15 अग॰ 2012

भारत की रेल पेल

बचपन में दादा के साथ रोज़ शाम को भरथना रेलवे स्टेशन तक घूमने जाना ही शायद इसका कारण है की ट्रेनें मुझे आज भी पसंद हैं। रेलवे स्टेशन की सीढ़ियाँ, रेलिंग, दूर तक जातीं पटरियाँ, खोमचों की गंध और इसके साथ ही बीड़ी और पसीने की मिली जुली अजीब सी --- क्या कहूँ - खुशबू या बदबू की परिभाषा फिट नहीं बैठती बस "बू" । भरथना का स्टेशन छोटा सा था पर अत्यधिक साफ सुथरा और व्यवस्थित। उस पर आज के शहरी स्टेशनों की भांति पाखाने के असह्य बदबू नहीं आती थी - आज भी नहीं आतीऔर कमोबेश हर छोटे स्टेशन पर नहीं आती पर जैसे ही बसावट शहरी होने लगती है यह बदबू बढ़ती जाती है। दिल्ली और मुंबई का तो हाल ही बुरा है। शायद शहरी होने की आपाधापी में हम सफाई भूल जाते हैं। खैर बात थी रेलों की और हम लूप लाइन पर चले गए। मेरा प्राथमिक विदद्यालय ही ट्रेनों पर निर्भर था। दादा जी हमें सीढ़ियाँ गिनवाते, ट्रेनों के डब्बों पर लिखे नंबर और अक्षर पढ़वाते। और ऐसे ही ट्रेनों से लगाव बढ़ता गया। अलीगढ़ प्रवास के दौरान तो किताबें खरीदने और तफरी करने की मनपसंद जगह थी रेलवे। फिर बाद में जब बड़े हुये और प्रकृतिक विज्ञानों की समाज से दूर पढ़ाई छोड़ कर इतिहास, राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र जैसे समाज से करीब विषय पढे तो जाना की रेलों की विश्व इतिहास में बहुत खास भूमिका है और अकेले हम ही नहीं रेलों के दुनियाँ में अनेक दीवाने हैं। जेम्स वाट और न्यू कोमेन के भाप के इंजनों ने ही हमें यहाँ तक पहुंचाया है। भाप के इन इंजनों को इंग्लैंड में पहले से ही मौजूद लकड़ी और लोहे की रेलों और वैगनों या ट्राम में फिट किया गया। यह भाप का इंजन और उपनिवेशों की विशाल कमाई इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति का कारण बनी। अमेरिका, औस्ट्रेलिया, अफ्रीका और रूस में यह गोल्ड रश, डायमंड रश और ब्लेक रश जैसी क्रांतियों का कारण बनीं। यही नहीं रेलों का सामाजिक प्रभाव भी अद्भुत था और है। रेलों ने दूरस्थ प्रदेशों को जोड़ कर 19वीं और 20वीं शताब्दियों में पनपते राष्ट्रवाद को मजबूती दी। भारत जैसे देश में हालांकि रेलों की शुरुआत अंग्रेजों ने अपने फ़ायदों के लिए ही की लेकिन यह रेल भारत को एक राष्ट्र बनाने में बहुत हद तक जिम्मेदार थी। रेल ने दूर के प्रदेशों को आपस में जोड़ा और जाति प्रथा के दंश को किसी हद तक कम किया। आखिरकार भारत के मुक्तिसंग्राम को एक नया मुखिया रेलों के कारण ही तो मिला था। ना मोहनदास गांधी को दक्षिण अफ्रीका में रेलगाड़ी के डब्बे से बाहर फेंका गया होता और ना ही उनके चिंतन को एक नयी दिशा मिली होती। और जब 1915 में गोखले ने गांधी को भारत को समझने की सलाह दी तो असली भारत देखने के लिए उनकी जिस साधन ने सर्वाधिक उपयोगिता सिद्धा की वह भारतीय रेल ही थी। भारत के आंदोलनों में तो यह उस राज सत्ता का प्रतीक भी थी। आजादी के आंदोलनों में रेल रोकना, पटरियाँ नष्ट करना अंग्रेजों के प्रति   घृणा दिखने का सबसे सुलभ प्रतीक थी। भारत के विभाजन की त्रासदी को व्यक्त करने वाली कुछ सबसे महत्वपूर्ण रचनाएँ जैसे ट्रेन टु पाकिस्तान और भीष्म साहनी की कहानी (नाम इस समय याद नहीं आ रहा) ट्रेनों की पृष्ठभूमि पर आधारित हैं।
आज भी भारतीय रेल दुनियाँ की सबसे बड़ी सेवा है। रोजाना करीब 3 करोड़ लोग इसमें सफर करते हैं और लगभग 1 करोड़ इससे संबन्धित सेवाओं का लाभ उठाते हैं। रेलवे करोड़ो लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मुहैया करती है। छोटे शहरों में रेलवे स्टेशन शहर की धुरी की तरह होते हैं और आपंको एक सलाह - अगर कभी यात्रा में अंजान शहर में फंस जाएँ तो सीधे रेलवे स्टेशन की ओर रुख कीजिये। देर रात तक चहल पहल आपको वहीं मिलेगी और सुरक्शित भी रहेंगे। 

30 जुल॰ 2012

गुरु की महिमा

इधर भारतीय मुक्केबाज़ी  का जो कायाकल्प हुआ है उसका श्रेय निश्चित ही भारतीय मुक्केबाज़ी कोच गुरुबक्ष सिंह को ही जाता है। मुक्केबाज़ी के लाइव मुक़ाबले के दौरान मुझे यह छवि सब कुछ कहती नज़र आयी और मैंने फौरन अपने GALAXY Tab के स्क्रीन कैप्चर का प्रयोग किया।
vijender
मुक्केबाज़ विजेंदर अपने मुक़ाबले के अंत में दर्शकों का अभिवादन करते हुये। पृष्ठभूमि में हैं भारतीय मुक्केबाज़ी के पितामह श्री गुरबक्ष सिंह। विजेंदर और जय भगवान को आँके आगामी मुकाबलों के लिए शुभकामनाएँ।

13 जुल॰ 2012

गुवाहाटी का अफसोस


गुवाहाटी की शर्मसार करने वाली घटना कई सवाल खड़े करती है। यह केवल गुवाहाटी में ही नहीं हर कहीं मौजूद है। एक प्रतिष्ठित अङ्ग्रेज़ी समाचार चैनल की वाचिका की प्रतिकृया ट्विटर पर थी। उनके अनुसार हम खुद को सुपर पावर कहते हैं और ऐसी घटनाएँ होतीं हैं। प्रश्न यह है की क्या सुपर पावर नैतिक भी होता है। बल्कि अगर आप देखें तो पाएंगे की सुपर पावर ही सबसे अनैतिक भी होता है। शक्ति है ही ऐसी चीज़। तभी किसी दार्शनिक ने कहा था "power corrupts and absolute power corrupts absolutely" शक्ति भ्रष्ट करती है और सम्पूर्ण शक्ति पूर्णतया भ्रष्ट कर देती है। दुनियाँ में जो भी सुपर पावर है वह उसका दुरुपयोग ही कर करहा है। हमारे समाज का ढांचा ही ऐसा बन गया है। अमेरिका ने अपने गुंडों के साथ (नैटो पढ़िये) इराक का जो हाल किया वह इसी गुवाहाटी जैसी घटना ही थी। जब से इंसान ने यह शक्ति और सत्ता का आविष्कार किया है वह इन पर कब्जे को लेकर लड़ता रहा है। दुनियाँ का इतिहास उठाइए तो पाएंगे की यह असल में युद्धों और संघर्षों का ही इतिहास है। समाज का अध्यययन करें तो वहाँ भी सत्ता और संपत्ति का संघर्ष मौजूद है। हमारा समाज पितृसत्तात्मक समाज है जहां संपत्ति का उत्तराधिकार पिता से पुत्र को जाता है। पुत्री का अधिकार नहीं है। मातृसत्तात्मक समाजों में यह उत्तराधिकार माँ से पुत्री को मिलता है। पर ऐसे समाजों में विवाह और परिवार की व्यवस्था वैसी नहीं होती। यहाँ पुरुष ढीले रूप से माँ-पुत्री से जुड़े रहते हैं। ऐसे समाज अब विश्व में बहुत कम हैं। पितृसत्तात्मक समाज अपने पुत्रों को सर्वोच्च स्थान देता है। उसकी प्रस्थिती और भूमिका उसे समाज में ताकतवर बनती है और यही ताकत उसे भ्रष्ट बना देती है। इस अव्यवस्था से निपटने के लिए ही समाज ने विवाह और संपत्ति के कानून बनाए  और उन्हें धार्मिक, राजनैतिक और आर्थिक ताकतों  से लागू करवाया गया। समाज के नैतिक मूल्य ताकत के दुरुपयोग की प्रवृत्ति को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। लेकिन आधुनिक अर्थव्यवस्था और व्यक्तिवादी दर्शन ने इस मूल्यों को तिलांजली दे दी है। इन्हें विक्टोरिया युगीन कह कह कर खारिज किया जाता है पर विडम्बना है की जो नए मूल्य पनप रहे हैं वे तो बर्बर हैं( विक्टोरिया युग से पहले यूरोप में पूर्वी ताकतों - हूणों, को बर्बर कहा जाता था) । आज नयी व्यवस्था नारी स्वातंत्र्य की पक्षधर है पर यही व्यवस्था इस स्वतन्त्रता का केवल विभ्रम पैदा करती है। असली स्वतन्त्रता नहीं देती। यह व्यवस्था नारी को देह तक ही सीमित करती है और उसे एक उत्पाद के रूप में देखने को प्रेरित करती है। यह व्यवस्था अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की आड़ में स्त्री का अनैतिक प्रदर्शन जारी रखती है। यह व्यवस्था स्त्री को एक सेंट पर मर मिटने के लिए तैयार दिखाती है। यह व्यवस्था स्त्री को आइटम बनती है - चिकनी चमेली बनाती है, शीला और मुन्नी बनाती है। एक अखबार तो 18 वर्ष की उम्र में शराब पीने  के अधिकार को ले कर बाकायदा एक जंग चला रहा है। अनेक अखबार जो छाप नहीं सकते उसे अपने वेब पोर्टल पर रखते है। फिल्में हमारी निरंतर अपनी सामाजिक हदें पार कर रहीं है। निरंतर गालियां, अश्लील और द्वियार्थी संवाद और आइटम नंबर आपको जल्दी ही इंका आदि बना रहे हैं। टीवी कार्यक्रमों में आप घर बैठे यह सब देख सकते हैं और अगर आप परेशान हैं तो जल्दी ही आप बहिष्कृत भी महसूस करेंगे। तो बेहतर है की आप समाजस्य बैठा लें। आप समाज में अधनंगे घूमें और आधुनिक कहलाए जाने को अधिक पसंद करेंगे  बजाए ओल्ड फैशन और आउटडेटेड के। बच्चों के आदर्श आज यहाँ नहीं वहाँ है - अमेरिका में। उनका संदर्भ भारतीय नहीं है अमरीकी है। आज बच्चे एकोन और एमिनेम को सुनते हैं जिनमें हिंसा, सेक्स और गलियों का तड़का लगा है। एकोन 14 वर्षीय बालिका के साथ स्टेज पर जो करता है वह हमारे लिए आघात है पर उनके लिए आदर्श है जो उसे सुनते हैं। हाल ही में हिन्दी फिल्म जोकर का एक गाना यू ट्यूब पर "लीक" हो गया है और उसके बोल "I wanna F**k you baby"। शराब, अश्लील गाने और वीडियो और नेट पर सर्वसुलभता और बेटा होने का दर्प। यह माहौल घातक है। इसका सुपरपावर होने और ना होने से मतलब नहीं है। यह तो उस व्यवस्था की स्वाभाविक उपज है जिसे हम बना रहे हैं।  इसके नियम और मूल्य भी हमें ही बनाने हैं। और नियमों को बनाने का मतलब होता है सीमाएं खींचना। अगर समाज को अराजक नहीं बनाना है तो कुछ हदें तो हमें बनानी ही होंगी। ऐसी घटनाएँ कानून का नहीं समाज का विषय होती हैं और यहीं आज का समाज असफल है। पहले समाज का दबाव और डर ऐसे आपराधिक तत्वों को दबाता था। केवल दबंग ही बच पाता था। लेकिन आज समाज अनुपस्थित है। गुवाहाटी की चलती फिरती रोड पर 8 - 10 लड़के एक लड़की का  शोषण करते रहे और दसियों लोग मूक दर्शक बने रहे? समाज इतना मूक बाघिर कभी नहीं था। गाँव में हमारे पैर बाहर पड़ते ही गली में दसियों लोग पूछ बैठते " काए लला कहाँ जाय रहे" जवाब दीजिये नहीं तो शिकायत घर हमसे पहले पहुँच जाती थी। और आज सोसाइटी में सामने वाले फ्लेट में कौन रहता है पता नहीं। सोचिए कैसा समाज हम बना रहे हैं। आधुनिकता कपड़ों से नहीं, सड़कों से नहीं, ऊंची इमारतों से नहीं सोच से आती है।

14 अप्रैल 2012

निर्मल तो नॉर्मल है यह बवाल ही एबनॉर्मल है।

निर्मल बाबा की कृपा पर बवाल मचा है। एक न्यूज़ चैनल पर शाम का पूरा समय(7 बजे से 12 बजे तक) निर्मल बाबा को दे दिया गया। आरोप थे कि वे 36 से अधिक चैनलों पर प्रचार करते हैं (पता नहीं इस चैनल ने अपने प्राइम टाइम के मूल्य को इस आंकड़े शामिल किया या नहीं) , वे भक्तों से प्रति सत्संग 2000 रुपये लेते हैं और चमत्कार का दावा करते हैं। इस देश में यह कोई नयी बात नहीं है। अनेक मुरारियों, आसारामों, बापुओं, रामदेवों  की दुकान चल सकती है तो निर्मल बाबा की दुकान क्यूँ नहीं। जब पूरी दुनियाँ में सेल्फ हेल्प किताबों के पीछे पागल हो, लीडरशिप और मोटीवेशन एक्सपर्ट्स मोटी फीस लेकर अपनी दुकान जमा सकते हैं तो निर्मल बाबा क्यूँ नॉर्मल नहीं हैं? आखिर जांच तो उन बाबाओं की होनी चाहिए जो भक्तों से पैसा नहीं लेते और फिर भी उनका साम्राज्य करोड़ों का है। आखिर क्या स्रोत है इस पैसे का? मैं बाबाओं का फैन नहीं हूँ और न ही निर्मल बाबा की तरफदारी कर रहा हूँ लेकिन इस सारे मामले में मुझे तथ्य कम ईर्ष्या ज्यादा लगती है। ये सभी निर्मल विरोधी उस समय कहाँ चले जाते हैं जब बाबाओं के आश्रम में हत्याएँ, व्यभिचार  और अनाचार होता है। टीवी एंकर का लगातार प्रश्न यह था कि इस पैसे की आपको क्या ज़रूरत है। क्या ऐसा ही प्रश्न उसे भारत के उन मंदिरों से नहीं पूछना चाहिए जहा हर वर्ष करोड़ों का चढ़ावा चढ़ता है? मेरे विचार से तो बाबा कर्म को एक अब एक सामान्य व्यवसाय मान कए सरकार को अब मंदिरों, बाबाओं और धर्मार्थ संस्थाओं पर भी  बकायदा टैक्स निर्धारित कर देना चाहिए। फिर यदि लोग स्वयं ही उल्लू बनना छाते हैं तो बने। निर्मल दरबार, आसाराम दरबार, मोरारी दरबारों में मैंने अनेक पढे लिखों को भी देखा है। अब अगर इतना सब होने के बाद भी कोई इन्हें उल्लू बना सकता है तो सरकार, पुलिस और मीडिया को दर्द क्यूँ हो रहा है। वे अपनी खुशी से पैसे दे कर सत्संग में जा रहे हैं। आखिर मानसिक शांति की खोज में लोग मनोचिकित्सकों को पैसे दे सकते हैं  तो बाबाओं को क्यूँ नहीं? जब लोग प्रचार करके पेरेंटिंग एक्सपर्ट बनकर प्ले स्कूल खोल कर लोगों को ठग सकते हैं तो निर्मल भला यह क्यूँ नहीं कर सकते? आखिर तब तो किसी मीडिया वाले ने उस प्ले स्कूल संचालिका से यह नहीं पूछा कि आपको यह ज्ञान कहाँ से और कैसे मिला?  निष्कर्ष यह कि निर्मल के बहाने ऐसे सभी मामलों में स्थायी हल निकालना चाहिए। अभी का बवाल तो महज़ एक ऐसी कार्यवाही लग रहा है जो ईर्ष्या से प्रेरित है।

19 मार्च 2012

डर्टी पिक्चर : एक दुखद कहानी का उत्सव

कहानी है विजय लक्ष्मी की। जिसकी शादी अल्पायु में ही हो गयी। पति और परिवार के निरंतर जुल्मों और महत्वाकांक्षा ने विजयलक्ष्मी को एक साहसी कदम उठाने को मजबूर कर दिया। वह घर से भाग गयी और पहुँच गयी मद्रास। फिर शुरू हुआ उसके दैहिक, आर्थिक और मानसिकशोषण  का वह सिलसिला जो उसकी मौत या ह्त्या के बाद भी आजतक जारी है। विजयलक्ष्मी से सिल्कस्मिता बनी एक सामान्य औरत के निरंतर शारीरिक, मानसिक और व्यावसायिक शोषण की दुखद लेकिन सत्यकथाको  इस प्रकार प्रस्तुत करना जैसे यह एक महान औरतवादी स्त्री की महान कहानी हो, एक विकृत प्रयास है। सत्य तो यह है की जिस सिल्क को इस फिल्म इंडस्ट्री ने हमेशा व्यावसायिक, हवस और नीची नज़रों से देखा वही फिल्म इंडस्ट्री आज उसकी महानता के दावे की चाशनी में लपेट कर  असल में सिल्क का नाम भुनाने की ही डर्टी कोशिश कर रही है। सिल्क का शोषण अभी तक रुका नहीं है। यह उसकी मौत के बाद भी इस रूप में जारी है। सिल्क जैसी अनेक हैं जो अलग अलग क्षेत्रों में इसी तरह के शोषण का शिकार होती हैं। चाहे वह सोनागाछी के वेश्यालय हों या बड़े फैशन घराने। सभी में महिलाओं की एक ही कीमत होती है - उनकी सेक्स अपील। उसका व्यक्तित्व, सोच, नाम सब इसी तराजू में तौले जाते हैं। घरों से भागी औरतों की यही कहानी है। उनका अंत आज भी वेश्यालयों में ही होता है, फिर चाहे वह जी बी रोड का रेड लाइट क्षेत्र हो या फिल्म नगरी। धंधे का अंदाज़ अलग होता है लेकिन ग्राहक की दृष्टि वही होती है। वे पैसा बनाने की मशीन होती हैं। जो लोग सिल्क की कहानी में औरत की आज़ादी की महानता खोज रहे हैं और सिल्क के विषादमय जीवन को विजय और संघर्ष की महान गाथा बना देने पर तुले हैं उन्हें शायद  अंदाज़ा नहीं है कि भारत ही नहीं विश्व की कई देशों की स्त्रियॉं के लिए ऐसे संघर्ष महानता का नहीं मजबूरी का नाम हैं। सेक्सुअलिटी  का सहारा ले कर चढ़ने वाली स्त्री अंततः शोषण का ही शिकार होती है। मीडिया, मार्केटिंग और बाज़ार ऐसी सभी कहानियों को ऐसे ही प्रस्तुत करता है। इन औरतों को ऐसे प्रस्तुत किया जाता है जैसे वे बेबाक, बिंदास और आज़ाद हैं, वे अपनी शर्तों पर जीना चाहतीं हैं और देह उनके लिए  आगे बढ्ने का वायस है। लेकिन इस सुनहरे वर्क के भीतर आपको मिलती है एक विषादमय दुनियाँ, अकेलापन और वेदना। अगर आइटम बनना ही अपनी शर्तों पर जीना है तो सबसे अधिक आजाद एक वेश्या ही है। ऐसी औरतें चाहे वह  मर्लिन मोनरो हो या सिल्क स्मिता दोनों को ही सामाजिक और व्यावसायिक शोषण के साये में ही ज़िंदगी जीनी पड़ती है और उसे तथाकथित सफलता भी तभी मिलती है जब वह किसी पुरुष का सहारा खोजती है। एक आध्यन के मुताबिक आज अमेरिका में लगभग 11 % परिवार गरीबी की रेखा से नीचे हैं। इनमें भी 28 % परिवारों की मुखिया स्त्री है जो या तो तलाकशुदा हैं या फिर अविवाहित माताएँ । यह दोनों ही वर्ग पुरुषों पर निर्भर थे और शुरुआती वर्षों में इसी निर्भरता ने उन्हें शिक्षा या हुनर सीखने से वंचित किया और आज जब वे परित्यक्त है तो गरीबी में जी रहे हैं। इस स्थिती में भी उनका सामाजिक, दैहिक, आर्थिक शोषण जारी रहता है। फैशन मॉडल्स का अधनगा कैटवाक हो , चीयर लीडर्स हों, फिल्मों में आइटम गर्ल्स हों सभी आखिर तो पुरुष की सेक्स भूख को ही शांत करने का काम करतीं हैं। आखिर कितनी महिलाएं किंगफिशर का कलेंडर खरीदतीं होंगी?  सिल्क स्मिता की कहानी एक दुखद सच्चाई है और शोषण की उस व्यवस्था प्रश्नचिन्ह लगाने की बजाय उसे महिमामंडित करने की व्यावसायिक कोशिश है यह फिल्म।काश यह फिल्म उसकी उफनती जवानी के जलवों की बजाय सिल्क स्मिता की होती ।  बेशक विद्या बालन की अदाएं लुभावनी हैं और शायद इतनी की राष्ट्रीय पुरस्कार ज्यूरी भी अपने को रोक ना पायी। फूल्स पैराडाइज़ में आपका स्वागत है। 

6 मार्च 2012

मेरा काम तो चलेगा - राहुल गांधी

राहुल गांधी आखिर अपनी माँद से नहर निकले की कहीं कोई उन्हें सिंह की बजाय सियार न मान ले यूपी की हार के बाद। वे अपने उत्तर सोच कर आए थे। मुलायम सिंह यादव जी और अखिलेश को लोकतन्त्र की मजबूरी मान कर बधाई दी (उनके शब्द थे मुलायम जी और अखिलेश को बधाई क्यूंकी डेमोक्रेसी है तो उन्हें बधाई)। मैंने उप की जनता से वादा किया था की मैं उनको गावों में खेतों में गरीबों के साथ सड़कों पर दिखाई दूँगा और मेरा काम तो चलेगा।
सही कहा राहुल भैया हमें भी यही लगता है की आपका काम तो चलेगा ही। यू पी , बिहार और अब फिर यू पी में असफल प्रदर्शन के बाद भी प्रधानमंत्री की कुर्सी तो आपकी पक्की है। 

5 मार्च 2012

 कपिल देव पूछ रहे हैं सचिन क्यूँ खेल रहे वन डे। अरे भाई भूल गए आप। अरे भाई कई मसले हैं। एक तो खैर आप सही समझे । रिकॉर्ड बनाना है। भूल गए आप अपना ज़माना जब चयनकर्ताओं पर आरोप लगते थे की आपके रिकोर्डों की खातिर ही आप को टीम में बनाए रखा है वरना आपको तो बहुत पहले सन्यास ले लेना चाहिए था। और यह भी की आप के कारण श्रीनाथ को स्पेस नहीं मिलता। हम उस जमाने में क्रिकेट और आपके फैन होते थे । तब मीडिया इतना खूंख़ार नहीं था। सचिन के लिए तो अभी सन्यास लेने का दिन नहीं आया है। भारत की परंपरा के लिए ही वे खेल रहे हैं। भला ऐसा कौन सा महान खिलाड़ी हुआ है भारत में आज तक जिसे बेआबरू कर के कूचे से न निकाला गया हो। रवि शास्त्री, गावस्कर, वेंगी, कपिल, श्रीनाथ, गांगुली, द्रविड़ आदि। सभी को झाड़ू से ही बुहारा गया है। कोई औस्ट्रेलिया तो है नहीं जहां ब्रेडमेन के खिताब को बचाने के लिए खिलाड़ी अपना एक रन कम ले। या फिर किसी खिलाड़ी के सम्मान में पूरा स्टेडियम खड़ा हो जाए और टीम उसे गोद में उठा ले। नहीं हम तो ठहरे कबड्डी वाले। टांग खींचे बिना चैन नहीं। एक मैच हारे तो जूते दूसरा जीते तो फूल। तो भैया कपिल दा आप तो रहने ही दो । अच्छा नहीं लगता। रही बात सचिन की तो जब उनकी तंग बुरी तरह खींच दी जाएंगी वे तब ही सन्यास लेंगे। (खबर दैनिक हिंदुस्तान से साभार)

होली पर पाया नया रंग

Holi-Cartoon0001

इस होली पर नया रंग खोजा मैंने - चुनाव का रंग

18 वर्षों में पहली बार वोट डाला। बचपन में गाँव में बड़ा ज़बरदस्त उत्साह देखा था। परचियाँ, बिल्ले, भोंपू, टेम्पो, पोस्टर, बल्लियाँ गाने बाजे, किसी उत्सव का सा माहौल। सबसे बड़ा त्योहार। बाद में वारदातें, बूथ कैप्चरिंग, हत्या, धमकी और डर। बड़े हुये तो चुनावों से दूर रहने की आम सहमति के साथ। 18 वर्ष के होने से पहले ही वोटिंग की आयु 18 कर दी गयी थी लेकिन फिर भी नहीं निकले। 80 के दशक में टीवी पर पूरे दिन फिल्में आतीं थी। स्कूल में भी नागरिकशास्त्र बस यूं ही था। और फिर स्नातक में भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान तो जैसे समाज से कोसों दूर ही थे। बाद में जब विश्वविध्यालय में राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र और अर्थशस्त्र से परिचय हुया तो लगा की यह विषय आस पास के बारे में अधिक बताते हैं। संविधान पढ़ा, आर्थिक नीतियाँ पढ़ीं और समाज के गठन के बारे में पढ़ा तो लगा की यह जीवंत विज्ञान हैं। मन में नागरिक प्रक्रिया में शामिल होने का जज़्बा तो था पर आदत आलस की पड़ चुकी थी। हम नेहरू युग के बाद जन्मे थे सो करिश्मा के प्रभाव में नहीं थे। इन्दिरा युग का अवसान भी हो चुका था और राजनीति अपनी सबसे दायनीय अवस्था में पहुँच चुकी थी। यह युग मण्डल, कमंडल का था और प्रगतिशील युवा होने के नाते हम इन मुद्दों हमारी राय का प्रतिनिधित्व कोई राजनैतिक पार्टी नहीं करती थी। तो हमें अपना वोट डालना व्यर्थ लगा। आखिर किसे चुनें। ना हम जातिवाद के समर्थक थे, ना आरक्षण के, ना ही सांप्रदायिकता के। 90 के दशक के आरंभ से राजनीति में जो नंगा नाच चला तो हमने इस लोकतन्त्र से ही किनारा करना ठीक समझा। देशकी आर्थिक हालात बिगड़ रही थी और नेता अपनी नीच राजनीति में मशगूल थे। देश का सोना एक ऐसे प्रधानमंत्री और उसकी सरकार ने गिरवी रखा जिसे जनता का आदेश प्राप्त नहीं था। ठीक इसी समय देश की नीतियों में आमूल चूल परिवर्तन हुय और नेता, बाबू, लाला गठजोड़ ने नयी ऊँचाइयाँ और नए रास्ते पाये। देश में नए करोड़पति हुये और "ऋणम कृत्वा घृतम पिबेत" का अद्भुत दर्शन आरंभ हुया। जाति, धर्म और अपराध ही राजनीति के स्तम्भ बन गए। शेषन ने जब जनता को चुनाव आयोग से परिचित करवाया और चुनाव धीरे धीरे कम हिंसात्मक होने लगे तो हमने यह भी देखा की किस तरह चुनाव आयुक्त के पर कतरे गए और कैसे यह सुनिश्चित किया गया की आयुक्त मनपसंद ही हो। इसी समय युवाओं की आकांक्षाओं ने भी नए आयाम खोजे और चल पड़े उदारीकरण के रास्ते दूर देशों को "यहाँ का सिस्टम ही है खराब" कह कर। जी नहीं गए वे भी वोट और राजनीति से तो दूर ही हो गए। लोकतन्त्र में भला  भरोसा किसे रहा? कहाँ है लोकतन्त्र, कहाँ हैं मौलिक अधिकार? बस एक ही बात अच्छी है लोकतन्त्र के बारे में की कम से कम आप इसकी बुराई तो कर ही सकते हैं लेकिन आगरा आप व्यक्तिगत से समष्टिगत होते हैं इस बुराई में तो आप अपने अतीत को जरूर टटोल लें और कीचड़ से होली खेलने को तैयार रहें। वरना आप को रामदेवा और  अन्ना जैसा हश्र भी झेलना होगा।  देश में पैसा बढ़ा और साथ ही घोटालों का ग्राफ भी। राष्ट्रमण्डल खेलों में जैसा खुला खेल हुआ और फिर जिस तरह 2G घोटाले ने बाबू - नेता - पत्रकार- लाला के गठजोड़ का पर्दाफाश किया तो विश्वास हो गया की यही हैं लोकतन्त्र के चार स्तंभ। किसी दिन न्यायपालिका की भी कलई खुलेगी संकेत तो मिल ही रहे हैं। इसी समय आया अन्ना का आंदोलन और लगा की देश जाग गया है। पर यह भी इस देश की भीषण जनता को बस झकझोर ही पाया। राजनीति का बाहरी भरकम रथ इसे भी रोंद गया। चुनाव शुरू होते ही भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं रहा। मुद्दा है तो 40 साल के युवा राहुल की बातें, उनकी रातें। वे युवा हैं लेकिन राजनीति वे बुढ़ाती हुयी करते हैं। वही फार्मूला - जाति, धर्म और आरक्षण। तो सोचा किसे वोट दिया जाए। ना कोई पार्टी न ही प्रत्याशी इस लायक लगा जिसे वोट दिया जाए। फिर तय किया की नियम 49 - ओ का प्रयोग करूंगा। बूथ पर गाया, वॉटर पर्ची दी, स्याही लगवाई और पीठासीन अधिकारी से आग्रह किया वह तय प्रकीरिया के अंतर्गत दर्ज करे की में मत नहीं दे रहा हूँ। अफसोस की 49-ओ का फार्म वहाँ उपलब्ध नहीं था। अतः मैंने निश्चय किया की जब देश में अंधा युग हो और कानून भी अंधा हो तो वोट भी अंधा ही होगा अतः आँखें बंद किन और बिटिया से कहा की वह अक्कड़ - बक्कड़ बम्बे बो कहे और जैसे ही उसने कहा चोर निकल के भागा मेंने बटन दबा दिया। पता नहीं कौन सा बटन था और किसको मिला पर जब चौपट राजा हो तो ऐसे ही चौपट तरीके से वोट देना सबसे अच्छा है। खैर इस बार यह नया रंग अच्छा लग रहा है। होली मुबारक !

27 फ़र॰ 2012

नोर्वे को सबक

दो भारतीय बच्चों को तथाकथित सुरक्षा गृह में रखने का मामला बड़ा विचित्र है और साथ ही संस्कृतियों की विभिन्नता भी दर्शाता है। नॉर्वे के क़ानूनों के अनुसार ये भारतीय दंपति बच्चों के पालन में सक्षम नहीं थे अतः बच्चों को किन्हीं दूसरे घरों में भेज दिया गया। यह अक्षमता थी - बच्चों को हाथ से खाना खिलाना, साथ सुलाना आदि। ऐसा केवल यही मामला नहीं है बल्कि नॉर्वे हर वर्ष बड़ी मात्र में बच्चों को मटा पिता से अलग करता आया है इन्हीं क़ानूनों के आधार पर। कोई राजा महाराजा सनकी हो सकता है पर एक कल्याणकारी राज्य की पूरी मशीनरी यदि सनकी हो जाए तो चिंता होती है। कानून बेशक सनक में नहीं बनाए जाते और अगर नॉर्वे में ऐसी कानून हैं तो इनकी ठोस वजह भी होनी चाहिए। और यही तथ्य मुझे चिंता में डाल देता है। कानून ईश्वर नहीं बनाता बल्कि क़ानूनों के पीछे समाज होता है। अगर नॉर्वे बड़ी मात्र में बच्चों को फॉस्टर होम्स में भेजता है तो यह तथ्य यही बताता है की नॉर्वे के समाज में बड़ी गड़बड़ है। समाज विज्ञान की भाषा में कहें तो वहाँ समाज डिसफंकशनल हो चुका है। यदि समाज अपने बच्चों को सुरक्षा नहीं दे सकता और समाज में यदि बच्चों को अपने ही माँ बाप से असुरक्षा हो तो केवल कानून नहीं बल्कि बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। भारतीय बच्चे तो खैर हमें वापस मिल ही जाएंगे पर स्वयं नॉर्वे यदि अपने विकृत समाज को सही करने की दिशा में कदम नहीं उठाएगा तो यह मानवता के लिए खतरा बन जाएगा। इस घटना से सीख मिलती है खास तौर पर उन लोगों के लिए जो पश्चिम की हर चीज़ को बेहतर मानते हैं और भारत के लिए कहा करते हैं "यहाँ का तो सिस्टम ही है खराब" । शायद नॉर्वे का सिस्टम उन्हें भी रास नहीं आएगा।