विचार पक्षियों जैसे होते हैं। मस्तिष्क के विशाल और अनंत फलक पर वे बादलों की तरह अचानक आते हैं, आकृतियाँ बदलते हैं, पक्षियों की तरह मँडराते हैं और फिर दूर कहीं गुम हो जाते हैं। बाज़ीचा-ए-अत्फाल है दुनियाँ मेरे आगे, होता है शब ओ रोज़ तमाशा मेरे आगे। इन्हीं तमाशों पर जो विचार आकार लेते हैं उन्हें पकड़ने का प्रयास है यह चिट्ठा। आपको अच्छा लगे तो एक लघु चिप्पी चस्पा करना ना भूलें।
5 अक्टू॰ 2012
Acute Corruption Syndrome
4 अक्टू॰ 2012
अखिलेश सरकार के 6 महीने और आशाओं का टूटना
3 अक्टू॰ 2012
क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है ?
इन्टरनेट पर गांधी जयंती के दिन ही फेसबुक पर एक पोस्ट टैग की गयी जिसका शीर्षक था - क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है ? इसने मुझे आहात कर दिया। इसमें वही गलत तथ्य थे जिन्हें ले कर गांधी जी को बदनाम किया जाता है मसलन भगत सिंह, 55 करोड़ आदि। प्रस्तुत है पूरी रिसर्च के साथ इन गलत तथ्यों के पीछे के सही तथ्य जो पिछले 60 वर्षों से अनेक गोडसे के पुत्र गांधी की बार बार हत्या करने के लिए प्रयोग करते हैं। आशा है आपमें से बहुतों की गलतफहमियां दूर होंगी और आप अपने प्यारे देश और इसके महान स्वतन्त्रता शहीदों को सम्मान देना सीख पाएंगे बजाय टुच्ची विचारधारा वाली राजनीति का शिकार बनने और खुद की नज़रों में गिरने के। यह लेख मैंने आरोप और उनके उत्तर के रूप में लिखा है। आरोप उन महोदय के हैं जिन्होंने मुझे टैग किया था और उत्तर मेरे हैं।
19 सित॰ 2012
17 सित॰ 2012
हवा हवाई
हवा हवाई एक गाना है । उसी फिल्म का, जिसका नायक गायब हो जाता है। आज यह “हवा” और “हवाई” शब्द महत्वपूर्ण हैं। शेयर बाज़ार का खेल ही कुछ ऐसा है। इसमें लोग हवाई आकांक्षाओं के हवाई किले बनाते हैं। उनसे बनता है “हवाई” पैसा। इसमें खिलाड़ी दूसरों के पैसों से खेलते हैं। ज़ाहिर है, अपना पैसा हो तो डर लगे पर दूसरों के पैसों का क्या डर? लगाओ दबा के। और जब पैसा बन जाए तो कहीं पैसा बनाने वाला इसे दबा कर ना बैठ जाए इसलिए उसे उड़ाने के लिए प्रेरित किया जाए। अमेरिकन संस्कृति(?) है ही ऐसी। चादर में ही मत सिमटो। चादर को बड़ा मान कर चलो (अर्थात अपनी क्षमताओं की हवाई सीमाएं बनाओ) और फिर जितना मन चाहे पैर फैलाओ। इसीलिए अमेरिका में हवाई का बड़ा क्रेज़ है। वहाँ का जो कुछ और जैसा साहित्य है जैसे की फिल्में, उपन्यास और टीवी सीरियल्स आदि से पता चलता है की “हवाई” (द्वीप) का वहाँ वही महत्व है जो अपने यहाँ प्रेस्टीज़ प्रेशर कुकर का
15 अग॰ 2012
भारत की रेल पेल
आज भी भारतीय रेल दुनियाँ की सबसे बड़ी सेवा है। रोजाना करीब 3 करोड़ लोग इसमें सफर करते हैं और लगभग 1 करोड़ इससे संबन्धित सेवाओं का लाभ उठाते हैं। रेलवे करोड़ो लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मुहैया करती है। छोटे शहरों में रेलवे स्टेशन शहर की धुरी की तरह होते हैं और आपंको एक सलाह - अगर कभी यात्रा में अंजान शहर में फंस जाएँ तो सीधे रेलवे स्टेशन की ओर रुख कीजिये। देर रात तक चहल पहल आपको वहीं मिलेगी और सुरक्शित भी रहेंगे।
30 जुल॰ 2012
गुरु की महिमा
मुक्केबाज़ विजेंदर अपने मुक़ाबले के अंत में दर्शकों का अभिवादन करते हुये। पृष्ठभूमि में हैं भारतीय मुक्केबाज़ी के पितामह श्री गुरबक्ष सिंह। विजेंदर और जय भगवान को आँके आगामी मुकाबलों के लिए शुभकामनाएँ।
13 जुल॰ 2012
गुवाहाटी का अफसोस
14 अप्रैल 2012
निर्मल तो नॉर्मल है यह बवाल ही एबनॉर्मल है।
निर्मल बाबा की कृपा पर बवाल मचा है। एक न्यूज़ चैनल पर शाम का पूरा समय(7 बजे से 12 बजे तक) निर्मल बाबा को दे दिया गया। आरोप थे कि वे 36 से अधिक चैनलों पर प्रचार करते हैं (पता नहीं इस चैनल ने अपने प्राइम टाइम के मूल्य को इस आंकड़े शामिल किया या नहीं) , वे भक्तों से प्रति सत्संग 2000 रुपये लेते हैं और चमत्कार का दावा करते हैं। इस देश में यह कोई नयी बात नहीं है। अनेक मुरारियों, आसारामों, बापुओं, रामदेवों की दुकान चल सकती है तो निर्मल बाबा की दुकान क्यूँ नहीं। जब पूरी दुनियाँ में सेल्फ हेल्प किताबों के पीछे पागल हो, लीडरशिप और मोटीवेशन एक्सपर्ट्स मोटी फीस लेकर अपनी दुकान जमा सकते हैं तो निर्मल बाबा क्यूँ नॉर्मल नहीं हैं? आखिर जांच तो उन बाबाओं की होनी चाहिए जो भक्तों से पैसा नहीं लेते और फिर भी उनका साम्राज्य करोड़ों का है। आखिर क्या स्रोत है इस पैसे का? मैं बाबाओं का फैन नहीं हूँ और न ही निर्मल बाबा की तरफदारी कर रहा हूँ लेकिन इस सारे मामले में मुझे तथ्य कम ईर्ष्या ज्यादा लगती है। ये सभी निर्मल विरोधी उस समय कहाँ चले जाते हैं जब बाबाओं के आश्रम में हत्याएँ, व्यभिचार और अनाचार होता है। टीवी एंकर का लगातार प्रश्न यह था कि इस पैसे की आपको क्या ज़रूरत है। क्या ऐसा ही प्रश्न उसे भारत के उन मंदिरों से नहीं पूछना चाहिए जहा हर वर्ष करोड़ों का चढ़ावा चढ़ता है? मेरे विचार से तो बाबा कर्म को एक अब एक सामान्य व्यवसाय मान कए सरकार को अब मंदिरों, बाबाओं और धर्मार्थ संस्थाओं पर भी बकायदा टैक्स निर्धारित कर देना चाहिए। फिर यदि लोग स्वयं ही उल्लू बनना छाते हैं तो बने। निर्मल दरबार, आसाराम दरबार, मोरारी दरबारों में मैंने अनेक पढे लिखों को भी देखा है। अब अगर इतना सब होने के बाद भी कोई इन्हें उल्लू बना सकता है तो सरकार, पुलिस और मीडिया को दर्द क्यूँ हो रहा है। वे अपनी खुशी से पैसे दे कर सत्संग में जा रहे हैं। आखिर मानसिक शांति की खोज में लोग मनोचिकित्सकों को पैसे दे सकते हैं तो बाबाओं को क्यूँ नहीं? जब लोग प्रचार करके पेरेंटिंग एक्सपर्ट बनकर प्ले स्कूल खोल कर लोगों को ठग सकते हैं तो निर्मल भला यह क्यूँ नहीं कर सकते? आखिर तब तो किसी मीडिया वाले ने उस प्ले स्कूल संचालिका से यह नहीं पूछा कि आपको यह ज्ञान कहाँ से और कैसे मिला? निष्कर्ष यह कि निर्मल के बहाने ऐसे सभी मामलों में स्थायी हल निकालना चाहिए। अभी का बवाल तो महज़ एक ऐसी कार्यवाही लग रहा है जो ईर्ष्या से प्रेरित है।
