस की इच्छा के विरुद्ध आंबेडकर संविधान सभा के लिए चुने गए वहां हिंदुओं की आबादी 71% थी. मतलब, इन सभी चार ज़िलों को भारत में रखा जाना चाहिए था, लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने शायद आंबेडकर के पक्ष में वोट देने की सामूहिक सज़ा के तौर पर इन सभी चार ज़िलों को पाकिस्तान को दे दिया.
इसके परिणामस्वरूप आंबेडकर पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य बन गए और भारतीय संविधान सभा की उनकी सदस्यता रद्द कर दी गई.
पाकिस्तान बनने के साथ ही बंगाल अब विभाजित हो गया था और संविधान सभा के लिए पश्चिम बंगाल में नए चुनाव किए जाने थे.
जब यह स्पष्ट हो गया कि आंबेडकर अब संविधान सभा में नहीं रह सकते तब उन्होंने सार्वजनिक स्टैंड लिया कि वो संविधान को स्वीकार नहीं करेंगे और इसे राजनीतिक मुद्दा बनाएंगे. इसके बाद ही कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें जगह देने का फ़ैसला किया.
बॉम्बे के क़ानून विशेषज्ञ एम. आर. जयकर ने संविधान सभा से इस्तीफ़ा दिया था जिनकी जगह को जी. वी. मावलंकर ने भरा. मंसूबा था कि उन्हें (मावलंकर को) तब संविधान सभा का अध्यक्ष बनाया जाएगा जब 15 अगस्त 1947 से यह भारत के केंद्रीय विधायिका के तौर पर काम करने लगेगा. लेकिन कांग्रेस पार्टी ने यह फ़ैसला किया कि जयकर की खाली जगह आंबेडकर भरेंगे।
(यह लेख बी बीबीसी हिंदी से लिया गया है )
12 नव॰ 2018
हिन्दुस्तान के ठग
3 अक्टू॰ 2018
भगत सिंह ने की थी अपने पिता की गद्दार से तुलना - जानिए क्यों ?
भगत सिंह को गिरफ्तार क्यों किया गया और फांसी क्यों दी गयी :
भगत सिंह क्रन्तिकारी थे . वे भारत को हिंसक तरीकों का प्रयोग करके ब्रिटिश सरकार को डरा कर भारत को स्वतंत्रता दिलवाने में भरोसा रखते थे . साइमन कमीशन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए लाला लाजपत राय को लाठी चार्ज में चोटें आयीं थीं और भगत सिंह व साथियों ने ब्रिटिश सरकार से इसका बदला लेने के लिए पुलिस कप्तान स्कॉट की हत्या की योजना बनायी लेकिन नौसिखिये साथियों और हड़बड़ी में गलती से एक अन्य पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या हो गयी . पुलिस ने दबिश दे कर भगत सिंह के अनेक साथियों को पकड़ लिया . इधर साइमन कमीशन के वादों पर जब राष्ट्रीय नेता बहस कर रहे थे तभी सरकार ने पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल असेब्मली में पेश किए . ये दोनों बिल दरअसल बढती क्रन्तिकारी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए थे. असेम्बली के अधिकांश भारतीय सदस्य इस बिल का विरोध कर रहे थे लेकिन वायसराय ने इसे अपने विशेषाधिकार से पारित कर सकते थे . भगत सिंह और साथियों ने तय किया कि उदारवादी राजनीती और सरकार के कानून का विरोध करने और क्रांतिकारियों की बात को कहने के लिए जिस समय ये कानून पारित हों उसी समय असेम्बली में बम का धमाका किया जाये . इसका उद्देश्य जान लेना नहीं था . भगत सिंह की योजना में यह भी शामिल था कि वे लोग गिरफ़्तारी का विरोध नहीं करेंगे और अपना बयान जज के सामने प्रेस की उपस्थिति में देंगे . बम फैंकने के साथ ही उनहोंने एक परचा भी फैंका था जो इस तरह था -
सूचना
“बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊँची आवाज की आवश्यकता होती है,” प्रसिद्ध फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलियाँ के यह अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं।
पिछले दस वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने शासन-सुधार के नाम पर इस देश का जो अपमान किया है उसकी कहानी दोहराने की आवश्यकता नहीं.....आज फिर जब लोग ‘साइमन कमीशन’ से कुछ सुधारों के टुकड़ों की आशा में आँखें फैलाए हैं और इन टुकड़ों के लोभ में आपस में झगड़ रहे हैं,विदेशी सरकार ‘सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक’ (पब्लिक सेफ्टी बिल) और ‘औद्योगिक विवाद विधेयक’ (ट्रेड्स डिस्प्यूट्स बिल) के रूप में अपने दमन को और भी कड़ा कर लेने का यत्न कर रही है। इसके साथ ही आनेवाले अधिवेशन में ‘अखबारों द्धारा राजद्रोह रोकने का कानून’ (प्रेस सैडिशन एक्ट) जनता पर कसने की भी धमकी दी जा रही है। सार्वजनिक काम करनेवाले मजदूर नेताओं की अन्धाधुन्ध गिरफ्तारियाँ यह स्पष्ट कर देती हैं कि सरकार किस रवैये पर चल रही है।
राष्ट्रीय दमन और अपमान की इस उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति में अपने उत्तरदायित्व की गम्भीरता को महसूस कर ‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ’ ने अपनी सेना को यह कदम उठाने की आज्ञा दी है। इस कार्य का प्रयोजन है कि कानून का यह अपमानजनक प्रहसन समाप्त कर दिया जाए।
जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियामेण्ट के पाखण्ड को छोड़ कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को लौट जाएं और जनता को विदेशी दमन और शोषण के विरूद्ध क्रांति के लिए तैयार करें। हम विदेशी सरकार को यह बतला देना चाहते हैं कि हम ‘सार्वजनिक सुरक्षा’ और ‘औद्योगिक विवाद’ के दमनकारी कानूनों और लाला लाजपत राय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर से यह कदम उठा रहे हैं। हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं। हम ऐसे उज्जवल भविष्य में विश्वास रखते हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शान्ति और स्वतन्त्रता का अवसर मिल सके। हम इन्सान का खून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। परन्तु क्रांति द्वारा सबको समान स्वतन्त्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर देने के लिए क्रांति में कुछ-न-कुछ रक्तपात अनिवार्य है। (https://www.marxists.org/hindi/bhagat-singh/1929/mein-feinka.htm).
पुलिस ने असेम्बली बम कांड के साथ ही भगत सिंह और साथियों पर "लाहौर षड़यंत्र केस " भी चलाया . भगत सिंह के पकडे गए साथी गोपाल ने सांडर्स की हत्या में भगत सिंह का नाम ले दिया था . इसके साथ ही अन्य क्रांतिकारियों के नाम भी दे दिए थे. भगत सिंह को फांसी असेम्बली में बम फैंकने से नहीं बल्कि लाहौर षड़यंत्र केस में उनके "क्रन्तिकारी " साथियों की गद्दारी के कारण मिली थी.
गाँधी इरविन समझौता :
यह वह घटना है जब सविनय अवज्ञा आन्दोलन या नमक आन्दोलन की सफलता ने गाँधी जी को निर्विवाद नेता स्थापित कर दिया था और देश के कोने कोने में गाँधी के इस आन्दोलन की धमक सुनाई दी थी. इसकी लोकप्रियता से मजबूर हो कर सरकार ने गाँधी से बातचीत का रास्ता निकला . गाँधी जी भी राजी हो गए . वार्ता हुयी और शर्तों में अनेक बातें शामिल हुयी जिन्स्में राजनितिक बंदियों को छोड़ने की बात भी शामिल थी . अनेक कैदियों को रिहा कर दिया गया लेकिन भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को छोड़ने से इरविन ने यह कह कर इनकार कर दिया की वे राजनितिक बंदी नहीं हत्यारोपी हैं .
गाँधी जी का पक्ष : गाँधी जी ने खुद लिखा है - 'भगत सिंह की बहादुरी के लिए मेरे मन में सम्मान है. लेकिन मुझे ऐसा तरीका चाहिए जिसमें खुद को न्योछावर करते हुए आप दूसरों को नुकसान न पहुंचाएं. उनहोंने कहा कि सरकार गंभीर रूप से उकसा रही है कि हम समझौते से पीछे हट जाएँ लेकिन समझौते की शर्तों में फांसी रोकना शामिल नहीं था. इसलिए इससे पीछे हटना ठीक नहीं है. "भगत सिंह और उनके साथियों के साथ बात करने का मौका मिला होता तो मैं उनसे कहता कि उनका चुना हुआ रास्ता ग़लत और असफल है. ईश्वर को साक्षी रखकर मैं ये सत्य ज़ाहिर करना चाहता हूं कि हिंसा के मार्ग पर चलकर स्वराज नहीं मिल सकता. सिर्फ मुश्किलें मिल सकती हैं.
"मैं जितने तरीकों से वायसराय को समझा सकता था, मैंने समझाया , मेरे पास समझाने की जितनी शक्ति थी. वो मैंने इस्तेमाल की. 23वीं तारीख़ की सुबह मैंने वायसराय को एक निजी पत्र लिखा जिसमें मैंने अपनी पूरी आत्मा उड़ेल दी थी." पाठकों को सनद रहे की भगत सिंह और साथियों को २३ की रात को फांसी दी गयी.
भगत सिंह की फांसी के बाद गाँधी ने कहा - भगत सिंह अहिंसा के पुजारी नहीं थे, लेकिन हिंसा को धर्म नहीं मानते थे. इन वीरों ने मौत के डर को भी जीत लिया था. उनकी वीरता को नमन है. लेकिन उनके कृत्य का अनुकरण नहीं किया जाना चाहिए. उनके इस कृत्य से देश को फायदा हुआ हो, ऐसा मैं नहीं मानता. खून करके न्याय और प्रचार हासिल करने की प्रथा अगर शुरू हो गई तो लोग एक दूसरे के कत्ल में न्याय तलाशने लगेंगे."
यह सही है की गाँधी जी जिस स्थिति में थे वे वायसराय पर अधिक दबाव बना सकते थे लेकिन फिर खुद गाँधी जी ही कहाँ रह जाते अगर वे हिंसा के प्रश्न को अनदेखा करते . उनहोंने असहयोग आन्दोलन हिंसा के कारण ही वापस ले लिया था .
भगत सिंह की प्रतिक्रिया :
अब यह भी जान लें की भगत सिंह क्या सोचते थे अपनी फांसी के बारे में .
जेल में जब एक पंजाबी नेता ने भगत सिंह से पुछा की उनहोंने अपना बचाव क्यों नहीं किया तो उनका जवाब था "इन्कलाबियों को मरना ही होता है, क्योंकि उनके मरने से ही उनका अभियान मज़बूत होता है, अदालत में अपील से नहीं.
"भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह ने ट्रिब्यूनल को पत्र लिखा और कहा कि मेरे बेटे का जोन सोंडर की हत्या में कोई हाथ नहीं है और वो निर्दोष है. तब भगत सिंह ने उन्हें बेहद सख्त भाषा में जो पत्र लिखा था वह शब्शः आपके सामने रख रहा हूँ . जो लोग भगत सिंह की फांसी माफ़ करने को लेकर गाँधी जी को कोसते हैं , भगत सिंह ने उन्हें गद्दार कहा होता.
(यह पत्र यहाँ से लिया गया है https://www.marxists.org/hindi/bhagat-singh/1930/pitaji-ke-nam-patra.htm)
पुलिस ने असेम्बली बम के साथ ही सांडर्स की हत्या का आरोपी बना कर भी चार्जशीट दाखिल की . उन्हें मौत की सजा सुनाई गयी .
जो लोग गाँधी को कोसते हैं बेशक कोसें लेकिन भगत सिंह की माफ़ी के लिए ना कोसें . भगत सिंह बिलकुल नहीं चाहते थे की उन्हें फांसी से बचाया जाए . ये शहादत थी - एक ऊँचे दर्जे की शहादत . इसे इस तरह नीचा ना बनाईये .
18 नव॰ 2016
लाइनों में देश
17 नव॰ 2016
एक शहर जो भविष्य को खा रहा है।
दिल्ली मुझे डराता है ।
यहाँ इतिहास कोने में सिमटा सहमा है
वर्तमान धुएँ को फँकता , गहमा है
भविष्य यहाँ खाँसता , धुआँ फाँकता
फुटपाथ पर भीख मांगता ,चार्जर और चीप साहित्य बेचता
रेलों में सुबह शाम बस्ता ले कर दौड़ता
अपने दिन गिन रहा है ।
दिल्ली मुझे डराता है ।
दिल्ली में आने वाले
बिहार, उड़ीसा, मेघालय, नागालैंड के परवासी
पिघल कर बन जाते हैं एक दिल्लीवाले
चालाक, जुगाडु, स्वार्थी, अंधे, क्रूर
बीतती है जिनकी ज़िंदगी
नौ से पाँच ,
सुबह शाम सड़कों पर
रेडियो जौकी की अनवरत रटंत के बीच ।
जिंदगी गुजरती है यहाँ रेल की तरह
घर एक बर्थ है - बस सोने के लिए
वे जीते हैं जिंदगी दूसरों के लिए
-----नहीं यह मानवता नहीं, गुलामी है
जिंदगी बंधुआ है उनके ऑफिसों में
घर बस एक बर्थ है उनके लिए ।
दिल्ली की सुबह है किसी स्टेशन की तरह
हर कोई कहीं जाने की जुगाड़ में है
लेकिन पहुंचता कहीं नहीं
दिल्ली पर शाम किसी मरघट की तरह उतरती है
और गिद्ध बैठ जाते हैं इंतज़ार में
रात श्मशान की तरह सूनी है
दिल्ली मुझे डराती है
16 नव॰ 2016
सक्षम नेता अक्षम तंत्र
14 नव॰ 2016
तुग़लक 2.0
9 नव॰ 2016
नोट 2 : नए नोट और पुराना मानव
ऐतिहासिक फैसला : यह तो इतिहास बताएगा की फैसला ऐतिहासिक है या नहीं लेकिन अगर मोदी जी नरसिम्हा राव - मनमोहन सिंह की तरह आर्थिक इतिहास में अपना नाम लिखना चाहते हैं तो उन्हें शायद निराशा ही हाथ लगे क्योंकि ये पहला मौक़ा नहीं है जब बड़े नोट बंद किए गए हैं. साल 1946 में में भी हज़ार रुपए और 10 हज़ार रुपए के नोट वापस लिए गए थे. फिर 1954 में हज़ार, पांच हज़ार और दस हज़ार रुपए के नोट वापस लाए गए. उसके बाद जनवरी 1978 में इन्हें फिर बंद कर दिया गया. इस प्रक्रिया के उस समय के परिणामों के बारे में खोजने पर मुझे BBC की साइट पर एक दिलचस्प बात पता लगी । उस वक़्त के रिज़र्व बैंक के गवर्नर आई जी पटेल सरकार के इस फ़ैसले के पक्ष में नहीं थे. उनके मुताबिक़ जनता पार्टी की सरकार के ही कुछ सदस्य मानते थे कि पिछली सरकार के कथित भ्रष्ट लोगों को निशाना बनाने के लिए ये क़दम उठाया गया है. इंडिया टुडे पर एक लेख में यह भी इंगित किया गया था की यह कदम जनता सरकार ने कांग्रेस को चंदे का कैश चुनावी अभियान में खर्च न करने देने के लिए उठाया था। गवर्नर पटेल ने तत्कालीन वित्त मंत्री को सुझाव दिया था कि इस तरह के फ़ैसलों से मनमाफ़िक परिणाम कम ही मिलते हैं. काले धन को नक़द के रूप में बहुत कम लोग लंबे समय तक अपने पास रखते हैं. पटेल के मुताबिक़, सूटकेस और तकिए में बड़ी रकम छुपाकर रखने का आइडिया ही बड़ा बचकाना किस्म का है और जिनके पास बड़ी रक़म कैश के तौर पर है भी वो भी अपने एजेंट्स के ज़रिए उन्हें बदलवा लेंगे.
फायदे : मोदी जी के इस कदम का सकारात्मक पक्ष भी हैं
1- नकली करेंसी : इस कदम से नकली करेंसी के खिलाफ एक प्रभावी हमला हुआ है । नए नोटों की नकल करने और उन्हें खपाने में कुछ समय लगेगा और यह महंगा भी होगा। सरकार को इसके साथ ही नकली नोटों को ट्रेस करने का प्रभावी तंत्र विकसित करना होगा।
2।- आतंकवादियों को फंडिंग : इस कदम ने आतंकियों की फंडिंग को कुछ समय के लैये रोक दिया है । लेकिन देश में बैठे ऐसे प्रभावी लोग जो इन आतंकवादियों को फंड कर रहे हैं उन्हें भी खतम करना होगा । अनेक नेता और उद्योगपति और काला धन अजेंट इस तंत्र में शामिल हैं ।
3- अघोषित धन : काला धन जो बिना टैक्स चुकाए लोगों के पास रहता है । यद्यपि यह नकदी में नहीं रहता । लोग काले धन को तुरंत ही रियल एस्टेट या सोने की खरीद में लगा देते हैं । नोटों को रातों रात बंद करने से इसका एक बहुत छोटा तात्कालिक हिस्सा है वही बाहर होगा । बाकी बड़े खिलाड़ीयों के पास इसके अनेक विकल्प मौजूद हैं। पिछली रात भर भारत के अमीरों ने सोने की खरीददारी की है इससे सोने के ब्लैकमार्केट में भाव इस समय तक 44000 से ऊपर पहुँच चुके हैं।
4- अपराध और नशे के व्यापार का पैसा भी बाहर होगा।
समस्या क्या है : इस कदम से सबसे अधिक परेशानी कुछ समय के लिए उस व्यक्ति को हो रही है जो छोटा मोटा काम करता है और अपना नकद पैसा अपने पास रखता है । जैसे थोक, किराना, सब्जी विक्रेता, आढ़ती, परचून, बेकरी, टेलर, ट्यूशन इत्यादि। इससे छोटी बचतें भी प्रभावित होंगी जैसे कमेटी, किटी या ऐसे ही अन्य साधन। इससे ऐसे लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे जिंका बैंक में खाता नहीं है । उनके कैश को ले कर समस्या पैदा होने वाली है क्योंकि उनका नकद पैसा दरअसल उनकी रोजाना की जिंदगी का सहारा है । अगर इसमें एक भी दिन की देरी होती है तो उनके खाने पीने की समस्या पैदा हो जाती है
क्या असली काला धन बाहर आएगा ? इसमें शक है । बड़े व्यापारी, रिश्वतखोर अधिकारी, नेता अपना पैसा नकद नहीं रखते । आज उनके पास अनेक विकल्प हैं । ऑफशोर कंपनियाँ, विदेशों में खाते , सोना, चैरिटी, रियल एस्टेट, बेनामी सौदे, आभूषण इत्यादि। इसलिए यह पैसा वापस मिलने से रहा। हाँ अगर इस कदम के साथ ही ऐसी नीतियाँ बनायीं जातीं जो इन सौदों पर रोक लगा सकतीं तो बेहतर था। आपने चुनावों के दौरान सुना होगा की एक गाड़ी से करोड़ों रुपये पकड़े गए। यह पैसा राजनीतिक पार्टियों का पैसा होता है जो कभी खुल कर सामने नहीं आता। अगर इस कदम के बावजूद आगामी उत्तर प्रदेश चुनावों में नेता हैलीकॉप्टर और रथों का प्रयोग करें और विशाल रैलियाँ हों तो समझिए इस सर्जिकल स्ट्राइक का भी वही असर हुआ है जितना पाकिस्तान पर। जब सरकार ने पार्टीसीपेटारी नोट बंद करने की कोशिश की थी जो अवैध धन का शेयर मार्केट में निवेश का एक चैनल है तब शेयर बाज़ार की हलचलों से परेशान हो कर यह कदम सरकार को वापस लेना पढ़ा था। हमारे शेयरा बाज़ार में एफ़आईआई निवेशक इसी माध्यम से पैसा लगते हैं और इसके जरिये भारतीय भी अपना काला धन सफ़ेद करते रहते हैं । इन सभी तरीकों में से किसी पर रोक नहीं लगने वाली और यही वह काला धन है जिसका आकार अविश्वसनीय है !
इस कदम के सीमित आर्थिक फायदे हैं लेकिन राजनीतिक फायदे बहुत हैं और यह मोदी का मास्टर स्ट्रोक है।
- मोदी पर जो लोग काले धन को लेकर दोगलेपन का आरोप लगा रहे थे वे अब हमेशा हमेशा के लिए चुप बैठ जाएंगे क्यूंकी इससे बड़ा कदम और क्या होगा।
- उत्तर प्रदेश चुनाव सर पर हैं अब विरोधी दलों के पास कैश खत्म हो गया है।
- आतंकवादी और देशविरोधी गतिविधियां अगर थमेंगी नहीं तो धीमी तो जरूर पढ़ेंगी और आजकल के हालात में यह एक राहत वाला कदम है।
- उत्तर प्रदेश चुनाव में यह न केवल एक मुद्दा होगा बल्कि चुनाव इसी के आसपास केन्द्रित किया जाएगा ।