16/08/2011

अन्ना का आंदोलन, सरकारी दमन और संविधान

अन्ना का आंदोलन, सरकारी दमन और संविधान
मैं 1975 में पैदा हुआ था और मैंने आज़ादी की लड़ाई को नहीं देखा पर इतिहास में पढ़ा था की कैसे गांधी जी के अहिंसक आंदोलनों ने अंग्रेजों को हर बार और गहरी मुसीबत में दाल दिया था। उस दौरान हमें ऐसे जुमले सुनाई देते थे “यह अधनंगा बुड्ढा” या फिर “सिरफिरा फकीर” या फिर “पागल आदमी”। ब्रिटिश सरकार के कारनामे भी भयानक थे। नेताओं को गिरफ्तार किया गया, आवाज़ दबाई गई। यह सब मैंने केवल पढ़ा ही था। आश्वस्त था की आज़ादी के बाद अब कभी ऐसे ज़ुल्म देखने को नहीं मिलेंगे और किसी की भी शांतिपूर्वक कही गयी बात को दबाया नहीं जाएगा। हमारा संविधान हमें कुछ मौलिक अधिकार देता है और इसके भाग 3 के पैरा नंबर 13(2) में यह साफ साफ कहा गया है कि -
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और ठीक इसके बाद खंड 19 मुझे अधिकार देता है स्वतन्त्रता का जिसमें बहुत से अधिकार शामिल हैं ।
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इन अधिकारों की रोशनी आज धुंधली पड़ गयी जब मैंने सरकार को, उसमें शामिल चुने हुये प्रतिनिधियों को ठीक वही भाषा बोलते सुना। मेंने सुना महाराष्ट्र के एक कद्दावर नेता को अन्ना को पागल कहते हुये, मैंने सुना कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को अन्ना के आंदोलन को ढोंग, नाटक, राजनीति, अवसरवाद ठहराते हुये। मैंने देखा सरकार को दिल्ली में लोगों पर लठियाँ भँजते हुये, निहत्थे लोगों पर ताकत आजमाते हुये। आज 16 अगस्त 2011 को आज़ादी की 64वीं वर्षगांठ के ठीक एक दिन बाद मेंने सरकार को हमारे पवित्र संविधान की धज्जियां उड़ाते हुये देखा। सरकार ने अन्ना को गिरफ्तार किया पर उनका कसूर नहीं बताया। सरकार ने उन्हें शांतिपूर्वक आंदोलन करने की अनुमति नहीं दी। उन्हें उसी जेल में रखा जिसमें महा भ्रष्ट मगरमच्छ रखे गए हैं। मुझे अपने संविधान पर भरोसा है। इसी संविधान में हमारी सर्वोच्च न्यायपालिका को यह शक्ति दी गयी है की वह ऐसे मामलों पर बिना किसी याचिका का इंतज़ार किए स्वयं सक्रिय हो कर आवश्यक कदम उठा सकती है। सरकारों को जवाब देना होगा।
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