14 अप्रैल 2012

निर्मल तो नॉर्मल है यह बवाल ही एबनॉर्मल है।

निर्मल बाबा की कृपा पर बवाल मचा है। एक न्यूज़ चैनल पर शाम का पूरा समय(7 बजे से 12 बजे तक) निर्मल बाबा को दे दिया गया। आरोप थे कि वे 36 से अधिक चैनलों पर प्रचार करते हैं (पता नहीं इस चैनल ने अपने प्राइम टाइम के मूल्य को इस आंकड़े शामिल किया या नहीं) , वे भक्तों से प्रति सत्संग 2000 रुपये लेते हैं और चमत्कार का दावा करते हैं। इस देश में यह कोई नयी बात नहीं है। अनेक मुरारियों, आसारामों, बापुओं, रामदेवों  की दुकान चल सकती है तो निर्मल बाबा की दुकान क्यूँ नहीं। जब पूरी दुनियाँ में सेल्फ हेल्प किताबों के पीछे पागल हो, लीडरशिप और मोटीवेशन एक्सपर्ट्स मोटी फीस लेकर अपनी दुकान जमा सकते हैं तो निर्मल बाबा क्यूँ नॉर्मल नहीं हैं? आखिर जांच तो उन बाबाओं की होनी चाहिए जो भक्तों से पैसा नहीं लेते और फिर भी उनका साम्राज्य करोड़ों का है। आखिर क्या स्रोत है इस पैसे का? मैं बाबाओं का फैन नहीं हूँ और न ही निर्मल बाबा की तरफदारी कर रहा हूँ लेकिन इस सारे मामले में मुझे तथ्य कम ईर्ष्या ज्यादा लगती है। ये सभी निर्मल विरोधी उस समय कहाँ चले जाते हैं जब बाबाओं के आश्रम में हत्याएँ, व्यभिचार  और अनाचार होता है। टीवी एंकर का लगातार प्रश्न यह था कि इस पैसे की आपको क्या ज़रूरत है। क्या ऐसा ही प्रश्न उसे भारत के उन मंदिरों से नहीं पूछना चाहिए जहा हर वर्ष करोड़ों का चढ़ावा चढ़ता है? मेरे विचार से तो बाबा कर्म को एक अब एक सामान्य व्यवसाय मान कए सरकार को अब मंदिरों, बाबाओं और धर्मार्थ संस्थाओं पर भी  बकायदा टैक्स निर्धारित कर देना चाहिए। फिर यदि लोग स्वयं ही उल्लू बनना छाते हैं तो बने। निर्मल दरबार, आसाराम दरबार, मोरारी दरबारों में मैंने अनेक पढे लिखों को भी देखा है। अब अगर इतना सब होने के बाद भी कोई इन्हें उल्लू बना सकता है तो सरकार, पुलिस और मीडिया को दर्द क्यूँ हो रहा है। वे अपनी खुशी से पैसे दे कर सत्संग में जा रहे हैं। आखिर मानसिक शांति की खोज में लोग मनोचिकित्सकों को पैसे दे सकते हैं  तो बाबाओं को क्यूँ नहीं? जब लोग प्रचार करके पेरेंटिंग एक्सपर्ट बनकर प्ले स्कूल खोल कर लोगों को ठग सकते हैं तो निर्मल भला यह क्यूँ नहीं कर सकते? आखिर तब तो किसी मीडिया वाले ने उस प्ले स्कूल संचालिका से यह नहीं पूछा कि आपको यह ज्ञान कहाँ से और कैसे मिला?  निष्कर्ष यह कि निर्मल के बहाने ऐसे सभी मामलों में स्थायी हल निकालना चाहिए। अभी का बवाल तो महज़ एक ऐसी कार्यवाही लग रहा है जो ईर्ष्या से प्रेरित है।

19 मार्च 2012

डर्टी पिक्चर : एक दुखद कहानी का उत्सव

कहानी है विजय लक्ष्मी की। जिसकी शादी अल्पायु में ही हो गयी। पति और परिवार के निरंतर जुल्मों और महत्वाकांक्षा ने विजयलक्ष्मी को एक साहसी कदम उठाने को मजबूर कर दिया। वह घर से भाग गयी और पहुँच गयी मद्रास। फिर शुरू हुआ उसके दैहिक, आर्थिक और मानसिकशोषण  का वह सिलसिला जो उसकी मौत या ह्त्या के बाद भी आजतक जारी है। विजयलक्ष्मी से सिल्कस्मिता बनी एक सामान्य औरत के निरंतर शारीरिक, मानसिक और व्यावसायिक शोषण की दुखद लेकिन सत्यकथाको  इस प्रकार प्रस्तुत करना जैसे यह एक महान औरतवादी स्त्री की महान कहानी हो, एक विकृत प्रयास है। सत्य तो यह है की जिस सिल्क को इस फिल्म इंडस्ट्री ने हमेशा व्यावसायिक, हवस और नीची नज़रों से देखा वही फिल्म इंडस्ट्री आज उसकी महानता के दावे की चाशनी में लपेट कर  असल में सिल्क का नाम भुनाने की ही डर्टी कोशिश कर रही है। सिल्क का शोषण अभी तक रुका नहीं है। यह उसकी मौत के बाद भी इस रूप में जारी है। सिल्क जैसी अनेक हैं जो अलग अलग क्षेत्रों में इसी तरह के शोषण का शिकार होती हैं। चाहे वह सोनागाछी के वेश्यालय हों या बड़े फैशन घराने। सभी में महिलाओं की एक ही कीमत होती है - उनकी सेक्स अपील। उसका व्यक्तित्व, सोच, नाम सब इसी तराजू में तौले जाते हैं। घरों से भागी औरतों की यही कहानी है। उनका अंत आज भी वेश्यालयों में ही होता है, फिर चाहे वह जी बी रोड का रेड लाइट क्षेत्र हो या फिल्म नगरी। धंधे का अंदाज़ अलग होता है लेकिन ग्राहक की दृष्टि वही होती है। वे पैसा बनाने की मशीन होती हैं। जो लोग सिल्क की कहानी में औरत की आज़ादी की महानता खोज रहे हैं और सिल्क के विषादमय जीवन को विजय और संघर्ष की महान गाथा बना देने पर तुले हैं उन्हें शायद  अंदाज़ा नहीं है कि भारत ही नहीं विश्व की कई देशों की स्त्रियॉं के लिए ऐसे संघर्ष महानता का नहीं मजबूरी का नाम हैं। सेक्सुअलिटी  का सहारा ले कर चढ़ने वाली स्त्री अंततः शोषण का ही शिकार होती है। मीडिया, मार्केटिंग और बाज़ार ऐसी सभी कहानियों को ऐसे ही प्रस्तुत करता है। इन औरतों को ऐसे प्रस्तुत किया जाता है जैसे वे बेबाक, बिंदास और आज़ाद हैं, वे अपनी शर्तों पर जीना चाहतीं हैं और देह उनके लिए  आगे बढ्ने का वायस है। लेकिन इस सुनहरे वर्क के भीतर आपको मिलती है एक विषादमय दुनियाँ, अकेलापन और वेदना। अगर आइटम बनना ही अपनी शर्तों पर जीना है तो सबसे अधिक आजाद एक वेश्या ही है। ऐसी औरतें चाहे वह  मर्लिन मोनरो हो या सिल्क स्मिता दोनों को ही सामाजिक और व्यावसायिक शोषण के साये में ही ज़िंदगी जीनी पड़ती है और उसे तथाकथित सफलता भी तभी मिलती है जब वह किसी पुरुष का सहारा खोजती है। एक आध्यन के मुताबिक आज अमेरिका में लगभग 11 % परिवार गरीबी की रेखा से नीचे हैं। इनमें भी 28 % परिवारों की मुखिया स्त्री है जो या तो तलाकशुदा हैं या फिर अविवाहित माताएँ । यह दोनों ही वर्ग पुरुषों पर निर्भर थे और शुरुआती वर्षों में इसी निर्भरता ने उन्हें शिक्षा या हुनर सीखने से वंचित किया और आज जब वे परित्यक्त है तो गरीबी में जी रहे हैं। इस स्थिती में भी उनका सामाजिक, दैहिक, आर्थिक शोषण जारी रहता है। फैशन मॉडल्स का अधनगा कैटवाक हो , चीयर लीडर्स हों, फिल्मों में आइटम गर्ल्स हों सभी आखिर तो पुरुष की सेक्स भूख को ही शांत करने का काम करतीं हैं। आखिर कितनी महिलाएं किंगफिशर का कलेंडर खरीदतीं होंगी?  सिल्क स्मिता की कहानी एक दुखद सच्चाई है और शोषण की उस व्यवस्था प्रश्नचिन्ह लगाने की बजाय उसे महिमामंडित करने की व्यावसायिक कोशिश है यह फिल्म।काश यह फिल्म उसकी उफनती जवानी के जलवों की बजाय सिल्क स्मिता की होती ।  बेशक विद्या बालन की अदाएं लुभावनी हैं और शायद इतनी की राष्ट्रीय पुरस्कार ज्यूरी भी अपने को रोक ना पायी। फूल्स पैराडाइज़ में आपका स्वागत है। 

6 मार्च 2012

मेरा काम तो चलेगा - राहुल गांधी

राहुल गांधी आखिर अपनी माँद से नहर निकले की कहीं कोई उन्हें सिंह की बजाय सियार न मान ले यूपी की हार के बाद। वे अपने उत्तर सोच कर आए थे। मुलायम सिंह यादव जी और अखिलेश को लोकतन्त्र की मजबूरी मान कर बधाई दी (उनके शब्द थे मुलायम जी और अखिलेश को बधाई क्यूंकी डेमोक्रेसी है तो उन्हें बधाई)। मैंने उप की जनता से वादा किया था की मैं उनको गावों में खेतों में गरीबों के साथ सड़कों पर दिखाई दूँगा और मेरा काम तो चलेगा।
सही कहा राहुल भैया हमें भी यही लगता है की आपका काम तो चलेगा ही। यू पी , बिहार और अब फिर यू पी में असफल प्रदर्शन के बाद भी प्रधानमंत्री की कुर्सी तो आपकी पक्की है। 

5 मार्च 2012

 कपिल देव पूछ रहे हैं सचिन क्यूँ खेल रहे वन डे। अरे भाई भूल गए आप। अरे भाई कई मसले हैं। एक तो खैर आप सही समझे । रिकॉर्ड बनाना है। भूल गए आप अपना ज़माना जब चयनकर्ताओं पर आरोप लगते थे की आपके रिकोर्डों की खातिर ही आप को टीम में बनाए रखा है वरना आपको तो बहुत पहले सन्यास ले लेना चाहिए था। और यह भी की आप के कारण श्रीनाथ को स्पेस नहीं मिलता। हम उस जमाने में क्रिकेट और आपके फैन होते थे । तब मीडिया इतना खूंख़ार नहीं था। सचिन के लिए तो अभी सन्यास लेने का दिन नहीं आया है। भारत की परंपरा के लिए ही वे खेल रहे हैं। भला ऐसा कौन सा महान खिलाड़ी हुआ है भारत में आज तक जिसे बेआबरू कर के कूचे से न निकाला गया हो। रवि शास्त्री, गावस्कर, वेंगी, कपिल, श्रीनाथ, गांगुली, द्रविड़ आदि। सभी को झाड़ू से ही बुहारा गया है। कोई औस्ट्रेलिया तो है नहीं जहां ब्रेडमेन के खिताब को बचाने के लिए खिलाड़ी अपना एक रन कम ले। या फिर किसी खिलाड़ी के सम्मान में पूरा स्टेडियम खड़ा हो जाए और टीम उसे गोद में उठा ले। नहीं हम तो ठहरे कबड्डी वाले। टांग खींचे बिना चैन नहीं। एक मैच हारे तो जूते दूसरा जीते तो फूल। तो भैया कपिल दा आप तो रहने ही दो । अच्छा नहीं लगता। रही बात सचिन की तो जब उनकी तंग बुरी तरह खींच दी जाएंगी वे तब ही सन्यास लेंगे। (खबर दैनिक हिंदुस्तान से साभार)

होली पर पाया नया रंग

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इस होली पर नया रंग खोजा मैंने - चुनाव का रंग

18 वर्षों में पहली बार वोट डाला। बचपन में गाँव में बड़ा ज़बरदस्त उत्साह देखा था। परचियाँ, बिल्ले, भोंपू, टेम्पो, पोस्टर, बल्लियाँ गाने बाजे, किसी उत्सव का सा माहौल। सबसे बड़ा त्योहार। बाद में वारदातें, बूथ कैप्चरिंग, हत्या, धमकी और डर। बड़े हुये तो चुनावों से दूर रहने की आम सहमति के साथ। 18 वर्ष के होने से पहले ही वोटिंग की आयु 18 कर दी गयी थी लेकिन फिर भी नहीं निकले। 80 के दशक में टीवी पर पूरे दिन फिल्में आतीं थी। स्कूल में भी नागरिकशास्त्र बस यूं ही था। और फिर स्नातक में भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान तो जैसे समाज से कोसों दूर ही थे। बाद में जब विश्वविध्यालय में राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र और अर्थशस्त्र से परिचय हुया तो लगा की यह विषय आस पास के बारे में अधिक बताते हैं। संविधान पढ़ा, आर्थिक नीतियाँ पढ़ीं और समाज के गठन के बारे में पढ़ा तो लगा की यह जीवंत विज्ञान हैं। मन में नागरिक प्रक्रिया में शामिल होने का जज़्बा तो था पर आदत आलस की पड़ चुकी थी। हम नेहरू युग के बाद जन्मे थे सो करिश्मा के प्रभाव में नहीं थे। इन्दिरा युग का अवसान भी हो चुका था और राजनीति अपनी सबसे दायनीय अवस्था में पहुँच चुकी थी। यह युग मण्डल, कमंडल का था और प्रगतिशील युवा होने के नाते हम इन मुद्दों हमारी राय का प्रतिनिधित्व कोई राजनैतिक पार्टी नहीं करती थी। तो हमें अपना वोट डालना व्यर्थ लगा। आखिर किसे चुनें। ना हम जातिवाद के समर्थक थे, ना आरक्षण के, ना ही सांप्रदायिकता के। 90 के दशक के आरंभ से राजनीति में जो नंगा नाच चला तो हमने इस लोकतन्त्र से ही किनारा करना ठीक समझा। देशकी आर्थिक हालात बिगड़ रही थी और नेता अपनी नीच राजनीति में मशगूल थे। देश का सोना एक ऐसे प्रधानमंत्री और उसकी सरकार ने गिरवी रखा जिसे जनता का आदेश प्राप्त नहीं था। ठीक इसी समय देश की नीतियों में आमूल चूल परिवर्तन हुय और नेता, बाबू, लाला गठजोड़ ने नयी ऊँचाइयाँ और नए रास्ते पाये। देश में नए करोड़पति हुये और "ऋणम कृत्वा घृतम पिबेत" का अद्भुत दर्शन आरंभ हुया। जाति, धर्म और अपराध ही राजनीति के स्तम्भ बन गए। शेषन ने जब जनता को चुनाव आयोग से परिचित करवाया और चुनाव धीरे धीरे कम हिंसात्मक होने लगे तो हमने यह भी देखा की किस तरह चुनाव आयुक्त के पर कतरे गए और कैसे यह सुनिश्चित किया गया की आयुक्त मनपसंद ही हो। इसी समय युवाओं की आकांक्षाओं ने भी नए आयाम खोजे और चल पड़े उदारीकरण के रास्ते दूर देशों को "यहाँ का सिस्टम ही है खराब" कह कर। जी नहीं गए वे भी वोट और राजनीति से तो दूर ही हो गए। लोकतन्त्र में भला  भरोसा किसे रहा? कहाँ है लोकतन्त्र, कहाँ हैं मौलिक अधिकार? बस एक ही बात अच्छी है लोकतन्त्र के बारे में की कम से कम आप इसकी बुराई तो कर ही सकते हैं लेकिन आगरा आप व्यक्तिगत से समष्टिगत होते हैं इस बुराई में तो आप अपने अतीत को जरूर टटोल लें और कीचड़ से होली खेलने को तैयार रहें। वरना आप को रामदेवा और  अन्ना जैसा हश्र भी झेलना होगा।  देश में पैसा बढ़ा और साथ ही घोटालों का ग्राफ भी। राष्ट्रमण्डल खेलों में जैसा खुला खेल हुआ और फिर जिस तरह 2G घोटाले ने बाबू - नेता - पत्रकार- लाला के गठजोड़ का पर्दाफाश किया तो विश्वास हो गया की यही हैं लोकतन्त्र के चार स्तंभ। किसी दिन न्यायपालिका की भी कलई खुलेगी संकेत तो मिल ही रहे हैं। इसी समय आया अन्ना का आंदोलन और लगा की देश जाग गया है। पर यह भी इस देश की भीषण जनता को बस झकझोर ही पाया। राजनीति का बाहरी भरकम रथ इसे भी रोंद गया। चुनाव शुरू होते ही भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं रहा। मुद्दा है तो 40 साल के युवा राहुल की बातें, उनकी रातें। वे युवा हैं लेकिन राजनीति वे बुढ़ाती हुयी करते हैं। वही फार्मूला - जाति, धर्म और आरक्षण। तो सोचा किसे वोट दिया जाए। ना कोई पार्टी न ही प्रत्याशी इस लायक लगा जिसे वोट दिया जाए। फिर तय किया की नियम 49 - ओ का प्रयोग करूंगा। बूथ पर गाया, वॉटर पर्ची दी, स्याही लगवाई और पीठासीन अधिकारी से आग्रह किया वह तय प्रकीरिया के अंतर्गत दर्ज करे की में मत नहीं दे रहा हूँ। अफसोस की 49-ओ का फार्म वहाँ उपलब्ध नहीं था। अतः मैंने निश्चय किया की जब देश में अंधा युग हो और कानून भी अंधा हो तो वोट भी अंधा ही होगा अतः आँखें बंद किन और बिटिया से कहा की वह अक्कड़ - बक्कड़ बम्बे बो कहे और जैसे ही उसने कहा चोर निकल के भागा मेंने बटन दबा दिया। पता नहीं कौन सा बटन था और किसको मिला पर जब चौपट राजा हो तो ऐसे ही चौपट तरीके से वोट देना सबसे अच्छा है। खैर इस बार यह नया रंग अच्छा लग रहा है। होली मुबारक !

27 फ़र॰ 2012

नोर्वे को सबक

दो भारतीय बच्चों को तथाकथित सुरक्षा गृह में रखने का मामला बड़ा विचित्र है और साथ ही संस्कृतियों की विभिन्नता भी दर्शाता है। नॉर्वे के क़ानूनों के अनुसार ये भारतीय दंपति बच्चों के पालन में सक्षम नहीं थे अतः बच्चों को किन्हीं दूसरे घरों में भेज दिया गया। यह अक्षमता थी - बच्चों को हाथ से खाना खिलाना, साथ सुलाना आदि। ऐसा केवल यही मामला नहीं है बल्कि नॉर्वे हर वर्ष बड़ी मात्र में बच्चों को मटा पिता से अलग करता आया है इन्हीं क़ानूनों के आधार पर। कोई राजा महाराजा सनकी हो सकता है पर एक कल्याणकारी राज्य की पूरी मशीनरी यदि सनकी हो जाए तो चिंता होती है। कानून बेशक सनक में नहीं बनाए जाते और अगर नॉर्वे में ऐसी कानून हैं तो इनकी ठोस वजह भी होनी चाहिए। और यही तथ्य मुझे चिंता में डाल देता है। कानून ईश्वर नहीं बनाता बल्कि क़ानूनों के पीछे समाज होता है। अगर नॉर्वे बड़ी मात्र में बच्चों को फॉस्टर होम्स में भेजता है तो यह तथ्य यही बताता है की नॉर्वे के समाज में बड़ी गड़बड़ है। समाज विज्ञान की भाषा में कहें तो वहाँ समाज डिसफंकशनल हो चुका है। यदि समाज अपने बच्चों को सुरक्षा नहीं दे सकता और समाज में यदि बच्चों को अपने ही माँ बाप से असुरक्षा हो तो केवल कानून नहीं बल्कि बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। भारतीय बच्चे तो खैर हमें वापस मिल ही जाएंगे पर स्वयं नॉर्वे यदि अपने विकृत समाज को सही करने की दिशा में कदम नहीं उठाएगा तो यह मानवता के लिए खतरा बन जाएगा। इस घटना से सीख मिलती है खास तौर पर उन लोगों के लिए जो पश्चिम की हर चीज़ को बेहतर मानते हैं और भारत के लिए कहा करते हैं "यहाँ का तो सिस्टम ही है खराब" । शायद नॉर्वे का सिस्टम उन्हें भी रास नहीं आएगा। 

12 फ़र॰ 2012

व्हिट्नी ह्यूस्टन नहीं रहीं

एक महान कलाकार की असमय मौत ------एक बार फिर। व्हिट्नी ह्यूस्टन अश्वेत अमेरिकी गायिका थीं जिन्हें दुनियाँ ने उनके अतिशय सफल एल्बम "बॉडीगार्ड" (ढिंका चिका वाला नहीं - उसे में Bawdy guard कहना पसंद करूंगा) और उनके ज़बरदस्त गाने "आई विल ऑल्वेज़ लव यू"  से पहचाना था। हालांकि उनका गाना "वन मोमेंट इन टाइम " 80 के दशक में भारत में भी लोकप्रिय रहा है। वे  सी सी ह्यूस्टन की बेटी थीं। उनकी कहानी भी अन्य अमेरिकी सुपर स्टारों की तरह धूमकेतु सी रही। वे आयीं, वे चमकीं और खो गईं। अमेरिका में यह अब रिवाज सा बन गया है की सुपर स्टार आखिर कार मुकद्दमेबाजी, अवसाद, नशा, और अंततः मौत का शिकार बनते हैं फिर चाहे वह मारलीन मोनरो हों या माइकेल जैक्सन, ब्रिटनी स्पीयर्स हों या फिर व्हिट्नी ह्यूस्टन सभी की कहानी एक जैसी। सेलिब्रिटीज के लिए अमेरिका सुरक्षित जगह नहीं है

प्रस्तुत है उनके कुछ गाने

8 फ़र॰ 2012

उदार हृदय और खुला दिमाग

File:Oprah Winfrey (2004).jpgओप्रा विनफ्रे हाल ही में भारत प्रवास पर थीं। वे दिल्ली आगरा, जयपुर, मथुरा और मुंबई भी गईं और हर जगह लोगों ने उन्हें खुले दिल और उदार हृदय से स्वीकारा। जयपुर में जो सम्मान उन्हें मिला उससे अभिभूत होकर उन्होंने अपनी दादी की इच्छा का ज़िक्र किया की उनकी दादी चाहतीं थीं की वे एक सम्मानित व्यक्ति के रूप में बड़ी हों। बेशक उन्हें अपने टीवी प्रोग्रामों से ना केवल अमेरिका बल्कि पूरे विश्व में भरपूर प्यार और प्रशंसा मिली है। वे खास हैं। वे नारी शक्ति की प्रतिनिधि हैं और उनके कार्यक्रमों  का सकारात्मक स्वरूप प्रेरणादायी है। वे यहाँ भारतीय विधवाओं के दशा पर अपने कार्यक्रम के लिए फिल्म बनाने आयीं थी और मथुरा में वे उन्हीं विधवाओं से मिलने गईं थीं। यह अच्छी बात है की लोग इन विधवाओं की दुर्दशा पर सोचें लेकिन दुख तब होता है जब यह सोच तभी निकलती है जब किसी को अपनी फिल्म बनानी है या किताब लिखनी है। इससे आगे की लड़ाई कौन लड़ेगा? और तभी यह स्पष्ट हो जाता है कि फिल्में तो बनती ही रहेंगी फिलहाल तो इन विधवाओं की आवास और भोजन, कपड़े की लड़ाई तो पारंपरिक मंदिर, ट्रस्ट आदि ही कर रहे हैं और बेशक शोषण भी (सभी नहीं)। फिल्म बना कर किताब लिख कर आप स्थिति तो उजागर कर देते हैं लेकिन इससे आगे कि लड़ाई लड़ने वाला कोई नहीं आता। क्यूँ नहीं आज फिर कोई ज्योतिबा फुले पैदा होता? क्या होता अगर गांधी जी देश की दुर्दशा पर केवल किताबें लिखते रह जाते और ज्योतिबा फुले भाषण ही देते रहते? भारत का विरोधाभास सभी विदेशियों को चकित करता है। लेकिन यही सच्चाई है। यह विरोधाभास उपजता ही तब है जब हम विकास का मतलब ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों और चमकती गाड़ियों से लगते हैं। पर जब इन्हीं इमारतों को बनाने वाले मजदूर, किसी महाशहर के बाहर अमानवीय परिस्थितियों में अवैध बस्तियों में अपने दिन काटने लगते हैं तो हमें विरोधाभास दिखाई देता है और तब कोई उन्हें झुग्गियों का कुत्ता(स्लम डॉग ) कह कर उपहास उड़ाते हुये तमाम पुरस्कार बटोर लेता है क्यूंकी  उन देशों के दर्शकों के लिए यह स्लम डॉग अजूबा है। ओप्रा को भी जयपुर में बैलगाड़ी पर सरिये ढोते, गधे पर बैठा आदमी और मोटरसाइकिल पर बैठा मोबाइल पर बतियाते आदमी में भारतीय विरोधाभास के दर्शन हुये। पता नहीं यह तीन  घटनाएँ  भगवान बुद्ध की भांति उनके जीवन पर क्या प्रभाव डालेंगी। यह विरोधाभास उन्हें ,उ,बाई में भी दिखा जब वे बच्चन के यहाँ गईं और आश्चर्य किया कि अभिषेक अभी भी अपने पिता के यहाँ क्यूँ रहते हैं। बेशक भारत यात्रा एक सामान्य पर्यटक के लिए एक ना भूलने वाला अनुभव होता है लेकिन ओप्राः से यह आशा नहीं थी कि वे सांस्कृतिक भिन्नता को अपने चश्मे से देखेंगीं। हमारे लिए बच्चों को अपने घरों में रखना एक सामान्य बात है अमेरिका में नहीं। अभी हाल ही में नॉर्वे का मामला चर्चित था जिसमें डॉ छोटे बच्चों के  लालन पालन में अक्षम ठहरा कर उनके माता पिता से छीन कर दत्तक परिवार में रख दिया गया। बेशक ऐसे कानून वहाँ आवश्यक हैं। क्यूंकी न समाज और न ही परिवार पालन पोषण के कठिन कार्य में सहयोगी नहीं होता लेकिन यहाँ भारत में न केवल नवमातृत्व के लिए सुरक्षित वातावरण और दादी, नानी, माँ, सासू माँ का अनुभव और सहता सदैव उपलब्ध रहती है। निश्चित ही हम बड़े शहरों में एकल परिवारों, और पूर्णतः कटे पड़ोस और बढ़ते अपराधों से जूझ रहे है। ओप्रा को अमेरिकी समाज के विरोधाभासों पर सोचना चाहिए और भूमंडलीकरण  के इस दौर में जहां लोगों का आना जाना बढ़ रहा है सांस्कृतिक विभिन्नताओं को विरोधाभास समझने से बचना चाहिए। यह विरोधाभास ही हैं जो आज अमेरिकी कंपनियों को भारत की ऊर मोड रहे हैं। निश्चित ही किसी अमेरिकी कंपनी को अपनी बहू मंजिली इमारत बनाने के लिए सस्ते मजदूर, कम लागत का ऐसा ट्रांसपोर्ट और कम पैसों में कैसा भी काम करने वाले योग्य कर्मचारी अमेरिका में तो मिलेंगे नहीं। हालांकि हमें भारत के इन विरोधाभासों से कोई लगाव नहीं है लेकिन ओप्रा जैसी हस्ती से फिर वही सस्ती टिप्पणियाँ सुनना  भी कोई कम विरोधाभासी नहीं हैं - आप खुले दिमाग और उदार हृदय से आयें हैं तो फिर विरोधाभास क्यूँ कहते हैं? ओप्रा आपसे विचारों कि अधिक गहराई कि अपेक्षा थी। रही बात स्टैंडिंग ओवशन  कि तो यह हम भारतीयों कि आदत है - बिछ जाने कि  बस वह आदमी अमेरिकन होना चाहिए। ओप्रा को इसमें भी विरोधाभास दिखना चाहिए था। 

1 फ़र॰ 2012

आ इक नया शिवाला इस देश में बना दें

अल्लामा इकबाल कि यह नज़्म रबबनी बंधुओं ने फिर गायी है। इकबाल का एक देश प्रेमी से एक विभाजनकारी में बदलाव एक ऐसा प्रश्न है जिसे आज हर एक इतिहासकार को खोजना चाहिए। क्यूंकी इसके उत्तर में ही हमें वे विष बीज मिल पाएंगे जो आज दोनों मुल्कों में फल फूल रहे हैं। बेशक आज का पाकिस्तान न तो जिन्नाह और ना ही इकबाल का पाकिस्तान है। और ना ही आज का भारत अब गांधी और भगत सिंह का भारत है।
इस गाने से परिचय के लिए मैं रेडियो वाणी का आभारी हूँ।