17/09/2012

हवा हवाई

हवा हवाई एक गाना है । उसी फिल्म का, जिसका नायक गायब हो जाता है। आज यह “हवा” और “हवाई” शब्द महत्वपूर्ण हैं। शेयर बाज़ार का खेल ही कुछ ऐसा है। इसमें लोग हवाई आकांक्षाओं के हवाई किले बनाते हैं। उनसे बनता है “हवाई” पैसा। इसमें खिलाड़ी दूसरों के पैसों से खेलते हैं। ज़ाहिर है, अपना पैसा हो तो डर लगे पर दूसरों के पैसों का क्या डर? लगाओ दबा के। और जब पैसा बन जाए तो कहीं पैसा बनाने वाला इसे दबा कर ना बैठ जाए इसलिए उसे उड़ाने के लिए प्रेरित किया जाए। अमेरिकन संस्कृति(?) है ही ऐसी। चादर में ही मत सिमटो। चादर को बड़ा मान कर चलो (अर्थात अपनी क्षमताओं की हवाई सीमाएं बनाओ) और फिर जितना मन चाहे पैर फैलाओ। इसीलिए अमेरिका में हवाई का बड़ा क्रेज़ है। वहाँ का जो कुछ और जैसा साहित्य है जैसे की फिल्में, उपन्यास और टीवी सीरियल्स आदि से पता चलता है की “हवाई” (द्वीप) का वहाँ वही महत्व है जो अपने यहाँ प्रेस्टीज़ प्रेशर कुकर का
अर्थात “जो बीवी से करें प्यार वे प्रेस्टीज़ से कैसे करें इंकार” आप सब कुछ करें लेकिन अगर हवाई में छुट्टियाँ नहीं मनाई तो क्या किया। तो सभी कंपनियाँ, दार्शनिक, अर्थशास्त्री, वकील और बैंकर यही कहते हैं की “कमाओ जम के उड़ाओ जम के” (वर्क हार्ड पार्टी हार्डर)। यह अमेरिकी संस्कृति का उद्घोष है और सारी दुनियाँ इसकी चकाचौंध में डूबी है। इस कमाने उड़ाने के खेल में बढ़ा ना आए इसलिए वे जोश से चिल्लाते हैं “ डी-रेगुलेशन” कोई नियंत्रण नहीं। यही तो स्वर्ग है - आह! अनंत सुख। गरीबी और भुखमरी दूर करने का उपाय है हवाई चादर अर्थात ऋण। आपको रोटी चाहिए? बैंकर अपने हवाई पैसे के बल पर कहेंगे अरे आप रोटी छोड़िए केक खाइये (मारी अंत्वानेत एक अच्छी बैंकर नहीं थी) और अगर पैसे चाहिए तो हम देते हैं आपको पैसा - हवाई पैसा - क्रेडिट कार्ड। ऋण लीजिये और केक खाइये (“ऋणम कृत्वा घृतम पिबेत” का आधुनिक रीमिक्स )। उधारी के इस पैसे को लौटने को आप फिर ऋण लीजिये । रहने को घर नहीं?, गाड़ी नहीं ? कोई बात नहीं “ हम हैं ना” और “विश्वास सदा कायम” जैसे हवाई नारे देने वाले कहेंगे। आप अपने हवाई किलों के चक्कर में भविष्य के कई वर्षों तक की कमाई को उधारी पर लगा देते है और फिर ब्याज चुकाने को पूरी ज़िंदगी काम करते हैं। मतलब अब आप अपने लिए नहीं अपने बैंकर के लिए काम करते हैं। ऐसे कामगार को क्या कहते हैं? बंधुआ मजदूर । इस तरह यह नयी हवाई व्यवस्था लोकतन्त्र के सर्वोच्च आदर्श “मानव मात्र की स्वतन्त्रता” की ही धज्जियां उड़ाती है। असल में पुरानी शोषणकारी महाजनी व्यवस्था इसलिए समाप्त नहीं की गयी की उसमे शोषण था, असमानता थी बल्कि उस व्यवस्था के शोषण के तरीके पुराने थे, दायरा सीमित था, असंगठित था और शोषण खर्चीला था। अब इसे आधुनिक पूंजीवादी लोकतन्त्र का नाम दिया गया। यह नई व्यवस्था संगठित (गिरोहीकृत) है, विश्वव्यापी है, और शोषण के तरीके भी आधुनिक हैं ऐसे कि पता न चले कि आप शोषित हो रहे हैं। प्रोपेगैण्डा, प्रचार, गुटबाजी, घूस इसके औज़ार हैं। चार वर्ष पहले शेयर बाज़ारों में आग लगी थी। हवाई चाल से वे द्रुतगामी थे । दुनियाँ के शेयर बाज़ारों में एफ आइ आइ आ रही थी। हवा हवाई की तरह आग लगा रहगी थी अब वे भाग रही थीं। आग लगती आई थीं बिजली गिराती चली गईं। दूसरों को हवाई चादरें देने वालों की अपनी चादरें छोटी पड़ने लगीं। अब वही लोग बेल आउट मांगने लगे। हालांकि यह दीगर बात है कि इन कंपनियों के सीईओ और मालिकों की जेबें मोटी होती रहीं। पहले जनता की कमाई हवा में उड़ाई, फिर उसकी भविष्य की कमाई भी दांव पर लगाई और अब जब दीवालिया हुये तो बेल आउट चाहिए मतलब फिर से जनता के पैसे। क्रेडिट रेटिंग कंपनियों को पहले कुछ भी गलत नहीं दिखा। जो कंपनियाँ दीवालिया हुईं वे अधिकांश ब्लूचिप कंपनियाँ थीं। दुनियाँ भर में बेल आउट, कर छूट (जो कभी कर जमा नहीं करते उन्हें फिर से छूट?) और अन्य सुविधाएं दीं गईं । यही है हवाई खेल। शेयर मार्केट को ओपीएम कहना ठीक ही है - अदर पीपुल्स मनी और यह ओपियम अर्थात गांजे की तरह आप पर चढ़ कर बोलता है। चीन के भयानक भौतिक विकास और मंदी को टालने के लिए लड़े गए इराक और अफगानिस्तान युद्ध भी अब ठंडे पड़ चुके हैं। वैसे युद्ध अमेरिका के लिए पूंजी बटोरने का इंजन रहे हैं। दोनों महा युद्धों से अमेरिका ने खूब कमाया। और इतिहास गवाह है कि तब से अमेरिका सतत युद्धों में लगा हुआ है। चाहे वह वियतनाम हो, यूएसएसआर हो, अफ्रीका, कोरिया, यूरोप, मध्य पूर्व हो या फिर इराक और अफगानिस्तान हो। उसकी वार मशीन शाश्वत है। कोल्ड वार खतम हुया तो अब वार ऑन टेरर है। अमेरिका के लिए ऐसे अनिश्चित युद्ध आवश्यक हैं। मंदी भी आवश्यक है, बल्कि यूं कहिए पूंजीवादी उपभोक्तावाद के लिए मंदी जरूरी है। यह खेल हवाबाज पतंगबाजी की तरह है। पहले धूल देकर लोगों को उकसाओ और फिर अचानक अपनी पतंग समेत कर सबकी पतंग लूट लो। मंदी से इसी तरह महाकुबेर पैदा होते हैं। यही लोग पूंजीवाद को सुदृढ़ करते हैं। पैसा हर मंदी के बाद और कम हाथों में सिकुड़ जाता है यही केंचुआ जैसी चाल पूंजीवाद का सत्य है। फैलना फिर सिकुडना। केंचुआ लंबे समय में गंतव्य तक पहुंचता है। विशेषज्ञ इसी को आदर्श मानते हैं शेयर बाज़ार के लिए। लंबे समय तक टिके रहो लाभ मिलेगा। लेकिन फिर विकास की ऊंची दरें ? अजी वे तो “हवाई” हैं। आज 16% तो कल 4%। फिलहाल विशेषज्ञों और क्रेडिट एजेंसियों की “हवाई” सलाहों और हवाबाजी में हाथ जला चुके हों तो मेरी सलाह मान लीजिये और कुछ दिन अपनी बची खुची साख पर ऋण लेकर हवाई द्वीप पर एकांतवास बिताएँ। सोचें कि क्यूँ चार्वाक दर्शन एक बड़े धर्म के रूप में अपनी जड़े नहीं फैला पाया। लाभ होगा। फिर भी चैन न आए तो विरेचन चिकित्सा लें जैसी शेयर मार्केट ले रहे हैं।
अनुपम दीक्षित


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