15/08/2012

भारत की रेल पेल

बचपन में दादा के साथ रोज़ शाम को भरथना रेलवे स्टेशन तक घूमने जाना ही शायद इसका कारण है की ट्रेनें मुझे आज भी पसंद हैं। रेलवे स्टेशन की सीढ़ियाँ, रेलिंग, दूर तक जातीं पटरियाँ, खोमचों की गंध और इसके साथ ही बीड़ी और पसीने की मिली जुली अजीब सी --- क्या कहूँ - खुशबू या बदबू की परिभाषा फिट नहीं बैठती बस "बू" । भरथना का स्टेशन छोटा सा था पर अत्यधिक साफ सुथरा और व्यवस्थित। उस पर आज के शहरी स्टेशनों की भांति पाखाने के असह्य बदबू नहीं आती थी - आज भी नहीं आतीऔर कमोबेश हर छोटे स्टेशन पर नहीं आती पर जैसे ही बसावट शहरी होने लगती है यह बदबू बढ़ती जाती है। दिल्ली और मुंबई का तो हाल ही बुरा है। शायद शहरी होने की आपाधापी में हम सफाई भूल जाते हैं। खैर बात थी रेलों की और हम लूप लाइन पर चले गए। मेरा प्राथमिक विदद्यालय ही ट्रेनों पर निर्भर था। दादा जी हमें सीढ़ियाँ गिनवाते, ट्रेनों के डब्बों पर लिखे नंबर और अक्षर पढ़वाते। और ऐसे ही ट्रेनों से लगाव बढ़ता गया। अलीगढ़ प्रवास के दौरान तो किताबें खरीदने और तफरी करने की मनपसंद जगह थी रेलवे। फिर बाद में जब बड़े हुये और प्रकृतिक विज्ञानों की समाज से दूर पढ़ाई छोड़ कर इतिहास, राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र जैसे समाज से करीब विषय पढे तो जाना की रेलों की विश्व इतिहास में बहुत खास भूमिका है और अकेले हम ही नहीं रेलों के दुनियाँ में अनेक दीवाने हैं। जेम्स वाट और न्यू कोमेन के भाप के इंजनों ने ही हमें यहाँ तक पहुंचाया है। भाप के इन इंजनों को इंग्लैंड में पहले से ही मौजूद लकड़ी और लोहे की रेलों और वैगनों या ट्राम में फिट किया गया। यह भाप का इंजन और उपनिवेशों की विशाल कमाई इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति का कारण बनी। अमेरिका, औस्ट्रेलिया, अफ्रीका और रूस में यह गोल्ड रश, डायमंड रश और ब्लेक रश जैसी क्रांतियों का कारण बनीं। यही नहीं रेलों का सामाजिक प्रभाव भी अद्भुत था और है। रेलों ने दूरस्थ प्रदेशों को जोड़ कर 19वीं और 20वीं शताब्दियों में पनपते राष्ट्रवाद को मजबूती दी। भारत जैसे देश में हालांकि रेलों की शुरुआत अंग्रेजों ने अपने फ़ायदों के लिए ही की लेकिन यह रेल भारत को एक राष्ट्र बनाने में बहुत हद तक जिम्मेदार थी। रेल ने दूर के प्रदेशों को आपस में जोड़ा और जाति प्रथा के दंश को किसी हद तक कम किया। आखिरकार भारत के मुक्तिसंग्राम को एक नया मुखिया रेलों के कारण ही तो मिला था। ना मोहनदास गांधी को दक्षिण अफ्रीका में रेलगाड़ी के डब्बे से बाहर फेंका गया होता और ना ही उनके चिंतन को एक नयी दिशा मिली होती। और जब 1915 में गोखले ने गांधी को भारत को समझने की सलाह दी तो असली भारत देखने के लिए उनकी जिस साधन ने सर्वाधिक उपयोगिता सिद्धा की वह भारतीय रेल ही थी। भारत के आंदोलनों में तो यह उस राज सत्ता का प्रतीक भी थी। आजादी के आंदोलनों में रेल रोकना, पटरियाँ नष्ट करना अंग्रेजों के प्रति   घृणा दिखने का सबसे सुलभ प्रतीक थी। भारत के विभाजन की त्रासदी को व्यक्त करने वाली कुछ सबसे महत्वपूर्ण रचनाएँ जैसे ट्रेन टु पाकिस्तान और भीष्म साहनी की कहानी (नाम इस समय याद नहीं आ रहा) ट्रेनों की पृष्ठभूमि पर आधारित हैं।
आज भी भारतीय रेल दुनियाँ की सबसे बड़ी सेवा है। रोजाना करीब 3 करोड़ लोग इसमें सफर करते हैं और लगभग 1 करोड़ इससे संबन्धित सेवाओं का लाभ उठाते हैं। रेलवे करोड़ो लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मुहैया करती है। छोटे शहरों में रेलवे स्टेशन शहर की धुरी की तरह होते हैं और आपंको एक सलाह - अगर कभी यात्रा में अंजान शहर में फंस जाएँ तो सीधे रेलवे स्टेशन की ओर रुख कीजिये। देर रात तक चहल पहल आपको वहीं मिलेगी और सुरक्शित भी रहेंगे। 

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