22/01/2011

स्पेक्ट्रम गरीब की जोरू नहीं

स्पेक्ट्रम गरीब की जोरू नहीं
अनुपम दीक्षित
मानव संसाधन मंत्री का बयान दुर्भाग्यपूर्ण है। उनके बयान ने बहुत से प्रश्न और चिंताओं को जन्म दिया है। वे कहते हैं की सरकार का काम सम्पदा बढ़ाना नहीं है बल्कि सम्पदा बांटना है जैसे फ्री ज़मीन स्कूल और अस्पतालों को दी जाती है, वैसे ही स्पेकट्रूम। लेकिन सिबल साहब स्पेक्ट्रम गरीब की जोरू नहीं कि कोई भी अधिकार जमा ले। यह एक अमूल्य संसाधन है जिस पर देश का बहुत सा पैसा और मानव संसाधन खर्च हुए हैं। यह तो ठीक हैं कि सरकार बिज़नस नहीं करती लेकिन सिब्बल साहब आप यह भूल गए की इस स्पेकट्रूम पर जितना खर्चा हुआ उतना पैसा निकालना भी आवश्यक था और कंपनियों को फ्री में स्पेकट्रूम बाँटना ऐसा कोई काम नहीं जिसके लिए सरकार सारे नियम ताक पर रख दे। और यह भी तथ्य है की फ्री जमीन जिन स्कूलों और अस्पतालों को बनती गए उससे जनता का कोई भला नहीं हुआ हाँ बड़े उद्योगपतियों को ज़रूर लाभ हुआकौड़ियों के दामों में स्पेकट्रूम बाँट देने से आगर किसी को फायदा हुआ तो वे हैं टेलीकॉम कंपनियाँ जिन्होंने स्पेकट्रूम बोली को प्रभावित कर के जनता के खजाने को चूना लगाया और दूसरी ओर सेवा का मूल्य भी जनता से जम कर वसूला। ओवर बिलिंग, गलत बिलिंग जैसे मामले सामने आते ही रहते हैं। जहां तक स्पेक्ट्रम के मूल्य की बात है तो यह कपिल सिब्बल को अच्छी तरह पता ही होगा की जनता के टेक्स से इसरो व अन्य विभाग वर्षों की मेहनत और अरबों रुपये खर्च करके सेटेलाइट, रॉकेट, लौंचिंग साइट्स, उपकरण बनाते हैं, न जाने कितने मानव श्रम के घंटे और कूटनीति (यह तकनीक परमाणु, मिसाइलों से भी जुड़ी है अतः वैश्विक सम्बन्धों का असर भी पड़ता है) इस तकनीक के विकास में लगती हैइन सबकी लागत यदि जोड़ी जाए तो आकलन नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के आकलन से भी अधिक होगा। 1.76 लाख करोड़ से कहीं अधिक रकम इस स्पेकट्रूम तकनीक पर खर्च हो चुकी है। कम से कम इस रकम की वसूली तो होनी चाहिए थीसरकार अगर बिजनेस नहीं कर रही तो स्पेकट्रूम भी कोई खैराती वस्तु नहीं है।
महालेखा परीक्षक के आकलन पर भी उंगली उठाई गई है। उनका आकलन उनके कर्तव्य और औडिटिंग के  नियमों के ही अनुरूप है, लेकिन सरकार और संचार मंत्रालय ने जो किया वह न तो उसका कर्तव्य है और न ही नियमों के अनुसारमहालेखा परीक्षक का एक आकलन गलत है तो रिपोर्ट में तीन आकलन हैं और रिपोर्ट यह कहती है की सब कुछ नियमों के मुताबिक नहीं हुआ। महालेखा परीक्षक एवं अन्य रिपोर्टें भी इसी ओर इशारा करती हैं की घोटाला हुआ है और राजा पर शक की सुई टिकती है। यही मुख्य तथ्य है। इसकी जांच होनी चाहिए, साथ ही राडिया की टेपों की असलियत भी सामने आनी चाहिए और यहाँ टाटा को परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। असल में बड़े लोग क़ानूनों को अपने हिसाब से चलाना जानते हैं इसीलिए जब टाटा की कंपनी लोगों के नंबरों को बिना उनकी इजाज़त के मार्केटिंग कंपनियों को बेच देती है उन्हें निजता कानून की परवाह नहीं होती लेकिन जब राडिया के साथ उनकी बात उजागर होती है और जनता उनकी असलियत जानती है तो उन्हें निजता के अधिकार की याद आती है। लेकिन टाटा और कपिल सिब्बल को यह कौन सिखाएगा की उनके अधिकारों से भी ऊपर लोक तंत्र में जनता के अधिकार होते हैं और देश हि से बढ़ कर कोई अधिकार नहीं होता – न निजता का और न ही गोपनियता का। कपिल सिब्बल यह अनर्गल बयान दे कर असल में मुख्य प्रश्न से लोगों का ध्यान भटकना चाहते हैं। उनके बयान की टाइमिंग भी  यही इशारा करती है कि अब इस घोटाले कि जांच का कड़ा तय है। करुणानिधि से पीएम कि मुलाक़ात के बाद यह बयान आना यही बताता है। दरअसल जब यह आशंकाएँ व्यक्त की जा रही थी कि ए राजा पर यदि इस्तीफे का दबाव डाला जाएगा तो सरकार चली जाएगी क्यूंकि करुणानिधि समर्थन वापस ले लेंगे तब भी मैं आश्वस्त था कि ऐसी भूल करुणानिधि जैसा राजनेता कर ही नहीं सकता। आखिर जिस हद तक जांच को सरकार के साथ रह कर प्रभावित किया जा सकता है वह सरकार के बाहर संभव नहीं। अब सिब्बल से शुरू हो कर यह नाटक काँग्रेस ने भी शुरू कर दिया है। राजा को वैसे ही काफी समय दे दिया गया था अपने ऑफिस और कागजातों के प्रबंधन के लिए ताकि छापों में सब साफ हो। कपिल सिब्बल बड़े नेता हैं और साफ छवि के हैं लेकिन यहाँ उनका रुख ठीक नहीं है और उन्हों ने अपने मतदाताओं और प्रशंसकों को निराश किया है।
इस घोटाले में इतने बड़े नाम आए हैं की भारत का जन्म से नागरिक होने के कारण मुझे यह भरोसा है कि इसकी जांच शायद ही कभी पूरी होगी, शायद ही कभी दोषियों को सज़ा मिलेगी
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