05/12/2011

ज़िंदगी से इश्क़ का फसाना - देव आनंद

देव आनंद अब नहीं है लेकिन लगता है जैसे इस बात से खास फर्क नहीं पड़ता की वे सशरीर यहाँ हैं या नहीं। कुछ लोगों की शख्सियत उनसे भी बड़ी हो जाती है। देव आनंद बेशक अपने ज़िंदादिल अंदाज़ और ज़िंदगी की ललक के प्रतिमान बन कर हमारे बीच हमेशा रहेंगे और उनकी फिल्में, गाने तो हैं ही – सदाबहार। अभी कुछ दिन पहले ही उनका साक्षात्कार देखा था। बेबाक, खरी और भड़कीली बातें सभी को लुभातीं थी।  88 वर्ष की उम्र में भी देवानन्द की ज़िंदादिली में कोई कमी नहीं थी। वे सदाबहार थे ।  कोई शख्स सदाबहार कैसे हो सकता है। सदाबहार रहने के लिए आपको खुद को समय समय पर बदलना पड़ता है जैसे एक सदाबहार वृक्ष अपने पत्तों को निरंतर बदलता रहता है। बदलना एक कठिन काम है। लोग हमेशा बदलाव को ना पसंद करते हैं। लेकिन आगे बढ़ने के लिए बदलना जरूरी है। आगे बढ़ना भी जरूरी है,  एक दरिया की तरह,  ना कि एक पोखर की भांति, ठहरा हुआ ।  पोखर का पानी सड़ जाता है पर दरिया निर्मल रहता है,  क्यूंकी उसमें निरंतर नया जल आपूरित होता रहता है। इसी से दरिया प्रवाहमान बनाता है और उसमें  अपना रास्ता खुद बनाने कि ताकत भी इसी प्रवाह से आती है -
हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
जिधर भी चल पड़ेंगे उधर, रास्ता हो जाएगा
शायद देव साहब की यही नवीनता  उनके सदाबहार होने के पीछे की ताकत थी।  जब उनसे एक साक्षात्कार में पूछा गया की आप की सर्वश्रेष्ठ फिल्म कौन सी है तो उनका जवाब था अभी जो फिलम में बना रहा हूँ वही मुझे सर्वश्रेष्ठ लगती है हालांकि लोग कहते हैं की गाइड थी। वर्तमान में जीना ही भविष्य के लिए ऊर्जा देता है। बेशक गाइड उनकी बेहतरीन फिल्म थी लेकिन अगर कोई कलाकार यह मान ले कि वह अपना सर्वोत्तम दे चुका है तो बेहतरी की गुंजाइश नहीं रहती। देव आनंद ने यही नहीं किया। अपनी पहली हिट फिल्म के बाद ही जो कंपनी उन्होने बनाई उसका नाम ही उनके इस दर्शन को अभिव्यक्त करता है – नवकेतन। नवीनता के इस पुजारी ने निरंतर खुद को नए साँचे में ढाला। अभिनेता के बाद प्रोड्यूसर और फिर निदेशक व पटकथा लेखक। एक समय रोमांटिक हीरो की छवि वाले इस कलाकार के सह कलाकार राज कपूर जब  पिता का रोल करने लगे थे और दिलीप कुमार कि फिल्में पिटने लगीं थीं,  देवानन्द ने हरे रामा हरे कृष्णा और तेरे मेरे सपने जैसी दो बिलकुल भिन्न स्वभाव कि लेकिन सुपर हिट  फिल्में  दे कर जैसे घोषित कर दिया हो कि उनका समय अभी गया नहीं है। इसके बाद तो बनारसी बाबू, छुपा रुस्तम, अमीर गरीब, हीरा पन्ना  जैसी सफल फिल्मों की श्रंखला ने उन्हें पुनः स्थापित कर दिया।
और इतना ही नहीं परिवर्तन और नवीनता का यह प्रतीक अभिनेता अपनी सामाजिक उत्तरदायित्व को भी नहीं भूला और जहां 70 के उत्तरार्ध में इन्दिरा जी की इमरजेंसी के खिलाफ अच्छे अच्छों कि बोलती बंद हो गयी देवानन्द ने एक राजनीतिक पार्टी "नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया" बना कर 77 के चुनावों में इन्दिरा जी का विरोध भी किया था।

88 वर्ष का यह पुराना शख्स निरंतर नवीनता कि खोज में लगा रहा। चाहे वह फिल्में हों, फिल्में बनाने का तरीका हो, हीरोइने हों या असल जिंदगी में उनकी प्रेमिकाएँ हों। सुरैया, कामिनी कौशल और ज़ीनत अमान के साथ उनके रोमांस के किस्से भी चले और यह सभी असफल प्रेम कहानियों कि परिणति को प्राप्त हुये। इन पर सोचते हुये उन्हें कहते सुना कि हार असल में ग्रोथ है। असफलता नए दरवाजे खोलती है और हर बार जब में हारा तो मुझे नया मुकाम मिला। ऐसे ही फलसफे का बयान है उनकी आत्मकथा "रोमांसिंग विथ लाइफ" जिसमें अनेक किस्से रोचक भी हैं। आज उनके जाने से जो स्थान रिक्त हुआ है वह शायद ही भर पाये। मन तो नहीं हुआ उनकी मौत पर दुखी होने का पर फिर भी

शाम से आँख में नमी सी है,
आज फिर आपकी कमी सी है ।

 तो आइए अब से कुछ दिनों तक हम उनकी तरह ही इस ज़िंदगी का जश्न मनाएँ और इसके उन लम्हों को भरपूर जिएँ जो कि बस आज ही हैं - क्या पता कल हों न हों।
अंत में एक खूबसूरत गीत उन्हीं की फिल्म से।
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।
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