15 मार्च 2013

कच्छ नहीं देखा तो कुच्छ नहीं देखा -3

रण उत्सव : ट्रेन से हम लोग भुज पहुँच कर होटल में रुके। वहाँ रात को चाचा जी, चाची जी और मेरी बहन आयुषी भी अहमदाबाद तक हवाई मार्ग से व भुज तक सड़क मार्ग से आ पहुंचे। उनका कमरा हमने पहले ही ले लिया था। अगले दिन चाचा जी की एक शिष्या, जो प्रशासनिक सेवा में चयनित हो कर अहमदाबाद में ही पोस्टेड है  द्वारा उपलब्ध कराई गयी इनोवा में बैठ कर रण उत्सव की ओर चले। लगभग 12 बजे तक हम टेण्ट सिटी पहुंचे। यहा काउंटर पर हमें तीन दिन के फूड कूपन, कैप, पहचान पत्र इत्यादि मिल गए और पोर्टर सेवा ने हमारा सामान हमारे तयशुदा टेंटों में पहुँच दिया।  इसके बाद सीधे हम लोग डायनिंग हॉल में गए क्यूंकी नाश्ता 12:30 तक ही मिलना था। डायनिंग हॉल पहुँच कर हमें लगा की अगर आगाज ऐसा तो अंजाम कैसा होगा । और आगाज तो बहुत ही अच्छा था। बिना किसी अव्यवस्था के करीने से लगे स्वादिष्ट पकवानों की मेज़ों से आती खुशबू ने भूख बढ़ा दी थी। गुजरती, राजस्थानी और सामान्य पकवानो के विकल्प मौजूद थे। तृप्त हो कर वहाँ से निकले और पहुंचे सीधे अपने टेंट में। यह स्थान बहुत ही खूबसूरत था। अर्ध चंद्राकार में अनेक टेंट लगे थे। A से शायद K तक के ब्लॉक थे और हर ब्लॉक में लगभग 50 टेंट थे। हर टेंट में अटैच बाथरूम था और एसी एवं हीटर दोनों का प्रबंध था। चाय बनाने का सामान व केतली भी मौजूद थी और किसी जरूरत के लिए रूम सर्विस को फोन से इत्तिला दी जा सकती थी। हम सब फ्रेश होकर थोड़ा घूमने निकाल गए। तभी सूचना दी गयी की 3 बजे टूर बसें हडको विलेज और व्हाइट सेंड व सूर्यास्त दिखने के लिए चल पड़ेंगी अतः हम जल्दी से तैयार हो कर बसों के साथ ही निकाल पड़े।

हडको विलेज: यह एक अनावश्यक पड़ाव था और वस्तुतः इस गाँव में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे दर्शनीय कहा जा सकता। मेरी आगामी पर्यटकों से गुजारिश है की यदि आप अपने वहाँ से हैं तो बेहतर है की थोड़ा रुक कर सीधे सनसेट प्वाइंट पहुंचा जा सकता हैं।

श्वेतरज पर सूर्यास्त : मीलों तक जहां दृष्टि जाती थी मानो श्वेत धवल हिम की पर्त बिछी हो। पावों तले नीचे देखने पर काली मिट्टी में मिश्रित यह श्वेतवर्णी  कर्क रेखीय हिम वस्तुतः नमक निकला। कच्छ के इस भाग में  समुद्री पानी अंदर तक चला आता है और तेज़ धूप में पानी सूख कर लवण बच जाता है जी श्वेत पर्त के रूप में मीलों तक फैला दिखाई देता है । अन्वी और विश्वम ने तो एक पोलीथिन ले कर लवण भरने में  मशगूल हो गए। हम सबने यहाँ फोटो खींची। बच्चों ने पतंग भी उड़ाई। कच्छ के मैदान तक जाने के लिए हमने ऊँट गाड़ी भी ले ली थी और बच्चों को तो ऊँट गाड़ी व ऊँट की सवार में बेहद आनंद आया। कच्छ के श्वेत धवल विस्तार के वर्णन के लिए शब्द कम हैं। प्रकृति को सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है, अभिव्यक्त नहीं, फिर मैं कवि भी नहीं। हम सब देर तक धीरे धीरे अस्त होते सूर्य के साथ इस सौंदर्य को पीते रहे। अनेक पर्यटक वहाँ फ़ोटोग्राफ़ी, ऊँट गाड़ी की सवारी और रण के लावणीय जालनिधि के किनारे टहल रहे थे। हमारे दोनों बच्चों को यहाँ बेहद मज़ा आया। सूर्यास्त होने के बाद भी अंधेरा छाने तक हम सब वहाँ रहे और आख़िर में चाय पीते हुए बस में बैठ कर पुनः अपने टेंट में आ गये। जब बस ने हमें छोड़ा तो शाम की चाय का समय हो चुका था अतः हम सब पहले डाइनिंग हाल टेंट में गये। वहाँ चाय और नाश्ते का नायब इंतज़ाम था जिसे हमने पुनः स्वाद लेकर खाया। डाइनिंग हॉल से निकल कर अब टेंट सिटी की ख़ूबसूरती निहारते हुए, वहाँ लगे बाज़ारों में घूमते हुए, फ़ोटो खींचते, खींचते लगभग ९:०० बजे हम पुनः टेंट में पहुँचे और पहुँचते ही संदेश मिला की डिनर के लिए डाइनिंग हाल पुनः तैयार है। हम सब थके थे अतः थोड़ा आराम कर के पुनः डाइनिंग हॉल चल दिये। इस ताँत और डाइनिंग हॉल के अनवरत चक्करों पर हमारे बेटे कि टिप्पणी थी " यहाम हम घूमने आये हैं या खाने, हर समय जब देखो टेंट से डाइनिंग हॉल और डाइनिंग हाल से टेंट" सभी लोगों को उसकी बात बड़ी मज़ेदार लगी लेकिन थी भी सही।
भारत - पाकिस्तान बॉर्डर : अगला दिन तय था टूर कि और से काली पहाड़ी और भारत - पाकिस्तान बॉर्डर तक बस यात्रा का। इस यात्रा में अधिकांश लोगों की रुचि नहीं थी। सिर्फ़ मैं, बहन और चाचा चाची ही गए। यह एक था देने वाली यात्रा थी। सड़क अच्छको नहीं थी और समय काफ़ी लगा। बॉर्डर पर भी देखने या सहने लायक़ कुछ भी नहीं था। ऊँची कँटीली बाड़ों के बीच एक ज़मीन की पट्टी " नो मेंस  लैंड " के तौर पर थी। दूसरी ओर दूर पर कुछ टावर दिखायी दिये । गाइड के अनुसार वे पाकिस्तानी टावर हैं और उनमें पक्सितानी सैनिक घाट लगाये बैठे हैं, जो सिर्फ़ उसे ही दिखायी दिये, बाक़ी सबने आँखें फाड़ फाड़ कर देखने के बाद "ऐंपरर्स न्यू क्लॉथ्स" की भाँति सबने स्वीकार कर लिए की हाँ उसे पाकिस्तानी सैनिक हाथ में बंदूक़ लिए, घात  लगाये बैठे दिखाई दिये हैं। किसी सैन्य बटालियन के दफ़्तर में रुक कर हमने चाय और नाश्ता भी किया। और पुनः एक लंबी थकाऊ यात्रा के बाद देर रात डिनर के समय तक हम फिर टेंट सीटी आ गये। आज यहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी था और इसमें गुजराती पारंपरिक नृत्य और संगीत का कार्यक्रम हुआ जो मनोरंजक था। हम देर रात तक इस कार्यक्रम का आनद लेते रहे और अंततः अपने टेंट में देर रात ही गये। 

15 जन॰ 2013

कच्छ नहीं देखा तो कुच्छ नहीं देखा-2

कच्छ का नक्शा
कच्छ और भुज - भूगोल: भुज एक प्राचीन स्थान है। करीब 10-12 वर्ष पूर्व एक भीषण भूकंप ने इसे नष्ट कर दिया था। तब से यह प्राचीन शहर फिर से उठ खड़ा हुआ है और मानुषी जीजीविषा का उदाहरण है। देश का दूसरा सबसे बड़ा ज़िला कच्छ कई कारणों से विशिष्ट है। कच्छ से कुछ याद आता है आपको..... नहीं? सोचिए क्या यह किसी जानवर का नाम है ----चलिये बताए देते है, कच्छप या कछुए से बना है यह शब्द। असल में बारिश के बाद इस क्षेत्र में पानी भर जाने के कारण यह पूरा क्षेत्र द्वीप बन जाता है और कछुए की पीठ जैसा दिखता हैं। यह क्षेत्र बहुत रोचक है। गुजरात राज्य का यह हिस्सा सिंधु नदी के प्रवाह क्षेत्र का भाग हुआ करता था और जलनिमग्न रहता था लेकिन 1819 के भीषण भूकंप ने इस क्षेत्र का भूगोल बादल दिया। भूकंप से पड़ी दरारों के कारण एक हिस्सा ऊपर उठ गया और सिंधु नदी का मार्ग परिवर्तित हो कर और पश्चिम की ओर चला गया। इस जगह को आज पाकिस्तान के सिंध प्रांत में देखा जा सकता है और इसका बहुत ही उपायुक्त नामकरण हुया है - “ अल्लाह बन्ध”। तो इस तरह यह हिस्सा शुष्क होने लगा। लेकिन आज भी बारिश में यह भूमि पानी से तर हो जाती है और इसकी विशिष्ट मिट्टी दलदल बन जाती है। जब पानी धीरे धीरे वाष्पीकृत हो जाता है या ज़मीन में सोख लिया जाता है तब इस मिट्टी पर नमक की सफेद पर्त जम जाती है। नमक के कारण यह भूमि वनस्पति विहीन है लेकिन फिर भी कहीं कहीं खेती होती नज़र आती है। कटा-फटा होने के कारण इस क्षेत्र में अनेक प्रकृतिक बंदरगाह हैं। मांडवी, कांडला और मूंदड़ा बन्दरगाह प्रमुख व्यस्त बन्दरगाहों में हैं। कच्छ का तटीय प्रदेश मैदानी है और खेती होती हैं। मुख्य रूप से सरसों, कपास और मोटे अनाज उगाये जाते हैं।
कच्छ का दक्षिणी हिस्सा डेक्कन ट्रेप की चट्टानों से बना है और उत्तरी हिस्सा सिंधु, घग्घर और लूनी के जलोढ़ अवसादों से। इनके बीच में रेगिस्तानी रण (रेगिस्तान) है। इसमें भारत के सबसे पुराने डायनासोर अवशेष मिले हैं यद्यपि गुजरात सरकार ने इन्हें प्रमुखता नहीं दी है अपने पर्यटन नक्शे पर।
अन्वी और विश्वम कपास के खेत में - मांडवी से भुज के रास्ते में 
कच्छ में सफर करते समय आपको दूर तक या तो नमक के मैदान नज़र आते हैं या फिर घास वाली ज़मीन। इसे बन्नी मैदान कहते हैं। हाँ जब आप मांडवी की ओर जानते है तो तटवर्तीय इलाकों में सरसों और कपास के खेतों की भूरी और पीली कतारें आपका मन मोह लेतीं हैं( दिसंबर जनवरी में ).

NRI गाँव :  भुज एक छोटा सा शहर है। स्टेशन से होटल तक के रास्ते में भारत के अन्य अधिकांश शहरों की तरह ही झुग्गियाँ और गंदगी आपका स्वागत करती है।  लेकिन अंदरूनी शहर बनिस्बत साफ है और इसका एक कारण मुझे स्थानीय टेम्पो चालक ने बताया कि यह सब निर्माण 9 से 5 वर्ष ही पुराना है । भूकंप के बाद पूर्णतया बर्बाद हो चुके शहर ने फिर अपनी रफ्तार पकड़ ली है और इंडियन एक्सप्रेस अखबार के हवाले से आपको यह भी बताता चलूँ की भुज में विदेशी निवेश भी तेजी से बढ़ा है। भूकंप से पूर्व यह बहुत कम था जबकि पिछले वर्ष तक यहाँ 2000 करोड़ से भी अधिक का निवेश हो चुका है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमने भी देखा। अपनी यात्रा के अंतिम दिन हम मांडवी तट जा रहे थे। रास्ते में एक सूनसान लेकिन खूबसूरत गाँव दिखा। ध्यान गया की यहाँ ज़्यादा चहल पहल नहीं थी लेकिन घर बड़े अच्छे थे परंतु अधिकांश में ताले जड़े हुये थे। टैक्सी ड्राइवर और चाय विक्रेता ने बताया की यह NRI गाँव है। यहाँ के लगभग सभी निवासी एनआरआई हैं और यहाँ सिर्फ केयरटेकर रहते हैं। फिर तो इसे केयरटेकरों का गाँव भी कह सकते हैं। शायद दईसारा नाम था।  


भुज के दर्शनीय स्थल : 

हिल गार्डन :- 
होटल के बाहर - सपरिवार 
हमने 1 जनवरी को भुज पहुँच कर होटल प्रिंस में कमरे लिए और सामान जमा कर नहाया धोया। नाश्ता और आराम करके यह तय किया गया की शाम को पास ही में हिल गार्डन देख लिया जाय। इसके बारे में ममेरे भाई ने पहले ही बता दिया था कि बच्चों के लिए बहुत अच्छा है। हिल गार्डन काफी बड़े क्षेत्र में फैला है और मुख्यतः बच्चों के लिए झूले 
हिल गार्डन 
और राइड्स का बहुत बढ़िया स्थान है। यह रोटरी क्लब द्वारा संचालित है और अनेक लोगों के धर्मार्थ दान से बना है। सभी झूले और पार्क दान दाताओं ने बनवाए हैं और इनका प्रयोग मुफ्त है। पार्क में प्रवेश शुल्क भी मात्र 2 रुपये है। बच्चों ने यहाँ खूब मज़े किए।
 यहाँ एक अक्वेरियम भी है जहां बहुत सी मछलियाँ प्रदर्शित की गईं हैं और साथ में एक विशाल ब्लू व्हेल का कंकाल भी है जो इस अद्भुत और सबसे बड़े जीवधारी के आकार काआभास  दिलाता है 


दुनियाँ के विशालतम जीव ब्लू व्हेल का कंकाल - हिल गार्डन भुज 

कुल मिला कर बच्चों के लिए बढ़िया जगह रही और बच्चे खुश तो बड़े भी खुश। यह देख कर भी सुखद आश्चर्य हुया कि अनेक स्कूल भी यहाँ आए दिन बच्चों को लाते हैं। यह सिलसिला और दिनों भी देखने को मिला जब हम कच्छ संग्रहालय देखने गए। एक छोटा सा लेकिन दर्शकों से भरा संग्रहालय देख कर मन प्रसन्न हो गया।  ऐसा चलन अपने तथाकथित हॉट सिटी शहर गाजियाबाद में तो असंभव ही लगा। यहाँ अव्वल तो पार्क या संग्रहालय हैं ही नहीं और हैं भी तो उनमें बच्चों के खेलने पर मनाही है क्यूंकी पार्क के जॉगिंग रास्ते और पौधे खराब हो जाते हैं और लायन्स व रोटरी क्लब प्रतिवर्ष मेले आयोजित करवाते हैं। काश ऐसा ही कोई प्रयास यहाँ भी होता। गाजियाबाद शहर में भी एक संग्रहालय होना चाहिए। आखिर इस ज़िले का इतिहास भी सिंधु सभ्यता के महत्वपूर्ण स्थल "आलमगीरपुर" से जुड़ा है जो हिंडन नदी के किनारे स्थित था और सबसे पश्चिमी स्थल था। इसके अलावा, महाभारतकालीन,मुगल कालीन और 1857 से जुड़े इस शहर में आज गुंडा राज है और एक ढंग का पुस्तकालय भी नहीं है। घूमने की जगहों के नाम पर ले दे कर मॉल हैं बस। 
हिल गार्डन पार्क का विहंगम दृश्य


शक सम्राट चष्टन का अंधाऊ अभिलेख : कच्छ संग्रहालय भुज 
कच्छ संग्रहालय:  हमारे होटल से नजदीक ही स्वामीनारायण चौक से कुछ दूरी पर एक छोटा सा संग्रहलय है। हमारे पास बहुत समय नहीं था क्यूंकी हमने इसे अपनी यात्रा के अंतिम दिन स्टेशन जाते समय देखा था लेकिन इस संक्षिप्त दर्शन में ही हम बहुत प्रभावित हुये। यहाँ भी हमें 4-5 स्कूलों के बच्चे मिले जिनके उत्साह से संग्रहालय गुंजायमान था। इतिहास और  वर्तमान का मिलन खूबसूरत था। यहाँ धोलावीरा के कुछ अवशेष हैं। सबसे खास है शक क्षत्रपों के तिथि सहित प्रस्तर अभिलेख।भारत में पहला   साम्राज्य चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य ने स्थापित किया था और इसमें महान अशोक जैसा शासक हुआ था। उसने गुजरात पर शासन भी किया था जिसका प्रमाण उसका जूनागढ़ अभिलेख है। मौर्य साम्राज्य के विघटन के बाद इस क्षेत्र में ईसा की पहली शताब्दी में पहले शक फिर कुषाण शासकों का अधिकार रहा। यह दोनों ही भारतीय नहीं बल्कि चीन के पश्चिमी क्षेत्र की क़बायली जनजाति थे। चीनी शासक शी हुआंग ती  द्वारा जब चीनी सीमा पर दीवार खड़ी कर यू-ची जाति को सीमा से भगाया गया और उधर उत्तर में हूणों की गतिविधियों से शक जाति पहले मध्य एशिया  के बल्ख क्षेत्र में सीर दरिया और आमू दरिया के दोआब में बस गयी।यू-ची  तिब्बत और बल्ख पहुंचे और बल्ख में शकों को खदेड़ कर यहाँ बस गए। भगाये गए शक सिंधु नदी पार करके भारत में प्रविष्ट हुयी और भारत में पहलव शासकों को पराजित कर यहाँ दो शाखाओं में बाँट गए। उत्तरी क्षत्रप जो तक्षशिला और मथुरा में थे तथा पश्चिमी क्षत्रप जो नासिक और उज्जैन के शासक थे। ये स्वयं को क्षहरात क्षत्रप कहते थे।उधर यू-ची  भी  भारत आ पहुंचे और बिखरते मौर्य साम्राज्य पर कब्जा कर लिया।  इनका आगमन भारतीय जाति व्यवस्था के लिए असमंजस भरा था। ये विदेशी थे इसलिए अछूत थे परंतु शासक भी थे। केवल यही नहीं कुषाण, पहलव, और ग्रीक भी थे। इनसे अनेक संकर पैदा हो चुके थे अतः यही समय था जब लचीली हिन्दू जीवन शैली ने सत-क्षत्रिय और असत-क्षत्रिय की दो श्रेणियाँ बना कर इन्हें भी क्षत्रिय वर्ण में शामिल कर लिया गया। असल में वर्ण -संकर जैसे सिद्धान्त का जन्म ही इसी आवश्यकता से हुआ क्यूंकी शक्ति और सत्ता के विदेशी स्वामियों को म्लेच्छ कह कर खारिज नहीं किया जा सकता था। बहरहाल गुजरात का यह क्षेत्र ईसा की प्रथम शताब्दियों में एक उथल पुथल भरे दौर से गुजर रहा था। इस क्षेत्र का सबसे प्रसिद्धा राजा चष्टन था। इसके अभिलेखों में कच्छ, सौराष्ट्र और मालवा जैसे प्रदेशों का उल्लेख हुआ है। चष्टन  का 11वे वर्ष का एक अभिलेख यहाँ कच्छ संग्रहालय में है। चष्टन  एवं रुद्रदामन के अन्य अभिलेख भी यहाँ हैं। आपको बताता चलूँ की इन्हीं शक क्षत्रपों के नाम से एक नया संवत शुरू हुया था जिसे शक संवत कहते हैं। यद्यपि इसके आरंभ की तिथि 78 इसवीं है जो कुषाण शासक कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि है। इन विदेशी जनजतियों ने भारत में स्थिरता पायी और इन्हें यहाँ बहुत कुछ सीखने को मिला। भारत के साथ सभी आक्रमणकारियों का यह अनुभव रहा। वे सब यहाँ आए, लड़े और फिर यहीं के हो गए चाहे शक हों, कुषाण हों, तुर्क या मुग़ल हों। जय शंकर प्रसाद की इन पंक्तियों का शायद यही अर्थ भी है -


अरुण यह मधुमय देश हमारा,
जहां पहुँच अंजान क्षितिज को मिलता एक सहारा । 

और तभी विदेशियों के दिल से निकलता है 

"गर फिरदौस बर रूए ज़मीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त।"

यह सभी विदेशी जनजातियाँ यहाँ आयीं और यहाँ की संस्कृति में घुल मिल गईं। वे लुटेरे नहीं थे। उन्होंने यहाँ की दौलत अपने देशों को नहीं भेजी  । और इनके आने से भारतीय संस्तृति और विविधतापूर्ण  हुयी। इस उपमहाद्वीप को हिंदुस्तान नामक देश बनाने में इस प्रक्रिया का भी हाथ है। यही मेल मिलाप का वह आंतरिक सूत्र है जो अंग्रेजों के आने से पहले भी सांस्कृतिक रूप में मौजूद था। यही कारण है कि हिंदुस्तान महज़ एक भौगोलिक इकाई नहीं था जैसा कि अंग्रेज़ इतिहासकारों ने लिखा है बल्कि एक देश था जिसे आप आस पास के अन्य देशों से अलग करके पहचान सकते थे। 
                                     दुनियाँ लोकतन्त्र का जन्मदाता फ्रांस को मानती है पर मेरे विचार से तो भारतीय हिन्दू संस्कृति ही लोकतन्त्र का जीता जागता उदाहरण है । आखिर और कौन सा धर्म इतनी विविधताओं को समेत सकता है वह भी अद्भुत समन्वय के साथ। यहाँ वैदिक देवताओं के साथ ही शैव, शाक्त, गाणपत्य, सौर, वैष्णव, जैन और बौद्ध धर्मों का संगम निरंतर प्रवाहित है।

 मुझे गर्व है अपने भारत पर और अपनी संगमी संस्कृति पर। इसीलिए मैं गुजरात गया और वहाँ की प्रशंसा कर रहा हूँ तो इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं नरेंद्र मोदी जी के हिन्दुत्व प्रयोगों से सहमत हूँ। बेशक गुजरात प्रभावित करता है और उनमें विकास की संभावनाएं हैं परंतु अपनी स्वतन्त्रता की कीमत पर मैं उन्हें स्वीकार नहीं कर सकता पीएम के तौर पर। याद रखिए कि दुनियाँ के सभी तानाशाहों ने बहुत तेज़ आर्थिक विकास का दावा किया था, चाहे वह हिटलर हो, सोवियत रूस के शासक हों, मुसोलिनी, या जापान और चीन हों, लेकिन लोगों और समाज के प्रति उनकी सोच संकुचित, खतरनाक और पश्चगामी थी - इतिहास गवाह है। 


सोमनाथ मंदिर का खंडित बाहरी हिस्सा 
कच्छ मूजियम में वह पखवाड़ा सोमनाथ मंदिर दर्शन पखवाड़ा भी था और इस अवसर पर सोमनाथ मंदिर के कुछ पुराने अवशेष और एक चित्र प्रदर्शनी भी आयोजित की गयी थी। सोमनाथ पर कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी की "जय सोमनाथ" जब से पढ़ी थी सोमनाथ देखने का मन था। यहाँ इस इच्छा की आंशिक पूर्ति हो गयी। अनेक चित्रों और लेखों से समृद्ध यह प्रदर्शनी सोमनाथ के इतिहास के बारे में अनेक तथ्य बताती है। लीजिये आप भी देखिये एक चित्र। पूरा मजा तो वहाँ जा कर ही आएगा। 


धोलावीरा : 
धोलावीरा का प्रस्तर कुंड 
कच्छ के खादर प्रदेश में भुज के उत्तर में स्थित है एक छोटा सा गाँव धोलावीरा डॉ आर एस बिष्ट और उनकी टीम के अद्भुत प्रयासों से आज प्राचीन विश्व इतिहास के नक्शे पर सबसे महत्वपूर्ण जगहों में से एक है। यह युनेस्को के विश्व धरोहर सूची में भी शामिल है। श्री बिष्ट के अथक प्रयासों का आरंभ 1960 ई0 में हुआ था और एक प्राचीन शहर का यह उत्खनन 1990 तक चलता रहा। विभाजन के बाद सिंधु सभ्यता का भारत में स्थित यह सबसे बड़ा स्थल बन गया और साथ ही यह उन छ्ह सैन्धव महानगरों में से अभी सबसे बड़ा है जो आज से तकरीबन 5000 वर्ष पहले भारत की शान हुआ करते थे। जब यूरोप जंगलों में घूम रहा था तब सात नदियों से सिंचित इस प्रदेश के मानव अपने शिल्प, उद्यमशीलता और नवीन प्रयोगों से मानव के भविष्य का इतिहास रचने में व्यस्त थे। सिंधु प्रदेश के इन निवासियों ने न केवल व्यापार और कृषि का विकास किया बल्कि दुनियाँ में सबसे पहली बार व्यवस्थित नगरों , पक्के मकानों, जल प्रबंधन, मानक माप और तौल की प्रणालियाँ और नगर सफाई व्यवस्था का भी ईजाद किया। सिंधु वासियों ने ही विश्व को सुई और कपास से परिचित कराया और सिले वस्त्र बनाए थे। सिंधु सभ्यता ही उस समय एकमात्र ऐसी सभ्यता थी जिसमें पक्की ईटों से बने घर और उनसे निकालने वाली गंदगी के प्रबंधन के लिए पूरे नगर में नालियों की व्यवस्था की गयी थी और सबसे ज्यादा ध्यान इस बात पर जाता है की ये नालियाँ ढँकी हुयी थीं। सफाई का ऐसा आग्रह न जाने आज कहाँ खो गया है! न जाने क्यूँ जिस देश ने आधुनिक शहरी स्वच्छता की नींव डाली उसी के शहर गंदगी से बजबजाते क्यूँ हैं? ढोलावीरा तो इन सभी नगरों में खास था। यह सिंधु नदी के मुहाने पर मनसर और मनहर नदियों के दोआब (आब शब्द फ़ारसी से आया है और इसका अर्थ है पानी या नदी, आबोहवा या आबोदाना भी अब शायद आपको समझ में आगए होंगे और ध्यान पेशाब पर भी गया होगा वैसे संस्कृत "आप" भी इसके नजदीक है  और आपको पता होना चाहिए की संस्कृत और फ़ारसी दोनों बहनें हैं - दोनों ही इंडो-ईरानियन भाषा से निकलीं हैं और ऐसा ही रिश्ता अङ्ग्रेज़ी और हिन्दी का है दोनों भाषाएँ इंडो - यूरोपियन भाषा से निकलीं दो बहनों लैटिन और संस्कृत की बेटियाँ हैं । तो हिन्दी हमारी मातृभाषा है और अङ्ग्रेज़ी मौसी है और मौसी चाहे जितनी अच्छी क्यूँ ना हो माता सदैव प्यारी ज्यादा होती है। इसीलिए यह ब्लॉग भी हिन्दी में है ) में बसा यह शहर एक औद्योगिक महानगर था और शायद सबसे समृद्ध भी। इसका खूबसूरत स्थापत्य और अनोखी जल प्रबंधन व्यवस्था सबसे उल्लेखनीय है। जल प्रबंधन के लिए इस नागर में एक 80 मीटर लंबा विशाल चट्टान को काट कर बनाया गया टैंक अनोखा है। पूरे नगर के चारों ओर कुओं और कृत्रिम तालाबों की एक व्यवस्था थी। ढोलावीरा भारत के अनेक स्थानों से व्यापारियों को आकर्षित करता था जो अपने सामान को सिंधु मुहाने स्थित लोथल बन्दरगाह से मकरान तट, अदन की खाड़ी, लाल सागर और मिस्र व मेसोपोटामिया (आज का ईराक) तक ले जाते थे। 


यहाँ पर्यटकों के रुकने के लिए जीटीडीसी का होटल तोरण है। भुज से अगर आप 6 -7 बजे तक निकल सकें तो यहाँ 12 बजे तक पहुंचा जा सकता है। रोड से यह 230 KM के लगभग है। खाना वगैरह साथ रखें और पहुँचने से पहले ही खा पी लें तो 2 घंटे में आप इस जगह को देख कर अगर 3 बजे तक भी निकाल सकें तो रात 8 बजे तक वापस भुज लौट आएंगे। एक व्यावहारिक सलाह है की अगर साथ में छोटे बच्चे हों तो ऐसा तूफानी दौरा न करें। बच्चों को इन खंडहरों में कोई मज़ा नहीं आएगा। 





क्रमशः 




9 जन॰ 2013

कच्छ नहीं देखा तो कुच्छ नहीं देखा


कच्छ नहीं देखा तो कुच्छ नहीं देखा

गाजियाबाद स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार 
यात्रा की तैयारी और प्रस्थान: मेरे श्वसुर जब से रिटायर हुये हैं अपने अधूरे सपनों को पूरा करने के मिशन पर हैं। वर्षों तक राज्य कर विभाग की शुष्क नौकरी करने के बावजूद जिंदगी में रस वे खोज ही लेते हैं। इस मिशन का आरंभ उनकी अंडमान यात्रा से हुआ था। उसकी प्लानिंग में मैंने सहयोग किया था। उसी दौरान कच्छ के रण उत्सव का प्रचार किसी अखबार में निकला तो उनहोने वहाँ भी नव वर्ष मनाने की ठान ली। अब इतनी यात्रा की प्लानिंग आप करेंगे तो मन में कुबुलाहट तो होने ही लगेगी ना सो मेरे मन में भी कच्छ देखने की लालसा जाग उठी। फिर तीन दिन टेंट में बिताने की बात ही कुछ और है। पर जाने आने और ठहरने में कुल 7 दिन चाहिए थे और भला आजकल की जिंदगी में इतनी बड़ी छुट्टी के बारे में सोचना ही अपने आप में एडवेंचर स्पोर्ट जैसा है। मन फिर भी वहीं लगा रहा। पत्नी भी डॉक्टर है और 7 दिन की छुट्टी मुश्किल है। तो लगभग आइडिया ड्रॉप ही कर दिया था की तभी चाचा जी कानपुर से सपरिवार आए हुये थे। बातों बातों में चर्चा पापा जी की यात्राओं की योजनाओं पर चल पड़ी तो जैसा की होना था आनन फानन में उनहोने भी कच्छ देखने की इच्छा व्यक्त कर डाली। चर्चा हुयी और तय पाया गया की 7 दिन की छुट्टी किसी भी तरह हासिल और प्रबंधित की ही जाए। चाचा जी ने फौरन अपने ट्रेवेल प्लानर को फोन करके 6 ट्रेन टिकट गाजियाबाद से भुज आला हज़रत एकक्स्प्रेस से बुक करने का आदेश दे डाला। फिर क्या था। मैंने भी अगली साप्ताहिक छुट्टी में दिल्ली कनाट प्लेस में स्थित गुजरात टूरिज़म के दफ्तर पहुँच कर टेंट बुक करा ही दिये।एसी टेंट का किराया 9500 रुपये प्रति व्यक्ति था और साथ में प्रत्येक यात्री की फोटो और मुख्य लोगों का पहचान पत्र आवश्यक था। एक टेंट 2 व्यक्तियों के लिए है और अतिरिक्त बिस्तर के लिए 4500 रुपये और लगेंगे। यह एक महंगा सौदा लगा। इसके बाद शुरू हुयी छुट्टियों की प्लानिंग। जैसे तैसे कर के हम सब ने छुट्टियों की प्लानिंग कर ही डाली। बीच में एक वह भी पल आया जब लगा कि अब कोई नहीं जा पाएगा। पर आखिर अमिताभ की पुकार ही भारी पड़ी। इस बीच मैंने इन्टरनेट,  गूगल मैप, यात्रा डॉट कॉम आदि स्रोतों से भुज के मौसम, होटल और दर्शनीय स्थलों की वास्तविकता के बारे में कुछ जानकारी हासिल कर ली। मेरा यात्रा के विषय में यह विश्वास है कि होटलों का चुनाव करते समय अगर आप 5 स्टार के व्यसनी नहीं हैं तो सबसे पहले राज्य टूरिज़म के होटलों को देख लेना चाहिए। ये होटल ना केवल अच्छी जगहों पर स्थित होते हैं बल्कि सस्ते, ठीक ठाक सेवा वाले होते हैं। जिन राज्यों का टूरिज़म विभाग बहुत अच्छा है उनमें मुझे सबसे बढ़िया केरल और गुजरात ही लगा। लेकिन भुज में GTDC (Gujarat Tourism Development Corporation) का कोई होटल नहीं था अतः GTDC की वेब साइट पर ही सुझाए गए एक होटल प्रिस रेसिडेन्सी को चुन लिया। मेरा एक ममेरा भाई भी भुज में 4 वर्षों तक रह चुका था अतः उससे भी जानकारी ले ली गई।उसके अनुसार ही दिन में आप एक स्वेटर या कोट के साथ काम चला सकते हैं लेकिन रात में तापमान 14 डिग्री के करीब पहुँचने पर आपको जैकेट आदि की जरूरत पड़ती है। भुज में हवाएँ तेज़ चलतीं हैं इसलिए टोपी और मफ़लर भी आवश्यक हैं। बच्चों के लिए विशेष तौर पर। बच्चे साथ में थे और मौसम ठंडा था अतः हम यात्री धर्म की एक शर्त निभाने में नाकाम रहे - सीमित सामान। हमारे और पापा जी के मिला कर कुल 14 अदद हो चुके थे और गाजियाबाद स्टेशन पर कुली नहीं मिलते हैं यह सोच कर मैं थोड़ा परेशान था। अतः ड्राइवर के साथ ही ऑफिस में काम करने वाले गुड्डू को भी साथ ले लिया गया। ट्रेन 10:50 AM पर थी और हम ठीक 10 बजे स्टेशन पर पहुँच गए। इसका एक कारण यह भी था कि मैंने सभी को ट्रेन का समय 9:50 एएम बता रखा था। 31 दिसंबर 2012 को गाजियाबाद स्टेशन घने कुहासे में ढका था। स्टेशन की गंदगी, बू और भीड़ से जूझते हमने आखिरकार सारा सामान एक जगह लगा लिया। अब शुरू हुआ ट्रेन का इंतज़ार और जैसी कि स्वाभाविक ही था ट्रेन तय समय से 1 घंटा विलंब से पहुंची। A-1 और B-2 बोगी में हमारी सीटें थीं। सारा सामान जमा कर हम भी अपनी सीटों पर जम गए और ट्रेन चल पड़ी।
आला हज़रत एक्स्प्रेस  से सूर्यास्त 
भारतीय रेलवे की दुर्दशा : दुनिया की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण रेल प्रणाली पर हमें गर्व है लेकिन उतना ही दुख भी कि यह अपने यात्रियों को सही सेवा उपलब्ध नहीं करा पाती। बेहद गंदी और उपेक्षित इस ट्रेन में एसी 2 टायर में भी बाथरूम प्रयोग लायक नहीं थे, कूड़ेदान बजबजा रहे थे और सीटों से काकरोच झांक रहे थे। पर्दे अपनी जगह रहें इसलिए यात्रियों ने ही पिनों और कीलों से उन्हें रोक रखा था। भारतीय रेल को अपनी दशा सुधारनी ही चाहिए। थोड़ा किराया बढ़ा कर अगर व्यवस्था सुधरती हो तो क्या बुरा है? फिर अकेले किराए से ही काम नहीं चलेगा कार्यसंस्कृति भी विकसित होनी चाहिए। कर्मचारियों की ज़िम्मेदारी ताया होनी चाहिए और यात्रियों को भी शिकायत पुस्तिका का प्रयोग करना चाहिए। कम से कम दो क्षेत्र तो ऐसे है जिनमें बिना पैसे बढ़ाए ही सुधार लाया जा सकता है पहला है कि प्रत्येक स्टेशन पर कूड़े की सफाई और बाथरूम की सफाई होनी चाहिए और दूसरा खान पान को ले कर बेहतर विकल्प उपलब्ध होने चाहिए। ट्रेन में जो भी खाना हमने लिया वह बिलकुल भी खाने लायक नहीं था। यह कोई सरकारी खैरात नहीं थी जिसे बिना गुणवत्ता देखे ले लिया जाए जैसा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली या मिड ड़े मील मैं होता है। यहाँ तो हम निजी वेंडरों से पैसे दे कर खाना खरीद रहे हैं। 40 रुपये की प्लेट में चावल, 2 रोटियाँ, तीन सब्जियाँ, पापड़, आचार, गुलाबजामुन और दही शामिल करने की क्या जरूरत है अगर ये सब खाने लायक ही ना हों। इसके बजाए अगर आप 40 रुपये में केवल 4 पूरियाँ और एक सब्जी ही रखें लेकिन वह उचित गुणवत्ता की हो तो अधिक सुकून मिलेगा। दाल में दाल थी ही नहीं और आलू सड़े हुये थे। चावल तो ऐसे कि छूने को बन ना करे। दही तो सफ़ेद पानी था और गुलाब जामुन की तो जाने दीजिये। रेलवे प्रबंधन को इस ओर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। खैर अन्य सभी यात्रियों कि तरह और एक अच्छे भारतीय नागरिक की तरह हमने संतोषी सदा सुखी का आदर्श मानते हुये यात्रा का आनन्द लेने लगे। साथ में और भी कई परिवार थे जो रण उत्सव में ही जा रहे थे। बातें करते और खाने पीने में दिन बीता और रात सोने में। अन्वी ने आस पास के बच्चों से दोस्ती कर ली और सारे रास्ते बतियाते,रूठते मानते रहे। विश्वम ने भी यात्रा का मज़ा लिया और सारे रास्ते गुजरात का इंतज़ार करता रहा। यह उसकी पहली लंबी ट्रेन यात्रा थी। मुझे अपना बचपन याद आ गया। मुझे ट्रेन बहुत पसंद है। इसकी तुलना आप किसी से नहीं कर सकते विशेष तौर पर भाप के इंजन वाली ट्रेन से। ऐसी खूबसूरत मशीन मानव ने शायद ही और कोई बनाई हो। शायद ट्रेन कि इसी हसीन चाल से प्रेरित हो कर दुष्यंत कुमार ने लिखा होगा

 “वोह ट्रेन सी गुजरती है मैं पुल सा थरथराता हूँ”

ट्रेनों और स्टेशनों पर मुझे हमेशा ही अच्छा लगता है। शायद आप महसूस कर सकें कि स्टेशन की आवाजें, बू, स्टाल, यात्रियों की भीड़ और चहल पहल, पीली और सफ़ेद रोशनियाँ, एनाउंसमेंट सब कुछ मिल जुल कर कैसा माहौल बनाते हैं। कम ही होंगे जिनहोने ट्रेन की खिड़की से बाहर पटरियों का तेज़ खेल ना देखा हो। ती इन्हीं विचारों में खोया जागा पहुँच गया गुजरात के शहर भुज। 

16 दिस॰ 2012

किसी रंजिश को हवा दो की मैं ज़िंदा हूँ अभी

किसी रंजिश को हवा दो की मैं ज़िंदा हूँ अभी 

अमेरिका के राष्ट्रपति की आँखें फिर नम हैं। अभी बहुत दिन नहीं हुये हैं जब ऐसी ही घटना ने उन्हें आहत किया था। शब्द और माहौल भी वही हैं गमगीन, गंभीर और कुछ करने के वादे , कुछ नहीं बदला है और शायद कुछ बदलेगा भी नहीं। आखिर छोटे बच्चों की मौत पर भला अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसी महान और शानदार लाइनों को अमेरिकी संविधान से यूं ही तो नहीं मिटाया जा सकता। और भला इससे किसका फाइदा होगा? अगर अमरीकी शस्त्र कानून बदलाव किया जाता है तो बंदूकों की बिक्री बंद हो जाएगी। लोग बेरोजगार होंगे और अराजकता फैलेगी फिर लोग अवैध तरीके से हथियार लेकर यही काम करेंगे। इसलिए यह कानून रहेगा और ऐसा ही रहेगा। इसके पैरवी करने वाले इतने सजग हैं की जिस दिन यह घटना घटी ठीक उसी दिन डिस्कवरी चैनल पर मैंने एक कार्यक्रम देखा जिसका नाम था डूम्स डे प्रेपेयर्स। इसमें एक सज्जन ने प्रलय या डूम्स डे के लिए तैयारी में पानी से ज्यादा बंदूकें खरीद रखीं थीं और उसका पूरा चिंतन इसी एक तर्क पर टीका था की जब मंदी आएगी तो अराजकता फैलेगी और उससे रक्षा के लिए हमें ऐसी तैयारी की ही आवश्यकता होगी। तो ऐसे कार्यक्रम दरअसल एक डर पैदा करके उस भय के व्यावसायिक दोहन के लिए माहौल बनाते हैं। तो मुझे पूरा भरोसा है की अभिव्यक्ति की आज़ादी छीनी नहीं जाएगी।

हाल की घटना में एक नौजवान ने एक स्कूल में फायरिंग करके 20 बच्चों और 8 वयस्कों की जान ले ली और खुद को एवं अपनी माँ को भी मौत के घाट उतार दिया। मामले की परतें खुलने पर पता चला है की यह नौजवान एक समृद्ध परिवार से था जिसके पिता बहुराष्ट्रीय कंपनी जीई कैपिटल में वाइस प्रेसिडेंट हैं और विश्व की सबसे बड़ी सलहकार फार्म अर्न्स्ट एंड यंग में पार्टनर भी हैं। लड़के का बड़ा भाई भी अर्न्स्ट एंड यंग में अच्छे पद पर है। बचपन में ही मटा पिता का अलगाव हुआ और फिर तलाक जिसके बाद दोनों अपनी माँ के साथ रहते थे जो इसी स्कूल में टीचर थी। आस पास के लोगों ने इस नौजवान को कभी बात करते या मिलते जुलते नहीं देखा और ना ही कोशिश की क्यूंकी उन्हें लगता था की वह अकेला ही रहना चाहता है। उसके एक सहपाठी के अनुसार वह होशियार था। उसकी कभी हिंसक गतिविधियां भी नहीं थीं। तब आखिर क्या बात थी जिसने उसे ऐसा कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया। क्या ऐसी घटनाओं के लिए अमेरिका ही अभिशप्त है ? भारत में ऐसी हृदयविदारक घटनाएँ क्यूँ नहीं होतीं? क्या यह संस्कृति से संबन्धित मामला है ? क्या ऐसा करने वाले आपराधिक मनोवृत्ति के लोग होते हैं?क्या यह कमजोर शस्त्र कानून का नतीजा है ? प्रश्न बड़े हैं और उत्तर नदारद। 

मुझे याद है अपना बचपन जो एक छोटे कस्बे में बीता था। हमारे मुहल्ले में कोई अकेला हो ही नहीं सकता था। आप बाहर निकालिए तो पूरी गली पार करते करते चबूतरों पर धूप सेंकते बुजुर्ग और गली के लड़के अगर यह ना पूछें की "काए लला कहाँ जाय रहे ?" तो लानत है उनके वहाँ होने पर  और आपको भी अपने अस्तित्व का बखूबी एहसास हो जाता था। अगर कभी कोई समस्या होती तो पूरा मुहल्ला शामिल होता और दुख तो खैर होता ही था सामूहिक। लड़की की शादी हो तो सहायता बिना मांगे मिलती थी। पड़ोसियों की खबर रखना अशिष्ट नहीं आवश्यक था। सब कुछ अच्छा अच्छा ही नहीं था बुराइयाँ भी थीं पर कम से कम उस स्थिति से तो बेहतर ही था जिसमें बगल के फ्लैट में आदमी चार दिन से मरा पड़ा हो और लोगों का ध्यान तब जाए जब बदबू आने लगे। 

मुझे लगता है की हमें फिर से सोचना होगा हमारे विकास और सफलता के मापदण्डों के बारे में। क्या किसी एमएनसी का CEO बनना ही जबकि आपका परिवार बिखर रहा हो । क्या मशीन की तरह काम करना और पैसा कमाना ही सफलता का मापदंड होना चाहिए। इस आधार पर उस नौजवान के पिता सफल हैं परंतु क्या वे मानवीय पैमानों पर सफल हैं? जब आपका परिवार बिखर रहा हो तो सफलता की सिद्धियों का क्या मतलब है। और क्या ऊंची इमारतें, फ़्लाइओवर, एकप्रेसवे, बड़ी गाड़ियां, ऊंचे पुल और बड़ी कंपनियाँ बैंक ही किसी समाज की सफलता की गारंटी हैं। अगर एक समाज अपने बच्चों को सुरक्षा, शिक्षा और सही वातावरण नहीं दे सकता तो उसके सफल होने का क्या अर्थ ? क्या एक राज्य तभी सफल है जबकि वह सबसे ज्यादा हथियार, सेना और शक्ति का प्रदर्शन कर सकता है जबकि उसका समाज दरक रहा हो। क्या एक संविधान अभिव्यक्ति की आज़ादी के पीछे जीवन के अधिकार को पीछे धकेल कर सफल माना जा सकता है। आखिर व्यक्तिगत जीवन की सुरक्षा से अधिक महत्वपूर्ण सामाजिक जीवन की सुरक्षा होनी चाहिए। राज्य एक सामूहिक व्यवस्था है और इसमें व्यक्ति की निरपेक्ष स्वतन्त्रता नहीं होती इसलिए अमेरिकी क़ानूनो की निरपेक्षताएँ अक्सर विरोधाभासी नज़र आती हैं। इस घटना में नौजवान ने सभी हथियार कानूनी ढंग से खरीदे थे। उसे रोका नहीं जा सकता था यह उसकी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता थी लेकिन उन लोगों के जीवन के नैसर्गिक अधिकार का क्या ? क्या यह अधिकार कम महत्वपूर्ण हैं ? अमेरिकी समाज का यह अकेलापन ऐसी घटनाओं का कारक बनता है। 
इस अकेलेपन में जब कोई नौजवान अपने अस्तित्व का आभास कराना चाहता है तब समाज व्यक्तिवादी हो कर उसके अकेलेपन को उस पर थोप देता है। उससे कोई नहीं पूछता की वह क्या चाहता है। उसके माँ बाप भी उसके कमरे के दरवाजे को अपनी सीमा मानते हैं और जब वह अकेलापन इतना असहनीय हो जाए तब वह एक ऐसी रंजिश को हवा देता है की जो समाज अभीतक उसके अस्तित्व से बेखबर था वह उसके होने और ना रहने के पलों को याद करके बरसों कांपता रहता है। 

तेल की धार देखो ............

प्रधान मंत्री जी कह रहे हैं की तेल का बिल , शिक्षा और स्वस्थ्य के बिल से ज्यादा है और इसे कम करके इन क्षेत्रों में लगाना जरूरी है । उत्तम विचार है। आखिर स्वस्थ्य और शिक्षा क्षेत्रों में पैसा है ही कहाँ जिसे खाया जा सके ! इन क्षेत्रों में जरा सा घोटाला करो नहीं की पकड़ में आ जाता है। कोई मंत्री स्वस्थ्य और शिक्षा का विभाग नहीं लेना चाहता और ना ही कोई कॉर्पोरेट इनके लिए लॉबीइंग करता है। अब तेल का पैसा आएगा तो हालत सुधरेंगे। अब ज़रा देखिये ना अभी यूपी में जो घोटाला हुआ है उसमें कितनी जानें चली गईं हैं। CMO भक्षी बन गया है राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन। सारी बुराइयों की जड़ सबसिडी ही है। छोड़ दीजिये उस अंतिम आदमी को बाज़ार के भरोसे और मुकर जाइए उन जिम्मेदारियों से जो एक कल्याणकारी राज्य की मानी जातीं है। 

11 दिस॰ 2012

पश्चिम का पागलपन

एक ऑस्ट्रेलियन एफ एम चैनल के जोकी द्वारा एक भारतीय मूल की नर्स को झूठी कॉल की और ब्रितानी राज घराने की बहू केट मिडल्टन के गर्भवती होने की खबर हासिल कर ली। इसके बाद उठे तूफान ने नर्स को इतना परेशान किया की उसने ख़ुदकुशी कर ली। इस घटना से एक बार फिर उस पागलपन पर प्रश्न चिह्न लग गया है जो शाही परिवार के बारे में खबरें प्राप्त करने के लिए जुनूनी हदें पार कर जाता है और कई जानें भी ले चुका है जिसमें खुद प्रिंस विलियम की माँ डायना की दर्दनाक मौत शामिल है और अब एक और जान केवल इसी वजह से चली गयी। शाही परिवार या सेलिब्रिटी की निजी ज़िंदगी के बारे में क्या श्रोता या पाठक वाकई इतने लालायित होते हैं कि रेडियो जौकी और पेप्रात्ज़ि कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं?! मुझे पूरा भरोसा है कि लोग ऐसा नहीं चाहते। आखिर क्यूँ नहीं कुछ अखबार या चैनल एक ऐसा व्यापक अध्ययन नहीं करा लेते जिसमें लोगों से इस प्रश्न को पूछा जाये। मुझे लगता है कि सेलिब्रिटी भी इस जनमत संग्रह को पसंद करेंगे और एक बड़े पागलपन से हम सबका पीछा छूटेगा। 

30 नव॰ 2012

धारा 19 बनाम धारा 66


पिछले दिनों मुंबई के एक स्थानीय नेता के निधन के बाद जैसा माहौल बिके हुये समाचार चैनलों ने बनाया उससे लगा जैसे इसके अलावा और कोई जरूरी मुद्दे नहीं हैं। बॉलीवुड के घाघरे में हर समय घुसे रहने वाले इन चैनलों को शाहरुख, सलमान बच्चन से अगर फुर्सत मिलती है तो कैमरा टिकता है ऐसे नेताओं पर जिनकी दुकान ही चलती है चुन चुन कर भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त गारंटियों को ध्वस्त करने से। ये बिके चैनल हर सामान्य कलाकार से उसकी खबर के ऐवज में पैसे मांगते हैं, हर अखबार खबर के बदले विज्ञापन चाहता है। न्यूज़ चैनलों पर या तो नेताओं और एंकरों की फिक्स लफ़्फ़ाजियाँ होतीं हैं या फिर करोड़ों रुपये ले कर फिल्मों और सीरियलों के प्रचार। कोई ढंग की स्टोरी, खबर से अब इनका नाता नहीं रहा। जनता का सरोकार जनता की रुचि के नाम पर स्वाहा कर दिया गया है लेकिन मुंबई के कार्टूनिस्ट और स्वयंभू हिन्दू हृदय सम्राट 
के निधन पर लगभग पूरा पखवाड़ा ही स्वाहा कर दिया गया। उन महान नेता के व्यक्तित्व पर खूब चाशनी लपेटी गयी और भरा पूरा श्रद्धांजली वाला माहौल बनाया गया। 
                             फेसबुक पर एक लड़की द्वारा ऐसे ही माहौल पर प्रश्न खड़ा करना उस नेता के पिछलग्गुओं (अनुयाई सिद्धांतों के लिए प्रयोग  किया जाता है ) और इनसे भयभीत राज्य का वह महकमा जो असल में जनता को भयमुक्त करने के लिए था, इन लड़कियों को भयभीत करने में जुट गया। मुंबई पुलिस को आधा घंटा भी नहीं लगा यह सुनिश्चित करने में की इन लड़कियों ने, जिनमें से एक ने तो केवल उस पोस्ट को लाइक ही किया था, सूचना तकनीक कानून की धारा 66ए का उल्लंघन किया है और माननीय न्यायाधीश को उससे भी कम समय लगा उन नागरिकों के प्रथम दृष्टया अपराध निर्धारित करने में। और उन गुंडों को तो खैर और भी कम समय लगा लड़की के रिश्तेदार डॉक्टर का क्लीनिक ध्वस्त करने में। इस चापलूसी, भय और राजनौतिक मजबूरी के कुहासे में यह तथ्य कहीं खो गया की फेसबुक पर महाज़ 200 शब्दों की छोटी से टिप्पणी अगर सेडिशन और व्यवस्था के लिए खतरा हो सकती है तो फिर उन दिवंगत महान नेता के वे जहर बुझे वाक्य क्यूँ नहीं सेडिशन, अराजकता का खतरा जैसी चिंताएँ नहीं उठा सके? आखिर धारा 19 का ध्यान मुंबई पुलिस को क्यूँ नहीं आता और क्यूँ नहीं कोई न्यायालय धारा 19 के उल्लंघन को निर्धारित नहीं कर पाते। (धारा 19 हमारे संविधान में है और नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता कुछ प्रतिबंधों के साथ देती है।)


संविधान द्वारा मिले अधिकार: संविधान का अनुच्छेद १५ हमें आश्वासन देता है कि हमसे भारत देश में धर्म, जाति,मूलवंश, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद नहीं किया जाएगा. अनुच्छेद १६ के द्वारा संविधान सरकारी नौकरियों में  न केवल अवसर की समानता देता है बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि हमसे धर्म, जाति, मूलवंश, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद ना हो. इसी प्रकार अनुच्छेद १९ प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति एवं अन्तःकरण की स्वतंत्रता प्रदान करता है. हमें यही अनुच्छेद सम्पूर्ण भारत में घूमने फिरने, कहीं भी बस जाने और कोई भी व्यवसाय कहीं भी करने का अधिकार देता है.
परन्तु अभिव्यक्तिका यह अधिकार निर्बाध नहीं है. इन स्वतंत्रताओं पर रोक भी लग सकती है यदि इनका प्रयोग भारत कि एकता, अखंडता, संप्रभुता, लोकव्यवस्था, विदेशी राज्यों के साथ मैत्री पूर्ण संबधों पर विपरीत असर डालने में किया जायेगा. संवैधानिक पदों पर व्यक्ति को प्रतिज्ञन करनी होती है उसका पूरा खाका भी संविधान कि एक अलग सूची (तीसरी अनुसूची) में किया गया है. प्रत्येक विधायक, सांसद और मंत्री को संविधान के प्रति निष्ठा कि और एकता व अखंडता को सुरक्षित रखने कि शपथ लेनी होती हैं.

अब यदि उपरोक्त तमाम कानूनों के प्रकाश में हम बाल ठाकरे, उद्धव ठाकरे और राजठाकरे के वक्तव्यों को देखें तो प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके वक्तव्य संविधान विरोधी हैं.

बैंक या रेलवे के परीक्षर्थियों पर हमला और उन्हें परीक्षा से वंचित करना अनु० १५ और १६ का उल्लंघन है. साथ ही यह ऐसी अभिव्यक्ति है जो लोकव्यवस्था, एकता, अखंडता,संप्रभुता पर विपरीत असर डालती है अतः इसकी अनुमति किसी संगठन को नहीं दी जा सकती (अनु० १९).

पाकिस्तान या ऑस्ट्रेलिया के खिलाडियों सम्बन्धी राज - बाल ठाकरे के बयान निश्चित तौर पर विदेशी राज्यों से संबंधों पर विपरीत असर डालते हैं और अनु ० १९ का उल्लंघन करते हैं.

उत्तर भारतीयों को मुंबई से भगाने, उन पर हमला करने जैसे कृत्य अनु० १५, १६ कीबखिया उधेड़ते हैं तो एक राजनीतिक दल के रूप में चुनाव आयोग की आचार संहिता का उल्लंघन भी करते हैं. चुनाव आयोग एक संवैधानिक निकाय है और राजनैतिक दलों के लिए निर्धारित आचार संहिता के पहले पैराग्राफ में ही लिखा है कि "कोई भी पार्टी ऐसीकिसी गतिविधि में शामिल नहीं होगी जो धर्मं, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर विभेद पैदा करती हो." पर शिवसेना आदि दल ऐसा ही करते हैं औरखुले आम करते हैं. 

ये दल स्वयं को सांस्कृतिक दल कहते हैं परन्तु इनकी कार्यवाहियां हिंसक, फासीवादी और अलगाववादी हैं. यह दल इसी अराजकता के सहारे थोड़ी सी राजनैतिक शक्ति जुटा कर क्षेत्रीय राजनीति में सौदेबाजी करते हैं और तो और केंद्रीय राजनीती को भी प्रभावित करते हैं. यह भी संविधान का उल्लंघन ही है क्यूंकि संविधान लोकतान्त्रिक व्यवस्था कि गारंटी देता है जबकि यह दल हफ्ता वसूली दल कि भांति काम करते हैं. शिवसेना केवल मुंबई कि राजनीती कर के स्वयं को पूरे महाराष्ट्र का ठेकेदार मानती है. २८८ में से केवल १३ सीटें जीतने वाले दल आखिर राजनीती कि दिशा क्यूँ तय करें? इस प्रकार शिवसेना हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर हर दृष्टि से प्रश्नचिंह लगाती है.  है कोई कानून जो इन महान नेताओं को नाथ सके? 



(भारत भाग्य विधाता के भरोसे अपलोड कर रहा हूँ )

21 नव॰ 2012

हंगामा है क्यूँ बरपा !

एक भारतीय दांत चिकित्सक महिला की आयरलैंड में इसलिए मौत हो गयी क्यूंकी डॉक्टर ने उसकी जान बचाने के लिए आवश्यक होते हुये भी गर्भपात करवाने से इनकार कर दिया क्यूंकी उसका कानून इसकी इजाज़त नहीं देता। इससे पुनः आइरिश कानून पर बहस छिड़ गयी है और भारत ने तो बकायदा आयरलैंड को सलाह भी दे डाली है की इस मामले की निष्पक्ष जांच करा ली जाए (जैसी की अपने यहाँ के नताओं को आदत सी हो गयी है) अनेक भारतीय समाचार चैनल इस मसले पर हंगामा बरपा रहे हैं । उस महिला की मौत दुर्भाग्यपूर्ण है और वह डॉक्टर तो निश्चित ही निंदनीय है जिसने उसका सही इलाज करने के अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं किया लेकिन ज़रा यहाँ ठहरिए और सोचिए क्या हमें अधिकार है इतना हंगामा खड़ा करने का ?

  • भारत के लोग हर वर्ष लाखों बच्चियों को गर्भ में मार डालते हैं। भारत के छोटे से छोटे कस्बे में अल्ट्रासाउंड सबसे चोखा धंधा है। इसे ले कर किसी डाक्टर को कानून क्या भगवान भी याद नहीं आते। आयरलैंड के डाक्टर कम से कम कानून का तो पालन करते हैं। 
  • भारत में हर वर्ष असुरक्षित प्रसव से लाखों माताओं की मौत होती और लाखों बच्चे मर जाते हैं तब कोई हँगामा नहीं सुनाई देता बस हर दस वर्ष में रस्मी तौर पर जनगणना के आंकड़ों पर बहसें हो जाया करतीं हैं। 
  • भारत में हर वर्ष लाखों बच्चियों की अल्पवयस्क होते हुये भी शादी की जाती है तब कोई हंगामा नहीं होता। 
  • भारत के चौराहों पर, मंदिरों में, और उनके बाहर, रेलवे स्टेशनों पर लाखों बच्चे भीख मांगते हैं पर तब हमें शर्म, गुस्सा या खीज नहीं होती। 
  • भारत के लाखों बच्चे आज भी भूख से मर जाते हैं पर किसी के कण पर जूँ तक नहीं रेंगती । 
  • भारत में हर वर्ष लाखों विवाहित महिलाएं दहेज के लिए मार डालीं जातीं हैं पर हमें फर्क नहीं पड़ता। 
  •  भारत जो एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है ( हम आयरलैंड की कैथोलिक एंगिल से भी आलोचना कर रहे हैं ) औरतों के लिए अलग अलग कानून हैं - हिंदुओं के लिए अलग और मुसलमानों के लिए अलग।
  • भारत में हर वर्ष सैकड़ों लड़कियां इसलिए मार दी जाती हैं क्यूंकी वे अपनी पसंद का जीवन साथी चुन लेतीं हैं। 
इन सबके लिए -----ध्यान से देखिये सरकार नहीं लोग दोषी हैं ----यही सबसे बड़ा भ्रष्ट आचरण है ---- स्विस बैंकों में दौलत जमा करने से बड़ा पाप है अजन्मी बच्चियों की हत्या, पैसे के लिए अपनी पत्नी, बहू की हत्या, धर्म की आड़ में बच्चों को टीकाकरण से दूर रखना, स्त्रियॉं को सामान्य मानव के हकों से दूर रखना। चिंता हमें आयरलैंड के क़ानूनों की नहीं अपने समाज की करनी चाहिए। आयरलैंड का क़ानून ो मुझे स्पष्ट लगा की अगर माँ की जान बचाने के लिए गर्भपात आवश्यक है तो इसकी अनुमति है पर हमारे देश के उन क़ानूनों की चिंता कीजिये जो ऐसे छेद छोड़ देते हैं जिससे उन्हें तोडा जा सके। आइये चिंता करें उन क़ानूनों की जो किसी स्त्री को उसका अधिकार नहीं दे सकते। आयरलैंड को निपटने दीजिये इस मुद्दे से वे इसे अपनी तरह से हल कर ही लेंगे। 

12 नव॰ 2012

जनता है सोने की मुर्गी

2G घोटाले के बाद अब तक घोटालों के प्रति हमारी संवेदनाओं को तृप्त करने वाले और भीषण, विभीषण प्रकार के घोटाले सामने आ चुके हैं। पर जैसा की हर घोटाले में होता है - दोनों ओर से जनता ही हलाल होती है। पहले तो जनता के कारों के पैसों से विकसित तकनीक को कौड़ियों के दामों पर निजी कंपनियों को बेच दिया गया। इन कंपनियों ने इसके ज़बरदस्त दाम वसूले। शायद आपको वह ज़माना याद भी ना हो की 1997 में मोबाइल कॉल दरें 18 रू प्रति मिनट थीं और इंकमिंग भी फ्री नहीं थी। फिर घोटाला खुला और न्यायालय ने सभी आबंटन रद्द कर दिये। हालांकि सज़ा नहीं हुयी। न्यायालय असाहय है। आरोप सिद्ध करना जिसका काम है वह करबद्ध और नतमस्तक है। लेकिन न्यायालय के इस फैसले के बाद अब मंत्री जी का संकेत है की दाम बढ़ेंगे। यानि जनता को फिर से हलाल किया जाएगा। क्या न्यायालय सुओ मोटो इस मामले को ले कर न्याय दिलाएगा की स्पेक्ट्रम के आबंटन से जो घाटा हुया वह इन कंपनियों के प्रॉफ़िट से वसूला जाए, दोषी नेताओं के वेतनमान, भविष्यनिधि और पेंशन फंड से काटा जाए। स्पेक्ट्रम नीलामी के नाम पर कॉल दरों को बढ़ाना नैसर्गिक न्याय का स्पष्ट उल्लंघन है। आखिर जनता कितनी बार और क्यूँ टैक्स भरे? पहले तकनीक विकास के लिए, फिर उस तकनीक के उत्पाद को खरीदने और प्रयोग करने पर टैक्स, और अब घोटालेबाज कंपनियों को जब दोबारा पैसा देना पड़ रहा है तो बढ़ी कॉल दरों के रूप में अनुचित भुगतान और अनुचित टैक्स। क्या न्यायालय संज्ञान लेगा ?