16 दिस॰ 2012

किसी रंजिश को हवा दो की मैं ज़िंदा हूँ अभी

किसी रंजिश को हवा दो की मैं ज़िंदा हूँ अभी 

अमेरिका के राष्ट्रपति की आँखें फिर नम हैं। अभी बहुत दिन नहीं हुये हैं जब ऐसी ही घटना ने उन्हें आहत किया था। शब्द और माहौल भी वही हैं गमगीन, गंभीर और कुछ करने के वादे , कुछ नहीं बदला है और शायद कुछ बदलेगा भी नहीं। आखिर छोटे बच्चों की मौत पर भला अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसी महान और शानदार लाइनों को अमेरिकी संविधान से यूं ही तो नहीं मिटाया जा सकता। और भला इससे किसका फाइदा होगा? अगर अमरीकी शस्त्र कानून बदलाव किया जाता है तो बंदूकों की बिक्री बंद हो जाएगी। लोग बेरोजगार होंगे और अराजकता फैलेगी फिर लोग अवैध तरीके से हथियार लेकर यही काम करेंगे। इसलिए यह कानून रहेगा और ऐसा ही रहेगा। इसके पैरवी करने वाले इतने सजग हैं की जिस दिन यह घटना घटी ठीक उसी दिन डिस्कवरी चैनल पर मैंने एक कार्यक्रम देखा जिसका नाम था डूम्स डे प्रेपेयर्स। इसमें एक सज्जन ने प्रलय या डूम्स डे के लिए तैयारी में पानी से ज्यादा बंदूकें खरीद रखीं थीं और उसका पूरा चिंतन इसी एक तर्क पर टीका था की जब मंदी आएगी तो अराजकता फैलेगी और उससे रक्षा के लिए हमें ऐसी तैयारी की ही आवश्यकता होगी। तो ऐसे कार्यक्रम दरअसल एक डर पैदा करके उस भय के व्यावसायिक दोहन के लिए माहौल बनाते हैं। तो मुझे पूरा भरोसा है की अभिव्यक्ति की आज़ादी छीनी नहीं जाएगी।

हाल की घटना में एक नौजवान ने एक स्कूल में फायरिंग करके 20 बच्चों और 8 वयस्कों की जान ले ली और खुद को एवं अपनी माँ को भी मौत के घाट उतार दिया। मामले की परतें खुलने पर पता चला है की यह नौजवान एक समृद्ध परिवार से था जिसके पिता बहुराष्ट्रीय कंपनी जीई कैपिटल में वाइस प्रेसिडेंट हैं और विश्व की सबसे बड़ी सलहकार फार्म अर्न्स्ट एंड यंग में पार्टनर भी हैं। लड़के का बड़ा भाई भी अर्न्स्ट एंड यंग में अच्छे पद पर है। बचपन में ही मटा पिता का अलगाव हुआ और फिर तलाक जिसके बाद दोनों अपनी माँ के साथ रहते थे जो इसी स्कूल में टीचर थी। आस पास के लोगों ने इस नौजवान को कभी बात करते या मिलते जुलते नहीं देखा और ना ही कोशिश की क्यूंकी उन्हें लगता था की वह अकेला ही रहना चाहता है। उसके एक सहपाठी के अनुसार वह होशियार था। उसकी कभी हिंसक गतिविधियां भी नहीं थीं। तब आखिर क्या बात थी जिसने उसे ऐसा कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया। क्या ऐसी घटनाओं के लिए अमेरिका ही अभिशप्त है ? भारत में ऐसी हृदयविदारक घटनाएँ क्यूँ नहीं होतीं? क्या यह संस्कृति से संबन्धित मामला है ? क्या ऐसा करने वाले आपराधिक मनोवृत्ति के लोग होते हैं?क्या यह कमजोर शस्त्र कानून का नतीजा है ? प्रश्न बड़े हैं और उत्तर नदारद। 

मुझे याद है अपना बचपन जो एक छोटे कस्बे में बीता था। हमारे मुहल्ले में कोई अकेला हो ही नहीं सकता था। आप बाहर निकालिए तो पूरी गली पार करते करते चबूतरों पर धूप सेंकते बुजुर्ग और गली के लड़के अगर यह ना पूछें की "काए लला कहाँ जाय रहे ?" तो लानत है उनके वहाँ होने पर  और आपको भी अपने अस्तित्व का बखूबी एहसास हो जाता था। अगर कभी कोई समस्या होती तो पूरा मुहल्ला शामिल होता और दुख तो खैर होता ही था सामूहिक। लड़की की शादी हो तो सहायता बिना मांगे मिलती थी। पड़ोसियों की खबर रखना अशिष्ट नहीं आवश्यक था। सब कुछ अच्छा अच्छा ही नहीं था बुराइयाँ भी थीं पर कम से कम उस स्थिति से तो बेहतर ही था जिसमें बगल के फ्लैट में आदमी चार दिन से मरा पड़ा हो और लोगों का ध्यान तब जाए जब बदबू आने लगे। 

मुझे लगता है की हमें फिर से सोचना होगा हमारे विकास और सफलता के मापदण्डों के बारे में। क्या किसी एमएनसी का CEO बनना ही जबकि आपका परिवार बिखर रहा हो । क्या मशीन की तरह काम करना और पैसा कमाना ही सफलता का मापदंड होना चाहिए। इस आधार पर उस नौजवान के पिता सफल हैं परंतु क्या वे मानवीय पैमानों पर सफल हैं? जब आपका परिवार बिखर रहा हो तो सफलता की सिद्धियों का क्या मतलब है। और क्या ऊंची इमारतें, फ़्लाइओवर, एकप्रेसवे, बड़ी गाड़ियां, ऊंचे पुल और बड़ी कंपनियाँ बैंक ही किसी समाज की सफलता की गारंटी हैं। अगर एक समाज अपने बच्चों को सुरक्षा, शिक्षा और सही वातावरण नहीं दे सकता तो उसके सफल होने का क्या अर्थ ? क्या एक राज्य तभी सफल है जबकि वह सबसे ज्यादा हथियार, सेना और शक्ति का प्रदर्शन कर सकता है जबकि उसका समाज दरक रहा हो। क्या एक संविधान अभिव्यक्ति की आज़ादी के पीछे जीवन के अधिकार को पीछे धकेल कर सफल माना जा सकता है। आखिर व्यक्तिगत जीवन की सुरक्षा से अधिक महत्वपूर्ण सामाजिक जीवन की सुरक्षा होनी चाहिए। राज्य एक सामूहिक व्यवस्था है और इसमें व्यक्ति की निरपेक्ष स्वतन्त्रता नहीं होती इसलिए अमेरिकी क़ानूनो की निरपेक्षताएँ अक्सर विरोधाभासी नज़र आती हैं। इस घटना में नौजवान ने सभी हथियार कानूनी ढंग से खरीदे थे। उसे रोका नहीं जा सकता था यह उसकी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता थी लेकिन उन लोगों के जीवन के नैसर्गिक अधिकार का क्या ? क्या यह अधिकार कम महत्वपूर्ण हैं ? अमेरिकी समाज का यह अकेलापन ऐसी घटनाओं का कारक बनता है। 
इस अकेलेपन में जब कोई नौजवान अपने अस्तित्व का आभास कराना चाहता है तब समाज व्यक्तिवादी हो कर उसके अकेलेपन को उस पर थोप देता है। उससे कोई नहीं पूछता की वह क्या चाहता है। उसके माँ बाप भी उसके कमरे के दरवाजे को अपनी सीमा मानते हैं और जब वह अकेलापन इतना असहनीय हो जाए तब वह एक ऐसी रंजिश को हवा देता है की जो समाज अभीतक उसके अस्तित्व से बेखबर था वह उसके होने और ना रहने के पलों को याद करके बरसों कांपता रहता है। 

तेल की धार देखो ............

प्रधान मंत्री जी कह रहे हैं की तेल का बिल , शिक्षा और स्वस्थ्य के बिल से ज्यादा है और इसे कम करके इन क्षेत्रों में लगाना जरूरी है । उत्तम विचार है। आखिर स्वस्थ्य और शिक्षा क्षेत्रों में पैसा है ही कहाँ जिसे खाया जा सके ! इन क्षेत्रों में जरा सा घोटाला करो नहीं की पकड़ में आ जाता है। कोई मंत्री स्वस्थ्य और शिक्षा का विभाग नहीं लेना चाहता और ना ही कोई कॉर्पोरेट इनके लिए लॉबीइंग करता है। अब तेल का पैसा आएगा तो हालत सुधरेंगे। अब ज़रा देखिये ना अभी यूपी में जो घोटाला हुआ है उसमें कितनी जानें चली गईं हैं। CMO भक्षी बन गया है राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन। सारी बुराइयों की जड़ सबसिडी ही है। छोड़ दीजिये उस अंतिम आदमी को बाज़ार के भरोसे और मुकर जाइए उन जिम्मेदारियों से जो एक कल्याणकारी राज्य की मानी जातीं है। 

11 दिस॰ 2012

पश्चिम का पागलपन

एक ऑस्ट्रेलियन एफ एम चैनल के जोकी द्वारा एक भारतीय मूल की नर्स को झूठी कॉल की और ब्रितानी राज घराने की बहू केट मिडल्टन के गर्भवती होने की खबर हासिल कर ली। इसके बाद उठे तूफान ने नर्स को इतना परेशान किया की उसने ख़ुदकुशी कर ली। इस घटना से एक बार फिर उस पागलपन पर प्रश्न चिह्न लग गया है जो शाही परिवार के बारे में खबरें प्राप्त करने के लिए जुनूनी हदें पार कर जाता है और कई जानें भी ले चुका है जिसमें खुद प्रिंस विलियम की माँ डायना की दर्दनाक मौत शामिल है और अब एक और जान केवल इसी वजह से चली गयी। शाही परिवार या सेलिब्रिटी की निजी ज़िंदगी के बारे में क्या श्रोता या पाठक वाकई इतने लालायित होते हैं कि रेडियो जौकी और पेप्रात्ज़ि कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं?! मुझे पूरा भरोसा है कि लोग ऐसा नहीं चाहते। आखिर क्यूँ नहीं कुछ अखबार या चैनल एक ऐसा व्यापक अध्ययन नहीं करा लेते जिसमें लोगों से इस प्रश्न को पूछा जाये। मुझे लगता है कि सेलिब्रिटी भी इस जनमत संग्रह को पसंद करेंगे और एक बड़े पागलपन से हम सबका पीछा छूटेगा। 

30 नव॰ 2012

धारा 19 बनाम धारा 66


पिछले दिनों मुंबई के एक स्थानीय नेता के निधन के बाद जैसा माहौल बिके हुये समाचार चैनलों ने बनाया उससे लगा जैसे इसके अलावा और कोई जरूरी मुद्दे नहीं हैं। बॉलीवुड के घाघरे में हर समय घुसे रहने वाले इन चैनलों को शाहरुख, सलमान बच्चन से अगर फुर्सत मिलती है तो कैमरा टिकता है ऐसे नेताओं पर जिनकी दुकान ही चलती है चुन चुन कर भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त गारंटियों को ध्वस्त करने से। ये बिके चैनल हर सामान्य कलाकार से उसकी खबर के ऐवज में पैसे मांगते हैं, हर अखबार खबर के बदले विज्ञापन चाहता है। न्यूज़ चैनलों पर या तो नेताओं और एंकरों की फिक्स लफ़्फ़ाजियाँ होतीं हैं या फिर करोड़ों रुपये ले कर फिल्मों और सीरियलों के प्रचार। कोई ढंग की स्टोरी, खबर से अब इनका नाता नहीं रहा। जनता का सरोकार जनता की रुचि के नाम पर स्वाहा कर दिया गया है लेकिन मुंबई के कार्टूनिस्ट और स्वयंभू हिन्दू हृदय सम्राट 
के निधन पर लगभग पूरा पखवाड़ा ही स्वाहा कर दिया गया। उन महान नेता के व्यक्तित्व पर खूब चाशनी लपेटी गयी और भरा पूरा श्रद्धांजली वाला माहौल बनाया गया। 
                             फेसबुक पर एक लड़की द्वारा ऐसे ही माहौल पर प्रश्न खड़ा करना उस नेता के पिछलग्गुओं (अनुयाई सिद्धांतों के लिए प्रयोग  किया जाता है ) और इनसे भयभीत राज्य का वह महकमा जो असल में जनता को भयमुक्त करने के लिए था, इन लड़कियों को भयभीत करने में जुट गया। मुंबई पुलिस को आधा घंटा भी नहीं लगा यह सुनिश्चित करने में की इन लड़कियों ने, जिनमें से एक ने तो केवल उस पोस्ट को लाइक ही किया था, सूचना तकनीक कानून की धारा 66ए का उल्लंघन किया है और माननीय न्यायाधीश को उससे भी कम समय लगा उन नागरिकों के प्रथम दृष्टया अपराध निर्धारित करने में। और उन गुंडों को तो खैर और भी कम समय लगा लड़की के रिश्तेदार डॉक्टर का क्लीनिक ध्वस्त करने में। इस चापलूसी, भय और राजनौतिक मजबूरी के कुहासे में यह तथ्य कहीं खो गया की फेसबुक पर महाज़ 200 शब्दों की छोटी से टिप्पणी अगर सेडिशन और व्यवस्था के लिए खतरा हो सकती है तो फिर उन दिवंगत महान नेता के वे जहर बुझे वाक्य क्यूँ नहीं सेडिशन, अराजकता का खतरा जैसी चिंताएँ नहीं उठा सके? आखिर धारा 19 का ध्यान मुंबई पुलिस को क्यूँ नहीं आता और क्यूँ नहीं कोई न्यायालय धारा 19 के उल्लंघन को निर्धारित नहीं कर पाते। (धारा 19 हमारे संविधान में है और नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता कुछ प्रतिबंधों के साथ देती है।)


संविधान द्वारा मिले अधिकार: संविधान का अनुच्छेद १५ हमें आश्वासन देता है कि हमसे भारत देश में धर्म, जाति,मूलवंश, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद नहीं किया जाएगा. अनुच्छेद १६ के द्वारा संविधान सरकारी नौकरियों में  न केवल अवसर की समानता देता है बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि हमसे धर्म, जाति, मूलवंश, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद ना हो. इसी प्रकार अनुच्छेद १९ प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति एवं अन्तःकरण की स्वतंत्रता प्रदान करता है. हमें यही अनुच्छेद सम्पूर्ण भारत में घूमने फिरने, कहीं भी बस जाने और कोई भी व्यवसाय कहीं भी करने का अधिकार देता है.
परन्तु अभिव्यक्तिका यह अधिकार निर्बाध नहीं है. इन स्वतंत्रताओं पर रोक भी लग सकती है यदि इनका प्रयोग भारत कि एकता, अखंडता, संप्रभुता, लोकव्यवस्था, विदेशी राज्यों के साथ मैत्री पूर्ण संबधों पर विपरीत असर डालने में किया जायेगा. संवैधानिक पदों पर व्यक्ति को प्रतिज्ञन करनी होती है उसका पूरा खाका भी संविधान कि एक अलग सूची (तीसरी अनुसूची) में किया गया है. प्रत्येक विधायक, सांसद और मंत्री को संविधान के प्रति निष्ठा कि और एकता व अखंडता को सुरक्षित रखने कि शपथ लेनी होती हैं.

अब यदि उपरोक्त तमाम कानूनों के प्रकाश में हम बाल ठाकरे, उद्धव ठाकरे और राजठाकरे के वक्तव्यों को देखें तो प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके वक्तव्य संविधान विरोधी हैं.

बैंक या रेलवे के परीक्षर्थियों पर हमला और उन्हें परीक्षा से वंचित करना अनु० १५ और १६ का उल्लंघन है. साथ ही यह ऐसी अभिव्यक्ति है जो लोकव्यवस्था, एकता, अखंडता,संप्रभुता पर विपरीत असर डालती है अतः इसकी अनुमति किसी संगठन को नहीं दी जा सकती (अनु० १९).

पाकिस्तान या ऑस्ट्रेलिया के खिलाडियों सम्बन्धी राज - बाल ठाकरे के बयान निश्चित तौर पर विदेशी राज्यों से संबंधों पर विपरीत असर डालते हैं और अनु ० १९ का उल्लंघन करते हैं.

उत्तर भारतीयों को मुंबई से भगाने, उन पर हमला करने जैसे कृत्य अनु० १५, १६ कीबखिया उधेड़ते हैं तो एक राजनीतिक दल के रूप में चुनाव आयोग की आचार संहिता का उल्लंघन भी करते हैं. चुनाव आयोग एक संवैधानिक निकाय है और राजनैतिक दलों के लिए निर्धारित आचार संहिता के पहले पैराग्राफ में ही लिखा है कि "कोई भी पार्टी ऐसीकिसी गतिविधि में शामिल नहीं होगी जो धर्मं, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर विभेद पैदा करती हो." पर शिवसेना आदि दल ऐसा ही करते हैं औरखुले आम करते हैं. 

ये दल स्वयं को सांस्कृतिक दल कहते हैं परन्तु इनकी कार्यवाहियां हिंसक, फासीवादी और अलगाववादी हैं. यह दल इसी अराजकता के सहारे थोड़ी सी राजनैतिक शक्ति जुटा कर क्षेत्रीय राजनीति में सौदेबाजी करते हैं और तो और केंद्रीय राजनीती को भी प्रभावित करते हैं. यह भी संविधान का उल्लंघन ही है क्यूंकि संविधान लोकतान्त्रिक व्यवस्था कि गारंटी देता है जबकि यह दल हफ्ता वसूली दल कि भांति काम करते हैं. शिवसेना केवल मुंबई कि राजनीती कर के स्वयं को पूरे महाराष्ट्र का ठेकेदार मानती है. २८८ में से केवल १३ सीटें जीतने वाले दल आखिर राजनीती कि दिशा क्यूँ तय करें? इस प्रकार शिवसेना हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर हर दृष्टि से प्रश्नचिंह लगाती है.  है कोई कानून जो इन महान नेताओं को नाथ सके? 



(भारत भाग्य विधाता के भरोसे अपलोड कर रहा हूँ )

21 नव॰ 2012

हंगामा है क्यूँ बरपा !

एक भारतीय दांत चिकित्सक महिला की आयरलैंड में इसलिए मौत हो गयी क्यूंकी डॉक्टर ने उसकी जान बचाने के लिए आवश्यक होते हुये भी गर्भपात करवाने से इनकार कर दिया क्यूंकी उसका कानून इसकी इजाज़त नहीं देता। इससे पुनः आइरिश कानून पर बहस छिड़ गयी है और भारत ने तो बकायदा आयरलैंड को सलाह भी दे डाली है की इस मामले की निष्पक्ष जांच करा ली जाए (जैसी की अपने यहाँ के नताओं को आदत सी हो गयी है) अनेक भारतीय समाचार चैनल इस मसले पर हंगामा बरपा रहे हैं । उस महिला की मौत दुर्भाग्यपूर्ण है और वह डॉक्टर तो निश्चित ही निंदनीय है जिसने उसका सही इलाज करने के अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं किया लेकिन ज़रा यहाँ ठहरिए और सोचिए क्या हमें अधिकार है इतना हंगामा खड़ा करने का ?

  • भारत के लोग हर वर्ष लाखों बच्चियों को गर्भ में मार डालते हैं। भारत के छोटे से छोटे कस्बे में अल्ट्रासाउंड सबसे चोखा धंधा है। इसे ले कर किसी डाक्टर को कानून क्या भगवान भी याद नहीं आते। आयरलैंड के डाक्टर कम से कम कानून का तो पालन करते हैं। 
  • भारत में हर वर्ष असुरक्षित प्रसव से लाखों माताओं की मौत होती और लाखों बच्चे मर जाते हैं तब कोई हँगामा नहीं सुनाई देता बस हर दस वर्ष में रस्मी तौर पर जनगणना के आंकड़ों पर बहसें हो जाया करतीं हैं। 
  • भारत में हर वर्ष लाखों बच्चियों की अल्पवयस्क होते हुये भी शादी की जाती है तब कोई हंगामा नहीं होता। 
  • भारत के चौराहों पर, मंदिरों में, और उनके बाहर, रेलवे स्टेशनों पर लाखों बच्चे भीख मांगते हैं पर तब हमें शर्म, गुस्सा या खीज नहीं होती। 
  • भारत के लाखों बच्चे आज भी भूख से मर जाते हैं पर किसी के कण पर जूँ तक नहीं रेंगती । 
  • भारत में हर वर्ष लाखों विवाहित महिलाएं दहेज के लिए मार डालीं जातीं हैं पर हमें फर्क नहीं पड़ता। 
  •  भारत जो एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है ( हम आयरलैंड की कैथोलिक एंगिल से भी आलोचना कर रहे हैं ) औरतों के लिए अलग अलग कानून हैं - हिंदुओं के लिए अलग और मुसलमानों के लिए अलग।
  • भारत में हर वर्ष सैकड़ों लड़कियां इसलिए मार दी जाती हैं क्यूंकी वे अपनी पसंद का जीवन साथी चुन लेतीं हैं। 
इन सबके लिए -----ध्यान से देखिये सरकार नहीं लोग दोषी हैं ----यही सबसे बड़ा भ्रष्ट आचरण है ---- स्विस बैंकों में दौलत जमा करने से बड़ा पाप है अजन्मी बच्चियों की हत्या, पैसे के लिए अपनी पत्नी, बहू की हत्या, धर्म की आड़ में बच्चों को टीकाकरण से दूर रखना, स्त्रियॉं को सामान्य मानव के हकों से दूर रखना। चिंता हमें आयरलैंड के क़ानूनों की नहीं अपने समाज की करनी चाहिए। आयरलैंड का क़ानून ो मुझे स्पष्ट लगा की अगर माँ की जान बचाने के लिए गर्भपात आवश्यक है तो इसकी अनुमति है पर हमारे देश के उन क़ानूनों की चिंता कीजिये जो ऐसे छेद छोड़ देते हैं जिससे उन्हें तोडा जा सके। आइये चिंता करें उन क़ानूनों की जो किसी स्त्री को उसका अधिकार नहीं दे सकते। आयरलैंड को निपटने दीजिये इस मुद्दे से वे इसे अपनी तरह से हल कर ही लेंगे। 

12 नव॰ 2012

जनता है सोने की मुर्गी

2G घोटाले के बाद अब तक घोटालों के प्रति हमारी संवेदनाओं को तृप्त करने वाले और भीषण, विभीषण प्रकार के घोटाले सामने आ चुके हैं। पर जैसा की हर घोटाले में होता है - दोनों ओर से जनता ही हलाल होती है। पहले तो जनता के कारों के पैसों से विकसित तकनीक को कौड़ियों के दामों पर निजी कंपनियों को बेच दिया गया। इन कंपनियों ने इसके ज़बरदस्त दाम वसूले। शायद आपको वह ज़माना याद भी ना हो की 1997 में मोबाइल कॉल दरें 18 रू प्रति मिनट थीं और इंकमिंग भी फ्री नहीं थी। फिर घोटाला खुला और न्यायालय ने सभी आबंटन रद्द कर दिये। हालांकि सज़ा नहीं हुयी। न्यायालय असाहय है। आरोप सिद्ध करना जिसका काम है वह करबद्ध और नतमस्तक है। लेकिन न्यायालय के इस फैसले के बाद अब मंत्री जी का संकेत है की दाम बढ़ेंगे। यानि जनता को फिर से हलाल किया जाएगा। क्या न्यायालय सुओ मोटो इस मामले को ले कर न्याय दिलाएगा की स्पेक्ट्रम के आबंटन से जो घाटा हुया वह इन कंपनियों के प्रॉफ़िट से वसूला जाए, दोषी नेताओं के वेतनमान, भविष्यनिधि और पेंशन फंड से काटा जाए। स्पेक्ट्रम नीलामी के नाम पर कॉल दरों को बढ़ाना नैसर्गिक न्याय का स्पष्ट उल्लंघन है। आखिर जनता कितनी बार और क्यूँ टैक्स भरे? पहले तकनीक विकास के लिए, फिर उस तकनीक के उत्पाद को खरीदने और प्रयोग करने पर टैक्स, और अब घोटालेबाज कंपनियों को जब दोबारा पैसा देना पड़ रहा है तो बढ़ी कॉल दरों के रूप में अनुचित भुगतान और अनुचित टैक्स। क्या न्यायालय संज्ञान लेगा ? 

Oh My God: भगवान की सही व्याख्या

भगवान को देखा है? कैसा है वह? कहाँ रहता है ? हिन्दू है या मुसलमान? आदमी है या औरत? शक्ल कैसी है? ये और इन जैसे अनेक प्रश्न मनुष्य को आदि काल से मथते आए हैं। इसी मंथन से वेद, उपनिषद, वेदांग, गीता, बाइबल, अवेस्ता, क़ुरान जैसे ग्रंथ निकले हैं। इन्हें किसने रचा कोई नहीं जानता पर इनमें मानव जाति  के सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान का समावेश है। यह ज्ञान है अस्तित्व का, मनुष्य के होने के कारण का, उसकी कठनाइयों का और उसकी जिम्मेदारियों का। यह ज्ञान है मनुष्य के विकास का, उन्नयन का। पशुत्व से मानवत्व के विकास की कुंजी का। यह ज्ञान है आस्था का, भरोसे का और इसी ज्ञान से जब जब भरोसा टूटता है तब तब उसे फिर से स्थापित करने के लिए किसी मुहम्मद, ईसा, कृष्ण या बुद्ध को आना पड़ता है और इन ग्रन्थों की शिक्षाओं को फिर से नए संदर्भों में स्थापित करना पड़ता है। दुनियाँ के सबसे पुराने हिन्दू धर्म में यह प्रवृत्ति स्पष्ट दिखती है। इस धर्म में निरंतार नए तत्वों का समावेश होता रहा है। यह सबको अपने भीतर ले कर चलने वाला सही मायने में लोकतांत्रिकता का प्रतीक है। इसमें सनातन से लेकर पुरातन, नास्तिक, तांत्रिक, अघोर, शैव, शक्त, वैष्णव, बौद्ध, जैन, निरीश्वरवादी और हर तरह का वाद विवाद शामिल होता आया है। यह धर्म हर एक वाद को फलने फूलने का स्पेस देता आया है। इसीलिए जब ओह माई गॉड में कांजी भाई (कान्ह जी - कृष्ण का अपभ्रंश) भगवान को कोसते हैं और मूर्तियों का धंधा चोखा करते हैं तो कोई फतवा जारी नहीं होता। कोई मंत्री करोड़ों के ईनाम की घोषणा नहीं करता। लोग हँसते हैं और कांजी भाई की बातों पर कहीं गहरे ध्यान भी देते है। संतों के विद्रूप पर किसी का सिर कलम करने की घोषणा नहीं होती। OMG मज़ाक में उस धर्म की उस सड़न की ओर इशारा करती है जिसकी दुर्गंध के अब हम आदि हो गए हैं। अनेक बापू, बाबाओं और निर्मलो के चोखे धंधे से पर्दा फ़ाश करती यह फिल्म एक सरहनीय प्रयास है। भगवान का असली स्वरूप तो प्राणियों में है। देखने के लिए ज्ञान चक्षु नहीं प्रेम की दृष्टि चाहिए। एक शायर का कहना है

सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं, जिसको देखा ही नहीं उसको खुदा कहते हैं।

फिल्म कांजीभाई को नास्तिक कहती है और नास्तिक का अर्थ भी बताती है - वह जो प्रमाण में आस्था रखे। यह भारत की ही खूबी है की वैदिक दर्शन को ना मानने वाले नास्तिक दर्शन भी हिंदुओं के ही माने जाते हैं। चार्वाक के लोकायत दर्शन का भौतिकवाद, बुद्ध का क्षणिकवाद और जैन का इंद्रियनिग्रह एक ही समस्या के अलग अलग हल हैं। बौद्ध और जैन धर्मों ने मानवता, अहिंसा और क्षमा पर जो बल दिया है वह असल में इसी तथ्य पर बल है की असली धर्म है प्राणियों के प्रति दया, अहिंसा, शुद्ध विचार और सादा जीवन। आडंबर यज्ञ, कीर्तन, पूजा और मंत्रों से श्रेष्ठ है दया और मन की शुद्धता। मन चंगा तो कठौती में गंगा। दारम की सरलता में ही उसका कल्याणकारी स्वरूप निहित है। आज बापुओं, निर्मलो ने न केवल धर्म को दुकान में बदल दिया है बल्कि उसका विद्रूप भी बना दिया है। खैर दुकानें तो चलती ही रहेंगी संतोष बस इतना  ही है की इनके खिलाफ आवाज़ उठती रहनी चाहिए। जो समाज खुद की आलोचना नहीं करता वह विकसित नहीं हो सकता है।

5 अक्टू॰ 2012

Acute Corruption Syndrome

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों में हर साल इस समय एक भीषण बीमारी फैलती है जिसमें हजारों (बढ़ा चढ़ा कर नहीं सच बता रहा हूँ ) बच्चे मर जाते हैं। यह बीमारी है तो एन्सिफेलाइटिस या दिमागी बुखार पर सरकारी स्वस्थ मशीनरी इसे स्वेईकार नहीं करती। जब बीमारी फैलती है तो सरकार मुआवजा दे देती है और विशेषज्ञ भेज देती है। ये विशेषज्ञ सरकारी गेस्ट हाउस में रुकते हैं, स्थानीय स्वस्थ्य अधिकारियों की मेजबानी स्वीकार करते हैं, तर माल खाते हैं और रिपोर्ट बना कर देते हैं की यह बीमारी एन्सिफेलाइटिस नहीं है बल्कि उससे मिलती जुलती है। क्या है पता नहीं फिलहाल नाम की सुविधा के लिए इसे एक्यूट एन्सिफेलाइटिस सिंड्रोम (अर्थात तेज़ एन्सिफेलाइटिस जैसे लक्षण) कह दिया जाता है।

4 अक्टू॰ 2012

अखिलेश सरकार के 6 महीने और आशाओं का टूटना

अखिलेश सरकार को 6 महीने हो गए हैं और यूपी अब भी वैसा ही है। आशाएँ टूट रहीं हैं। प्राइमटाइमों में बैठ कर बकैती करने वाले बातों के वीर अखिलेश के युवा होने को ले कर ऐसे उत्साहित थे जैसे उनसे पहले और कोई युवा नहीं हुआ। एक और युवा हैं हमारे देश में जिनको ले कर ऐसे ही जानकारों को बहुत आशाएँ हैं।

3 अक्टू॰ 2012

क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है ?

क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है ?
इन्टरनेट पर गांधी जयंती के दिन ही फेसबुक पर एक पोस्ट टैग की गयी जिसका शीर्षक था - क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है ? इसने मुझे आहात कर दिया। इसमें वही गलत तथ्य थे जिन्हें ले कर गांधी जी को बदनाम किया जाता है मसलन भगत सिंह, 55 करोड़ आदि। प्रस्तुत है पूरी रिसर्च के साथ इन गलत तथ्यों के पीछे के सही तथ्य जो पिछले 60 वर्षों से अनेक गोडसे के पुत्र गांधी की बार बार हत्या करने के लिए प्रयोग करते हैं। आशा है आपमें से बहुतों की गलतफहमियां  दूर होंगी और आप अपने प्यारे देश और इसके महान स्वतन्त्रता शहीदों को सम्मान देना सीख पाएंगे बजाय टुच्ची विचारधारा वाली राजनीति का शिकार बनने और खुद की नज़रों में गिरने के। यह लेख मैंने आरोप और उनके उत्तर के रूप में लिखा है। आरोप उन महोदय के हैं जिन्होंने मुझे टैग किया था और उत्तर मेरे हैं।