विचार पक्षियों जैसे होते हैं। मस्तिष्क के विशाल और अनंत फलक पर वे बादलों की तरह अचानक आते हैं, आकृतियाँ बदलते हैं, पक्षियों की तरह मँडराते हैं और फिर दूर कहीं गुम हो जाते हैं। बाज़ीचा-ए-अत्फाल है दुनियाँ मेरे आगे, होता है शब ओ रोज़ तमाशा मेरे आगे। इन्हीं तमाशों पर जो विचार आकार लेते हैं उन्हें पकड़ने का प्रयास है यह चिट्ठा। आपको अच्छा लगे तो एक लघु चिप्पी चस्पा करना ना भूलें।
27 फ़र॰ 2012
नोर्वे को सबक
12 फ़र॰ 2012
व्हिट्नी ह्यूस्टन नहीं रहीं
8 फ़र॰ 2012
उदार हृदय और खुला दिमाग
1 फ़र॰ 2012
आ इक नया शिवाला इस देश में बना दें
रवीश के मिसरे पर अपनी गज़ल
मीनार पर चढ़ कर बांग देते है, एंकर हैं हर मुद्दे को धांग देते हैं
सदन के गलियारों से लालाओं के दालानों तक, हम एंकर हर काम को अंजाम देते हैं।
कभी फेंक देते हैं तो कभी टांग देते हैं, एंकर हर शख़्स को ऐसा ही मक़ाम देते हैं।
तबीयत अपनी घबराती है सुनसान रातों में, जब एंकर चीख चीख कर बांग देते हैं।
पत्रकारिता अब भी एक मिशन है यारो, पर ये मोटे कॉर्पोरेट मुर्गे मोटा ईनाम देते हैं।
कहे रवीश मर गया है रिपोर्टर, अब तो एंकर ही हर काम को लाम देते हैं।
टीआरपी, विज्ञापन और आकाओं को बचाना है इसलिए एंकर आम आदमी के मुदद्दों को थाम लेते हैं
एक नाटक का सुखांत
कितना अभूतपूर्व था भारतीय लेखकों का अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिए खड़े हो जाना। कितना सुंदर था यह प्रयास सरकार का की हम धर्मनिरपेक्ष देश में सबकी सुनेंगे उनकी भी जो धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं। नहीं सुनेंगे तो बस उन धर्म निरपेक्ष आवाज़ों को जो आतीं हैं यूपी के बुनकरों के घरों से या बुंदेलखंड के किसानों की झोपड़ियों से। वे
नहीं सुनेंगे विदर्भ के उन मरते किसानों की आहें। वे नहीं सुनेंगे गर्भ मेनमरती बच्चियों की चीखें। नहीं वे नहीं सुनेंगे आवाज़ें जो मँगतीं हैं हक। जो मँगतीं हैं शिक्षा, रोजगार और स्वस्थ्य। वे सुन नहीं सकेंगे 170 मिलियन स्लमडॉग्स (हमें गर्व है कि हमें गाली दे कर बनाई गयी फिल्म से ही ऑस्कर देवता ने कृपा की) की व्यथा जो मजबूर हैं अमानवीय परिस्थितियों में रहने को। दरअसल वे जिनका होने का दावा करते हैं सबसे दूर वे उनसे ही हैं।
सलमान रुशदी की लेखकीय क्षमता पर तो खैर विशेषज्ञों को ही अधिकार है बोलने का लेकिन मिडनाइट्स चिल्ड्रेन और सेटेनिक वर्सेज़ पड़ने के बाद लगा कि खुमैनी के फतवे ने उन्हें अपने आकार से ज्यादा जगह दे दी है जिसे भरने का प्रयास वे अपनी बदन दिखाऊ पेज 3 पत्नियों के जरिये करने की कोशिश करते हैं। बेशक पत्नियाँ बुढ़ातीं हैं और इस काम के लिए नयी आपूर्ति तलाक के जरिये हो जाती है। हॉलीवुड के बहुतेरे कब्रोन्मुखी सेलिब्रिटीज को देखा है मेंने। हर 3 साल में पत्नियाँ बदल बदल कर ही खबरों में रहते हैं। शादी करते हैं तो खबर, तलाक लेते हैं तो खबर। तलाक का सेटेलमेंट ही करोड़ों में होता है। तो ऐसे महान लेखक का यहाँ आना हमारे साहित्य जगत के लिए बड़ी बात थी।
उनके आने से पता नहीं कितने नव लेखकों को प्रेरणा मिलती और साहित्य का कैसा भला होता लेकिन उनके आने और ना आने के दुविधापूर्ण नाटक से निश्चय ही अनेक लोगों को "उल्लू सीध करना" नामक मुहावरे की बहुत ही साहित्यिक और यथार्थपूर्ण व्याख्या देखने को मिली। जयपुर साहित्यिक सम्मेलन की यही सबसे बड़ी उपलब्धि रही। एक अङ्ग्रेज़ी रंजित सम्मेलन द्वारा हिन्दी मुहावरे की ऐसी साहित्यिक व्याख्या! आखिर भारत धर्मनिरपेक्ष के साथ ही भाषा निरपेक्ष भी है। इस नाटक के पटाक्षेप के साथ ही कई संतुष्ट पक्ष दिखे। कांग्रेस(सो) [घबराइए नहीं सोनियाँ गांधी की कांग्रेस को उनकी पारिवारिक परंपरा के हिसाब से नाम दिया है] , बरखा दत्त, साहित्य सम्मेलन, कट्टरपंथी मुस्लिम, कट्टरपंथी हिन्दू, न्यूज़ चैनल्स आदि।
सरकार ने यह दिखाया कि वह संविधान, कानून और व्यक्तियों की सुरक्षा को लेकर कितनी संवेदनशील है। उसकी खुफिया संस्थाएं देश पर हुये भयानक आतंकी हमलों को न तो रोक पातीं हैं और न ही उनका सुराग लगा पातीं हैं लेकिन सलमान रुशदी कि सुरक्षा पर बड़ी तत्परता से ये सरकार को पहले से आगाह कर देतीं है और जो सरकार खुफिया सूचनाओं को दबा कर बैठने की आदि हो चुकी है वह सलमान रुशदी कि रक्षा के लिए चिंतित दिखाई देती है।
कांग्रेस पार्टी के लिए सुनहेरा अवसर था। यूपी के चुनाव, राहुल की युवा(?) राजनीति और मुस्लिम वोटों को ध्रुविकृत करने का एक और अवसर। मुसलमानों को संसाधनों पर पहला हक होने का दावा करने वाली यह पार्टी पिछले 100 सालों से मुसलमानों का एक मात्र प्रतिनिधि होने का दावा करती रही है और तुष्टीकरण कि राजनीति कि जन्मदात्री रही है।
किताब भारत में प्रतिबंधित है और तब से एक नयी पीढ़ी जवान हो चुकी है और दूसरी हो रही है। इस पीढ़ी ने शायद इस किताब का नाम भी नहीं सुना होगा। यह दारुल उलूम कि ही कृपा है कि सेटेनिक वर्सेस को अब यह पीढ़ी भी जानती है। साहित्य की ऐसी ही सेवा की एक शैक्षणिक संस्था से उम्मीद थी।
सबसे अधिक फायदा जयपुर सम्मेलन को हुआ। निरंतर यह खबरों में छाया रहा। राष्ट्रिय मीडिया में, प्राइम टाइम में इतना बड़ा प्रचार अगर देते तो कितना खर्चा आता, जिज्ञासु जन यह बात मायावती जी से पूछ सकते है। उन्होने लगभग 6 महीनों से रोज़ सभी समाचार चैनलों को एक साथ 10 से 20 मिनट लंबे प्रचार दिये हैं। इसके अलावा निरंतर प्रिंट मीडिया, इन्टरनेट, मोबाइल पर फेस्टिवल मनाया गया। साहित्य का तो पता नहीं पर हाँ बजारवाद, मार्केटिंग, डिजायनिंग, मीडिया मैनेजमेंट जैसी चीजों का फायदा जरूर हो गया। और दिग्गी पैलेस को भला कौन नहीं जानता? संजोय रॉय कि भीगी आँखें तो सालों तक याद राहेंगीं। भला अभिव्यक्ति कि आज़ादी के लिए खून तो छोड़िए लोग आजकल स्याही भी नहीं बहाते ऐसे में ये आँसू जरूर याद रहेंगे।
एक और हैं बरखा दत्त। पहले रिपोर्टर थीं फिर कारगिल की बहादुरी भरी रिपोर्टिंग करके चर्चा में रहीं, तेज तर्रार और झन्नाटेदार अङ्ग्रेज़ी वाली यह रिपोर्टर मीडिया के पयदानों पर चढ़ती गई और फिर जो हाल ज्यादा चढ़ने पर सभी का होता है [ गुरुत्वाकर्षण] वे गिरीं भी। उनका उत्थान और पतन नवमीडिया या बाजारू मीडिया की एक केस स्टडी है। बरखा दत्त कि विश्वसनीयता को जो झटका लगा था उससे उबरने का यह एक सुनहरा मौका था। बंद कमरे में सलमान रुशदी से वीडियो लिंक पर साक्षात्कार का उत्साह उनके निरंतर ट्वीट्स से झलक रहा था। उनकी वाही वाही हुयी।
सलमान रुशदी यहाँ लगा कि कठपुतली हैं। वे कभी भी ठीक से नहीं बता पाये कि वे भारत आ रहे हैं या नहीं। पहले उन्होने कहा मैं आऊँगा, फिर सरकार कि सुरक्षा संबंधी सूचना दी और कहा कि नहीं आऊँगा। फिर सरकार को, जयपुर पुलिस को झूठा बताया। फिर वीडियो लिंक कि बात कि और फिर हिंसा की बात कह कर उससे भी किनारा कर लिया और फिर बरखा दत्त के साथ बंद कमरे में दहाड़े कि "मैं भारत आ रहा हूँ - निपटो इससे"। एनडीटीवी ने इस प्रोग्राम को ब्रोडकास्ट किया।
इसके साथ ही एनडीटीवी की टीआरपी बढ़ी, प्रतियोगी इस फुटेज को चलाने को बाध्य हुये और बरखा फिर कार्गिल जैसी बहादुर हुईं। उन्होंने अभिव्यक्ति नामक चिड़िया को आज़ाद ही कर दिया। सलमान रश्दी की किताबों की बिक्री बढ़ी, दारुल उलूम खबरों में आया, कांग्रेस ने भरोसा दिलाया कि मुसलमानों के खैरख्वाह वही है। कट्टरपंथी खुश हुये कि हमने सलमान रुशदी को जयपुर फेस्टिवल में किसी तरह नहीं बोलने दिया। और हमने राहत कि सांस ली कि चलो कुछ और देखने को मिलेगा।
इस सब के बीच बेचारी ओप्रा विनफ्रे को फायदा नहीं मिल पाया हालांकि उनके बॉडीगार्डों ने मथुरा में हाथापाई करके कुछ फुटेज हथियाने कि कोशिश तो की थी। चलिये ओप्रा अगली बार सही।
यद्यपि मेरा मानना है कि सलमान रुशदी को आने देना चाहिए। बोलने देना चाहिए। लोगों को उनकी भी किताबें पदनी चाहिए, मुसलमानों को भी। एक किताब आपकी आस्था को क्या हिला सकती है? हाँ अगर आप ऐसा करना बंद कर देंगे तो आस्था ही बंद हो जाएगी जैसे प्राचीन धर्म अब नहीं हैं क्यूंकी वे समय के अनुसार नहीं बदले।
अनुपम दीक्षित
21 दिस॰ 2011
19 दिस॰ 2011
अदम गोंडवी का जाना
साल 2011 न जाने क्यूँ जाते जाते कुछ ऐसे लोगों को ले जा रहा है कि लगता है बहुत अकेले हो जाएंगे आने वाले साल में। पहले बचपन के अंकल पै (टिंकल वाले - मेरी उम्र के नौजवान अभी भी शायद चकमक, डूब डूब और कालिया को नहीं भूले होंगे) फिर भोपेन हजारिका, जगजीत सिंह, देवानन्द और अब जमीनी शायर अदम। वक्त की पहचान जब साथ छोड़ने लगे तो समझना चाहिए कि अब वक्त बदलने का है। वक्त के बदलने का एहसास तो पहले भी था फिज़ाओं में जब अदीबों ने विचारधाराओं के अंत की घोषणा कर दी थी और जमीनी बात करने वाले को पूजीवादी गलियों (कम्युनिस्ट एक गाली है पूजीवादी दयारों में) से नवाजा जाने लगा था। ऐसे ही एक बेअदब जमीनी कवि थे अदम। दुष्यंत कुमार की परंपरा को आगे बढ़ाते हुये अदम्य जिजीविषा के धनी रामनाथ सिंह ने लोगों की असल बात कहने का जोखम उठाया था। उनके कुछ अशआर देखिये।
काजू भुने प्लेट में विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में .
पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत
इतना असर है खादी के उजले लिबास में.
आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में.
पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
ससद बदल गयी है यहाँ की नखास में.
जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में.
कहने की जरूरत नहीं है कि यह एक विडम्बना है जो ऐसी रचनाएँ अभी तक समीचीन बनी हुयी हैं। व्यवस्था निरंतर जस की तस है और जनता त्रस्त है। क्या यह हमारे लिए या प्रेमचंद के लिए शर्म की बात नहीं है की होरी आज भी न केवल ज़िंदा है बल्कि उसके हालात पहले से भी गए बीते हैं। हम प्रगति और विकास की बात करते हैं लेकिन इस विकास का जमा हासिल आखिर क्या है? ज़रा गौर से देखिये कि अदम की दृष्टि वह देखती है जो आसानी से दिखता नहीं। कितना व्यंग्य और व्यथा है।
· इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आख़िर क्या दिया
सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियाँ सल्फ़ास की
· जो उलझ कर रह गई फाइलों के जाल में
गाँव तक वो रोशनी आयेगी कितने साल में
· आप कहते हैं सरापा गुलमुहर है ज़िन्दगी
हम ग़रीबों की नज़र में इक क़हर है ज़िन्दगी
· ख़ुद को ज़ख्मी कर रहे हैं ग़ैर के धोखे में लोग
इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो.
और शहरों के इस उबाऊ अंधेर से घबरा कर ही शायद उनका यह शेर मुकम्मल हुआ होगा।
· ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़ारों में
मुसल्सल फ़न का दम घुटता है इन अदबी इदारों में
· न इनमें वो कशिश होगी, न बू होगी, न रानाई
खिलेंगे फूल बेशक लॉन की लम्बी क़तारों में
· अदीबों! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ
मुलम्मे के सिवा क्या है फ़लक़ के चाँद-तारों में
और बेशक आपको बुरा लगे आखिर हम मध्यमवर्गीय लोगों के संस्कार तो हैं ही सामंतवादी - लेकिन फिर भी
· वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है
· इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है
पूंजीवाद का ढोल बज रहा है। आइरन हील शाश्वत चक्र की भांति मंथर गति से घूम रहा है और 2011 तेजी से 1984 की अवस्था में पहुँच रहा है (यहाँ में ऑस्कर वाइल्ड के प्रसिद्ध उपन्यास 1984 की बात कर रहा हूँ)। जमीनी बात करने वाले हाशिये पर हैं। भारत सुपर शक्ति बन गया है। अच्छी बात है। प्रोपेगैण्डा सही जा रहा है। भारत धनवान है। काले धन की सूची बताती है। भारत में संभावनाएं हैं यह करोड़ों की संपत्ति वाले चपरासियों और क्लर्कों से साबित हो रहा है। आंदोलन हो रहे हैं और सरकार कटघरे में है। मनरेगा और खासुबि भी चल रहे हैं लेकिन फिर भी सोचता हूँ की अब जमीनी लोगों की बात कौन कहेगा। इस डर्टी पिकचर के युग में, मुन्नी, शीला, राजा, कलमाड़ी के दौर में भला अब कौन मेरा ध्यान जब तब सच्चाईयों की जमीन तक मोड़ेगा? शायद तुमने सोचा होगा -
यहाँ दरख्तों के साए में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिए
(दुष्यंत कुमार)
5 दिस॰ 2011
ज़िंदगी से इश्क़ का फसाना - देव आनंद
88 वर्ष का यह पुराना शख्स निरंतर नवीनता कि खोज में लगा रहा। चाहे वह फिल्में हों, फिल्में बनाने का तरीका हो, हीरोइने हों या असल जिंदगी में उनकी प्रेमिकाएँ हों। सुरैया, कामिनी कौशल और ज़ीनत अमान के साथ उनके रोमांस के किस्से भी चले और यह सभी असफल प्रेम कहानियों कि परिणति को प्राप्त हुये। इन पर सोचते हुये उन्हें कहते सुना कि हार असल में ग्रोथ है। असफलता नए दरवाजे खोलती है और हर बार जब में हारा तो मुझे नया मुकाम मिला। ऐसे ही फलसफे का बयान है उनकी आत्मकथा "रोमांसिंग विथ लाइफ" जिसमें अनेक किस्से रोचक भी हैं। आज उनके जाने से जो स्थान रिक्त हुआ है वह शायद ही भर पाये। मन तो नहीं हुआ उनकी मौत पर दुखी होने का पर फिर भी
तो आइए अब से कुछ दिनों तक हम उनकी तरह ही इस ज़िंदगी का जश्न मनाएँ और इसके उन लम्हों को भरपूर जिएँ जो कि बस आज ही हैं - क्या पता कल हों न हों।
अंत में एक खूबसूरत गीत उन्हीं की फिल्म से।



