08/02/2012

उदार हृदय और खुला दिमाग

File:Oprah Winfrey (2004).jpgओप्रा विनफ्रे हाल ही में भारत प्रवास पर थीं। वे दिल्ली आगरा, जयपुर, मथुरा और मुंबई भी गईं और हर जगह लोगों ने उन्हें खुले दिल और उदार हृदय से स्वीकारा। जयपुर में जो सम्मान उन्हें मिला उससे अभिभूत होकर उन्होंने अपनी दादी की इच्छा का ज़िक्र किया की उनकी दादी चाहतीं थीं की वे एक सम्मानित व्यक्ति के रूप में बड़ी हों। बेशक उन्हें अपने टीवी प्रोग्रामों से ना केवल अमेरिका बल्कि पूरे विश्व में भरपूर प्यार और प्रशंसा मिली है। वे खास हैं। वे नारी शक्ति की प्रतिनिधि हैं और उनके कार्यक्रमों  का सकारात्मक स्वरूप प्रेरणादायी है। वे यहाँ भारतीय विधवाओं के दशा पर अपने कार्यक्रम के लिए फिल्म बनाने आयीं थी और मथुरा में वे उन्हीं विधवाओं से मिलने गईं थीं। यह अच्छी बात है की लोग इन विधवाओं की दुर्दशा पर सोचें लेकिन दुख तब होता है जब यह सोच तभी निकलती है जब किसी को अपनी फिल्म बनानी है या किताब लिखनी है। इससे आगे की लड़ाई कौन लड़ेगा? और तभी यह स्पष्ट हो जाता है कि फिल्में तो बनती ही रहेंगी फिलहाल तो इन विधवाओं की आवास और भोजन, कपड़े की लड़ाई तो पारंपरिक मंदिर, ट्रस्ट आदि ही कर रहे हैं और बेशक शोषण भी (सभी नहीं)। फिल्म बना कर किताब लिख कर आप स्थिति तो उजागर कर देते हैं लेकिन इससे आगे कि लड़ाई लड़ने वाला कोई नहीं आता। क्यूँ नहीं आज फिर कोई ज्योतिबा फुले पैदा होता? क्या होता अगर गांधी जी देश की दुर्दशा पर केवल किताबें लिखते रह जाते और ज्योतिबा फुले भाषण ही देते रहते? भारत का विरोधाभास सभी विदेशियों को चकित करता है। लेकिन यही सच्चाई है। यह विरोधाभास उपजता ही तब है जब हम विकास का मतलब ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों और चमकती गाड़ियों से लगते हैं। पर जब इन्हीं इमारतों को बनाने वाले मजदूर, किसी महाशहर के बाहर अमानवीय परिस्थितियों में अवैध बस्तियों में अपने दिन काटने लगते हैं तो हमें विरोधाभास दिखाई देता है और तब कोई उन्हें झुग्गियों का कुत्ता(स्लम डॉग ) कह कर उपहास उड़ाते हुये तमाम पुरस्कार बटोर लेता है क्यूंकी  उन देशों के दर्शकों के लिए यह स्लम डॉग अजूबा है। ओप्रा को भी जयपुर में बैलगाड़ी पर सरिये ढोते, गधे पर बैठा आदमी और मोटरसाइकिल पर बैठा मोबाइल पर बतियाते आदमी में भारतीय विरोधाभास के दर्शन हुये। पता नहीं यह तीन  घटनाएँ  भगवान बुद्ध की भांति उनके जीवन पर क्या प्रभाव डालेंगी। यह विरोधाभास उन्हें ,उ,बाई में भी दिखा जब वे बच्चन के यहाँ गईं और आश्चर्य किया कि अभिषेक अभी भी अपने पिता के यहाँ क्यूँ रहते हैं। बेशक भारत यात्रा एक सामान्य पर्यटक के लिए एक ना भूलने वाला अनुभव होता है लेकिन ओप्राः से यह आशा नहीं थी कि वे सांस्कृतिक भिन्नता को अपने चश्मे से देखेंगीं। हमारे लिए बच्चों को अपने घरों में रखना एक सामान्य बात है अमेरिका में नहीं। अभी हाल ही में नॉर्वे का मामला चर्चित था जिसमें डॉ छोटे बच्चों के  लालन पालन में अक्षम ठहरा कर उनके माता पिता से छीन कर दत्तक परिवार में रख दिया गया। बेशक ऐसे कानून वहाँ आवश्यक हैं। क्यूंकी न समाज और न ही परिवार पालन पोषण के कठिन कार्य में सहयोगी नहीं होता लेकिन यहाँ भारत में न केवल नवमातृत्व के लिए सुरक्षित वातावरण और दादी, नानी, माँ, सासू माँ का अनुभव और सहता सदैव उपलब्ध रहती है। निश्चित ही हम बड़े शहरों में एकल परिवारों, और पूर्णतः कटे पड़ोस और बढ़ते अपराधों से जूझ रहे है। ओप्रा को अमेरिकी समाज के विरोधाभासों पर सोचना चाहिए और भूमंडलीकरण  के इस दौर में जहां लोगों का आना जाना बढ़ रहा है सांस्कृतिक विभिन्नताओं को विरोधाभास समझने से बचना चाहिए। यह विरोधाभास ही हैं जो आज अमेरिकी कंपनियों को भारत की ऊर मोड रहे हैं। निश्चित ही किसी अमेरिकी कंपनी को अपनी बहू मंजिली इमारत बनाने के लिए सस्ते मजदूर, कम लागत का ऐसा ट्रांसपोर्ट और कम पैसों में कैसा भी काम करने वाले योग्य कर्मचारी अमेरिका में तो मिलेंगे नहीं। हालांकि हमें भारत के इन विरोधाभासों से कोई लगाव नहीं है लेकिन ओप्रा जैसी हस्ती से फिर वही सस्ती टिप्पणियाँ सुनना  भी कोई कम विरोधाभासी नहीं हैं - आप खुले दिमाग और उदार हृदय से आयें हैं तो फिर विरोधाभास क्यूँ कहते हैं? ओप्रा आपसे विचारों कि अधिक गहराई कि अपेक्षा थी। रही बात स्टैंडिंग ओवशन  कि तो यह हम भारतीयों कि आदत है - बिछ जाने कि  बस वह आदमी अमेरिकन होना चाहिए। ओप्रा को इसमें भी विरोधाभास दिखना चाहिए था। 

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